Sunday, September 12, 2010

सुनहरा धोखा

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

रक्तिम उषा,
स्वर्णिम अरुणोदय,
रवि की चमक-दमक,
चन्द्र-रजत की ललक,
उष्ण-शीत दिवस,
झर झर झरता पावस,
इन सबमें पलता मानव,
कभी दिव्य, कभी दानव।

अहं त्वं अन्य का जाल,
क्षणिक काल अनन्त काल,
शून्य नभ में सुनहरा धोखा है,
उद्भव-स्थिति-संहार का-
न लेखा है न जोखा है।

पर धोखे की धुरी सत्य,
सतत अमिट अमर्त्य,
लहराता बन कर्तव्य जड़ में चेतन,
चेतन में स्वयं सकाम-निष्काम,
पर, अनादि अनन्त अभिराम

(रचना तिथिः शनिवार 24-12-1983)
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