Tuesday, November 10, 2009

क्या वो भूत था या महज एक भ्रम?

भूत होते हैं या नहीं यह एक विवादित विषय है। मैं स्वयं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ इसलिये सामान्यतः अलौकिक बातों पर विश्वास नहीं करता किन्तु कुछ घटनाएँ मेरे साथ ऐसी घटी हैं जो मुझे अलौकिक बातों के अस्तित्व पर विश्वास करने पर विवश कर देती है। आज एक ऐसा ही संस्मरण आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

बात दिसम्बर 1980 की है। मैं उन दिनों ऑडिट असिस्टेंट था और ऑडिट के उद्देश्य से अपने अधिकारी, सुब्रमणियम साहब, के साथ जलपाईगुड़ी पहुँचा। वहाँ के शाखा प्रबन्धक शर्मा जी अत्यन्त सज्जन व्यक्ति थे और हमारे रहने के लिये उन्होंने हमें दो गेस्ट हाउस दिखाये। पहला शहर में ही था और आधुनिक भी था। दूसरा गेस्ट हाउस एक बहुत पुराने चाय बगान का था जो शहर से रेल्वे स्टेशन जाने के रास्ते में कुछ सुनसान जगह में था। हमने अपने रहने के लिये दूसरे गेस्ट हाउस को को पसंद किया। वह अंग्रेजों के जमाने का बना हुआ पुराना भवन था जिसकी पहली मंजिल में चाय बगान का ऑफिस था और दूसरी मंजिल में एक विशाल गेस्ट हाउस था। ऊपर जाने के लिये गोल चक्करदार सीढ़ियाँ थीं। सीढ़ियाँ खत्म होते ही एक ओर बहुत बड़ा बाथरूम था जिसमें पुराने जमाने का ही बाथटब और कमोड लगा था। दूसरी ओर हमारा गेस्ट हाउस था।

दिन भर हम बैंक में काम करते थे और शाम के बाद अपने गेस्ट हाउस में आ जाते थे। मैंने दो रात उस गेस्ट हाउस में बड़े मजे के साथ बिताया। तीसरे दिन सुब्रमणियम साहब को एक चाय बगान का इंस्पेक्शन करने जाना था जो कि जलपाईगुड़ी से लगभग डेढ़-दो सौ किलोमीटर दूर था। उन्होंने मुझसे कहा कि अवधिया, मैं ओल्ड आदमी है, आज जाकर आज ही वापस आयेगा तो बहुत एक्जर्शन होगा इसलिये मैं रात में वहीं रुक जायेगा और कल वापस आयेगा।

मैं शुरू से ही निशाचर टाइप का इंसान रहा हूँ याने कि रात में देर से सोने की आदत है मुझे, सोते-सोते लगभग एक डेढ़ बज ही जाते हैं। मैंने बैंक की लाइब्रेरी से "लोलिता" उपन्यास ईशु करा लिया था जिसे कि रात को सोने के पहले मैं पढ़ा करता था। उस रात भी मैं लगभग एक-सवा बजे तक पढ़ता रहा। फिर लाइट बुझाकर मच्छरदानी के भीतर घुस कर सोने का प्रयास करने लगा। कमरे में घुप्प अंधेरा था। एक दो मिनट बाद ही मुझे लगा कि सुब्रमनियम साहब के बेड, जो कि मेरे बेड के पास ही था और दोनों बेड के बीच एक टी टेबल रखा था, से खर्राटे लेने की आवाज आ रही है। उस समय मैं सोया नहीं था बल्कि सोने का प्रयास कर रहा था। मैं सोचने लगा कि यह आवाज कैसी है? आज तो सुब्रमणियम साहब भी नहीं हैं। फिर मैंने यह सोच कर स्वयं को तसल्ली दी कि अकेले होने के कारण मुझे कुछ भ्रम सा हो रहा है। उस समय मुझे भूत प्रेत आदि का कुछ गुमान भी नहीं था और मैं जरा भी भयभीत नहीं था।

मैं आँखें बन्द करके सोने का प्रयास करने लगा। किन्तु खर्राटे की आवाज थी कि लगातार चली आ रही थी। पाँचेक मिनट बीतने पर भी जब आवाज बन्द नहीं हुई तो बिस्तर से निकल कर मैंने लाइट जलाई। लाइट जलते ही झकाझक उजाला हो गया और खर्राटे की आवाज भी बंद हो गई। मैंने सुब्रमणियम साहब के बिस्तर का निरीक्षण किया और पाया कि न तो उस पर कोई सोया है और न ही किसी प्रकार की सिलवट आदि ही है। खिड़की दरवाजों को भी मैंने एक नजर देखा, वे भी भलीभाँति बन्द थे।

मुझे विश्वास हो गया कि खर्राटों की आवाज महज मेरा वहम था। लाइट बुझा कर फिर मैं अपने बिस्तर में घुस गया। फिर वही घुप्प अंधेरा। एकाध मिनट भी नहीं बीता था कि फिर खर्राटों की आवाज आनी शुरू हो गई। मैंने सोचा कि यह मेरा वहम है, थोड़ी देर में मुझे नींद आ जायेगी। पर वह आवाज लगातार जारी थी। दसेक मिनट तक तो मैं सुनता रहा फिर मैं एक बार फिर बिस्तर से बाहर निकला और लाइट जलाया। इस बार भी उजाला होते ही आवाज बन्द हो गई किन्तु नीचे कुछ कुत्तों के एक साथ रोने की आवाज सुनाई देने लगी।

कुत्ते रोने की आवाजे आने से पहले मुझमें लेशमात्र का भी भय नहीं था किन्तु बचपन से सुनते आया था कि कुत्तों का रोना अशुभ होता है, उन्हें भूत या आत्माएँ दिखाई पड़ती हैं और परिणामस्वरूप वे रोने लगते हैं। यार दोस्त जब ऐसा कुछ जिक्र करते थे तो मैं उनकी हँसी उड़ाया करता था पर आज वे बातें ही मुझ पर कुछ कुछ असर दिखाने लगीं। रात के दो बज चुके थे। डर से थर थर काँप तो नहीं रहा था मैं पर कुछ कुछ भय का अनुभव जरूर कर रहा था।

(चित्र गूगल इमेजेस से साभार)

पूरा इलाका सुनसान था। आस पास न कोई घर न दुकान। नीचे चाय बगान के आफिस में ताले बन्द। एक भी आदमी नहीं। हाँ भवन के आखरी छोर पर चौकीदार का कॉटेज जरूर था जहाँ वृद्धावस्था को प्राप्त करता एक चौकीदार रहता था। वही एक आदमी उपलब्ध हो सकता था उस समय। मैंने टार्च निकाला और उसके कॉटेज में जाने को उद्यत हुआ। किन्तु कमरे का दरवाजा पार करते ही मेरे पैर रुक गये। मैं सोचने लगा कि क्या दिखाउँगा मैं उस चौकीदार को? और यदि उसके आ जाने के बाद अंधेरा करने पर भी मान लो खर्राटों की आवाज नहीं सुनाई पड़ी तो? तब तो वह चौकीदार अवश्य ही मुझे बहुत बड़ा डरपोक समझेगा।

मैं फिर से कमरे में वापस आ गया। लाइट जलने दी और बिस्तर में घुस कर सोने का प्रयास करने लगा। पर मेरी नींद उड़ चुकी थी। वैसे भी सौ वाट के बल्ब की रोशनी में नींद आने से रही और अब लाइट बुझाने का साहस मैं कर नहीं पा रहा था। उन दिनों बंगाल में बिजली की बेहद शार्टेज चल रही थी। कब लाइट चली जायेगी यह कहा भी नहीं जा सकता था। अक्सर रात को एक-दो बजे लाइट चली जाती थी जो कि सुबह होने के बाद ही वापस आती थी। गनीमत यह रही कि उस रोज लाइट नहीं गई।

ले दे कर रात बीत गई। दूसरे दिन मैं तैयार होकर बैंक पहुँचा और अपने काम में लग गया। दोपहर तक सुब्रमणियम साहब भी वापस आ गये। मैं उहापोह में था कि कल के अपने अनुभव को किसी को, विशेष करके सुब्रमणियम साहब को, बताऊँ या न बताऊँ। पता नहीं क्या समझेंगे वे। इसी उहापोह में और काम करते-करते शाम हो गई। दिसम्बर का महीना होने के कारण दिन छोटा हो गया था और शाम साढ़े पाँच बजे ही अंधेरा घिर जाता था। हम साढ़े छः-सात बजे तक काम करते थे बैंक में। वापस गेस्ट हाऊस जाते तक भरपूर अंधेरा हो जाता था। मैंने सोच लिया कि कल के अपने अनुभव को कम से कम सुब्रमणियम साहब को तो बता ही देना चाहिये।

बैंक से निकल कर गेस्ट हाउस जाते समय रास्ते में मैंने उन्हे सारा किस्सा सुनाया। मेरे किस्से को सुनकर उन्होंने कहा कि अवधिया, आई हैव नॉट टोल्ड यू मॉय एक्पीरियंस, आय हैव गॉन थ्रू सम पीक्युलियर फीलिंग्स इन दिस गेस्ट हाउस। मैं सोचा कि तुम डर जायेगा इसलिये नहीं बताया पर अब बताता है। द व्हेरी फर्स्ट डे एट दिस गेस्ट हाउस ........

(शेष कल)

चलते-चलते

आज का चलते चलते भी इसी संस्मरण का ही एक हिस्सा है। घूमने के लिये जलपाईगुड़ी से हम दार्जिलिंग गये टैक्सी कार से। हम चार लोग थे - मैं, सुब्रमणियम साहब, बैंक के प्रबन्धक शर्मा जी और बैंक के एक फील्ड आफीसर साहब जिनका नाम याद नहीं आ पा रहा है। दार्जिलिंग में बेहर ठंड थी, दो दिन पहले ही स्नोफॉल हुआ था और हम ठिठुर रहे थे ठंड से। दो डबल रूम ले लिये हमने एक होटल में, एक मेरे तथा सुब्रमणियम साहब के लिये और दूसरा बैंक के आफीसर द्वय के लिये। उस होटल में कमरा गरम करने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी अतः हमने रात में ओढ़ने के लिये अतिरिक्त कम्बलें और ले लीं।

दार्जिलिंग में घूम-घाम कर शाम को सात-साढ़े सात बजे हम अपने होटल पहुँचे। सुब्रमणियम साहब डेली ड्रिंक लेते थे इसलिये कमरे में पहुँचते ही ब्रांडी की बोतल खोल ली और पैग बनाने लगे। मैंने देखा वे दो पैग बना रहे हैं। उन दिनों मैं ड्रिंक नहीं लिया करता था (ऐसा भी नहीं था कि बिल्कुल ही दूध का धुला था मैं, यारी दोस्ती में दो-चार बार बीयर का स्वाद चख चुका था)।

सुब्रमणियम साहब को दो पैग बनाते देख कर मैंने पूछा, "ये आप दूसरा पैग किसके लिये बना रहे हैं?"

सहजता के साथ वे बोले, "तुम्हारे लिये।"

"आप तो जानते हैं कि मैं ड्रिंक नहीं लेता।"

"तो ठीक है मत पीना! पर मेरे को अपने घर का पता लिख कर दे दो़"

"वो क्यों?"

"अरे भाई, कल मुझे तुम्हारे पिता को टेलीग्राम करना पड़ेगा ना कि यहाँ आकर अपने बेटे की अकड़ी हुई लाश ले जाओ।"

मेरे लाख कहने के बाद भी वे माने ही नहीं। क्या करें साहब उस रोज हमें दो पैग ब्रांडी पीनी ही पड़ी।

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