Thursday, August 5, 2010

हम भी कई बार वही काम करते हैं जिसे करके बहुत से लोग सफलतम व्यक्ति बन गये - याने कि चोरी!

चोरी!

शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने अपने जीवन में कभी चोरी न की हो। कोई बचपने में घर के ही अचार चुराता है तो युवावस्था में किसी का दिल चुरा लेता है। भगवान श्री कृष्ण का तो एक नाम ही "माखनचोर" है। हमारी संस्कृति में चोरी को चौंसठ कलाओं में से एक माना गया है - चौर्य कला। इस कला में महारथ रखने वाला तो "आँखों से अंजन चुरा लेता है"। इसके उल्टे चोरी यदि फूहड़ता के साथ की जाये तो वह चोरी अपनी चुगली आप कर देती है।

लेखन के क्षेत्र में भी चोरी एक आम बात है। कितने ही लेखक अंग्रेजी जासूसी उपन्यासों की सामग्री चुरा कर हिन्दी के सफलतम जासूसी उपन्यासकार बन बैठे हैं। कवि और शायर अन्य प्रख्यात कवियों और शायरों की किसी पंक्ति को चुरा कर अपनी कविता या शायरी का शीर्षक बना लिया करते हैं। हम भी अपने लेखन में किसी प्रख्यात लेखक के भाव तथा शब्द चुरा लिया करते हैं। कई बार तो हम अपने पोस्ट में किसी प्रख्यात रचनाकार के लेखन को, जो हमें बहुत अधिक पसंद आता है, ज्यों का त्यों उतार दिया करते हैं। याने कि पोस्ट हमारा पर लेखन किसी और का। यह चोरी नही है तो और क्या है? पर हाँ, ऐसे समय में हम उस रचनाकार का उल्लेख करना भी कभी नहीं भूलते। उदाहरण के लिये हमें छत्तीसगढ़ के प्रख्यात साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी के निम्न विचार बहुत अच्छे लगेः

यह सच है कि अधिकांश तरुण साहित्यकारों की प्रवृति गद्य रचना की अपेक्षा पद्य रचना की ओर अधिक है। गद्य रचना में भी कथाओं की रचना की ओर अधिकांश नवयुवक जितना ध्यान देते हैं उतना गंभीर विषयों की विवेचना की ओर नहीं। उसका कारण भी है, तारुण्य में कल्पना की जो प्रखरता रहति है वह प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था में नहीं रह जाती। सभी तरुण कल्पना का एक मायाजगत निर्मित कर प्रेम और सौन्दर्य की अनुभूति के लिये व्यग्र रहते हैं। यही कारण है कि अपने प्रारंभिक काल में कितने ही नवयुवक कवता और कहानी की रचना में विशेष उत्साह प्रदर्शित करते हैं। कुछ समय के बाद जब वे संसार के कर्मक्षेत्र में प्रविष्ट होते हैं तब उनमें से अधिकांश का यह उत्साह लुप्त सा हो जाता है। कुछ लोग यह समझते हैं कि ऐसे लेखक जब साहित्य के क्षेत्र से पृथक हो जाते हैं तब साहित्य में एक गतिरोध सा उत्पन्न हो जाता है। पर ऐसी बात नहीं है। जिन्हें साहित्य के प्रति अनुराग होता है उन्हें किसी भी परिस्थिति में रचना के प्रति विरक्ति नहीं होती। महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर जो लोग साहित्य के क्षेत्र में आते हैं उनकी अभीष्ट-सिद्धि न होने पर विरक्ति होना अस्वाभाविक नहीं। आजकल साहित्य के क्षेत्र में भी राजनीति के क्षेत्र की तरह प्रचार की भावना बढ़ती जा रही है। लोग दलबद्ध हो कर प्रचार कार्य करते हैं। उस प्रचार के भीतर एक विशेष महत्वाकांक्षा ही काम कर रही है। पर सच पूछिये तो इससे साहित्य के निर्माण में विशेष लाभ नहीं होता। हम लोग हो-हल्ला मचा कर कुछ समय के लिये कुछ लोगों को भले ही प्रभावित कर लें परन्तु अंत में हम लोगों का यह प्रचार कार्य निष्फल ही होता है। मैंने स्वयं अपने इस जीवनकाल में कितने ही कवियों और कलाकारों का उदय देखा और उनका अस्त भी। अतएव महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर जो लोग साहित्य के क्षेत्र में सस्ती कीर्ति पाने का प्रयत्न करते हैं, उन्हें अंत में हतोत्साह होना पड़ता है। सच्चे साहित्यकारों के लिये जो बात सबसे अधिक मुख्य है वह है उनका अंतःसुख। उसी अंतःसुख के कारण वे साहित्य के क्षेत्र में यश और अपयश की चिंता न कर लिखते ही जाते हैं। जिनमें विशेष रचना-कौशल रहता है उन्हें सफलता भी मिल जाती है। साहित्य के इतिहास में यह देखा गया है कि विषम परिस्थितियों में रह कर जिन साहित्यकारों ने अपूर्व ग्रंथों की रचना की वैसी रचनायें उन्हीं के द्वारा सुख-सुविधा और विलास की परिस्थिति में रह कर नहीं लिखी गई। इसलिये साहित्य को मैं विशुद्ध आनंद का फल मानता हूँ। वही आनंद साहित्यकारों को सच्ची प्रेरणा देता है।
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया जी के उपन्यास "धान के देश में" की भूमिका से)

बख्शी जी के उपरोक्त विचार हमें न केवल साहित्य के क्षेत्र के लिये वरन ब्लोगिंग के क्षेत्र के लिये भी अत्यन्त सार्थक लगते हैं। साहित्य के समान ब्लोगिंग भी विशुद्ध आनन्द का फल है और वही आनन्द ब्लोगरों को सच्ची प्रेरणा देता है।

बख्शी जी का यह भी मानना है किः

वृद्धावस्था में हम सब लोगों की अपनी एक विशेष रुचि हो जाती है। फिर भी उपन्यासों में कथा रस का उपभोग करने की क्षमता रहती है। हम उपन्यासों को पढ़ कर उनके माया जगत में ऐसे लीन हो जाते हैं कि हम सचमुच आत्म विस्मृत हो जाते हैं। फिर भी यह सच है कि विशेष स्थिति में विशेष उपन्यास रुचिकर होते हैं। यह सर्वथा सम्भव है कि एक अवस्था में जिन कथाओं को पढ़कर हमें विशेष आनंद हुआ है, उन्हीं से अन्य अवस्था में विरक्ति भी हो सकती है। कुछ ऐसी भी कथायें होती हैं जिन्हें हम केवल एक बार पढ़कर फेंक देते हैं, उन्हें फिर पढ़ने की इच्छा नहीं होती। ऐसे भी उपन्यास होते हैं जिन्हें बार-बार पढ़ने से भी हमें विरक्ति नहीं होती। ऐसे कितने ही उपन्यास हैं जिन्हें मैं पच्चीसों बार पढ़ चुका हूँ और जब मुझे काम करने की व्यग्रता नहीं रहती तब उन्हीं उपन्यासों के द्वारा मुझे साहित्य का विशुद्ध आनंद प्राप्त हो जाता है।


 (स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया जी के उपन्यास "धान के देश में" की भूमिका से)

हमें भी यही लगता है कि कथाओं और उपन्यासों के जैसे ही कुछ ब्लोग पोस्ट भी ऐसे होते हैं जिन्हें हम केवल एक बार पढ़कर भूल जाते हैं और कुछ पोस्ट ऐसे भी होते हैं जिन्हें बार बार पढ़कर भी मन नहीं भरता।

मैं भी कथाओं और उपन्यासों का प्रेमी पाठक हूँ। किशोरावस्था में ही मैंने देवकीनन्दन खत्री, वृन्दावनलाल वर्मा, मुंशी प्रेमचंद, भगवतीचरण वर्मा, आचार्य चतुरसेन, गुरुदत्त आदि प्रख्यात रचनाकारों की कई रचनाओं को पढ़ लिया था। चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता संतति, चित्रलेखा, गोदान, वयं रक्षामः, वैशाली की नगरवधू, सोना और खून आदि उपन्यासों को मैंने एक नहीं अनेक बार पढ़ा है। आज तो लोगों की रुचि भारी-भरकम उपन्यासों को पढ़ने में रह ही नहीं गई है, और जिन लोगों की रुचि इनमें है उनके पास, आज के इस व्यस्ततम जमाने में, इन्हें पढ़ने के लिये समय ही नहीं है। ऐसे लोगों को कथाओं का रसपान कराने के लिये कई बार हम अपने पोस्ट में प्रख्यात रचनाकारों के लेखन के अंश को उद्धरित कर दिया करते हैं।

आज प्रस्तुत है आचार्य चतुरसेन जी के उपन्यास "सोना और खून" से लिया गया एक छोटा सा अंश जिसमें नवाब और उनकी बेगम की आपसी नोक-झोंक को अत्यन्त रोचकता के साथ पेश किया गया है, आप भी पढ़कर मजा लें:

बड़े नवाब मिर्जा अलीबेग अस्सी की उम्र में जब मरे तो उनके साहबज़ादे मिर्जा अख़्तरबेग की उम्र बीस बरस की थी। बड़ी मानता-मनौती मानने पर बड़े नवाब को बुढ़ौती में बेटे का मुँह देखना नसीब हुआ था। इसीलिए उनकी परवरिश भी लाड़-प्यार में हुई थी। उन दिनों जहांगीराबाद की रियासत में ऐशो-इशरत की कमी न थी। सिर्फ इतना ही नहीं कि छोटे नवाब ऐशो-इशरत की गोद में पलकर किसी कदर आवार हो गए, उनकी तालीम भी बहुत मामूली हुई। इन सब कारणों से ज्यों ही बड़े नवाब मरे और इन्हें हाथ की छूट हुई तो बेहद फिज़ूलखर्चियाँ करने लगे। बदइन्तजामी इतनी बढ़ी कि आमदनी आधी भी न रही।

इनकी ऐयाशी और फिज़ूलखर्ची बड़े नवाब के जमाने में आरम्भ हो गई थीं। उन्होंने यह सोचकर कि शादी कर देने से वह खानादारी में फँसकर ठीक हो जाएगा, उनकी शादी चौदह साल की उम्र में ही कर दी थी। शुरू-शुरू में तो नए मियाँ-बीबी खूब घुल-मिल कर रहे। बीबी का मिज़ाज़ जरा तेज था। वह भी एक नवाब की बेटी थी। पर मियाँ की वह बहुत लल्लो-चप्पो करती रहती थी।......... परंतु धीरे-धीरे यह प्रेम का पौधा सूखने लगा और छोटे नवाब इधर-उधर फिर दिल का सौदा करने लगे। इससे बेग तिनक गईं। और फिर आए दिन मान-मनौवल, फसाद-झगड़े उठने लगे। इसी बीच बड़े नवाब का इन्तकाल हो गया और छोटे नवाब की पगड़ी बँधी। इसके एक साल बाद ही नवाब के लड़का पैदा हुआ। लड़का सुन्दर और स्वस्थ था। पहला बच्चा था, इसलिये हवेली में बाजे बजने लगे। बधाइयाँ गाई जाने लगीं। तवायफ़ों की महफ़िल हुई। लेकिन जब दाई ने छठवीं के दिन लड़के को लाकर नवाब की गोद में डाला और उम्मीद की कि कोई भारी इनाम मिलेगा, तो नवाब ने बिगड़कर कहा, "इस लड़के की सूरत हमसे नहीं मिलती, चुनाँचे यह हमारा लड़का ही नहीं।"

नवाब साहब की इस बात से तहलका मच गया। हकीकत यह थी कि उनके आवारा दोस्तों ने कुछ ऐसी इशारेबाजियाँ पहले ही से कर रखी थीं, जिनसे नवाब का दिल वहम से भर गया था। वह अनपढ़ और बेवकूफ़ तो था ही, लड़के को देखते ही ऐसी बेहूदा बात कह बैठा।

बेगम ने सुना तो अपना सिर पीट लिया। रो-धोकर उसने सारा घर सिर पर उठा लिया। ..... इसी दौरान बेगम को पता लगा कि नवाब ने एक तवायफ़ से आशनाई कर ली है। ...... बेगम से एक दिन उसकी मुँह-दर-मुँह नोक-झोंक हो गई।

नवाब ने कहा, "बेगम, तुमने यह हक-नाहक का कैसा हंगामा खड़ा कर दिया है? बखुदा इससे बाज आओ, वरना हमसे बुरा कोई न होगा।"

"क्या कर लोगे तुम?"

"कसम कलामे-पाक की, मैं तुम्हारी खाल खिंचवाकर भूसा भरवा दूँगा।"

"तो तुफ़ है तुम पर जो करनी में कसर करो।"

"नाहक एक खूने-नाहक का अजाब मेरे सिर होगा।"

"तुम्हें क्या डर है! करनी कर गुजरो, ज्यादा से ज्यादा फाँसी हो जाएगी।"

"फाँसी क्यों हो जाएगी?"

"यह कम्पनी बहादुर की अमलदारी है। तुम्हारी खाला का राज नहीं।"

"बखुदा, बड़ी मुँहफट हो।"

"मगर अस्मतदार हूँ।"

"चे खुश। अस्मतदार हो तो कहो यह लौंडा कहाँ से पेट में डाल लाईं?"

"शरम नहीं आती यह बेहूदा कलाम जुबान पर लाते?"

"हम तो लाखों में कहेंगे। कुछ डर है!"

"नकटा जिए बुरे हवाल, डर काहे का! डर तो उसे हो जिसे अपनी इज्जत का कुछ खयाल हो।"

"हम खानदानी रईस हैं। हमारी इज्जत का तुम क्या जानो।"

"बड़े आए इज्जतवाले। तभी तो मुई उस वेसवा का थूक चाटते हो।"

"तो इससे तुम्हें क्या! यह हमने कोई नई बात नहीं की। हमारे हमकौम रईस-नवाब सभी कोई रखैल, रंडी रखते हैं। हमने रख ली तो तुम्हारा क्या नुकसान किया?"

"अच्छा, हमारा कोई नुकसान ही नहीं किया?"

"हमारा फर्ज ब्याहता के साथ रहने का है, हर्गिज फरामोश न करेंगे। और अगर ज्यादा बावेला न मचाकर घर में खामोश बैठोगी तो हम तुम्हारी खातिरदारी मिस्ल साबिक बल्कि उससे भी ज्यादा करेंगे। हालाँकि तुम इस सलूक के काबिल नहीं।"

"क्या कहने हैं! मियाँ होश की दवा करो। मेरा जो हक है मुँह पर झाड़ू मारकर लूँगी। होई हँसी-ठठ्ठा है!"

"तुमने बेहयाई पर कमर कस ली है तो लाचारी है।"

"मैं बेहया लोगों के कहने का बुरा नहीं मानती। अब्बाजान को मैंने सब हकीकत लिख दी है। वे आया ही चाहते हैं। उनसे निबटना। देखूँगी, कैसे तीसमारखां हो!"

"देखूँगा उन्हें, कितनी तोपें लेकर आते हैं!"

यह कहते और गुस्से से काँपते हुए नवाब बाहर चले गए।
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