Thursday, January 20, 2011

अगस्त्य संहिता में इलेक्ट्रोप्लेटिंग की विधि (Electroplating process in Agastya Samhita)

हमारी सबसे बड़ी विडम्बना है कि हम अपने प्राचीन ग्रन्थों में निहित सामग्री को कपोल कल्पना समझते हैं, संस्कृत साहित्य को केवल मन्त्रोच्चार की सामग्री समझते हैं, ब्रह्म संहिता, वाल्मीकि रामायण आदि में वर्णित स्थानों के नाम को कल्पित नाम समझते हैं जबकि हमारे प्राचीन ग्रन्थ ज्ञान के अथाह सागर हैं।

"Technology of the Gods: The Incredible Sciences of the Ancients" (Google Books) का लेखक उद्धृत करता हैः
"In the temple of Trivendrum, Travancore, the Reverned S. Mateer of the London Protestant Mission saw 'a great lamp which was lit over one hundred and twenty years ago', in a deep well in side the temple. ....... On the background of the Agastya Samhita text's giving precise directions for constructing electrical batteries, this speculation is not extravagant."
अर्थात्
"लंदन प्रोटेस्टैन्ट मिशन के Reverned S. Mateer ने त्रिवेन्द्रम, ट्रैवंकोर के मन्दिर में 'एक महान दीप (a great lamp) देखा जो कि पिछले एक सौ बीस वर्षों से जलता ही चला आ रहा था'। .....अगस्त्य संहिता में निहित विद्युत बैटरी बनाने के स्पष्ट दिशा निर्देश की पृष्ठभूमि में उनके अवलोकन को अतिशयोक्ति या असत्य नहीं कहा जा सकता।"
(चूँकि उपरोक्त पुस्तक कॉपीराइटेड है, हमने उसमें से एक दो पंक्तियों को ही उद्धृत किया है और उसके लिए आभार भी व्यक्त करते हैं।)

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज की अनेक आधुनिक तकनीकों का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। शुक्र नीति के अनुसार आज के इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए "कृत्रिमस्वर्णरजतलेपः" शब्द का प्रयोग करते हुए इसे "सत्कृति" नाम नाम दिया गया है - "कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते"।

अगस्त्य संहिता में विद्युत बैटरी का सूत्र (Formula for Electric battery in Agastya Samhita) के विषय में हम पहले ही बता चुके हैं और अब यह बताना चाहते हैं कि अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌ का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए करने की विधि दर्शाते हुए निम्न सूत्र मिलता हैः

यवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रं स्वर्णेन रजतेन वा।
सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रं शातकुंभमिति स्मृतम्‌॥


अर्थात्‌- लोहे के पात्र में रखे गए सुशक्त जल (तेजाब का घोल) का सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से आच्छादित कर देता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ स्वर्ण कहा जाता है।

मुझे संस्कृत का विशेष ज्ञान नहीं है अतः मेरे द्वारा किया गया अर्थ दोषयुक्त हो सकता है, संस्कृत के पण्डित और भी अच्छा हिन्दी अनुवाद कर पाएँगे।

(सन्दर्भः http://www.organiser.org/dynamic/modules.php?name=Content&pa=showpage&pid=184&page=22)

हमें तो यह भी प्रतीत होता है कि संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त लघु और गुरु मात्राएँ भी आज के बायनरी के अंक अर्थात् 0 और 1 हैं और अनुष्टक श्लोक उनके 8 bits याने कि 1 bite हैं। बहुत सी वैज्ञानिक जानकारी, जैसा कि आज भी होता है, संकेत (codes) में लिखा गया है। आज आवश्यकता है तो अपने प्राचीन ग्रन्थों का गूढ़ अध्ययन करके शोध करने की।
Post a Comment