Saturday, September 18, 2010

भारत में शिक्षा व्यवस्था

अत्यन्त प्राचीनकाल से ही भारतवर्ष में ज्ञान और विद्या के क्षेत्र में संसार का अग्रणी रहा है। हमारे देश में नालन्दा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय रहे हैं जहाँ पर समस्त संसार से आने वाले लोग शिक्षा ग्रहण किया करते थे। कालान्तर में वारानसी शिक्षा का बहुत बड़ा केन्द्र बन गया।

देखा जाए तो भारत में शिक्षा का इतिहास वैदिक काल से भी पूर्व तक चला जाता है। पतञ्जलि तथा कात्यायन की कृतियों में स्पष्ट उल्लेख है कि वैदिक युग में शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं का समानाधिकार था। यहाँ पर पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को सहेजा जाता रहा है। कठोपनिषद का निम्न सूत्र बताता है कि भारत में ज्ञान तथा शिक्षा का क्या महत्व थाः

"जिस प्रकार से एक उत्साही सारथी युद्धाश्वों को नियन्त्रित रखता है उसी प्रकार से मन को एकाग्र कर के परम ज्ञान को प्राप्त करने वाला अपने इन्द्रियों को नियन्त्रित रखता है।"

रामायण काल हो चाहे महाभारत काल, प्रत्येक काल में हमारे देश में गुरु-शिष्य परम्परा रही है। जहाँ रामायण काल में वशिष्ठ, विश्वामित्र जैसे गुरु रहे हैं जिन्होंने राम, गुह आदि को विद्यादान दिया वहीं महाभारत काल में संदीपनी, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे गुरु थे जिन्होंने कृष्ण, सुदामा, पाण्डवों, कौरवों आदि को शिक्षा प्रदान किया था। प्राचीनकाल से लेकर मध्यकाल तक शिष्यों को विद्यार्जन के लिए गुरु के आश्रम में जाकर रहने की परम्परा थी जहाँ पर गुरु उन्हें ज्ञान प्रदान किया करते थे। विद्या का मोल नहीं होता था इसीलिए विद्याग्रहण करने के पश्चात् गुरु-दक्षिणा की प्रथा थी।

सहस्त्राब्दी तक उत्तर भारत आर्य हिन्दू साहित्य और संस्कृति का केन्द्र बना रहा किन्तु गज़नवी, तुगलक और तैमूर ने एक के बाद एक आक्रमण करके वहाँ के धर्म, संस्कृति और साहित्य की प्रगति को छिन्न-भिन्न कर दिया। परिणामस्वरूप हिन्दू विद्या, साहित्य, धर्म और संस्कृति को सुदूर-पूर्व की ओर भाग कर बंगाल की शरण लेनी पड़ी। बनारस और मिथिला के अनेक विद्वान गुरुओं ने बंगाल में आकर न्यायशास्त्र के विद्धापीठ स्थापित किए क्योंकि बनारस, पाटलिपुत्र आदि विद्या-केन्द्र आतताइयों के पैरों तले रौंदे जा चुके थे। चौदहवीं शताब्दी में कल्लण भट्ट ने अपनी मानव-धर्मशास्त्र की टीका रची। बाद में पन्द्रहवीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने वैष्णव-पन्थ चलाकर देश की धर्म-ग्लानि को दूर किया। विद्वान ब्राह्मण अपने यजमानों का कल्याण करने के साथ ही साथ उनके सन्तानों को शिक्षा देने का कार्य किया करते थे और दक्षिणा के रूप में सम्पन्न यजमानों से उन्हें अनेक गाँव तक प्रदान किए जाते थे।

सत्रहवी शताब्दी तक भारत शिक्षा के प्रचार में यूरोप के सभी देशों से आगे था और हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का प्रतिशत अन्य देशों की अपेक्षा बहुत अधिक था।
सहस्त्रों की संख्या में ब्राह्मण अध्यापक अपने-अपने घरों में लाखों शिष्यों को मुफ्त शिक्षा प्रदान किया करते थे। समस्त भारत में जहाँ संस्कृत-साहित्य की शिक्षा के लिए विद्यापीठ थे वहीं साथ ही साथ उर्दू-फारसी की शिक्षा के लिए विद्यापीठ तथा मक़तब और मदरसे कायम थे। छोटे-छोटे गाँवों में भी ग्राम-पंचायतों के नियन्त्रण में पाठशालाएँ चला करती थीं।

परन्तु बाद में वे दिन नहीं रहे। अंग्रेज एक नया युग लेकर आए। लोभ और अर्थ-संग्रह ही उनके यहाँ आने के उद्देश्य थे। तलवार और बन्दूक की लड़ाई करके उन्होंने हमारे देश पर हुकूमत कायम कर लिया था किन्तु उस हुकूमत को चलाते रहने के लिए हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था एक बहुत बड़ी बाधा थी। इसलिए उन्होंने कलम की लड़ाई आरम्भ कर दिया। इस देश की सन्तानों को उन्होंने अपनी भाषा और साहित्य पढ़ाना शुरू कर दिया और वे अंग्रेज वीरों की वीरता के गुणगाण करने लगे। अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों की एक अलग जमात बन गई जिन्हें अपने देशवासियों से सहानुभूति ही नहीं रही या रही भी तो बहुत कम। देश के प्राचीन गौरव, परम्परा, इतिहास आदि से उन्हें कुछ मतलब ही नहीं रहा। ऐसा करने के लिए लॉर्ड मैकॉले ने एक ऐसी शिक्षा-प्रणाली बना दिया, जो कि भारतीयों को अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूर ले जाए और उनमें राष्ट्रीय भावना पैदा ही ना होने दे। और आज तक हमारे देश की शिक्षा-नीति कमोबेश वही बनी हुई है जिसे कि लॉर्ड मैकॉले ने बनाया था परिणामस्वरूप आज हम तथा हमारे बच्चे अपनी संस्कृति और सभ्यता को हेय दृष्टि से देखते हैं।

टीपः उपरोक्त लेख में मेरे अपने विचारों के साथ ही साथ अनेक स्थान पर आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून" से विचार लिए गए हैं।
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