Friday, July 9, 2010

कहूँ चीख चिल्लाय

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कुण्डलियाँ)

सरकारी राक्षस सभी, घूसखोर मक्कार।
मदिरा अंडा मांस के, भक्त बड़े हैं यार॥
भक्त बड़े हैं यार, खोजत फिरत व्यापारी।
साँठ-गाँठ व्यहार, निभा लेते हैं यारी॥
'कहूँ चीख चिल्लाय', आये आपकी बारी।
लेंगे तुमको चूस, कर्मचारी सरकारी॥

व्यापारी को जानिये, रावण का अवतार।
मेल मिलावट में कुशल, दाम बढ़ावन हार॥
दाम बढ़ावन हार, लहू पीने में खटमल।
सदा नम्र व्यवहार, लूट खसोट में चंचल॥
'कहूँ चीख चिल्लाय', प्रशंसा करते भारी।
धन्य धन्य तुम धन्य, दो नम्बर के व्यापारी॥

अकड़ें नेता दैत्य-सम, पाय कुजोग सुजोग।
मस्ती में डूबे रहें, सुलभ सदा सब भोग॥
सुलभ सदा सब भोग, मतलबी चोंच लड़ाते।
पकड़ टांग को खींच, सहयोगी को गिराते॥
'कहूँ चीख चिल्लाय', बुराई को ही पकड़ें।
बन कर मालामाल, झूम ठर्रा में अकड़ें॥

नमन करूँ गुरु देव को, ज्ञानी सन्त महान।
छेड़त नटखट चाल चल, नित नूतन अभियान॥
नित नूतन अभियान, बुद्धि कौशल दिखलावें।
बहिष्कार हड़ताल, करें, बालक रटवावें।
'कहूँ चीख चिल्लाय', होवे विद्या का शमन।
करें राष्ट्र निर्माण, बारम्बार तुम्हें नमन॥

आरक्षी दल को नमन, जो जग प्रेत समान।
पकड़त ऐसे लोग को, जैसे भूत-मसान॥
जैसे भूत मसान, क्वचित, बलात्कार भी करते।
कर्फ्यू के शैतान, लट्ठ बने लाठी धरते॥
'कहूँ चीख चिल्लाय', उड़न दस्ता के पक्षी।
उड़ते हैं दिन रात, उलूक बने आरक्षी॥

(रचना तिथिः सोमवार 26-01-1981)
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