Sunday, November 15, 2009

खब्त-खोपड़ी-खाविन्द हूँ तेरा, जीवन भर तुझको झेला हूँ

हे आर्यावर्त की आधुनिक आर्या!
हे विकराले! हे कटुभाषिणी!
हे देवि! हे भार्या!

पाणिग्रहण किया था तुझसे
सोच के कि तू कितनी सुन्दर है,
पता नहीं था
मेरी बीबी मेरी खातिर
"साँप के मुँह में छुछूंदर है"

निगल नहीं पाता हूँ तुझको
और उगलना मुश्किल है
समझा था जिसको कोमलहृदया
अब जाना वो संगदिल है

खब्त-खोपड़ी-खाविन्द हूँ तेरा
जीवन भर तुझको झेला हूँ
"पत्नी को परमेश्वर मानो"
जैसी दीक्षा देने वाले गुरु का
सही अर्थ में चेला हूँ

बैरी है तू मेरे ब्लोगिंग की
क्यूँ करती मेरे पोस्ट-लेखन पर आघात है?
मेरे ब्लोगिंग-बगिया के लता-पुष्प पर
करती क्यों तुषारापात है?

हे विकराले! हे कटुभाषिणी!
हे देवि! हे भार्या!

बस एक पोस्ट लिखने दे मुझको
और प्रकाशित करने दे
खाली-खाली हृदय को मेरे
उल्लास-उमंग से भरने दे
तेरे इस उपकार के बदले
मैं तेरा गुण गाउँगा
स्तुति करूँगा मैं तेरी
और तेरे चरणों में
नतमस्तक हो जाउँगा।

चलते-चलते

रात भर ड्यूटी करने बाद थका हारा पुलिसवाला पति घर आकर सो गया। अभी झपकी भी नहीं लगी थी कि उसकी पत्नी ने उसके जेब से सौ की पत्ती मार दिया। पर पुलिसवाला आखिर पुलिसवाला था तत्काल उसने चोरी पकड़ ली।

बीबी से बोला, "मैं तुम्हारा पति बाद में हूँ, पुलिसवाला पहले हूँ। जल्दी से निकाल दो चोरी का माल।"

बीबी बोली, "अजी, छोड़िये भी, चोरी के माल में से आधा आप रख लीजिये और मामला निबटाइये।"

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कबन्ध का वध - अरण्यकाण्ड (17)

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