Friday, October 5, 2007

धान के देश में - 27

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 27 -

टाटनगर में श्यामवती आजकल अकेली ही है। उसे परसादी और उसकी पत्नी का पूरा सहारा मिल गया है। लगभग दस दिनों से भोला टाटानगर से बाहर गया हुआ है। जब से अपनी कुत्सित वासना का असफल परिचय देकर बुधराम भाग गया था तभी से भोला उससे बदला लेने के लिये विकल हो रहा था। उसने एक दिन श्यामा से बहाना किया कि उसे कारखाने के काम से बाहर जाना है और उधर कारखाने से भी पन्द्रह दिन की छुट्टी ली तथा सीधे कलकत्ता चला गया। वहाँ जाने का उसका एक मात्र उद्देश्य बुधराम को ढूँढ निकालना ही था। उसने अनुमान किया कि शायद वह कलकत्ता ही गया हो।
कलकत्ता पहुँच कर उसने हर ओर बुधराम को ढूँढा पर इतने बड़े शहर में उसका पता लगाना सहज काम नहीं था। भोला दिन भर इधर-उधर भटकता, किसी होटल में खा लेता और रात को फुटपाथ पर सो रहता था। एक दिन शाम हो चुकी थी। कलकत्ते की गलियाँ और सड़कें बिजली की रोशनी से मुस्कुराने लगी थीं। सामने से एक खाली रिक्शा आ रहा था जिसे कुछ गुनगुनाते हुये एक आदमी धीरे-धीरे खींच रहा था। जब रिक्शा पास आया तब भोला रिक्शेवाले को देखकर चौंक गया - वह बुधराम था। भोला को सामने पाकर बुधराम भी सहम गया। भोला ने उसे पुकारा।
पहले बुधराम ने सोचा कि वह तेजी से भाग जाये पर उसकी अकड़ ऐसा करने के लिये राजी नहीं हुई। उसने रिक्शा रोक दिया और रिक्शे की गद्दी के नीचे से चमचमाता हुआ छुरा निकाल कर पैंतरा बदल भोला से कहा, "देखो भोला, उस दिन तुम्हारे घर जो कुछ हुआ वह तो तुम्हें मालूम हो ही गया होगा। उसके बारे में एक भी शब्द बोले तो छुरा भोंक दूँगा।" भोला ने देखा कि जिस प्रकार वह बदला लेने के लिये तुला है उसी प्रकार और उससे भी अधिक बुधराम सतर्क है। उसने धूर्तता से काम लिया। मीठे शब्दों में बोला, "यार बुधराम, गोली मारो पिछली बातों को। मैं तो कलकत्ता घूमने आया हूँ। अच्छा हुआ जो अचानक तुमसे भेंट हो गई। पिछली बातों को सोचते भी हो तो जानते हो कि तुम्हारे भाग जाने के बाद क्या हुआ? मैंने श्यामवती की बच्ची को खूब पीटा। मुझे तो आज भी विश्वास है कि सारा दोष उसी का था। उसने ही तुम्हें बुलाया होगा। भैया, भगवान को जान लेना सहज है पर तिरिया चरित्तर को जान लेना किसके वश की बात है?"
भोला की बातें सुन कर बुधराम ठंडा पड़ गया। उसने सोचा कि भोला के ऊपर उसकी दोस्ती का कितना गहरा असर पड़ चुका था। बुधराम की अदूरदर्शिता ने भोला पर विश्वास कर लिया। उसने कहा, "यार, मैं तो मामला गरमागरम होने के कारण टाटानगर से यहाँ चला आया और रिक्शा चलाता हूँ। मैंने सोचा शायद तुम मुझे ही बुरा समझोगे। अच्छा अब चलो मेरे घर।" भोला इतना ही तो चाहता था। मन में उमड़ते हुये क्रोध को दबा कर वह बुधराम के रिक्शे पर बैठ गया और बुधराम उसे खींचता हुआ चला। सड़क से उतर कर एक गली में मुड़ते ही वह खोली सामने थी जिसे बुधराम ने किराये से ले रखा था। बुधराम ने रिक्शा रोका। भोला नीचे उतर गया और अपने उस दुष्ट साथी के द्वारा ताला खोले जाने पर दोनों ने खोली में प्रवेश किया। बुधराम ने पड़ी हुई खाट पर भोला को बैठाया। सबेरे की रखी हुई रोटी निकाल कर बोला, "लो, खा लो, फिर आराम करेंगे।" भोला ने बात बनाई और कहा, "मैं पहले ही बासे में खा चुका हूँ। भूख नहीं है। तुम खा लो।"
भोला की बात सुन कर बुधराम को संतोष हुआ। हृदय से तो वह चाहता ही था कि भोला न खाये तो अच्छा है क्योंकि वह भूखा था और रोटी एक ही आदमी के लिये काफी नहीं थी। बुधराम चुपचाप खाने लगा। भोला ने कहा, "यार बुधराम, मेरा खयाल है कि तुम यहाँ कालीमाटी से अधिक सुखी नहीं हो। दिन भर रिक्शा दौड़ाने के बाद भी तुम्हें उतने पैसे नहीं मिलते होंगे जितने वहाँ शान्ति और शान से नौकरी करने पर मिल जाते थे।"
"तुम ठीक कहते हो भोला।"
भोला ने देखा कि तीर ठिकाने पर लगा है। आगे बोला, "तो फिर से कालीमाटी क्यों नहीं चलते?" भोला की बात सुनकर बुधराम की प्रबल इच्छा हुई कि पंख हो तो अभी उड़ कर टाटानगर चला जावे। उसका यह भाव चेहरे पर उभर आया जिसे लक्ष्य लकर भोला ने आगे कहा, "देखो, यदि तुम वापस चलने को तैयार हो तो मैं मैनेजर से सिफारिश कर तुम्हें काम दिला दूँगा। मेरी मैनेजर से पटती है।"
अब बुधराम ने संकोच से कहा, "नहीं यार, रहने दो। वहाँ जाउँगा तो उस दुर्घटना को लेकर लोग क्या कहेंगे।"
"उसकी चिन्ता तुम मत करो। लोगों का क्या। वे तो कुछ का कुछ कहते ही रहते हैं। तुम मेरे साथ चलो तो सही।" भोला ने बड़े मीठे शब्दों में प्रसन्न मुद्रा बना कर कहा। बुधराम की कल्पना में टाटानगर में मनाई गुई रंगरेलियाँ एक एक कर साकार होती जा रही थीं। कुछ देर तक चुप रहने के बाद उसने अपनी स्वीकृति दे दी। निश्चय किया गया कि सवेरे की गाड़ी से ही टाटानगर वापस चला जावे। इसके बाद दोनों सो गये। दिन भर का थका हुआ होने के कारण बुधराम को गहरी नींद ने धर दबाया और वह खर्राटे लेने लगा पर भोला की आँखों में नींद नहीं थी। उसकी प्रतिहिंसा की भावना पिशाचिनी बन रही थी।
वह चुपचाप उठा। बुधराम ने जो छुरा रिक्शे के नीचे से निकाल कर एक कोने में रख दिया था उसे उठा लिया और बुधराम की छाती की ओर तान कर खड़ा हो गया। जैसे ही उसका हाथ बिजली की गति से छुरा भोंकने वाला ही था कि उसके विचार ने उसे एकदम रोक दिया। वह सोचने लगा 'मैं कलकत्ते में हूँ, यदि बुधराम को बोटी बोटी काट कर भागा तो इस अनजान नगर में पकड़ा जा सकता हूँ।' सहसा उसके मन में एक नया विचार बिजली की तरह कौंध गया जिससे वह आप ही आप मुस्कुरा कर रह गया। मन ही मन उसने स्वयं से कहा, "चलो, इस तरीके से वह तरीका लाख गुना अच्छा होगा। टाटानगर में ही सही।" चुपचाप उसने छुरा को उसके स्थान पर वापस रख दिया और लेट गया, पर उसे नींद नहीं आई।
प्रातःकाल होते ही भोला ने बुधराम को उठाया और दोनों पहली गाड़ी से टाटानगर के लिये रवाना हो गये।
(क्रमशः)
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