Saturday, September 29, 2007

धान के देश में - 21

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 21 -

परसादी का साथ होने से भोला के मन में एक नई लालसा जागृत हुई। वह भी टाटानगर जाने के लिये लालायित हो उठा। एक दिन घर मे जब श्यामवती अकेली थीं तब भोला ने उससे कहा, "श्यामा, चलो हम दोनों कालीमाटी (टाटानगर) चलें।"
सुनकर श्यामवती चौंक गई! उसे ऐसा लगा मानो उसके हृदय मे स्थित महेन्द्र का ध्यान कांप गया है! धीरज रख कर धीरे से पूछा, "क्या यहाँ अच्छा नहीं है जो कालीमाटी ‌आवोगे।"
"है क्यों नहीं! लेकिन कमाई वहां अधिक होगी। तुमने परसादी की स्त्री को देखा है न? कैसे सिर से पैर तक गहनों मे लदी रहती है। वहां चल तो सही, तुझे भी गहनों से लाद दूँगा।"
श्यामवती पर गहनों के प्रलोभन का कोई असर नही पड़ा। उसने कहा, "मुझे गहने नहीं चाहिये।" "मेरे गहने तो तुम हो।" ऐसा कहते ही उसके हृदय में तीखी कसक उठी उसे साफ साफ लगा कि वह अपने आपको छल रही है। क्या महेन्द्र के लिये उसके हृदय मे सिंहासन नहीं है जिसमें उसको सौम्य मूर्ति सदैव विराजमान नहीं रहती!
भोला को श्यामा की बात जँची नहीं। उसने कुछ आवेश से कहा, "देख श्यामा मैं तो कालीमाटी जरुर जाऊंगा। मैं चाहता हूँ कि हम दोनों साथ चलें तो अच्छा हो पर तुम नहीं जाना चाहती तो तुम जानो।"
श्यामवती को भोला का स्वभाव अच्छी तरह मालूम था। उसे एक बार जो धुन सवार हो जाती तो वह उसे पूरी करके ही छोड़ता था। भोला की बात सा उसका हृदय काँप उठा। उसके लिये एक और कुँआ था तो दूसरी ओर खाई। यदि वह भोला के साथ नहीं जाती तो वह अवश्य ही उसे हमेशा के लिये छोड़ कर चला जावेगा और यदि जाती है तो उसके आत्मीय और जन्म भूमि छूट जाती है। और महेन्द्र! वह भी तो! कुछ देर तक गम्भीरता से सोचने के बाद वह बोली, "मैं साथ चलूंगी क्यों नही। तुम जहाँ कहोगे वहाँ जाऊंगी। कब तक चलोगे?"
"कब तक क्या? अच्छे काम मे देर क्यों! मैं तो आज ही भिनसारे रवाना होने के लिये सोच रहा हूँ" भोला के उत्तर में पहाड़ की दृढ़ता थी।
"तो अपने पिताजी को भी बता दो। उनका आशीर्वाद ले लें। फिर आज ही चलने में मुझे कोई इजर नहीं" कहने को तो श्यामवती कह गई पर उसके हृदय में तूफान मचा हुआ था आज ही प्रस्थान करने से तो वह अपनी माता और भाई से मिल ही नही सकेगी क्या एक बार ही महेन्द्र का दर्शन हो सकेगा उसे!
"पिताजी से कुछ नही कहना है" भोला ने रुखा सा जवाब दिया। सुनकर श्यामवती को दुख हुआ। वह उदासीनता से बोली, "जैसा चाहो वैसा करो। मुझे क्या?" भोला इतना तो अवश्य जानता था कि अपने पिता दुर्गाप्रसाद को अपना इरादा बतलावेगा तो वह उसे रोकने के लिये भरसक प्रयत्न करेगा। इसीलिये उसने चुपचाप भाग जाने का निश्चय किया और उसी रात श्यामवती के साथ टाटानगर के लिये रवाना हो गया।
दूसरे दिन दुर्गाप्रसाद ने अब बेटे और बहू को लापता पाया तब बहुत व्याकुल हुआ। पहले उसने किसी को उनके गुम हो जाने की सूचना नही दी। आप ही आप उन्हें गांव मे ढ़ूढ़ता रहा पर उनके न मिलने पर घर आकर चौखट पर बैठ दिर पकड़ कर बड़ी देर तक रोता रहा। अन्त में उसने निश्चय किया कि खुड़मुड़ी जाकर पता लगा आवे। कहीं वहीं तो दोनों न चले गये हों। ऐसा सोच वह अपने कमरे में गया। अचानक उसकी नजर एक मुड़े हुए कागज पर पड़ी जो उसकी पगड़ी के एक छोर में ऐसा बाँधा गया था कि पगड़ी उठाने के पहले उस पर नजर पड़े बिना रह ही नही सकती थी। उसने गाँठ खोलकर मुड़े हुए कागज की तह खोली। उसमें कुछ लिखा अवश्य था पर उसके लिये काले अक्षर भैंस बराबर थे। वह पढ़ ही कैसे सकता था। अचानक उसे पण्डित शिवसहाय की याद आई कि उनसे इस पूर्जे को क्यों न पढ़वा ले। वह बेतहाशा दौड़ता हुआ पण्डित शिवसहाय के घर गया पर वहां पता लगा कि वे एक किसान के घर सत्यनारायण की कथा पढ़ने गये हैं। उससे रुका नहीं गया। वह सिर के बल दौड़ता हुआ उस किसान के घर गया तो पाया कि सत्यनारायण की कथा चल रही है। वह वहाँ बैठ गया। शिवसहाय कथा सुनाने मे व्यस्त थे पर दुर्गाप्रसाद के कानों में उनके शब्द वैसे ही टकरा कर सुनाई दे रहे थे जैसे बादलों की गड़गड़ाहट सुन पड़ती है! चित्त अशान्त होने के कारण उसके लिये कथा सुनना न सुनना बराबर था! मन मे आंधी उठ रही थी जिसके झकोरे मे उसके मानसिक कान यही सुन रहे थे कि "मेरा भोला कहाँ होगा? बहू की क्या दशा होगी?"
कथा तो अधिक से अधिक आधे घण्टे मे समाप्त हो गई पर दुर्गाप्रसाद को ऐसा लगा मानो शताब्दी बीत गई हो! पूजा करा कर उठते ही उसने शिवसहाय को वह कागज दिया और पढ़कर सुनाने का अनुरोध किया। उसे पढ़ लेने के बाद शिवसहाय बोले "अरे! दुर्गा, यह तो तेरी बहू की चिट्ठी है। हम लोग कालीमाटी जा रहे हैं। आप फिकर मत करना। उन्होने मुझे आपको बताने से रोक दिया था। मैंने उनसे छिपाकर यह चिट्ठी लिखी है श्यामवती।
पण्डित जी ने पत्र जोर से पढ़ा था। सभी को मालूम हो गया कि भोला अब गांव मे नहीं है। जिन लोगों को उसने बहुत सताया था उन लोगो ने मन ही मन कहा, "चलो अच्छा हुआ। गांव से साढ़े साती दूर हुआ।" ऐसे लोग भी थे जिन्होंने दुर्गाप्रसाद के प्रति हर प्रकार से सहानुभूति भी दिखाई। वज्रपात के समान इस सूचना को वज्र का हृदय बनाकर दुर्गाप्रसाद ने सुन लिया पर आकर दुख से कातर हो पछाड़ खाकर गिर पड़ा और घण्टों रोता रहा।
दुर्गाप्रसाद ने अपना प्रबोध कर लिया। उसने सोचा जब उसका भाग्य ही खोटा है तो वह कर ही क्या सकता है! उदास रहकर खेती किसानों के कामों मे लग गया पर अब उसे जीवन मे केवल दूर तक फैला हुआ मरुस्थल ही दिखाई देता था।
(क्रमशः)
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