Monday, October 26, 2009

फिजिक्स के विद्यार्थी थे पर मनोविज्ञान पढ़ाया और फँस गए उम्र भर के लिए

मनोविज्ञान हमारा विषय कभी रहा ही नहीं पर पढ़ाया जरूर है इस विषय को। और उसी चक्कर में उम्र भर के लिए फँस भी गए। कैसे फँस गए यह सिर्फ आपको ही बता रहे हैं क्योंकि आप हमारे मित्र हैं, पर गुजारिश है कि आप किसी और को मत बताइगा प्लीज।

तो हम थे उस समय एम.एससी. फर्स्ट ईयर में, भौतिकशास्त्र विषय था हमारा। वार्षिक परीक्षा के कुछ दिन ही शेष थे। एक दिन हमारी एकमात्र छोटी बहन, जो कि बी.ए. फर्स्ट ईयर में पढ़ रही थी, ने हमसे कहा, "भैया, हम लोगों के सायकोलॉजी वाले सर पता नहीं पता नहीं कैसे पढ़ाते हैं कि कुछ समझ नहीं आता। लगता है हम सभी सहेलियाँ इस साल मनोविज्ञान में फेल हो जायेंगी। आप हम लोगों को सायकोलॉजी पढ़ा देंगे क्या?"

हमने कहा, "मैं भला मनोविज्ञान क्या जानूँ? ये तो मेरा विषय ही नहीं है। खैर, तुम्हारी मनोविज्ञान वाली पुस्तक दो पढ़ के देखते हैं और यदि समझ में आ जाएगा तो पढ़ा भी देंगे।"

उसने तत्काल हमें मनोविज्ञान की पुस्तक दे दी। पढ़ा तो विषय बहुत रोचक लगा। उसी दिन ही दो-तीन चेप्टर पढ़ गये और अगले ही दिन से सायकोलॉजी का क्लास लेने के लिए तैयार हो गये।

अगले दिन हमारी बहन के साथ उसकी पाँच छः सहेलियाँ आ गईं पढ़ने के लिए।

हमने कहा, "आज हम तुम लोगों को मनुष्य के मस्तिष्क के विषय में बतायेंगे। मस्तिष्क के तीन स्तर होते हैं - चेतन, अचेतन और अवचेतन। अंग्रेजी में इन्हें conscious, semi-conscious और unconscious कहा जाता है। जब हम जानते-बूझते किसी कार्य को करते हैं तो वह चेतन के द्वारा किया गया कार्य होता है किन्तु यदि किसी कार्य को अनजाने में करते हैं वह अचेतन का कार्य होता है। तुम लोगों ने देखा होगा तुम दो सहेलियाँ अपनी अपनी सायकल से कॉलेज जा रही हो और साथ ही साथ बातें भी कर रही हो। तुम लोगों का पूरा ध्यान बातें करने में ही लगा रहता है पर सड़क में मोड़ आने पर सायकल का हेंडल अपने आप मुड़ जाता है, सामने से किसी बड़ी गाड़ी आने पर सड़क के बीचोबीच चलती सायकलें किनारे आ जाती हैं पर बातों का सिलसिला कहीं पर भी नहीं टूटता। जब तुम लोग कॉलेज पहुँच जाती हो तो तुम्हें लगता है कि 'अरे! हम तो कॉलेज पहुँच गए'। याने कि तुम लोग जानती थीं कि तुम आपस में बाते कर रहीं थीं पर यह नहीं जानती थीं कि सायकल सही सही चलने का काम अपने आप हो रहा था। तो आपस में बातें करने वाला कार्य तुम लोगों का चेतन मस्तिष्क कर रहा था और सही सही सायकल चलाने का कार्य तुम्हारा अचेतन मस्तिष्क कर रहा था। चेतन तभी तक कार्य करता है जब तक हम जागते रहते हैं किन्तु अचेतन सोते-जागते चौबीसों घंटे कार्य करता है। सपने भी अचेतन ......."

अरे! अरे!! ये क्या? मैं तो आप लोगों का ही क्लास लेने लगा। थोड़ी धुनकी में आ गया था मैं। पर अब इससे आगे आप लोगों को और बोर नहीं करूँगा।

तो साहब, हमारा इस प्रकार पढ़ाना उन सभी को पसंद आया। उनमें हमारी बहन की एक बहुत प्यारी (और सुन्दर भी) सहेली भी हमारे मुहल्ले में ही रहती थी। अक्सर क्लास लेने के बाद भी हमसे कुछ कुछ पूछने आ जाती थी। हमारे पास से वो हमारी माँ के पास पहुँच जाती थी और उनके काम में हाथ बँटा दिया करती थी। वापस जाने के पहले हमारी दादी को भी उनकी पसंद की चर्चा याने कि धार्मिक चर्चा के लिए थोड़ा समय देना नहीं भूलती थी।

बहुत दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। फिर हमारी नौकरी लग गई तो हम रायपुर छोड़ कर नरसिंहपुर चले गए अकेले। लगता है कि हमारे चले जाने के बाद भी उसका हमारे घर में वैसा ही सिलसिला चलता रहा क्योंकि सन 1975 में स्थानान्तरित होकर रायपुर आने पर हमने पाया कि हमारी माँ, दादी, पिताजी सभी की वो लाडली बन चुकी थी।

अब सबकी यही जिद थी कि हम शादी कर लें उसके साथ। सबसे ज्यादा दबाव तो हमारी दादी का था।किसी प्रकार उसके बाद भी एक साल तक तो हम टालते रहे पर अन्ततः शादी कर ही ली उसके साथ और आज तक भुगत रहे हैं।


चलते-चलते

हम दोस्तों के साथ रोज बार चले जाया करते थे। रात में वापस आने पर, जैसा कि आप अनुमान लगा ही सकते हैं, रोज ही हमें श्रीमती जी हड़काती थीं। जब हम बिना कोई प्रतिक्रिया किए चुपचाप सुन लेते थे तो आखिर में कहती थी 'देख लेना एक दिन भीख मांगोगे'

एक दिन हमने सोचा कि कहती तो ये ठीक ही है और इसकी बात में हमारी भलाई भी है, हमको दारू छोड़ देना चाहिए। बस क्या था छोड़ दिया पीना। यार दोस्त आए, हमें बहुत मनाया पर हम भी अपने निश्चय पर अटल रहे। इस प्रकार पूरे पच्चीस दिन बीत गए। पच्चीसवें दिन पूरी मित्र मण्डली ने हमें बधाई दी और कहा कि यार तुम्हें पीना छोड़े पच्चीस दिन हो गए हैं। इसी खुशी में हम लोगों ने एक पार्टी रखी है। हमने कहा भाई तुम्हारी पार्टी तो दारू वाली ही होगी, मेरा वहाँ क्या काम? उन्होंने कहा कि यार तुम भी अजीब आदमी हो! अरे भई, तुम ड्रिंक्स मत लेना पर खाना तो खा सकते हो ना।

अब पार्टी में हमें दोस्तों ने सिर्फ एक घूँट ले लेने के लिए इतनी मिन्नत की कि हमने हाँ कर दी। बस फिर क्या था। कोई कभी सिर्फ एक घूँट ले कर रह सकता है?

जब वापस लौटे तो फिर वही हड़काना - मैं कहती थी ना कि आप कभी भी पीना नहीं छोड़ सकते ... ऐसा... वैसा ... आदि आदि इत्यादि और आखिर में 'देख लेना एक दिन भीख मांगोगे'

हम तो जानते ही थे कि आखिर में क्या कहा जायेगा इसलिए हमने पहले से ही जुगाड़ कर लिया था याने कि एक भीख मांगने वाले को दस रुपये देकर साथ लाये थे जो कि दरवाजे के पास बैठा था। जब श्रीमती जी ने 'देख लेना एक दिन भीख मांगोगे' कहा तो हम बोले चलो जरा दरवाजे तक।

दोनों के दरवाजे तक आ जाने पर हमने उस भिखमंगे को बुला कर कहा, "तुम क्या करते हो भाई?"

"भीख मांगता हूँ साहब।"

"कभी दारू पी है?"

"अरे साहब, भीख मांग कर बड़ी मुश्किल से एक टाइम के खाने का जुगाड़ होता है। भला मैं दारू कहाँ से पी सकता हूँ। नहीं, मैं दारू नहीं पीता।"

हमने उस भिखारी को जाने के लिए कह दिया और सीना फुला कर मैडम से बोले, "देखा मैडम! जो लोग दारू नहीं पीते वो ही भीख मांगते हैं।

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