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Monday, October 31, 2011
अमीर भारत की जनता को गरीब बनाने वाले काले अंग्रेज
यह तो हम सभी जानते हैं कि सोने की खदानें भारत में न तो आज हैं और न कभी पहले ही थी। फिर भी इतना सोना था भारत में कि उसे "सोने की चिड़िया" कहा जाता था। फिर प्रश्न यह उठता है कि आरम्भ ले लेकर अठारहवीं शताब्दी तक भारत विश्व का सबसे धनाढ्य देश कैसे बना रहा? जब भारत में सोने की खानें ही नहीं थीं तो फिर इतना सारा सोना वहाँ आया कहाँ से? जाहिर है कि उन देशों से आया होगा जहाँ सोने की खदानें हैं। पर इतिहास गवाह है कि कई हजार साल के अपने इतिहास में भारत ने कभी भी किसी अन्य देश पर आक्रमण नहीं किया, किसी को भी लूटा नहीं। जब लूटा नहीं तो फिर भी दूसरे देशों से सोना कैसे आ गया? कोई किसी को सेंत-मेत में सोना तो देने से रहा। भारत ने लूटा नहीं और दूसरे देशों ने सेंत-मेंत में दिया नहीं फिर भी भारत में दूसरे देशों से न केवल सोना बल्कि चाँदी, हीरे, लाल जैसे अन्य रत्न आते रहे। लूट-खसोट से नहीं बल्कि व्यापार से। भारत कोई असभ्य देश नहीं था जो दूसरों को लूटता, लूटने का काम तो सिर्फ असभ्य ही करते हैं। भारत अत्यन्त प्राचीनकाल से ही सभ्य देश रहा है। प्राचीनकाल से ही भारत का व्यापार अत्यन्त समृद्ध रहा है। भारत के उत्पादनों की संसार भर के देशों में माँग थी और भारत का निर्यात विश्व के कुल निर्यात का एक तिहाई था। भारत के समृद्ध व्यापार ने भारत को एक ऐसा गड्ढा बना कर रख दिया था जिसमें दुनिया भर से धन-दौलत आ-आ कर भरने के तो सत्रह सौ साठ रास्ते थे पर उसमें उसे निकल जाने के लिए कोई भी रास्ता नहीं था। यही कारण है कि भारत विश्व का सर्वाधिक धनाढ्य देश बन गया था। भारत के अनेक मन्दिरों तथा राजा-महाराजओं के धनागार में वह धन इकट्ठा होते रहता था।
अत्यन्त प्राचीनकाल से ही भारत का व्यापारिक सम्बन्ध भारत से बाहर के देशों से स्थापित हो चुका था। भारत में बने कपड़ों की प्रायः सभी देशों में माँग बनी ही रहती थी, भारत के मसालों के लिए तो अन्य देश के लोग मसालों के वजन के बराबर सोना तक देने के लिए तैयार रहते थे। यह व्यापारिक सम्बन्ध मुग़ल अमलदारी में फिर से नये सिरे से फिर स्थापित हुआ। मुग़ल-साम्राज्य की समाप्ति तक अफ़गानिस्तान दिल्ली के बादशाह के अधीन था तथा अफ़गानिस्तान के जरिये बुखारा, समरकंद, बलख, खुरासान, खाजिम और ईरान से हजारों यात्री तथा व्यापारी भारत में आते रहते थे। बादशाह जहांगीर के राज्यकाल में तिजारती माल से लदे चौदह हजार ऊँट प्रतिवर्ष बोलान दर्रे से भारत आते थे। इसी प्रकार पश्चिम में भड़ोंच, सूरत, चाल, राजापुर, गोआ और करबार तथा पूर्व में मछलीपट्टनम तथा अन्य बन्दरगाहों से सहस्रों जहाज प्रतिवर्ष अरब, ईरान, टर्की, मिस्र, अफ्रीका, लंका, सुमात्रा, जावा, स्याम और चीन आते-जाते थे।
भारत की अकूत धन-सम्पदा को प्राप्त करने के लालच में यवन, शक, हूण, तुर्क, मुगल आदि जैसी असभ्य और बर्बर जातियों ने बार-बार आक्रमण करते रहे। अनेकों बार लूटे जाने के बावजूद भी भारत की धन-सम्पदा अकूत ही बनी रही। अंग्रेजों के आने तक भारत संसार का सबसे धनी देश बना ही रहा। शाहजहां की धन-दौलत का अनुमान तक कोई भी इतिहासज्ञ नहीं लगा सका है। उसका स्वर्ण-रत्न-भण्डार संसार भर में अद्वितीय था। गोलकुण्डा से ही उसे तीस करोड़ की सम्पदा प्राप्त हुई थी, आज के तीस करोड़ नहीं बल्कि आज से लगभग चार सौ साल पहले के तीस करोड़ रुपये। शाहजहां ने मक्का में काबा मस्जिद में एक ठोस सोने की एक मोमबत्ती, जिसमें सबसे बहुमूल्य हीरा जड़ा था जिसकी कीमत एक करोड़ रुपये थी, भेंट की थी। कहा जाता है कि शाहजहां के पास इतना धन था कि फ्रांस और पर्शिया के दोनों महाराज्यों के कोष मिलाकर भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते थे। तख्त-ए-ताउस सोने के ठोस पायों पर बना हुआ था जिसमें मोतियों और जवाहरात के दो मोर बने थे। उसमें पचास हजार मिसकाल हीरे, मोती और दो लाख पच्चीस मिसकाल शुद्ध सोना लगा था, जिसकी कीमत सत्रहवीं शताब्दी में तिरपन करोड़ रुपये आँकी गई थी। इससे पूर्व इसके पिता जहांगीर के खजाने में एक सौ छियानवे मन सोना तथा डेढ़ हजार मन चाँदी, पचास हजार अस्सी पौंड बिना तराशे जवाहरात, एक सौ पौंड लालमणि, एक सौ पौंड पन्ना और छः सौ पौंड मोती थे। शाही फौज अफसरों की दो हजार तलवारों की मूठें रत्नजटित थीं। दीवाने-खास की एक सौ तीन कुर्सियाँ चाँदी की तथा पाँच सोने की थीं। तख्त-ए-ताउस के अलावा तीन ठोस चाँदी के तख्त और थे, जो प्रतिष्ठित राजवर्गी जनों के लिए थे। इनके अतिरिक्त सात रत्नजटित सोने के छोटे तख्त और थे। बादशाह के हमाम में जो टब सात फुट लम्बा और पाँच फुट चौड़ा था, उसकी कीमत दस करोड़ रुपये थी। शाही महल में पच्चीस टन सोने की तश्तरियाँ और बर्तन थे। वर्नियर कहता है कि बेगमें और शाहजादियाँ तो हर वक्त जवाहरात से लदी रहती थीं। जवाहरात किश्तियों में भरकर लाए जाते थे। नारियल के बराबर बड़े-बड़े लाल छेद करके वे गले में डाले रहती थीं। वे गले में रत्न, हीरे व मोतियों के हार, सिर में लाल व नीलम जड़ित मोतियों का गुच्छा, बाँहों में रत्नजटित बाजूबंद और दूसरे गहने नित्य पहने रहती थीं।
भारत की इस अथाह धनराशि के विषय में एशियाई देश तो जानते ही थे, यूरोपीय देशों में भी इसकी चर्चा होती थी। किन्तु फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों के पास भारत पहुँचने का कोई आसान जरिया नहीं था। फिर पन्द्रहवीं शताब्दी में पुर्तगाली वास्को डा गामा ने भारत पहुँचने का समुद्री रास्ता खोज लिया। भारत की अकूत धन-सम्पदा को देखकर उसकी आँखें चौंधिया गईं। उसने जब वापस जाकर यहाँ के वैभव के बारे में यूरोप को बताया तो यूरोपीय लोगों का मुँह में पानी आने लग गया। उन्हें पता चल गया था कि भारत के एक समुद्री तट से दूसरे समुद्री तट में जाकर व्यापार करने वाले जहाजों में अपार धन होता है। बस फिर क्या था, हिन्द महासागर यूरोपीय समुद्री डाकुओं से पट गया। पुर्तगाल और स्पेन के समुद्री डाकू दो सौ साल तक भारतीय जहाजों को लूटते रहे। यहाँ तक कि पुर्तगालियों ने मंगलौर, कंचिन, लंका, दिव, गोआ और बम्बई के टापू को अपने अधिकार में ही ले लिया।
वैसे तो उन दिनों अधिकांश यूरोपीय देश लुटेरे ही थे किन्तु उनमें सबसे पहला नंबर इंग्लैंड का था क्योंकि इंगलैंड अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ तक घोर दरिद्रता, निरक्षरता और अन्धविश्वासों का दास बना हुआ था। कृषि वहाँ होती नहीं थी, व्यापार, उद्योग-धंधे वहाँ थे नहीं। इंगलैंड के पीछे न तो किसी जातीय सभ्यता का इतिहास था और न ही किसी प्राचीन संस्कृति की छाप। पर सत्रहवीं शताब्दी के पहले इंग्लैंड के लुटेरे भारत तक पहुँच ही नहीं पाए क्योंकि उनके पास भारत आने के रास्ते का नक्शा नहीं था। रानी एलिजाबेथ के शासनकाल में सर फ्रांसिस ड्रेक नामक एक डाकू, जो कि ‘समुद्री कुत्ते’ के नाम से विख्यात था, एक पुर्तगालियों के जहाज को लूट लिया तो उसमें उसे लूट के माल के साथ भारत आने का समुद्री नक्शा भी मिल गया। भारत के धन-वैभव के विषय में उन्होंने सुन ही रखा था इसलिए इस नक्शे के मिल जाने पर ही ईंस्ट इंडिया कंपनी की नींव का पहला पत्थर डाला गया।
भारतीय जलमार्ग के नक्शे के मिल जाने के लगभग तीस साल बाद सन् 1608 में अंग्रेजों का ‘हेक्टर’ नामक एक जहाज सूरत के बन्दरगाह में आकर लगा। जहाज का कप्तान का नाम हाकिन्स था जो कि पहला अंग्रेज था जिसने भारत की भूमि पर कदम रखा था। उन दिनों भारत में बादशाह जहांगीर तख्तनशीन थे। हाकिन्स ने आगरा जाकर इंग्लिस्तान के बादशाह जेम्स प्रथम का पत्र और सौगात बादशाह को भेंट की। आगरा की विशाल अट्टालिकाएँ, नगर का वैभव और बादशाह जहांगीर के ऐश्वर्य को देखकर उसकी आँखें चुँधिया गईं। ऐसी शान का शहर उसने अपने जीवन में कभी देखा ही नहीं था, देखना तो दूर उसने ऐसे वैभवशाली नगर की कभी कल्पना भी नहीं की थी। चिकनी-चुपड़ी बातें करके उसने बादशाह को खुश कर लिया और अंग्रेजों को सूरत में कोठी बनाने तथा व्यापार करने का फर्मान भी जारी करवा लिया। इतना ही नहीं इस बात की भी इजाजत ले ली कि मुगल दरबार में अंग्रेज एलची रहा करे। थोड़े ही समय पश्चात् सर टॉमस रो इंग्लिस्तान के बादशाह का एलची बनकर मुगल-दरबार आया और उसने अंग्रेज व्यापारियों के लिए और भी सुविधाएँ प्राप्त कर लीं। अंग्रेजों को कालीकट और मछलीपट्टनम में भी कोठियाँ बनाने की इजाजत मिल गई। अपनी बातों के जाल में उसने बादशाह को ऐसा उलझाया कि बादशाह ने यह फर्मान भी जारी कर दिया कि अपनी कोठी के अन्दर रहने वाले कम्पनी के किसी मुलाजिम के कसूर करने पर अंग्रेज स्वयं उसे दण्ड दे सकते हैं। यह एक विचित्र बात थी क्योंकि अंग्रेजों ने अपने साथ अपने देश से किसी नौकर को नहीं लाया था बल्कि उन्होंने भारतीयों को ही अपना नौकर बना कर रख लिया था। इस प्रकार से इस फर्मान के तहत अंग्रेजों को अपने भारतीय नौकरों का न्याय करने और उन्हें सजा देना का अधिकार मिल गया। ऐसा फर्मान जारी करना बादशाह की सबसे बड़ी भूल थी। फर्मान जारी करते वक्त उस बादशाह ने सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा कि एक दिन ये अंग्रेज बादशाह के उत्तराधिकारी तक को दण्ड दने लगेंगे और यदि उनका विरोध किया जाएगा तो वे प्रजा का संहार कर डालेंगे तथा बादशाह के उत्तराधिकारी को बागी कहकर आजीवन कैद कर लेंगे।
शुरू-शुरू में उनका व्यापार भारत में नहीं चला क्योंकि वे प्रायः काँच के सस्ते सामान के थैले लादे शहर-शहर गली- गली में घूम-घूम कर उन सामानों को बेचते फिरते थे। औरंगजेब के समय तक भारत के अन्दर अंग्रेज व्यापारियों की स्थिति लगभग वैसी ही थी, जैसे आज घूम-घूम कर हींग बेचने वाले काबुलियों की होती है। हाँ यह जरूर था कि बंदर की भाँति लाल-लाल चेहरेवाले फिरंगी के मुँह से उनकी अटपटी भाषा सुनने को बालक और स्त्रियाँ आतुर रहते, उनके आने पर उनके काँच के सस्ते सामान को हँसी उड़ाते और उन्हें तंग करते थे।
किन्तु बाद में वे अपने देश से सोना-चाँदी, जो कि प्रायः समुद्री डाकुओं की लूट का माल होता था, बेचना शुरू किया और उनका यह धंधा जोर-शोर के साथ चल निकला और वे मुनाफा कमने लगे। भारत से वापस इंग्लैंड जाते समय वे भारत से कच्चे रेशम, रेशम के बने कपड़े, उम्दा किस्म का शोरा सस्ते में खरीद कर ले जाते थे जिनकी वहाँ पर खूब माँग थी।
सूरत में उनकी कोठी पहले से ही थी। बाद में उन्होंने पटना और मछलीपट्टनम, जो कि उन दिनों गोलकुण्डा राज्य के अन्तर्गत बन्दरगाह था, में भी कोठियाँ बनवा डालीं। व्यापार के बढ़ने के साथ ही साथ बालासोर, कटक, हरिहरपुर आदि में भी अंग्रेजों की कोठियाँ बन गईं। विजयनगर के महाराज से जमीन माँग कर अंग्रेजों ने मद्रास में सेंट जार्ज का किला भी बनवा लिया। इस प्रकार से मुगल-राज्य से बाहर अंग्रेजों का एक स्वतन्त्र केन्द्र स्थापित हो गया।
यद्यपि ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में सिर्फ व्यापार करने की इजाजत मिली थी, वह कम्पनी ब्रिटिश सरकार की प्रतिनिधि नहीं थी, किन्तु अब इस कंपनी ने अपने निजी धन-जन से भारत के भागों को हथियाना शुरू कर दिया। और मजे की बात तो यह है कि उनका निजी धन-जन भी भारत की ही थी याने कि भारत से कमाई गई रकम से भारत के लोगों को ही सैनिक बना कर भारतीय लोगों पर ही आक्रमण करना। इस प्रकार से उस काल में भारत की बीस करोड़ जनता पर ब्रिटेन के मात्र सवा करोड़ निवासियों का वर्चस्व होने की शुरुवात हो गई।
सन् 1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में अपना सिक्का चलाने, रक्षा के लिए फौज रखने, किले बनाने और आवश्यकता पड़ने पर लड़ाई लड़ने के भी अधिकार प्रदान कर दिए। यह दूसरी विचित्र बात थी क्योंकि जिस भारत पर इंग्लैंड के राजा का किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं था, उसी भारत पर व्यापार करने वाली अंग्रेजी कंपनी को इंग्लैंड के राजा ने राजनैतिक अधिकार दे दिया और यहाँ के सत्ताधारियों के कान में जूँ भी नहीं रेंगी। यही वह अधिकार था जिसने बाद में भारत में अंग्रेजों की सत्ता स्थापित की।
औरंगजेब की अनुदार नीति ने चारों ओर छोटी-छोटी परस्पर प्रतिस्पर्धा करने वाली रियासतें भारत में पैदा कर दी, जिससे केन्द्रीय शक्ति निर्बल हो गई और हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य खण्डित हो गया। औरंगजेब की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद ही मद्रास और बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी के षड्यन्त्र चलने लगे, जिनके फलस्वरूप औरंगजेब की मृत्यु के पचास वर्ष बाद प्लासी का युद्ध हुआ। उस समय अंग्रेजों का हित इस बात में था कि औरंगजेब की अनुदार नीति के कारण जो अव्यवस्था और अनैक्य भारत के हिन्दू-मुसलमानों में स्थापित हो चुका था, वह कायम ही रखा जाए और उन्होंने यही अपनी नीति बना ली।
इतने सब के बावजूद भी उस समय तक सभ्यता, शक्ति और व्यवस्था में भारतीय अंग्रेजों से श्रेष्ठ थे। परन्तु उनमें एक बात की कमी थी। वह कमी थी उनके भीतर राष्ट्रीयता या देश-भक्ति की भावना का न होना। यद्यपि भारत की शक्ति बहुत अधिक थी, किन्तु वह बिखरी हुई थी, छोटे-छोटे राजा-रजवाड़ों में बँटी हुई थी। अंग्रेजों और दूसरी यूरोपियन जातियों ने यह बात जान ली और उन्होंने इससे लाभ उठाकर एक शक्ति को दूसरी शक्ति से लड़ाने का धन्धा आरम्भ कर दिया। दिखाने के लिए उन्होंने अपना रूप निष्पक्ष का रखा, परन्तु भीतर ही भीतर भाँति-भाँति की साजिशों और चालों को चलकर उन्होंने बिखरी हुई भारतीय शक्तियों में ऐसा संग्राम खड़ा कर दिया कि वे शक्तियाँ स्वयं ही एक-दूसरे से टकराकर चकनाचूर होने लगीं। परिणाम यह हुआ कि संसार का सर्वाधिक धनाढ्य देश भारत अंग्रेजों के अधिकार में आ गया और उन्होंने उस सर्वाधिक सम्पन्न देश को लूट-लूट कर दुनिया का सबसे बड़ा कंगाल देश बना डाला।
किन्तु भारत के पास आज भी ऐसी प्राकृति सम्पदाएँ हैं जो अन्य देशों के पास नहीं है। मीठे फलों, पत्तीदार सब्जियों तथा अन्य बहुत सारी वस्तुओं के लिए यूरोपीय देश आज भी भारत पर आश्रित हैं। भारतीयों की श्रम-शक्ति और बुद्धि-चातुर्य अद्भुत है। इन्हीं कारणों से स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से भारत ने फिर से तेजी सम्पन्नता प्राप्त करना शुरू कर दिया। आज भी भारत बहुत अमीर है पर वहाँ की जनता गरीब है। अमीर भारत की जनता को गरीब बनाने का श्रेय सिर्फ उन काले अंग्रेजों को जाता है जिनके हाथ में स्वतन्त्रता के बाद सत्ता की बागडोर चली गई और जिन्होंने तरह-तरह के घोटाले कर-कर फिर से भारत को लूटना शुरू कर दिया। सन उन्नीस सौ अड़तालीस में घोटाले की जो शुरुवात हुई वह दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ती गई तथा आज तक जारी है। इन काले अंग्रेजों ने ही अमीर भारत की जनता को गरीब बना डाला और स्वयं को अमीर।
Monday, May 30, 2011
क्या आप भारत के विषय में इन बातों को जानते हैं?
- कि भारत कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर उत्पादों के विश्व के बड़े निर्यातकों में से एक है तथा भारत 90 से भी अधिक देशों को सॉफ्टवेयर निर्यात करता है।
- कि भारत में लगभग 300,000 मस्जिदें हैं। मस्जिदों की यह संख्या समस्त मुस्लिम देशों के मस्जिदों की संख्या से भी अधिक है।
- कि भारत में यहूदी ईसा पूर्व 200 तथा ईसाई ईसा पश्चात् 52 से रहते चले आ रहे हैं।
- कि योग का जन्म भारत में लगभग 5,000 वर्ष पूर्व हुआ था।
- की भारत के तिरुपति तीर्थस्थान में प्रतिदिन औसतन 30,000 दर्शनार्थी आत हैं और मन्दिर की दान से प्राप्त आमदनी लगभग 6 मिलियन यू.एस. डालर प्रतिदिन है।
- अंग्रेजो के सत्ता में आने से पूर्व भारत विश्व का सर्वाधिक धनाड्य देश था।
- कि भारत के ऋषि बोधायन ने 6 शताब्दी में "पाई" का मान ज्ञात कर लिया था।
- कि बौद्धक खेल शतरंज का आविष्कार भारत में हुआ था।
- कि भारत की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है।
- कि भारत विश्व का सबसे बड़ा गणतन्त्र है।
- कि विश्व के सबसे बड़े देशों में भारत का स्थान 6वाँ है।
- कि भारत ने अपने 1,00,000 वर्षों के इतिहास में कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया।
Monday, August 23, 2010
अंग्रेजों ने भारत को जीता नहीं था, भारत तो उन्हें सेंत-मेंत में ही मिल गया था
जिस प्रकार से मोहम्मद बिन कासिम और मोहम्मद गोरी जैसे आक्रमणकारियों में बाहर से आकर भारत पर हमला किया था क्या उसी प्रकार से कभी किसी अंग्रेज योद्धा ने अपनी सेना के साथ आकर भारत पर आक्रमण किया था?
उपरोक्त प्रश्न का उत्तर केवल नहीं में ही मिलता है। वास्तविकता तो यही है कि इंग्लैंड और हिन्दुस्तान के बीच कभी कोई लड़ाई हुई ही नहीं।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब इंग्लैंड ने कभी भारत पर आक्रमण ही नहीं किया तो फिर आखिर वह भारत का स्वामी कैसे बन बैठा?
ऐसे प्रश्न जब मेरे मष्तिस्क में उठते हैं तो मुझे खुद पर खीझ आने लगती हैं कि क्यों मुझे कभी इतिहास में रुचि नहीं रही? अपने विद्यार्थी काल में क्यों मुझे गणित जैसा विषय सरल और इतिहास जैसा विषय दुरूह लगा करता था? विश्व का इतिहास न सही, क्यों मैंने भारत का इतिहास तक को कभी नहीं पढ़ा?
अस्तु, मानव-मष्तिस्क अत्यन्त विचित्र है! जब इसके भीतर प्रश्न कुलबुलाने लगते हैं तो यह अधीर हो जाता है उनके उत्तर पाने के लिए। तो उपरोक्त प्रश्न का उत्तर जानने के लिए मैंने भारत के इतिहास से सम्बन्धित सामग्री खोज कर खंगालना शुरू किया तो बहुत सी विचित्र बातें जानने को मिलीं। सच तो यह है कि मुझे भारत का इतिहास ही अत्यन्त विचित्र लगने लगा।
पन्द्रहवीं शताब्दी में जब वास्को-डि-गामा भारत पहुँचा तो उसने जाना कि भारत को "सोने की चिड़िया" यों ही नहीं कहा जाता। भारत के पास अपार सम्पदा का भण्डार था। भारत की अथाह और अतुलनीय सम्पदा को देखकर उसकी आँखें चौंधिया गईं। उसने जब वापस जाकर यहाँ के वैभव के बारे में यूरोप को बताया तो यूरोपीय लोगों का मुँह में पानी आने लग गया और परिणामस्वरूप हिन्द महासागर यूरोपीय समुद्री डाकुओं से पट गया। सोलहवीं शताब्दी में यूरोप के विभिन्न देशों के समुद्री डाकू भारत के व्यापारी जहाजों को, जो कि भारत के ही एक समुद्री तट से दूसरे समुद्र तट में जाकर भारत में ही व्यापार किया करते थे, लूटते रहे। पुर्तगालियों ने तो मंगलौर, कंचिन, लंका, दिव, गोआ और बम्बई के टापू को अपने अधिकार में ही ले लिया।
पुर्तगाल और स्पेन भारतीय जहाजों को लगभग दो सौ साल तक लूटते रहे और इस लूट की सम्पत्ति से मालामाल हो गए। किन्तु इंग्लैंड का भारत से पहली बार सम्पर्क सत्रहवीं शताब्दी में ही हुआ क्योंकि उसके पास भारत आने के रास्ते का नक्शा नहीं था। रानी एलिजाबेथ के शासनकाल में सर फ्रांसिस ड्रेक नामक एक डाकू, जो कि 'समुद्री कुत्ते' के नाम से विख्यात था, एक पुर्तगालियों के जहाज को लूट लिया तो उसमें उसे लूट के माल के साथ भारत आने का समुद्री नक्शा भी मिल गया। इस नक्शे के मिल जाने कारण ही ईंस्ट इंडिया कंपनी की नींव का पहला पत्थर डाला गया।
भारतीय जलमार्ग के नक्शे के मिल जाने के लगभग तीस साल बाद सन् 1608 में अंग्रेजों का 'हेक्टर' नामक एक जहाज सूरत के बन्दरगाह में आकर लगा। जहाज का कप्तान का नाम हाकिन्स था जो कि पहला अंग्रेज था जिसने भारत की भूमि पर कदम रखा था। उन दिनों भारत में बादशाह जहांगीर तख्तनशीन थे। उल्लेखनीय बात यह है कि सैकड़ों वर्षों तक लुटते चले आने के बाद भी भारत की सम्पदा उस समय तक भी अपार थी, इतनी अथाह कि कोई भी माई का लाल उसका अनुमान तक नहीं लगा सकता था। हाकिन्स ने आगरा जाकर इंग्लिस्तान के बादशाह जेम्स प्रथम का पत्र और सौगात बादशाह को भेंट की। आगरा की विशाल अट्टालिकाएँ, नगर का वैभव और बादशाह जहांगीर के ऐश्वर्य को देखकर उसकी आँखें चुँधिया गईं। ऐसी शान का शहर उसने अपने जीवन में कभी देखा ही नहीं था, देखना तो दूर उसने ऐसे वैभवशाली नगर की कभी कल्पना भी नहीं की थी।
अस्तु, बादशाह ने उस अंग्रेज अतिथि की खूब खातिरदारी की और न केवल अंग्रेजों को सूरत में कोठी बनाने तथा व्यापार करने का फर्मान जारी किया बल्कि यह भी इजाजत दे दी कि मुगल दरबार में अंग्रेज एलची रहा करे। कुछ दिनों बाद सर टॉमस रो को इंग्लिस्तान के बादशाह ने मुगल-दरबार में अपना पहला एलची बनाकर भेज दिया, जिसने अंग्रेज व्यापारियों के लिए और भी सुविधाएँ प्राप्त कर लीं। अंग्रेजों को कालीकट और मछलीपट्टनम में भी कोठियाँ बनाने की इजाजत मिल गई। अंग्रेजों की प्रार्थना पर भारत के बादशाह ने यह फर्मान भी जारी कर दिया कि अपनी कोठी के अन्दर रहने वाले कम्पनी के किसी मुलाजिम के कसूर करने पर अंग्रेज स्वयं उसे दण्ड दे सकते हैं। यह एक विचित्र बात थी क्योंकि अंग्रेजों ने अपने साथ अपने देश से किसी नौकर को नहीं लाया था बल्कि उन्होंने भारतीयों को ही अपना नौकर बना कर रख लिया था। इस प्रकार से इस फर्मान के तहत अंग्रेजों को अपने भारतीय नौकरों का न्याय करने और उन्हें सजा देना का अधिकार मिल गया। फर्मान जारी करते वक्त उस बादशाह ने सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा कि एक दिन ये अंग्रेज बादशाह के उत्तराधिकारी तक को दण्ड दने लगेंगे और यदि उनका विरोध किया जाएगा तो वे प्रजा का संहार कर डालेंगे तथा बादशाह के उत्तराधिकारी को बागी कहकर आजीवन कैद कर लेंगे।
सन् 1612 में अंग्रजों ने अपनी पहली कोठी सूरत में बनवाया और स्थल मार्ग से आगरा और दिल्ली के बीच व्यापार शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने पटना और मछलीपट्टनम, जो कि उन दिनों गोलकुण्डा राज्य के अन्तर्गत बन्दरगाह था, में भी कोठियाँ बनवा डालीं। व्यापार के बढ़ने के साथ ही साथ बालासोर, कटक, हरिहरपुर आदि में भी अंग्रेजों की कोठियाँ बन गईं। विजयनगर के महाराज से जमीन माँग कर अंग्रेजों ने मद्रास में सेंट जार्ज का किला भी बनवा लिया। इस प्रकार से मुगल-राज्य से बाहर अंग्रेजों का एक स्वतन्त्र केन्द्र स्थापित हो गया।
अंग्रेजों का धन्धा मुनाफे में चलने लगा। वे भारत से कच्चे रेशम, रेशम के बने कपड़े, उम्दा किस्म का शोरा सस्ते में खरीद कर अपने देश में बेचने लगे और उनके देश से भेजे गए सोने-चाँदी की भी भारत में अच्छी खपत होने लगी। सन् 1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में अपना सिक्का चलाने, रक्षा के लिए फौज रखने, किले बनाने और आवश्यकता पड़ने पर लड़ाई लड़ने के भी अधिका प्रदान कर दिए। यह एक बहुत ही विचित्र बात थी कि जिस भारत पर इंग्लैंड के राजा का किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं था, उसी भारत पर व्यापार करने वाली अंग्रेजी कंपनी को इंग्लैंड के राजा ने राजनैतिक अधिकार दे दिया और यहाँ के सत्ताधारियों के कान में जूँ भी नहीं रेंगी। यही वह अधिकार था जिसने बाद में भारत में अंग्रेजों की सत्ता स्थापित की।
यह भी एक चमत्कारिक बात है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटिश सरकार की प्रतिनिधि नहीं थी, उसे भारत और चीन में व्यापार करने का ही इजारा मिला था, किन्तु इस कंपनी ने अपने निजी धन-जन से भारत के भागों को हथियाना शुरू कर दिया। और मजे की बात तो यह है कि उनका निजी धन-जन भी भारत की ही थी याने कि भारत से कमाई गई रकम से भारत के लोगों को ही सैनिक बना कर भारतीय लोगों पर ही आक्रमण करना। इस प्रकार से उस काल में भारत की बीस करोड़ जनता पर ब्रिटेन के मात्र सवा करोड़ निवासियों का वर्चस्व होने की शुरुवात हो गई।
स्पष्ट है कि भारत को अंग्रेजों ने नहीं हराया, भारत ने ही खुद को अंग्रेजों के लिए हरा दिया। भारत अंग्रेजों को सेंत-मेंत में ही मिल गया, बिल्कुल जमीन में पड़े अमूल्य हीरे की तरह। इसका मुख्य कारण था कि भारत में किसी एकछत्र सम्राट का आधिपत्य नहीं था। और सही कहा जाए तो भारत में राष्ट्रीयता की भावना नहीं थी।
राष्ट्रीय भावना न होने की अपनी कमजोरी के कारण भारत हजार से भी अधिक वर्षों तक विदेशियों का गुलाम बना रहा। क्या हम अपनी कमजोरी को कभी समझ पाए हैं? आज भी तो हम क्षेत्रीयता और भाषा के नाम पर लड़ मरने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं।
उपरोक्त प्रश्न का उत्तर केवल नहीं में ही मिलता है। वास्तविकता तो यही है कि इंग्लैंड और हिन्दुस्तान के बीच कभी कोई लड़ाई हुई ही नहीं।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब इंग्लैंड ने कभी भारत पर आक्रमण ही नहीं किया तो फिर आखिर वह भारत का स्वामी कैसे बन बैठा?
ऐसे प्रश्न जब मेरे मष्तिस्क में उठते हैं तो मुझे खुद पर खीझ आने लगती हैं कि क्यों मुझे कभी इतिहास में रुचि नहीं रही? अपने विद्यार्थी काल में क्यों मुझे गणित जैसा विषय सरल और इतिहास जैसा विषय दुरूह लगा करता था? विश्व का इतिहास न सही, क्यों मैंने भारत का इतिहास तक को कभी नहीं पढ़ा?
अस्तु, मानव-मष्तिस्क अत्यन्त विचित्र है! जब इसके भीतर प्रश्न कुलबुलाने लगते हैं तो यह अधीर हो जाता है उनके उत्तर पाने के लिए। तो उपरोक्त प्रश्न का उत्तर जानने के लिए मैंने भारत के इतिहास से सम्बन्धित सामग्री खोज कर खंगालना शुरू किया तो बहुत सी विचित्र बातें जानने को मिलीं। सच तो यह है कि मुझे भारत का इतिहास ही अत्यन्त विचित्र लगने लगा।
पन्द्रहवीं शताब्दी में जब वास्को-डि-गामा भारत पहुँचा तो उसने जाना कि भारत को "सोने की चिड़िया" यों ही नहीं कहा जाता। भारत के पास अपार सम्पदा का भण्डार था। भारत की अथाह और अतुलनीय सम्पदा को देखकर उसकी आँखें चौंधिया गईं। उसने जब वापस जाकर यहाँ के वैभव के बारे में यूरोप को बताया तो यूरोपीय लोगों का मुँह में पानी आने लग गया और परिणामस्वरूप हिन्द महासागर यूरोपीय समुद्री डाकुओं से पट गया। सोलहवीं शताब्दी में यूरोप के विभिन्न देशों के समुद्री डाकू भारत के व्यापारी जहाजों को, जो कि भारत के ही एक समुद्री तट से दूसरे समुद्र तट में जाकर भारत में ही व्यापार किया करते थे, लूटते रहे। पुर्तगालियों ने तो मंगलौर, कंचिन, लंका, दिव, गोआ और बम्बई के टापू को अपने अधिकार में ही ले लिया।
पुर्तगाल और स्पेन भारतीय जहाजों को लगभग दो सौ साल तक लूटते रहे और इस लूट की सम्पत्ति से मालामाल हो गए। किन्तु इंग्लैंड का भारत से पहली बार सम्पर्क सत्रहवीं शताब्दी में ही हुआ क्योंकि उसके पास भारत आने के रास्ते का नक्शा नहीं था। रानी एलिजाबेथ के शासनकाल में सर फ्रांसिस ड्रेक नामक एक डाकू, जो कि 'समुद्री कुत्ते' के नाम से विख्यात था, एक पुर्तगालियों के जहाज को लूट लिया तो उसमें उसे लूट के माल के साथ भारत आने का समुद्री नक्शा भी मिल गया। इस नक्शे के मिल जाने कारण ही ईंस्ट इंडिया कंपनी की नींव का पहला पत्थर डाला गया।
भारतीय जलमार्ग के नक्शे के मिल जाने के लगभग तीस साल बाद सन् 1608 में अंग्रेजों का 'हेक्टर' नामक एक जहाज सूरत के बन्दरगाह में आकर लगा। जहाज का कप्तान का नाम हाकिन्स था जो कि पहला अंग्रेज था जिसने भारत की भूमि पर कदम रखा था। उन दिनों भारत में बादशाह जहांगीर तख्तनशीन थे। उल्लेखनीय बात यह है कि सैकड़ों वर्षों तक लुटते चले आने के बाद भी भारत की सम्पदा उस समय तक भी अपार थी, इतनी अथाह कि कोई भी माई का लाल उसका अनुमान तक नहीं लगा सकता था। हाकिन्स ने आगरा जाकर इंग्लिस्तान के बादशाह जेम्स प्रथम का पत्र और सौगात बादशाह को भेंट की। आगरा की विशाल अट्टालिकाएँ, नगर का वैभव और बादशाह जहांगीर के ऐश्वर्य को देखकर उसकी आँखें चुँधिया गईं। ऐसी शान का शहर उसने अपने जीवन में कभी देखा ही नहीं था, देखना तो दूर उसने ऐसे वैभवशाली नगर की कभी कल्पना भी नहीं की थी।
अस्तु, बादशाह ने उस अंग्रेज अतिथि की खूब खातिरदारी की और न केवल अंग्रेजों को सूरत में कोठी बनाने तथा व्यापार करने का फर्मान जारी किया बल्कि यह भी इजाजत दे दी कि मुगल दरबार में अंग्रेज एलची रहा करे। कुछ दिनों बाद सर टॉमस रो को इंग्लिस्तान के बादशाह ने मुगल-दरबार में अपना पहला एलची बनाकर भेज दिया, जिसने अंग्रेज व्यापारियों के लिए और भी सुविधाएँ प्राप्त कर लीं। अंग्रेजों को कालीकट और मछलीपट्टनम में भी कोठियाँ बनाने की इजाजत मिल गई। अंग्रेजों की प्रार्थना पर भारत के बादशाह ने यह फर्मान भी जारी कर दिया कि अपनी कोठी के अन्दर रहने वाले कम्पनी के किसी मुलाजिम के कसूर करने पर अंग्रेज स्वयं उसे दण्ड दे सकते हैं। यह एक विचित्र बात थी क्योंकि अंग्रेजों ने अपने साथ अपने देश से किसी नौकर को नहीं लाया था बल्कि उन्होंने भारतीयों को ही अपना नौकर बना कर रख लिया था। इस प्रकार से इस फर्मान के तहत अंग्रेजों को अपने भारतीय नौकरों का न्याय करने और उन्हें सजा देना का अधिकार मिल गया। फर्मान जारी करते वक्त उस बादशाह ने सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा कि एक दिन ये अंग्रेज बादशाह के उत्तराधिकारी तक को दण्ड दने लगेंगे और यदि उनका विरोध किया जाएगा तो वे प्रजा का संहार कर डालेंगे तथा बादशाह के उत्तराधिकारी को बागी कहकर आजीवन कैद कर लेंगे।
सन् 1612 में अंग्रजों ने अपनी पहली कोठी सूरत में बनवाया और स्थल मार्ग से आगरा और दिल्ली के बीच व्यापार शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने पटना और मछलीपट्टनम, जो कि उन दिनों गोलकुण्डा राज्य के अन्तर्गत बन्दरगाह था, में भी कोठियाँ बनवा डालीं। व्यापार के बढ़ने के साथ ही साथ बालासोर, कटक, हरिहरपुर आदि में भी अंग्रेजों की कोठियाँ बन गईं। विजयनगर के महाराज से जमीन माँग कर अंग्रेजों ने मद्रास में सेंट जार्ज का किला भी बनवा लिया। इस प्रकार से मुगल-राज्य से बाहर अंग्रेजों का एक स्वतन्त्र केन्द्र स्थापित हो गया।
अंग्रेजों का धन्धा मुनाफे में चलने लगा। वे भारत से कच्चे रेशम, रेशम के बने कपड़े, उम्दा किस्म का शोरा सस्ते में खरीद कर अपने देश में बेचने लगे और उनके देश से भेजे गए सोने-चाँदी की भी भारत में अच्छी खपत होने लगी। सन् 1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में अपना सिक्का चलाने, रक्षा के लिए फौज रखने, किले बनाने और आवश्यकता पड़ने पर लड़ाई लड़ने के भी अधिका प्रदान कर दिए। यह एक बहुत ही विचित्र बात थी कि जिस भारत पर इंग्लैंड के राजा का किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं था, उसी भारत पर व्यापार करने वाली अंग्रेजी कंपनी को इंग्लैंड के राजा ने राजनैतिक अधिकार दे दिया और यहाँ के सत्ताधारियों के कान में जूँ भी नहीं रेंगी। यही वह अधिकार था जिसने बाद में भारत में अंग्रेजों की सत्ता स्थापित की।
यह भी एक चमत्कारिक बात है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटिश सरकार की प्रतिनिधि नहीं थी, उसे भारत और चीन में व्यापार करने का ही इजारा मिला था, किन्तु इस कंपनी ने अपने निजी धन-जन से भारत के भागों को हथियाना शुरू कर दिया। और मजे की बात तो यह है कि उनका निजी धन-जन भी भारत की ही थी याने कि भारत से कमाई गई रकम से भारत के लोगों को ही सैनिक बना कर भारतीय लोगों पर ही आक्रमण करना। इस प्रकार से उस काल में भारत की बीस करोड़ जनता पर ब्रिटेन के मात्र सवा करोड़ निवासियों का वर्चस्व होने की शुरुवात हो गई।
स्पष्ट है कि भारत को अंग्रेजों ने नहीं हराया, भारत ने ही खुद को अंग्रेजों के लिए हरा दिया। भारत अंग्रेजों को सेंत-मेंत में ही मिल गया, बिल्कुल जमीन में पड़े अमूल्य हीरे की तरह। इसका मुख्य कारण था कि भारत में किसी एकछत्र सम्राट का आधिपत्य नहीं था। और सही कहा जाए तो भारत में राष्ट्रीयता की भावना नहीं थी।
राष्ट्रीय भावना न होने की अपनी कमजोरी के कारण भारत हजार से भी अधिक वर्षों तक विदेशियों का गुलाम बना रहा। क्या हम अपनी कमजोरी को कभी समझ पाए हैं? आज भी तो हम क्षेत्रीयता और भाषा के नाम पर लड़ मरने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं।
Saturday, August 14, 2010
14 अगस्त - आज के दिन ही देश के टुकड़े हुए थे
विभाजन पूर्व भारत
(चित्र नेशनल ज्योग्रफिक से साभार)
विभाजन पश्चात् भारत
महात्मा गांधी ने विभाजन के पूर्व हिन्दुओं से अनुरोध किया था कि वे अपना घर बार छोड़ कर कहीं न जाएँ क्योंकि देश का विभाजन नहीं होगा। भरी सभा में उनका कथन था - "यदि पाकिस्तान बनेगा तो मेरी लाश पर बनेगा"।
विभाजन के दौरान हुए दंगों में मारे गये लोगों की लाशों का ढेर
(चित्र स्रोतः http://news.bbc.co.uk/2/shared/spl/hi/pop_ups/06/south_asia_india0s_partition/html/7.stm)दंगों में मारे गये लोगों का सामूहिक अग्नि संस्कार
(चित्र स्रोतः http://news.bbc.co.uk/2/shared/spl/hi/pop_ups/06/south_asia_india0s_partition/html/9.stm)पाकिस्तान से भारत आने वाली रेलगाड़ी
दिल्ली से पाकिस्तान जाने वाली रेलगाड़ी
शरणार्थी शिविर
(चित्र स्रोत http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00routesdata/1900_1999/partition/camps/camps.html)एक और शरणार्थी शिविर
(चित्र स्रोत http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00routesdata/1900_1999/partition/camps/camps.html)पंजाब उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति श्री जी.डी. खोसला की पुस्तक ‘‘The stern Reckoning’’ पुस्तक से कुछ उद्धरण:
गाड़ियाँ भर-भरकर निर्वासितों के दल हिन्दुस्तान आने लगे। उसका ब्यौरा भी हृदय विदीर्ण करने वाला है। वह भयाक्रान्त मानवता का बड़ा प्रवाह बह रहा था। डिब्बों में साँस लेने जितना भी स्थान न था। डिब्बों की छत पर बैठकर भी लोग आते थे। पश्चिमी पंजाब के मुसलमानों का आग्रह था कि लोगों का स्थानान्तरण होना चाहिए, परन्तु वह इतने सीधे, बिना किसी छल के हो, यह उन्हें नहीं भाता था। इन हिन्दुओं के जाते समय भयानकता, क्रूरता, पशुता अमानुषता, अवहेलना आदि भावों का अनुभव मिलना ही चाहिए, ऐसी उनकी सोच थी। उसी के अनुसार उनका व्यवहार था।
(छेदक 12 ए 9)
किसी स्टेशन पर गाड़ी घण्टों ठहरती थी। उस विलम्ब का कोई कारण न था। पानी के नल तोड़ दिए गए थे। अन्न अप्राप्य किया जाता था। छोटे बच्चे भूख और प्यास से छटपटा कर मरते थे। यह तो सदा का अनुभव बना था। एक अधिकृत सूचना के अनुसार माता-पिताओं ने अपने बच्चों को पानी के स्थान पर अपना मूत्र दिया, किन्तु यह भी उनके पास होता तो ! निर्वासितों पर हमले हुआ करते थे। उनको ले जाने वाले ट्रक और लारियाँ रास्ते में रोकी जाती थीं। लड़कियाँ भगायी जाती थीं। जो युवावस्था में थीं, ऐसी लड़कियों पर बलात्कार हुआ करते थे। वे भगायी भी जाती थीं और दूसरे लोगों की हत्या की जाती थी। यदि कोई पुरुष बच जाए, उसे अपने प्राण बच गए, यह मानकर ही संतुष्ट रहना पड़ता था।
(छेदक 12 ए 10)
निर्वासितों का काफिला झुण्ड की भाँति चल रहा था। वृद्ध पुरुषों तथा स्त्रियों का चलते-चलते दम घुट जाता था। वे मार्ग के किनारे मरने के लिए ही छोड़े जाते थे। काफिला आगे बढ़ जाता था। उनकी देखभाल करने का किसी के पास समय न होता था। रास्ते शवों से भरे थे। शव गल जाते थे। उनसे दुर्गन्ध फैलती थी। कुत्ते और गिद्ध उन्हें अपना भोजन बनाते थे। ऐसे समूह मानो मनुष्य की पराभूत चित्त की, शोक विह्वल और अगनित मन की अन्त्ययात्रा ही थी।
(छेदक 12 ए 11)
अल्पसंख्यकों का बरबस निष्कासन करना, यही मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की रचना को प्रोत्साहित करने वालों का मन्तव्य था। अतएव उन लोगों से सद्व्यवहार, सहानुभूति अथवा सुविधाओं की अपेक्षा करना अर्थहीन था। उनके सैनिक और आरक्षीगण (पुलिस) उनके यात्रारक्षी दल प्रायः मुसलमान थे। उनसे निर्वासितों को रक्षण मिलना असंभव ही था। निर्वासितों को भी उन पर विश्वास न था। क्योंकि उन्हें रक्षण देने की अपेक्षा, अपने धर्मबन्धुओं द्वारा चलाए लूटपाट के अभियान में हाथ बंटाने का उन्हें अधिक मोह हुआ करता था।
(छेदक 12 ए 12)
पश्चिमी पंजाब से आई निर्वासितों की गाड़ियों पर कई हमले हुआ करते थे, किन्तु 14 अगस्त, 1947 के पश्चात् जो हमले हुए, वे अत्यधिक क्रूरतापूर्वक थे। सितम्बर में झेलम जिले के पिंडदादनखान गाँव से चल पड़ी गाड़ियों पर तीन स्थानों पर आक्रमण हुए। दो सौ स्त्रियों को या तो मारा गया या भगाया गया था। वहाँ से निकली गाड़ी पर वजीराबाद के पास हमला हुआ। वह गाड़ी सीधे रास्ते से लाहौर जाने के बजाय टेढ़े रास्ते सियालकोट की ओर घुमायी गयी। यह सितम्बर में हुआ। अक्टूबर में सियालकोट से आने वाली एक गाड़ी पर ऐसा ही अत्याचारी प्रयोग किया गया, किन्तु जनवरी, 1948 में बन्नू से निकली गाड़ी पर गुजरात स्थानक पर विशेष रूप से क्रूर हमला हुआ। हिन्दुओं का घोर संहार हुआ। उसी गाड़ी पर खुशाब स्थानक पर भी हमला हुआ। सरगोधा और लायलपुर के रास्ते वह गाड़ी सीधी लाहौर लाई जाने के बजाय खुशाब, मालकवाल, लालामोसा गुजरात और वजीराबाद जैसे दूर के मार्ग से लाहौर लाई गई। बिहार का सैनिकदल यात्रारक्षा के लिए नियुक्त किया गया था, उन पर भी शस्त्रधारी पठानों ने हमला किया था, गोलियाँ बरसायी थीं। यात्रारक्षी दल ने प्रत्युत्तर में गोली चलायी, किन्तु शीघ्र ही उनका गोला बारुद समाप्त हो गया। जैसे ही पठानों को यह भान हुआ, तीन सहस्त्र पठानों ने गाड़ी पर हमला कर दिया। पाँच सौ लोगों को कत्ल कर दिया। यात्री अधिकतर बन्नू की ओर के थे और उनमें से कुछ धनवान थे। उनको लूट लिया गया। यह सब जनवरी, 1948 में हुआ।
(छेदक 12 ए 13)
(कोटेड सामग्री http://pustak.org/bs/home.php?bookid=4418 से साभार)
देश का विभाजन एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। विभाजन एक ऐसा घाव है जो हमेशा हमेशा के लिए नासूर बन कर रह गया है।
Sunday, June 27, 2010
कभी भारत का नक्शा ऐसा हुआ करता था

(चित्र ब्लोग.लुकइंडिया से साभार)
चलते-चलते
देश दो करेंसी एक
यद्यपि पाकिस्तान को 14th अगस्त, 1947 के दिन, अर्थात् भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पूर्व, स्वतंत्रता प्राप्त हुई किन्तु करेंसी के मामले में उसे 30 September, 1948 तक भारत पर ही निर्भर रहना पड़ा था क्योंकि उस दौरान दोनों देशों के मुद्रा प्रबंधन का पूरा भार भारतीय रिजर्व बैंक पर ही था। देखें सन् 1947 के एक रुपये का चित्र जिसमें, Government of India के साथ ही साथ बायीं ओर, Government of Pakistan भी मुद्रित है।
Thursday, June 24, 2010
भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ता
क्या आपको जानते हैं कि वर्तमान में कितने भारतीय इंटरनेट का प्रयोग करते हैं? आईटीयू (ITU), जो कि संयुक्त राष्ट्र United Nations की सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के मुद्दों पर जानकारी एकत्रित करने वाली संस्था है, द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार सन् 2010 में भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या 8,10,00,000 (आठ करोड़ दस लाख) और ब्रॉडबैंड प्रयोग करने वालों की संख्या 52,80,000 (बावन लाख अस्सी हजार) है।
निम्न सारिणी दर्शाती है कि भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या किस सन् में कितनी रही हैः
(सारिणी http://www.internetworldstats.com/asia/in.htm के सौजन्य से)
निम्न सारिणी दर्शाती है कि भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या किस सन् में कितनी रही हैः
| वर्ष | प्रयोगकर्ता | जनसंख्या | % | जानकारी स्रोत |
| 1998 | 14,00,000 | 1,09,48,70,677 | 0.1% | आईटीयू (ITU) |
| 1999 | 28,00,000 | 1,09,48,70,677 | 0.3% | आईटीयू (ITU) |
| 2000 | 55.00,000 | 1,09,48,70,677 | 0.5% | आईटीयू (ITU) |
| 2001 | 70,00,000 | 1,09,48,70,677 | 0.7% | आईटीयू (ITU) |
| 2002 | 1,65.00,000 | 1,09,48,70,677 | 1.6% | आईटीयू (ITU) |
| 2003 | 2,25,00,000 | 1,09,48,70,677 | 2.1% | आईटीयू (ITU) |
| 2004 | 3,92,00,000 | 1,09,48,70,677 | 3.6% | |
| 2005 | 5,06,00,000 | 1,11,22,25,812 | 4.5% | C.I. Almanac |
| 2006 | 4,00,00,000 | 1,11,22,25,812 | 3.6% | |
| 2007 | 4,20,00,000 | 1,12,96,67,528 | 3.7% | |
2009 | 8,10,00,000 | 1,15,68,97,766 | 7.0% | आईटीयू (ITU) |
| 2010 | 8,10,00,000 | 1,17,31,08,018 | 6.9% | आईटीयू (ITU) |
(सारिणी http://www.internetworldstats.com/asia/in.htm के सौजन्य से)
Thursday, December 10, 2009
मुझे भारत पर गर्व है ... क्योंकि मार्क ट्वेन भी कहते हैं
भारत मानव वंश का उद्गम, अनेक भाषाओं तथा बोलियों की जन्म-स्थली, इतिहास की माता, पौराणिक एवं अपूर्व कथाओं की मातामह (दादी) और अनेक परम्पराओं की प्रमातामह (परदादी) है। मानव इतिहास की अत्यंत बहुमूल्य उपलब्धियाँ भारत के खजाने की ही देन हैं!
- मार्क ट्वेन
(India is the cradle of the human race, the birthplace of human speech, the mother of history, the grandmother of legend, and the great grand mother of tradition। Our most valuable and most astrictive materials in the history of man are treasured up in India only!
- Mark Twain)
वहीं अल्बर्ट आइंस्टीन का कथन हैः
"हम भारतीयों के ऋणी हैं जिन्होंने हमें गिनती सिखाया है जिसके बिना कोई सार्थक वैज्ञानिक खोज किया ही नहीं जा सकता था!"
- अल्बर्ट आइंस्टीन
("We owe a lot to the Indians, who taught us how to count, without which no worthwhile scientific discovery could have been made!"
- Albert Einstein)
सही बात तो यह है कि भारतीय संस्कृति के ढाँचे में अलग-अलग युगों में समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार तथा उन युगों की परंपरा, रीति-रिवाज और लोगों के विचारों एवं मान्यताओं के अनुसार अनेकों बार परिवर्तन हुआ है। इसी कारण से आज भी भारतवर्ष के अलग-अलग क्षेत्रों में अनेक प्रकार की संस्कृतियाँ, भाषायें, परंपराएँ, रीति रिवाज और मान्यताएँ पाई जाती हैं।
भारत में हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख जैसे अनेक धर्मों और संप्रदायों का आविर्भाव हुआ जिनका प्रभाव न केवल भारत के वरन विश्व के अनेकों देशों के निवासियों पर आज भी देखने को मिलता है। दसवीं शताब्दी के बाद से भारत में पारसी, तुर्क, मुस्लिम आदि विदेशी संस्कृतियों का प्रभाव पड़ना आरम्भ हो गया जिसके कारण यहाँ की संस्कृति में विभिन्नता और अधिक बढ़ गई।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित भारतीय संस्कृति को अनेक भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। भारत पर विश्व के अनेकों धर्मों तथा संप्रदायों का भी प्रभाव रहा है जिसके परिणामस्वरूप यहाँ पर विभिन्न धार्मिक-सांप्रदायिक भावनाओं के मिश्रण से परिपूर्ण संस्कृतियों का भी प्रादुर्भाव भी हुआ। जहाँ भारत के ग्रामीण तथा कस्बाई क्षेत्रो में आज भी प्राचीन संस्कृतियों का प्रभाव बना हुआ है वहीं देश के बड़े नगरों में इन संस्कृतियों का विलोप होता जा रहा है और वैश्वीकरण का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
संक्षेप में कहा जाये तो भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। चलते-चलते
एक उत्तर-भारतीय परिवार के पड़ोस में दक्षिण-भारतीय परिवार रहने के लिये आ गया। उत्तर-भारतीय परिवार ने उन्हें भोजन के लिये निमन्त्रित किया। खाना खाते समय दक्षिण-भारतीय गृहस्वामिनी कुछ संकोच कर रही थी इसलिये उत्तर-भारतीय गृहस्वामिनी ने कहा, "खाइये, खाइये, शरमाइये नहीं!"
कुछ दिन बाद दक्षिण-भारतीय परिवार ने उत्तर-भारतीय परिवार को खाने के लिये बुला लिया। खाना परसते वक्त दक्षिण-भारतीय गृहस्वामिनी को याद आया कि खाना खाते वक्त उससे कुछ कहा गया था। उसे हिन्दी ठीक से नहीं आती थी पर उस कथन को याद करके उसने उत्तर-भारतीय गृहस्वामिनी से कहा, "खाओ, खाओ, शरम तो है नहीं!"
- मार्क ट्वेन
(India is the cradle of the human race, the birthplace of human speech, the mother of history, the grandmother of legend, and the great grand mother of tradition। Our most valuable and most astrictive materials in the history of man are treasured up in India only!
- Mark Twain)
वहीं अल्बर्ट आइंस्टीन का कथन हैः
"हम भारतीयों के ऋणी हैं जिन्होंने हमें गिनती सिखाया है जिसके बिना कोई सार्थक वैज्ञानिक खोज किया ही नहीं जा सकता था!"
- अल्बर्ट आइंस्टीन
("We owe a lot to the Indians, who taught us how to count, without which no worthwhile scientific discovery could have been made!"
- Albert Einstein)
सही बात तो यह है कि भारतीय संस्कृति के ढाँचे में अलग-अलग युगों में समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार तथा उन युगों की परंपरा, रीति-रिवाज और लोगों के विचारों एवं मान्यताओं के अनुसार अनेकों बार परिवर्तन हुआ है। इसी कारण से आज भी भारतवर्ष के अलग-अलग क्षेत्रों में अनेक प्रकार की संस्कृतियाँ, भाषायें, परंपराएँ, रीति रिवाज और मान्यताएँ पाई जाती हैं।भारत में हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख जैसे अनेक धर्मों और संप्रदायों का आविर्भाव हुआ जिनका प्रभाव न केवल भारत के वरन विश्व के अनेकों देशों के निवासियों पर आज भी देखने को मिलता है। दसवीं शताब्दी के बाद से भारत में पारसी, तुर्क, मुस्लिम आदि विदेशी संस्कृतियों का प्रभाव पड़ना आरम्भ हो गया जिसके कारण यहाँ की संस्कृति में विभिन्नता और अधिक बढ़ गई।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित भारतीय संस्कृति को अनेक भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। भारत पर विश्व के अनेकों धर्मों तथा संप्रदायों का भी प्रभाव रहा है जिसके परिणामस्वरूप यहाँ पर विभिन्न धार्मिक-सांप्रदायिक भावनाओं के मिश्रण से परिपूर्ण संस्कृतियों का भी प्रादुर्भाव भी हुआ। जहाँ भारत के ग्रामीण तथा कस्बाई क्षेत्रो में आज भी प्राचीन संस्कृतियों का प्रभाव बना हुआ है वहीं देश के बड़े नगरों में इन संस्कृतियों का विलोप होता जा रहा है और वैश्वीकरण का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
संक्षेप में कहा जाये तो भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। चलते-चलते
एक उत्तर-भारतीय परिवार के पड़ोस में दक्षिण-भारतीय परिवार रहने के लिये आ गया। उत्तर-भारतीय परिवार ने उन्हें भोजन के लिये निमन्त्रित किया। खाना खाते समय दक्षिण-भारतीय गृहस्वामिनी कुछ संकोच कर रही थी इसलिये उत्तर-भारतीय गृहस्वामिनी ने कहा, "खाइये, खाइये, शरमाइये नहीं!"
कुछ दिन बाद दक्षिण-भारतीय परिवार ने उत्तर-भारतीय परिवार को खाने के लिये बुला लिया। खाना परसते वक्त दक्षिण-भारतीय गृहस्वामिनी को याद आया कि खाना खाते वक्त उससे कुछ कहा गया था। उसे हिन्दी ठीक से नहीं आती थी पर उस कथन को याद करके उसने उत्तर-भारतीय गृहस्वामिनी से कहा, "खाओ, खाओ, शरम तो है नहीं!"
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