Wednesday, March 30, 2011

पतझड़ का सौन्दर्य - मनुष्य को प्रकृति का एक अलौकिक दान!

सुबह-सुबह के सूर्य की किरणें, जो अभी एक माह पहले तक भली लगती थीं, अब प्रखर होकर संतप्त करने लगी हैं। वायु में शीतलता के स्थान पर उष्णता का आभास होने लगा है। यद्यपि पलास और सेमल के पत्रविहीन वृक्ष अभी भी रक्तवर्ण पुष्पों से सुशोभित हैं, किन्तु आम्रवृक्षों की डालियों में अब आम्रमंजरी के स्थान पर आमफल के गुच्छे दृष्टिगत होने लगे हैं। पतझड़ अपना पूर्ण यौवन प्राप्त कर चुका है और पेड़ों के नीचे उनके गिरे हुए पत्तों के ढेर दिखाई देने लगे है। बड़ और पीपल वृक्षों के छोटे-छोटे पके हुए फल टप-टप करके टपकने लगे हैं जिन्हें खाने के लिए नन्हें-नन्हें पक्षियों का झुँड मँडराते रहता है। ये समस्त दृष्य एक प्रकार के सौन्दर्य के प्रती नहीं है तो फिर क्या हैं? यही तो है पतझड़ का सौन्दर्य! मादकता के साथ आलस्य का संगम! वसन्त के अवसान और ग्रीष्म के आरम्भ का सूचक! मनुष्य को प्रकृति का एक अलौकिक दान!
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