लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)
- 18 -
बैसाख का महीना आया और श्यामवती के ब्याह की तैयारियाँ होने लगीं। सभी गाँव में थे। महेन्द्र बहुत ही दुःखी था। श्यामवती भी कछ कम विकल नहीं थी। दोनों मछली की भाँति तड़प रहे थे।
एक दिन महेन्द्र राजवती के घर गया। श्यामवती अकेली थी। वह बहत ही उदास थी। महेन्द्र खाट पर बैठ गया और बोला, "श्यामा, यह सब क्या हो गया। जीवन अब कैसे बीतेगा?" कहते कहते वह बच्चे जैसा रोने लगा। श्यामवती के आँसू भी बहने लगे। वह समझ ही नहीं पाती थी कि क्या करे, क्या न करे। उसे लग रहा था कि अंधकार की सेना चारों ओर से उस पर बड़े वेग और शक्ति से आक्रमण कर रही है। आँखें पोंछती हुई वह बोली, "महेन्द्र, मैं कर ही क्या सकती हूँ?"
श्यामवती की बात सुन कर महेन्द्र को लगा कि वह उसकी उपेक्षा कर रही है। उत्तेजित होकर कहने लगा, "क्या कर सकती हो! तुम चाहो तो सब कुछ किया जा सकता है।"
"क्या किया जा सकता है?" श्यामवती ने कौतूहल से पूछा।
"मैं दादा से और तुम्हारी माँ से साफ साफ कह दूँगा कि वे तुम्हें भोला के गले न बाँधे।" महेन्द्र उत्तेजना में बहते हुये बोला।
"कर सकते हो ऐसा?" श्यामवती ने शान्ति से पूछा।
"क्यों नहीं।"
श्यामवती सूखी हँसी हँस कर बोली, "कह तो दोगे पर इसका परिणाम भी सोचा है तुमने?" परिणाम की बात सुन कर महेन्द्र ठण्डा पड़ गया पर दूसरे ही क्षण बोला, "परिणाम यही होगा कि मैं दादा और माता जी को तुम्हारी शादी मेरे साथ कर देने के लिये राजी कर लूँगा।"
दुःख की गहराई में भी महेन्द्र की बात सुन कर श्यामवती को हँसी-सी आ रही थी पर हँसती देख कर महेन्द्र के हृदय पर गहरा आघात होगा ऐसा सोच कर वह गम्भीर ही रही और बोली, "कहना जितना सरल होता है करना उससे कई गुना कठिन और कभी-कभी असम्भव भी हो जाता है। माना कि माता जी और दादा जी राजी हो भी जावें तो हम दोनों के समाज के बारे में भी सोचा है तुमने?"
"उसकी चिन्ता मुझे नहीं है श्यामा।"
"यह भी ठीक है पर मेरी समझ से तो अभी वह समय नहीं आया है जिसकी तुम कल्पना कर रहे हो। समाज को छोड़ दो तो भी दादा को अपनी बातों में ले आना उन पर अत्याचार करना होगा। मानती हूँ वे उदार हैं। अकेले होने के कारण तुम पर उनका स्नेह भी सीमा रहित है। तो भी तुम्हारा विचार सुन कर ही उनको प्राण छूटने का सा दुःख होगा। अभी उनकी उदारता में इतनी शक्ति नहीं है कि वे दुनिया का सामना कर सकें। उनकी अपनी भी तो लालसायें होंगी। क्या तुम उनकी कामनाओं में आग लगा देना चाहते हो। फिर मुझे भी तो अपनी माता और उनके वचन की ओर देखना है। महेन्द्र, अभी हमारे समाज का बन्धन फाँसी बन कर राक्षसी हँसी हँसता है। मैं हृदय से तुम्हारी ही तो हूँ। क्या हम दोनों की आत्मायें दूर हैं - अलग हैं। हमारे सच्चे प्रेम को बलिदान की आवश्यकता है।" कहती हुई श्यामवती का धीरज टूट गया और वह सिसक सिसक कर रोने लगी।
श्यामवती ने अपने विद्यार्थी जीवन में अनेकों पुस्तकें अपने अवकाश के समय पढ़ ली थीं। इसी का परिणाम था कि उसका विवेक जाग उठा था। नहीं तो गाँव की लड़की में ये सब बातें कहाँ? श्यामवती की तर्कयुक्त बातों के सामने महेन्द्र के निरुत्तर हो जाना पड़ा। उसने श्यामा को चुप कराने की असफल कोशिश की पर श्यामवती बड़ी देर तक महेन्द्र के वक्ष पर सिर टिकाये रोती ही रही।
इसके बाद दूसरे दिन ही महेन्द्र रायपुर चला आया। उसमें शक्ति ही नहीं थी कि वह अपनी श्यामा को दूसरे की होती हुई देख कर सहन कर सके। महेन्द्र के इस व्यवहार से सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। पर सबने यही समझा कि कोई आवश्यक काम होगा इसीलिये वह श्यामवती के विवाह के समय भी चला गया। वास्तविक बात किसी को मालूम नहीं हुई। यहाँ तक कि सदा साथ रहने वाला सदाराम भी कुछ नहीं जान सका। केवल श्यामवती ही सब कुछ समझ रही थी। उसका हृदय तड़प रहा था।
निश्चित समय पर श्यामवती और भौला का ब्याह हो गया। वह भोला के साथ सिकोला भेज दी गई पर महेन्द्र के दर्शन उसे नहीं हुये। वह मन मसोस कर रह गई।
(क्रमशः)
7:45 AM
जी.के. अवधिया








1 टिप्पणियाँ:
आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.
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