Friday, April 9, 2010

शवयात्रा से वापस आने पर नीमयुक्त पानी से स्नान

हमारे छत्तीसगढ़ में एक परम्परा है कि जब कोई व्यक्ति किसी की शवयात्रा में जाता है तो उसके घर में गृहणी घर के दरवाजे के पास मिट्टी के चूल्हा जला कर उस पर पानी से भरी हुई मिट्टी की हांडी चढ़ा देती है साथ ही हांडी के भीतर के पानी में नीम की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं। जब व्यक्ति शवयात्रा से वापस आता है तो उसे उसी पानी से स्नान करना पड़ता है और स्नान के बाद बचे पानी में अपने कपड़े को डाल देना होता है।

कमोबेश पूरे भारत में इस प्रकार की परम्पराएँ पाई जाती हैं। स्पष्ट है कि हमारे पूर्वज अच्छी प्रकार से जानते थे कि शवदाह से उत्पन्न धुएँ में विषाक्त कीटाणु होते हैं। इन्हीं कीटाणुओं को जो कि व्यक्ति के शरीर और कपड़ों में चिपक कर घर तक आ जाते हैं नीमयुक्त पानी, जो कि प्राकृतिक एंटीसेप्टिक है, नष्ट कर देता है।

कितनी विज्ञानसम्मत हैं हमारी परम्पराएँ! हमें अपनी परम्पराओं पर गर्व है!

7 comments:

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

ji hamare up me bhi jaha mai rahta hun ye parampara hai magar thora rioop badla hai neem ki patii daal ke yaha bhi snaan hota hai
saadar
praveen pathik
9971969084

जी.के. अवधिया said...

मेरा जीमेल बता रहा है कि इस पोस्ट में प्रवीण शुक्ल प्रार्थी जी ने टिप्पणी की है किन्तु प्रकाशित करने पर वह गूगल की किसी तकनीकी गलती के कारण अपने आप गायब हो गई। अतः मैं उस टिप्पणी को नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) has left a new comment on your post "शवयात्रा से वापस आने पर नीमयुक्त पानी से स्नान":

ji hamare up me bhi jaha mai rahta hun ye parampara hai magar thora rioop badla hai neem ki patii daal ke yaha bhi snaan hota hai
saadar
praveen pathik
9971969084

Anil Pusadkar said...

जी हां हमे गर्व है।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

सही कहा आपने! दरअसल भारतीय परम्पराओं का यह नियम है कि जो विधियाँ इन में प्रयुक्त होती हैं, वे सभी प्राय: हम लोगों को शारीरिक एवं मानसिक लाभ पहुंचाने की दृ्ष्टि से ही रखी गई हैं...लेकिन आज के तथाकथित पढे लिखे बुद्धिमान लोग जिन्हे अन्धविश्वास मानने लगे हैं!

सूर्यकान्त गुप्ता said...

यह पोस्ट मेरे द्वारा पढ़ा नही गया है सुना गया है
बहुत ही मार्के की बात कही है आपने। मेरे घर मे
इसी बात पर विवाद पैदा हो जाता है। कारण मालूम नही रहने की वजह से। बहुत बढिया।

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेशक...... अवधिया जी सहमत हूं आपसे..

Udan Tashtari said...

निश्चित ही सोच समझ कर यह परंपरायें बनाई गई होंगी.