Saturday, August 7, 2010

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है

रात के सन्नाटे में बरसते पानी की टिपिर-टिपिर ध्वनि! आंगन में लगी रातरानी के फूलों की भीनी-भीनी सुवास! पड़ोस के घर में चलती हुई टीवी से सुनाई देता गीत - "मनमोर हुआ मतवाऽऽला ये किसने जादू डाला रे..."! दामिनी की दमक! सुरचाप की चमक! मेघों की कड़क! इस सुनसान रात्रि में मैं निपट अकेला इस दृश्य को देख रहा हूँ। नितांत अकेला होने पर भी मौन नहीं हूँ, स्वयं से बातें भी करते जा रहा हूँ। मैथिलीशरण गुप्त जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।


पावस का प्रभाव बाल हृदय को उल्लासित कर रहा है, युवा प्रेमी-युगलों के हृदय में मधुर मिलन के लिये तड़प उत्पन्न कर रहा है, विरहातुरों को संतप्त कर रहा है और वृद्ध हृदय को अतीत का स्मरण करा रहा है। हम मनुष्य तो क्या, इस पावस ने तो देवाधिदेव श्री राम के हृदय को भी प्रभावित किया हैः

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥

पिछले तीन-चार दिनों से लगातार बारिश हो रही है। कभी मूसलाधार तो कभी हल्की फुहार। नदी-नाले अपनी उफान पर हैं। सरिता सम्पूर्ण धरा को अपने भीतर समेट लेना चाहती हैं। उनकी वेगवती प्रचण्ड धाराएँ चट्टानों से टकरा कर उन्हें चूर-चूर कर डालने के लिए आतुर हैं। धारा और चट्टान की टकराहट से उत्पन्न फेन की शुभ्रता नयनाभिराम प्रतीत हो रही हैं।

रात भर बरसने के बाद बारिश अभी थमी है। बरसात के रुक जाने से पक्षी अपने नीड़ से निकल आये हैं। उनकी चहचहाहट एक मधुर संगीत को जन्म दे रही है। पास के पीपल की डाल पर कोयल कूक रही है। वसुन्धरा ने हरीतिमा से अपना श्रृंगार कर लिया है। कहीं दूर कोई आल्हा गा रहा है - "बड़े लड़ैया महोबेवाला जिनके बल को वार न पार ..."!

रिमझिम की फुहार रुकी हुई है किन्तु किन्तु मेघमालाओं ने अभी भी भगवान भास्कर को ढँक रखा है। ऊदे-ऊदे बादल आसमान में अपना जादू दिखा रहे हैं। कभी वे हाथी का शक्ल ले लेते हैं तो कभी मोर का। देखते ही देखते बादल का वह टुकड़ा जो शेर जैसा दिखाई दे रहा था अब श्वान जैसा प्रतीत होने लगा है। अरे अब तो पूरे आसमान को काले-काले बादलों ने ढँक लिया। बस थोड़ी ही देर में अवश्य ही फिर से बरसने लगेंगे ये, इनके बरसने में कुछ भी सन्देह नहीं है क्योंकि आज शनिवार है और ये बादल कल शुक्रवार से छाये हुए हैं, कहा भी गया हैः

शुक्रवार की बादरी रही शनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी बिन बरसे नहि जाय॥
Post a Comment