Sunday, October 25, 2009

अब मरने वाले की बुराई कैसे करें ...

मुहल्ले का कुख्यात गुंडा लल्लू लाटा मर गया। गुंडा तो था किन्तु उसके संबंध बड़े बड़े नेताओं से भी थे अतः उसकी अच्छी साख भी थी। लोग उसे छुपे तौर पर गुंडा कहते पर खुले तौर पर उस एक संभ्रांत व्यक्ति ही कहा करते थे।

तो लल्लू लाटा मर गया। मरना तो खैर प्रत्येक प्राणी की नियति है और जन्म के साथ ही मरने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। एक दिन आखिर सभी को मरना ही पड़ता है। अस्तु, तो लल्लू लाटा मर गया। संभ्रांत होने के कारण उसकी मृत्यु के पश्चात् मुहल्ले में एक शोक सभा आयोजित करने की योजना भी बन गई। मुहल्ला समिति के प्रमुख को एक छोटा सा भाषण भी देना था।

समिति प्रमुख के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई, आखिर बोले तो क्या बोले। कोई भी अच्छा कार्य, जिसे कि लल्लू लाटा ने किया हो, उसे याद ही नहीं आ रहा था। और फिर किसी दिवंगत की बुराई भी तो नहीं की जा सकती। भई, अब किसी के मरने के बाद उसकी बुराई कैसे करें?

अंततः समिति प्रमुख ने सभा में कहा, "ये माना कि लल्लू लाटा एक नंबर का कमीना था। पूरा हरामी था। कई बार डाके डाले थे उसने और कितनों की हत्याएँ भी की थी। मुहल्ले की बहू बेटियों पर हमेशा बुरी नजर रखा करता था। मुहल्ले का ऐसा कोई भी निवासी नहीं होगा जिसे कि उसने परेशान न किया हो। फिर भी वो अपने भाई कल्लू काटा से लाख गुना अच्छा था!"



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