Friday, November 13, 2009

एक ब्लोगवाणी पसंद का सवाल है बाबा ... जो दे उसका भी भला जो न दे उसका भी भला

कल हमने भेजे याने कि खोपड़ी पर लिखने के लिये खूब खोपड़ी खपाया,
उसे लिखने के लिये दो घंटे की मशक्कत के बदले सिर्फ छः ब्लोगवाणी पसंद ही पाया,
इतनी कम पसंद?
क्या हम इतने गये गुजरे हैं?
ये सब सोच कर हमारा भेजा भन्नाया

अरे! ये तो कविता बनती जा रही है। नहीं भाई, मैं कवि नहीं हूँ इसलिये मैं कविता की और लाइने लिख कर आपको बोर नहीं करूँगा।

मैं तो सिर्फ यह जानना चाहता हूँ कि आखिर लोग किसी पोस्ट को पसंद करते हैं तो पसंद बटन पर एक चटका लगाने में कंजूसी क्यों कर जाते हैं? क्या जाता है उनका पसंद बटन पर एक क्लिक करने में? न तो इसके लिये जेब से रुपया खर्च करना पड़ता है और न ही कोई समय गवाँना पड़ता है।

टिप्पणियाँ मिल जाती हैं पर पसंद नहीं मिलता। बताइये भला, यह भी कोई बात हुई?

यह सब मैं अपने पोस्ट को पसंद करवाने के लिये नहीं कह रहा हूँ बल्कि उन सभी पोस्टों के बारे में कह रहा हूँ जिन्हें आप पढ़ कर पसंद करते हैं और टिप्पणी भी करते हैं। आपकी टिप्पणी से सिर्फ ब्लोगर को तुष्टि मिलती है किन्तु आपके पसंद बटन को क्लिक करने से सिर्फ ब्लोगर को तुष्टि मिलती है वरन ब्लोगवाणी की लोकप्रियता भी बढ़ती है।

ब्लोगवाणी और इसके पसंद बटन की लोकप्रियता बढ़ने पर गूगल को भी इसे अंग्रेजी के डिग, टेक्नोराटी आदि की तरह महत्व देना पड़ेगा। यह मापदंड बन जायेगा हिन्दी ब्लोग की लोकप्रियता का। अधिक पसंद किये जाने वाले पोस्टों को सर्च इंजिन्स में प्रमुख स्थान मिलने लगेंगे। अंग्रेजी के डिग बटन में तो सैकड़ों से हजारों की संख्या में चटके लगते हैं इसी कारण से गूगल सहित अन्य सभी सर्च इंजिन्स की नजरों में डिग का महत्व है। हमें भी यह प्रयास करना है कि ब्लोगवाणी पसंद का भी महत्व डिग, टेक्नोराटी जैसा हो जाये।

तो पसंद आने वाली पोस्टों में आप चाहे टिप्पणी करें या न करें पर पसंद बटन पर चटका लगाना कभी भी न भूलें। ऐसा करके आप ब्लोगर को प्रोत्साहन तो देंगे ही साथ ही साथ हिन्दी ब्लोग्स को आगे बढ़ाने में भी आपका योगदान हो जायेगा। पर चटका उसी पोस्ट के लिये लगायें जो आप को पसंद हो, जो पोस्ट आपको पसंद नहीं हैं उस पर चटका लगाना पसंद बटन का दुरुपयोग होगा।

चलते-चलते

आज के हमारे इस पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर कैसा लगा? यही ना कि हमने मांगने वाला स्टाइल अपनाया आज। और आप तो जानते ही हैं

रहिमन वे नर मर चुके जो कछु मांगन जाहि।
उन ते पहिले वे मुए जिन मुख निकसत नाहि॥


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