Thursday, March 31, 2011

भारतीयों में राष्ट्रीय भावना खेल भरती है या प्रतिद्वन्द्विता?

क्रिकेट, भारत का राष्ट्रीय खेल न होने के बावजूद भी, आज देश में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है। कल  मार्च  को भारत और पाकिस्तान के मध्य खेले गए क्रिकेट मैच के दौरान प्रत्येक भारतीय के भीतर बसी भारत की जीत की कामना और भारत की जीत के के पश्चात् उनकी जुनून की हद तक पहुँच जाने वाली प्रसन्नता भारतीयों की असीम और अटूट राष्ट्रीय भावना का द्योतक हैं। वास्तव में देखा जाए तो जन-जन के भीतर भारतीयता की भावना भर देने में में क्रिकेट की अपेक्षा भारत-पाकिस्तान की चिरप्रतिद्वन्द्विता की भावना की भूमिका कहीं बहुत अधिक है। वर्तमान पीढ़ी के बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि एक जमाने में भारत-पाकिस्तान के मध्य हॉकी का मैच, विशेषतः विश्वकप में फायनल मैच, प्रत्येक भारतीय को सिर्फ और सिर्फ भारतमय बना दिया करती थी। धीरे-धीरे हॉकी की लोकप्रियता घटते-घटते लोपप्राय हो गई और क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ते-बढ़ते चरम में पहुँच गई किन्तु भारत-पाकिस्तान की चिरप्रतिद्वन्द्विता की भावना ज्यों की त्यों बरकरार ही रही और समस्त भारतीयों के भीतर राष्ट्रीयता की भावना भरने की भूमिका को सतत् रूप से निभाती रही।

6 टिप्पणियाँ:

खुशदीप सहगल said...

आज तो हर भारतवासी को पूरी ताकत के साथ मुठ्ठियां हवा में लहराते हुए ये गाना गाना चाहिए...

हिमालय की चोटी पर चढ़ कर,
हमने ये ललकारा है,
दूर हटो, दूर हटो,
हटो हटो, ऐ श्रीलंका वालों,
वर्ल्ड कप हमारा है...

जय हिंद...

anshumala said...

सही कहा ऐसे मौके पर हम सब बस भारतीय ही रह जाते है | हल के दिनों में आस्ट्रेलिया से भी प्रतिद्वंदिता बढ़ी है किन्तु पाकिस्तान वाली बात अब भी नहीं आई है |

Manpreet Kaur said...

अच्छी सोच हम सब की सहमत ! हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर जरुर आना !
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भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

जबरदस्ती का हो-हल्ला मचा दिया जाता है...

Udan Tashtari said...

ऐसे मौकों पर ऐसा ही होता है.

प्रवीण पाण्डेय said...

यह भावना बनी रहे।

 
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