Sunday, April 11, 2010

तेरे वादे से कहाँ तक मेरा दिल फरेब खाये

तेरे वादे से कहाँ तक मेरा दिल फरेब खाये
कोई ऐसा कर बहाना मेरा दिल ही टूट जाये


पता नहीं आज पोस्ट लिखने को जी नहीं कर रहा है। वैसे भी आज इतवार है छुट्टी का दिन, पढ़ने वाले कम ही आते हैं। तो आज कुछ पसंदीदा शेर ही पोस्ट किये देते हैं। पर है ये "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा ...", याने कि इन शेरों का आपस में सम्बन्ध हो भी सकता है और नहीं भी। तो प्रस्तुत है मेरी पसंद की कुछ पंक्तियाँ:

तेरे वादे से कहाँ तक मेरा दिल फरेब खाये
कोई ऐसा कर बहाना मेरा दिल ही टूट जाये
मैं चला शराबखाने जहाँ कोई गम नहीं है
जिसे देखनी हो जन्नत मेरे साथ साथ आये

अपने ज़जबात में नगमात रचाने के लिये
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुम्हें
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैंने किस्मत की लकीरों से चुराया है तुम्हें
(ज़जबात=भावनाएँ, नगमात=कविताएँ, तसव्वुर=कल्पना)

अंदाज़ अपने देखते हैं आईनें में वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो

हबीबों से तो रकीब अच्छे जो जल कर नाम लेते हैं
गुलों से तो ख़ार अच्छे जो दामन थाम लेते हैं
(हबीब=अपने, रकीब=प्रतिद्वन्दी, गुल=फूल, ख़ार=काँटे)

तुम पूछो और मैं ना बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
एक जरा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं

आसमां से उतारा गया
जिंदगी दे के मारा गया
मौत से भी न जो मर सका
उसको नजरों से मारा गया

तुम्हें गैरों से कब फुरसत हम अपने ग़म से कब खाली
चलो बस हो गया मिलना न तुम खाली न हम खाली

हमें तो अपनों ने मारा गैरों में कहाँ दम था
मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था

एक शहंशाह ने बनवा के हँसी ताजमहल
हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक

नादान जवानी का जमाना गुजर गया
अब आ गया बुढ़ापा सुधर जाना चाहिये
आवारगी में हद से गुजर जाना चाहिये

भाई! बुढ़ापा तो हमारा कब का आ गया है, इसलिये अब सुधर जाते हैं और इस पोस्ट को यहीं बंद करते हैं।
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