Tuesday, March 30, 2010

कहाँ गई आत्मा?


इधर कई सालों से मैंने आत्मा को नहीं देखा है; क्या आपने देखा है उसे?

नेता हैं पर जनता का ही रक्त चूस रहे हैं और राष्ट्र तक को बेच खा रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

व्यापारी है किन्तु व्यापार के नाम से ग्राहकों को लूट रहे हैं; उचित मुनाफा लेकर जीवनयापन करने के बदले ग्राहकों को लूट-लूट कर तिजोरी भरना ही उनका उद्देश्य बन गया है? कहाँ गई उनकी आत्मा?

चिकित्सक हैं किन्तु सिर्फ उन्हीं की चिकित्सा करते हैं जो बदले में मोटी रकम दे सके; गरीब चिकित्सा के बिना मर रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

शिक्षा संस्थान हैं किन्तु विद्या का दान नहीं व्यापार कर रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

संगीत है किन्तु मेलॉडी नहीं है; शोर-शराबा संगीत ही का पर्याय बन गया है। कहाँ गई संगीत की आत्मा?

कविताएँ हैं किन्तु काव्यात्मक विकलता नहीं है; क्रौञ्च वध से उत्पन्न करुणा नहीं है। कहाँ गई कविता की आत्मा?

कहाँ गई आत्मा?

क्या आत्मा मर चुकी है?

15 comments:

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

तंग आ आत्मा तो कब की परमात्मा में विलीन हो गई ! अब तो बस भूतों -पिचाशो के कंकाल अपना खेल खेल रहे है !

Randhir Singh Suman said...

nice

अन्तर सोहिल said...

ब्लाग पढते तो हैं, मगर टिप्पणी नही करते
कहां गई आत्मा :-)

प्रणाम

Anil Pusadkar said...

गोदियाल जी और सोहिल जी की टिपण्णीयों को मेरी टिपण्णी माना जाये।
अवधिया जी हनुमान जयंती की बधाई।

sonal said...

हुने अपनी आत्मा को अपनी गुडियाघर में छिपा दिया है ..मासूम उसके साथ खुश रहती है

डॉ महेश सिन्हा said...

इसीलिये आसानी से नहीं दिखती आत्मा

kunwarji's said...

आत्मा-वात्मा के चक्कर में पड़ कर भूखो नहीं मरना है मियाँ!

उसी आत्मा को जिलाने के लिए जी रहे है!लूट-खसोट कर ही सही,धोखा-धडी से ही सही,

ऐसे-वैसे-जैसे-कैसे भी उस आत्मा के लिए ही तो कर रहे है.......

कुंवर जी,

kunwarji's said...

आत्मा-वात्मा के चक्कर में पड़ कर भूखो नहीं मरना है मियाँ!

उसी आत्मा को जिलाने के लिए जी रहे है!लूट-खसोट कर ही सही,धोखा-धडी से ही सही,

ऐसे-वैसे-जैसे-कैसे भी उस आत्मा के लिए ही तो कर रहे है.......

कुंवर जी,

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

ता कारन हत आतमा, झुठ कपट अहंकार्।
सो माटी मिल जाएगा, बिसरा सिरजनहार ॥

दादु कोई काहु जीव की करे आतमा घात्।
सांस कहुँ समय नही सो प्राणी दोजख जात॥

ज्ञान गुरु का गुदड़ी, शब्द गुरु का भेख्।
अतीत हमारी आत्मा, दादु पंथ अलेख ॥

जिसकी सुरति जहां रहे तिसका तंह विश्राम्।
भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥


जय हो अवधिया जी

Yashwant Mehta "Yash" said...

अभी बताये रहा हूँ दुबारा मत पूछना

आत्मा गयी तेल लेने!!!!!!!!!!

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" said...

कलयुग याने मुर्दों की बस्ती...ओर सुना हैं कि मुर्दों में आत्मा नहीं हुआ करती..

विजयप्रकाश said...

आत्मा बन गयी है दुरात्मा

राज भाटिय़ा said...

आत्मा को इन्होने इतना शमिंदा किया की वो इन हेवानो को छोड कर भाग गई

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सोचता हूं कि कहां गई>>

सूर्यकान्त गुप्ता said...

"आत्मा "आत्म" सुख
"आत्म" प्रतिष्ठा के चक्कर में
उलझ गई है बजाय इसके कि
परमार्थ में कम से कम यह सोचकर लग जाया जावे
कि इससे हमें जीवन के सबसे
बड़े स्वार्थ, "अपने आप में संतोष" और लोगों की
दुआ, की पूर्ती होगी .
"कहाँ गयी आत्मा" का सुन्दर चित्रण