Wednesday, March 31, 2010

डॉ. जमालगोटा का करम खोटा... बन गया वो बिन पेंदी का लोटा

अब डॉ. जमालगोटा का करम ही खोटा है तो भला कोई क्या कर सकता है? ये जहाँ भी जाते हैं गाली ही खाते हैं। पर बड़ी मोटी चमड़ी है इनकी, इसीलिये गाली खाकर भी मुस्कुराते हैं। पहले ये हकीमी करते थे किन्तु "नीम हकीम खतरा-ए-जान" समझकर कोई इनसे इलाज ही नहीं करवाता था। परेशान होकर इन्होंने डॉ. नाईक को अपना उस्ताद बना लिया और उस्ताद ने इनके नाम के साथ "डॉ." का तमगा लगा दिया।

एक बार इन्होंने एक मरीज को, अपने नाम के अनुरूप, जमालगोटा खिला दिया। मरीज की हालत बिगड़ गई तो गिरी जी ने गुस्से में आकर इन्हें जमीन पर गिरा दिया और अवध्य बाबू ने इनका कपड़ा फाड़ डाला। इस घटना के बाद ये पागल हो गये और इनके दिमाग का ऑपरेशन करवाया गया। ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर ने इन्हे ठीक करने के लिये इनके दिमाग में बहुत सारे गन्दगी के कीड़े भर दिये। तभी से इनके दिमाग से सिर्फ गंदे विचार ही निकलते हैं।

दिमाग का ऑपरेशन हो जाने के बाद ये पूरे पागल की जगह अब नीम पागल हो गये हैं पर स्वयं को बहुत बड़ा तालीमयाफ्ता और ब्रह्मज्ञानी समझते हैं। लोगों को जबरन ज्ञान बाँटते फिरते हैं। बिन पेंदी के लोटे के जैसे कभी वेद की तरफ लुढ़कते हैं तो कभी कुरआन की तरफ, कभी गायत्री का गान करते हैं तो कभी काबा की तरीफ करने लग जाते हैं। बिन पेंदी का यह लोटा सदा गंदे नाले की गंदगी से आधा भरा रहता है और आप तो जानते ही हैं कि "अधजल गगरी छलकत जाय"। इस लोटे से गंदगी हमेशा छलकती ही रहती है।

पर गिरी जी और अवध्य बाबू जब भी इन्हें दिखाई पड़ जाते हैं, इनका सारा ज्ञान घुसड़ जाता है और नीम पागल की जगह फिर से पूरे पागल बन कर अनाप शनाप बकने लगते हैं। गिरी और अवध्य बाबू इनके लिये लाइलाज बीमारी बन गये हैं जिसका इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं हैं। अब क्या करें ये बेचारे जमालगोटा साहब? सिर्फ अपने करम को कोसते रहते हैं। चलनी  में दूध दुहने वाला करम को कोसने के सिवाय और कर ही क्या सकता है?

अन्त में हम इतना ही लिखना चाहेंगे मित्रों कि न तो हमारे संस्कार इस प्रकार के लेखन की हमें इजाजत देते हैं और न ही ऐसा लेखन हमें शोभा देता है। हम यह भी जानते हैं कि गंदगी में ढेला मारने से छींटे अपने आप पर ही आते हैं। किन्तु हम इतने कायर भी नहीं हैं कि चुपचाप आतताई को सहन कर लें। अन्याय करना जितना बड़ा अपराध है, अन्याय सहना उससे भी बड़ा अपराध है। इसीलिये कभी-कभी "जिन मोहे मारा ते मैं मारे" वाले अंदाज में भी आना पड़ता है, ईंट का जवाब पत्थर से देना ही पड़ता है।

11 टिप्पणियाँ:

पी.सी.गोदियाल said...

मुझे तो अवधिया साहब , यही सोच-सोच कर हैरानी होती रहती है कि जब इनके एक डाक्टर ( तथाकथित ) की मानसिकता ऐसी है तो बाकी के आम सलीमो की सोच पर तो हम खामख्वाह नाराजगी व्यक्त कर रहे थे!

sudha prajapti said...

वाह अवधिया जी,
आपने बहुत करारी पोस्ट लिखी है।
कुर्रम कुर्रम कुरकुरे वाली
अन्याय करना जितना बड़ा अपराध है, अन्याय सहना उससे भी बड़ा अपराध है। इसीलिये कभी-कभी "जिन मोहे मारा ते मैं मारे" वाले अंदाज में भी आना पड़ता है, ईंट का जवाब पत्थर से देना ही पड़ता है।

सही जवाब

Bhavesh (भावेश ) said...

एक बार गलती से या यूँ समझे की पहली बार जिज्ञासावश एक पोस्ट पढ कर ही पता चल गया था कि "इन तिलों में तेल नहीं". बस उसके बाद तो उस गली का रास्ता ही नहीं पकड़ा. क्योंकि कबीरदासजी ने कहाँ है कि ज्ञानी से कहिये कहाँ कहत कबीर लजाये, अंधे आगे नाचते कला अकारथ जाए.

Suresh Chiplunkar said...

एक बार मार दिया आपने, बस ठीक है… अब और नहीं…
"पागलों" पर दया करनी चाहिये ऐसा सामान्य व्यवहार कहता है…। यदि खाड़ी देशों से मिले पैसों का उपयोग और हिसाब नहीं करेगा तो बेचारा लिखेगा क्या? क्योंकि देश के किसी ज्वलंत मुद्दे पर लिखना तो आता नहीं…।

हिन्दी पत्रिका "सरिता" के पुराने अंकों में से देख-देखकर नकल करता है बेचारा… जाने दीजिये सर, दया कीजिये…

जी.के. अवधिया said...

पागल समझ कर दया ही तो कर रहे थे सुरेश जी किन्तु पागलपन की भी कोई सीमा होती है। ठीक है, आप कह रहे हैं तो अब आगे भी दया ही करेंगे।

ललित शर्मा said...

नकटा आगे नकटी नाचे,नकटी ताल बजावे
नकटी आगे नकटा गावे,नकटी नकटा भावे

दादु द्वै द्वै पढ लिए, साखी भी हुँ चार
हमको अनुभव उपजी,हम ज्ञानी संसार

जय हो

kunwarji's said...

डाक्टर साहब बेचारे,उन्होंने पढ़ा तो होगा जरुर!
सलीम मियाँ भी लुक-छिप कर देख तो गए होंगे!और इन्टरनेट पर कैराना भी कहा दूर है!
पर क्षणिक शर्म टाइप की चीज आ ही गयी होगी सो यहाँ जवाब नहीं दे पाए होंगे!अगली पोस्ट कि तय्यारी में लग गए होंगे,अब शर्म क्षणिक ही तो थी जनाब!

kunwar ji,

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

सुना है गूगल भारत और पाकिस्तान सरकार के साथ मिलकर कोई सांझा उपक्रम शुरू करने जा रहा है...जिसके तहत हिन्दी ब्लागजगत में फैले सभी नकटों, पागलों को पकड पकडकर पाकिस्तान की मंडियों में बेचने के लिए भेज दिया जाएगा...वहाँ ऎसे लोगों की बहुत भारी डिमांड है:-)

Tarkeshwar Giri said...

अरे भाई साहेब क्या करे , समझाते - समझाते थक गए । लेकिन वो तो क्या कहे। हमारे आजमगढ़ के पड़ोस मैं एक गाँव है जिसमे सिर्फ पागल रहते हैं। और जो नहीं रहते हैं वो कंही ना कंही आई ये यस या पी सी यस हैं। लेकिन पागल सिर्फ इस लिये हुए की वो पागल लोग डॉ अनवर जमाल की तरह कुछ ज्यादा ही पढ़ लिख गए। और उनके चले भी उन्ही की तरह , वो क्या नाम है करेला या करान्वी पता नहीं।

Tarkeshwar Giri said...

meri post kidhar

राज भाटिय़ा said...

आवधिया जी कमाल कर दित्ता तुसी ते, बहुत सुंदर,

 
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