Monday, May 10, 2010

प्रसन्नता की बात है कि हम ब्लोगर्स को माया नहीं व्यापती!

माया याने कि धन याने कि रुपया!

हर किसी को व्यापती है यह, हर कोई दीवाना है इसका और हर कोई भाग रहा है इसके पीछे। सभी को सिर्फ यही चिन्ता खाते रहती है कि चार पैसे कैसे बना लिये जायें? कोई कुछ कार्य करता है तो उस कार्य के बदले में सिर्फ धन की ही अभिलाषा रखता है। जिसे देखो वही "हाय पैसा!" "हाय पैसा!!" कर रहा है। धन कमाने के लिये आदमी अपना सुख-चैन यहाँ तक कि खाना-पीना तक को भी भूल जाता है।

ऐसा नहीं है कि संसार में रुपया ही सबसे बड़ा है, रुपये से बढ़ कर एक से एक मूल्यवान वस्तुएँ हैं जैसे कि विद्या, शिक्षा, ज्ञान, योग्यता, चिकित्सा आदि, किन्तु मुश्किल यह है कि, आज के जमाने में, वे वस्तुएँ भी केवल रुपये अदा करके प्राप्त की जा सकती हैं।

धन की यह महिमा आज से ही नहीं बल्कि सैकड़ों हजारों-वर्षों से चलती चली आ रही है। लगभग सौ साल पहले लिखी गई पुस्तक "भूतनाथ" में 'खत्री' जी लिखते हैं:

अहा, दुनिया में रुपया भी एक अजीब चीज है! इसकी आँच को सह जाना हँसी-खेल नहीं है। इसे देखकर जिसके मुँह में पानी न भर आवे समझ लो कि वह पूरा महात्मा है, पूरा तपस्वी है और सचमुच का देवता है। इस कमबख्त की बदौलत बड़े-बड़े घर सत्यानाश हो जाते हैं, भाई-भाई में बिगाड़ हो जाता है, दोस्तों की दोस्ती में बट्टा लग जाता है, जोरू और खसम का रिश्ता कच्चे धागे से भी ज्यादे कमजोर होकर टूट जाता है, और ईमानदारी की साफ और सफेद चादर में ऐसा धब्बा लग जाता है जो किसी तरह छुड़ाये नहीं छूटता। इसे देखकर जो धोखे में न पड़ा, इसे देखकर जिसका ईमान न टला, और इसे जिसने हाथ-पैर का मैल समझा, बेशक कहना पड़ेगा कि उस पर ईश्वर की कृपा है और वही मुक्ति का पात्र है।
किन्तु प्रसन्नता की बात है कि हम ब्लोगर्स को यह माया नहीं व्यापती! अंग्रेजी तथा अन्य भाषा के ब्लोग्स में भी ब्लोगर्स पोस्ट लिखते हैं तो धन कमाने के लिये। वे लिखते हैं किसी उत्पाद को प्रमोट करने के लिये ताकि उत्पाद उनके ब्लोग के माध्यम से बिके और उनका कमीशन बने। पर हमें भला ब्लोग से कमाई से क्या लेना-देना है? क्यों सोचें हम उन तरीकों के बारे में जिनसे ब्लोग के माध्यम लोगों का भला होने के साथ ही साथ हम ब्लोगर्स की कमाई भी हो? हम तो खुश हैं एक से एक विवाद करके? विवाद करने में, एक-दूसरे की टाँगें खींचने में, छिद्राण्वेशन करने में जो सुख है वह धन प्राप्त करने में भला कहाँ है!

कितने महान हैं हम ब्लोगर! माया हमें व्यापती ही नहीं है!!
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