Tuesday, June 22, 2010

बंद होना ब्लोगवाणी का और खुश तथा मायूस होना अलग-अलग लोगों का

"सीता की दुविधा ....." पोस्ट पर ब्लोगवाणी का अटके रहने का आज चौथा दिन है। पहले दिन तो हमने यही अनुमान लगाया कि शायद ब्लोगवाणी का रख-रखाव होने के कारण ऐसा है। फिर जब दूसरे दिन भी हालत नहीं बदली तो सोचने लगे कि ब्लोगवाणी किसी जटिल तकनीकी समस्या से जूझ रही होगी। तीसरे दिन आभास होने लगा कि ब्लोगवाणी बंद हो चुकी है। हमें आशा थी कि ब्लोगवाणी की ओर से ब्लोगवाणी के बंद होने का कारण दर्शाते हुए कुछ न कुछ वक्तव्य अवश्य आयेगा पर हमारी इस आशा पर अभी तक तो तुषारापात ही हुआ है।

ब्लोगवाणी क्यों बंद हुई यह तो ब्लोगवाणी वाले ही जानें पर हमें तो यही लगता है कि किसी कारण से उनकी भावनाओं पर आघात लग जाना ही इसका कारण हो सकता है। आलोचनाएँ तो सेवाव्रत धारण करने वालों को ही सहनी पड़ती है और उन्हें काँटों का ताज भी पहनना पड़ता है। अच्छे कार्य करने वालों को प्रायः प्रशंसा कम और आलोचना ही अधिक मिला करती हैं। हमारे छत्तीसगढ़ी में कहावत है "खेलाय-कूदाय के नाव नहि अउ गिराय-पराय के नाव" अर्थात् "किसी बालक को खिलाने वाले की प्रशंसा नहीं होती पर उसी व्यक्ति से यदि बच्चे को जरा भी चोट लग जाये तो उसे बुरा-भला जरूर कहा जाता है"। अस्तु, हम समझते हैं कि ब्लोगवाणी ने लंबे अरसे तक हिन्दी ब्लोगजगत की निस्वार्थ भाव से सेवा की है और इसके लिये वह धन्यवाद की पात्र है।

किन्तु, चाहे कोई ब्लोगवाणी का प्रशंसक रहा हो या फिर आलोचक, ब्लोगवाणी को सहज ही भुला देना किसी के लिये भी आसान नहीं है इसीलिये कुछ लोग खुश होकर भी उसे नहीं भुला पा रहे हैं और कुछ लोग मायूस होकर भी। वो कहते हैं ना "मुश्किलें होती हैं आसान बहुत मुश्किल से!"

हमारे लिये तो ब्लोगवाणी का बंद होना एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ही है।
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