Sunday, October 17, 2010

अनोखी बारात विदाई! - इस श्रृंखला का अन्तिम किन्तु अत्यन्त रोचक पोस्ट

पिछले चार दिनों से हम आचार्य चतुरसेन जी के उपन्यास "सोना और खून" का एक बहुत ही रोचक अंश को श्रृंखलाबद्ध रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला का अन्तिम किन्तु अत्यन्त रोचक पोस्ट। इस श्रृंखला को पोस्ट करने में हमारा उद्देश्य मात्र यही है कि हम आज से डेढ़-दो सौ साल पहले के आचार-विचार, रहन-सहन, रीति-रिवाज आदि, जिसे कि आचार्य जी ने बेहद रोचक रूप में अपने उपन्यास में दर्शाया है, को जानें।

आप सभी को विजयादशमी पर्व की शुभकामनाएँ!

तो प्रस्तुत हैः

अनोखी बारात विदाई!

लेखकः आचार्य चतुरसेन

(इससे पहले की कहानी यहाँ पढ़ें - यूसुफ मियाँ और शबनम की शादी तय)

और बारात आई मुज़फ्फरनगर में धूमधाम की। बारात में दस-बारह हाथी, पचास रथ, सौ से ऊपर मझोलियाँ, बहेली और फीनसें, दो सौ से अधिक घोड़े, ऊँट और इतनी ही फिरक, ठोकर, छकड़े और बारदाने के खच्चर। बाराती कोई बारह सौ से ऊपर। हिन्दू और मुसलमान दोनों। राजा-नवाब, जमींदार-रैयत सब, कहना चाहिए पंचमेल मिठाई। सब अपनी-अपनी धज में। रईसों के साथ दर्जनों निजी खिदमतगार और मुसाहिब। नाई, धोबी, कहार, कसाई, बावर्ची, घसियारे, चरकटे, बरकन्दाज, असारदार, मशालची, मुन्शी, मोदी अलग। रंडी, भांड, नक्काल, नफीरी वाले, नक्कारची, ढील-दमामे, आतिशबाज, बाजीगर, पहलवान, नट, मितारिए, गवैए-कलावन्त दर्जनों। सबकी अलग-अलग जमात। दूल्हा मियाँ के यार-दोस्त-मुसाहिबों की अलग चौकड़ी। गरज, बारात क्या थी अच्छा-खासा लश्कर था। कहना पड़ेगा - इन्तजाम सब बातों का बारात के साथ भी माकूल था। नवाब मुज़फ्फरबेग का जरूर इन्तकाल हो चुका था, मगर उनकी जगह हापुड़ के नवाब जबरदस्त खां भारी दबदबे से दूल्हे मियाँ के कर्ताधर्ताओं के रूप में आए थे। एक जरी काम का कोई दो हजार रुपयों की कीमत का दुशाला कमर में लपेटे, तनवार-पेश कब्ज, और कटार फैटे में कसे, अपनी शानदार दाढ़ी और रुआबदार चेहरे से बारात भर में नवाब जबरदस्त खां दबदबे के आदमी जँच रहे थे। वास्तव में इस भारी-भरकम बारात में नवाब जबरदस्त खां ही नवाब मुज़फ्फरनगर के जोड़-तोड़ के आदमी थे। दो खिदमतगार दुनाली बन्दूकें लिए और दो खिदमतगार उनका पानदा और हुक्का लिए, आठों पहर चौंसठ घड़ी उनकी खिदमत में हाजिर रहते थे। बारात की जान थी नवाब की नटनी गुलाबजान; जो अलग अपना डेरा लाई थी। यद्यपि बारात में कोई दर्जन भर नर्तकियाँ डेरे डाले थीं, पर गुलाब जान की बात ही निराली थी। हवादान में बैठकर वह चलती थी। उसकी पालकी के आठों कहार ऐसी जर्कबर्क पोशाक में रहते थे कि खामख्वाह देखने वालों की नज़र उनपर टिक जाती थी। सच पूछो तो बारात में सबसे ज्यादा खातिरदारी बुला जान की ही होती थी। खुद नवाब जबरद्स्त खां सुबह-शाम उनकी हाजिरी बजाते थे। गुलाब जान का दरबार लगता था - दर्जनों मुसाहिब, चाहने वाले, चपरकनातिए, कुर्रम उसे घेरे रहते थे। गुलाब जान शाहज़ादी की-सी शान से दिन में दो-चार बार लिबास बदलती और नई-नई वजहदारी दिखाती थी।

यद्यपि नवाब जबरदस्त खां ने बारात के साथ बहुत-सी जिन्स राशन छकड़ों में लादकर रख ली थी, और ऐसा इन्तजाम किया था कि बारात की यदि मुज़फ्फरनबर में कुछ पूछ न भी हो तो - बारात के सब छोटे-बड़ों की सभी जरूरतें पूरी हो जाएँ। लेकिन नवाब मुज़फ्फरनगर का इन्तजाम भी लाजवाब था। मील भर के घेरे में डेरा, तम्बू, झोपड़ियाँ और छोलदारियाँ लगाई गई थीं। जनवासा क्या था - फौजी पड़ाव था, जहाँ एक छोटा-सा बाजार भी था, जहाँ जिसका जो जी चाहे वही जिन्स जितनी दरकार हो ले जाए। पैसा खर्चने का काम नहीं। एक तरफ जलाने की लकड़ियों के अम्बार लगे हैं, तो दूसरी ओर हजारों मटकों, आबखोरों, शकोरों, पत्तलों का पहाड़ लगा है। दही-दूध, सब्जी, तरकारी, मुर्गी, अण्डा, खस्सी शिकार हर रोज ताजा चला आ रहा है। हर जिन्स का अम्बार लगा है। बैलों की जोड़ी के लिए प्रतिदिन एक सेर घी, आठ सेर रातब, हाथी के लिए सवा मन का रोट और सवा सेर घी, ताजा गन्ना। बारातियों के लिए शीरमाल, मीठे टुकड़े, बिरयानी, मुतंजन, मिठाइयाँ, सिवइयाँ, कबाब, कोफ्ते और न जाने क्या-क्या। हिन्दुओं के लिए - कच्ची-पक्की रसोई ब्राह्मणों के हाथों से तैयार। पान-सुपारी, इलायची, तमाखू की भरमार।

बारात स्वागत का इन्तजाम देखकर नवाब जबरदस्त खां ने हँस कर कहा, “इन्तजाम तो नवाब साहब ने माशाअल्ला इस तरह किया है गोया बारात छः महीना रोक रखी जाएगी।”

नवाब जबरदस्त खां का यह फिकरा नवाब इकरामुल्ला के कान में भी जा पहुँचा। सुनकर आपने सिर हिलाकर कहा, “क्या मुजाइका है, देखा जाएगा।”

शादी हुई, निकाह हुआ और अब नाच-रंग, गाना-बजाना, खाना-पीना, ऐश-इशरत का दौर चला। नित नए जश्न। नाम सुनकर दूर-दूर से कलावन्त आ रहे हैं। अपने-अपने करतब दिखा रहे हैं। जगह-जगह डेरेदार रंडियों की महफिलें जमी हैं, नाच मुजरे हो रहे हैं, मशहूर भांड ऐसी नकलें कर रहे हैं कि देखने वालों के हँसते-हँसते पेट में बल पड़ रहे हैं। कुछ मनचले नौजवान घोड़े उछाल रहे हैं, और शहसवारी के जौहर दिखा रहे हैँ। कहीं नेज़ेबाजी, पट्टेबाजी के करतब हो रहे हैं। उस्ताद और शागिर्द भिड़ रहे हैं। कहीं दिल्ली के डण्डे वाले चीरफाड़ और बिलन्द्री के खेल दिखा रहे हैं। कहीं नट पैरों में पैने नोंकदार सींग बाँधकर रस्सियों पर चल रहे हैं। बूढ़ा नट ढोल बजा-बजाकर कह रहा है - नहीं बना, नहीं बना। और रस्सी पर का नट और दूसरा खतरनाक खेल दिखाता है। कहीं जादूगर हाथ की सफाई दिखा रहे हैं। कहीं कलन्दर बन्दर नचा रहे हैं। भिश्ती दौड़-दौड़कर छिड़काव कर रहे हैं, मगर गर्द-धूल का अम्बार है कि दबता ही नहीं। दूर-दूर के इत्र-फुलेल बेचने वाले, डेरे-डेरे घूमकर इत्र बेच रहे हैं। सौदे-सुलफ हो रहे हैं। नवाब साहब ने मेरठ की फौज का अंग्रेजी बाजा मँगवाया है जो अपनी अजीब अदा से घिर्र-पौं कर रहा है। नवाब साहब के बहुत से शागिर्द पेशा कुश्ती और दूसरे करतब दिखा रहे हैं। बड़े-बड़े बाजीगर और सँपेरे भी अपना-अपना तमाशा दिखा रहे हैं।

सब कुछ हो रहा है। लेकिन बारात की बिदाई नहीं हो रही है। हफ्तों गुजर गए, और अब एक महीना बीत रहा है। जब-जब नवाब जबरदस्त खां विदा का पैगाम भेजते हैं तो नवाब इकरामुल्ला खां हर बार जवाब देते हैं, “क्या मुजाइका है, देखा जाएगा।”

लेकिन बात इतने कहने-सुनने ही पर नहीं रह गई है। मुज़फ्फरनगर की चौहद्दी में नवाब के पहरे बैठे हैं। पहरे में हथियारबन्द सिपाही, बरकन्दाज और लठियल जवान तैनात हैं। मज़ाल नहीं कि कोई बाराती मुज़फ्फरनगर की चौहद्दी से बाहर तशरीफ ले जाए। पहरे-चौकी का सारा इन्तजाम नामी-गिरामी चोरों के सरदारों और डाकू सरदारों के जिम्मे है, जो अपनी-अपनी जमात को लिए जगह-जगह चौकी डाले पड़े हैं और अपनी चौकी पर पूरे मुस्तैद हैं। इन चौकियों को पार करके बाहर का आदमी मुज़फ्फरनगर में आ सकता है, पर मुज़फ्फरनगर का कोई आदमी चौहद्दी से बाहर नहीं जा सकता।

नाच-रंग, खेल-तमाशे, दावतें, खाना-पीना, मौज-बहार वैसी ही चल रही है। परन्तु बाराती घबरा रहे हैं। घर लौटने को बेचैन हैं। पर बारात की विदाई हो तब न बाराती घर लौटें? हकीकत यह है कि नवाब इकरामुल्ला ने कहने वालों की चुनौटी स्वीकार कर ली थी, और कसद कर लिया था कि बारात छः महीने से पहले हर्गिज विदा नहीं की जाएगी।

नवाब साहब का रुआब-दबदबा कम न था। यों नवाब जबरदस्त खां भी काफी दबंग आदमी थे। पर चोरों के शहनशाह नवाब इकरामुल्ला से उनकी भी पिण्डली काँपती थी। नवाब इकरामुल्ला को खुश रखने में ही खैरियत थी, भला किसकी माँ ने धोंसा खाया है कि उन्हें गुस्सा दिलए और अपना घर-बार लुटाए? बस सबका काफिया तंग था। सब तरह की आरजू-मिन्नत की गई, रोना-पीटना हुआ, गुस्सा-नाराजी कि बातें भी हुईं। पर बेकार। बारात विदा न होनी थी - न हुई।

न जाने कहाँ से घी-मैदा, चीनी आदि राशन के छकड़े रातों-रात लदे चले आते थे - दूध-दही, सब्जी-तरकारी, बकरे-मेढ़े, खस्सी, मुर्गी-मुर्गे, मछली दाना-चारा बेशुमार दिन-दिन आता जाता था। न जाने कहाँ से? लुत्फ यह है कि सब काम करते थे - शागिर्द पेशा लोग। नवाब मसनद पर बैठे खमीरी तमाखू पर कश लगाते और हुक्का गुड़गुड़ाते थे। प्रतिदिन शाम को वे हाथी पर चढ़कर जनवासे का चक्कर लगा आते थे - जो अब मीलों में फैल गया था।

दिन बीतते जाते थे, और इस अद्भुत बारात की चर्चा दूर-दूर तक फैलती जा रही थी। नवाब साहब महीनों से बारात विदा नहीं कर रहे हैं। पहरे बैठा रखे हैं। यह खबर सुन तथा शादी की महफिलें, दावतों और मौज-मजा की चर्चा सुन दूर-दूर से तमाशाई सैकड़ों की तादाद में मुज़फ्फरनगर आ रहे थे। पर जो आता उनका शुमार बाराती में ही किया जाता था़। वह खाए-पीए, मजा करे, पर वहाँ से जा नहीं सकता था। रहना बारात के साथ ही पड़ता था। इस प्रकार अब बारात भी दुगनी-तिगुनी हो गई थी।

…….

सरदार दोल्चासिंह बड़े जोड़-तोड़ के आदमी थे। वे सहारनपुर के राजा ही थे। जिस प्रकार रुहेलखण्ड के रुहेले सरदारों पर नवाब बब्बू खां का प्रभुत्व था, उसी प्रकार गूजरवाड़े के गूजरों पर सरदार दोल्चासिंह का था। मराठाशाही तक उनकी तूती बोलती थी। महाराजा जसवन्त राव होल्कर जैसे महापराक्रमी राजा सरदार दोल्चासिंह की सहायता पाने की आशा में सहारनपुर में महीनों पड़े रहे थे। हकीकत यह थी कि गूजरवाड़े के तीन लाख गूजरों के नेता - सरदार दोल्चासिंह थे। अफसोस है कि अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण ने गूजरवाड़े की शक्ति तोड़ डाली थी। उसके बाद गूजरों का संगठन बिगड़ता ही गया। अब सरदार दोल्चासिंह की यद्यपि वह पुरानी धाक नहीं रही थी, परन्तु गूजर उन्हें अपना राजा और जाति का प्रमुख मानते थे। जसवन्त राव होल्कर ने यही आशा की थी, कि यदि दोल्चासिंह गूजरों का संगठन कर उनका नेतृत्व करें, तो तीन लाख गूजरों की एक वीर-वाहिनी खड़ी हो सकती है जो उत्तर भारत में अंग्रेजी कम्पनी के उठते हए प्रभाव को चकनाचूर कर सकती है। होल्कर ने बहुत चेष्टा की, वे स्वयं इस वीर-वाहिनी का नेतृत्व करने को तैयार थे, पर अफ़सोस, गूजरों में न वह दमखम था, न जोशखरोश, न संगठन। वे अब नामी-गिरामी चोर बन चुके थे। यद्यपि वे जमींदार और किसान थे, पर उन्होंने मुख्य पेशा चोरी ही बनाया हुआ था। और उस अंधेरगर्दी के जमाने में यह काम बहुत लाभ का था। जोखिम इसमें कम थी। मजेदार बात तो यह थी कि छोटे बड़े राजा-नवाब जमींदार इनके द्वारा अपनी रियाया के घर चोरी कराते या डाके डलवाते और अपना हिस्सा चोरी के माल का लेते थे। मुज़फ्फरनगर के नवाब इकरामुल्ला खां तो चोरों के शहनशाह थे ही। अब सरदार दोल्चासिंह तो मर चुके थे - उनके पुत्र रनवीरसिंह चोरों के सरदार बने हुए थे। रियाया सरकश थी। लगान देती न थी। कम्पनी बहादुर की सरकार मालगुजारी न पाने पर राजा हो चाहे छोटा जमींदार, सबको जेल में ठूँस देती थी - तथा जमींदारी कुर्क करा लेती थी - परिणाम इसका यह हुआ - कि रनवीरसिंह ने चोरों का नेतृत्व ग्रहण कर लिया। यद्यपि वे नवाब इकरामुल्ला खां के जोड़ के पुरुष तो न थे; पर गूजरों के सरदार मुखिया और राजा थे। अतः गूजरवाड़े के चोर सरदारों में इकरामुल्ला खां के बाद उन्हीं का नाम था।

कभी-कभी इन चोरों के सरदारों में भी नोंक-झोंक हो जाया करती थी। खासकर नवाब इकरामुल्ला खां और राजा रनवीरसिंह एक प्रकार के प्रतिद्वन्द्वी व्यक्ति थे। कभी-कभी एक ही शिकार पर दोनों के शागिर्द टूट पड़ते तो झगड़ा उठ खड़ा होता था। हाल ही में यह झगड़ा तूल पकड़ गया था और यही कारण था कि राजा रनवीरसिंह नवाब के यहाँ शादी में निमन्त्रण पाकर भी नहीं आए थे। नवाब भला यह हिमाकत कब बर्दाश्त कर सकते थे। परन्तु इस वक्त शादी की खटपट में वे राजा रनवीरसिंह को मुनासिब सजा न दे सके थे। फिर भी वे उनका न आना अपनी तौहीन समझते थे - और बदला लेने का इरादा पुख्ता कर चुके थे। अब उन्हें एक सुयोग हाथ लग गया। नागौरी बैलों की एक जोड़ी हाल ही में खरीदकर राजा रनवीरसिंह ने मँगाई थी, जिसकी सूचना नवाब को तुरन्त मिल गई। जोड़ी यकता थी। नवाब सानब को भला यह बात कहाँ पसन्द कि कोई उम्दा जानवर उनके अमल में दूसरे के पास हो। बस, राजा साहब के यहाँ यह जोड़ी दो सप्ताह भी न रहने पाई और खुलकर नवाब की पशुशाला में दाखिल हुई। राजा साहब की इस नायाब और अद्वितीय नागौरी बैलों की जोड़ को देखकर नवाब बहुत खुश हुए। खासकर इसलिए कि राजा ने शादी में न आने की जो हिमाकत की है, उसका एक आंशिक बदला मिल गया। अब उन्होंने इरादा किया कि इसी जोड़ी को रथ में जोड़कर उसी रथ में बैठाकर बेटी को विदा करूँगा।

अब बारात को मुज़फ्फरनगर में आए चौथा महीना बीत रहा था। नाच-रंग, महफिल, खेल-तमाशे और दावत सब बदस्तूर चल रहे थे। बारात गर्मियों में आई थी…. और अब नवाब साहब ने बारात के लिए रजाइयाँ सिलवाई थीं। पचास दर्जी रात-दिन रजाइयाँ और गर्म पोशाक बारातियों के लिए सी रहे थे। नवाब साहब के सामने बारादरी में रजाइयों के अम्बार लगे थे - सब तरह की रजाइयाँ थीं। रेशमी, सूती और छींट वाली। इकरंग और रंग-बिरंगी धुनियों की ताँत तन्नक तूं बोल रही थी। सैकड़ों रजाइयाँ तह पर तह रखी थी। तैयार रजाइयाँ बारातियों में बाँटी जा रही थीं, नई सिल-सिलकर आती जाती थीं। नवाब बहुत व्यस्त थे - कह रहे थे, “म्याँ, जल्दी करो; जल्दी। कोई बाराती ठण्ड में मर गया तो उस मर्दूद की तो खैर जान ही जाएगी, मगर मेरी किस कदर बदनामी होगी।”

यहाँ रजाइयों की यह धूमधाम हो रही थी कि राजा रनवीरसिंह हाथी पर सवार आ बरामद हुए। साथ में पचास सिपाही, प्यादे, सवार, खिदमतगार, मशालची, मुन्शी, गुमाश्ते।

नवाब को इत्तिला हुई, तो उठकर बहर आए और बिगड़कर कहा, “अब आपको यहाँ आने की फुर्सत मिली राजा साहब, वल्लाह, समझदार आप एक ही हैं। तौबा, तौबा, बारात को आए आज चार महीना हो गया, और आप हैं, कि अब आ रहे हैं। यह भी न सोचा कि चलकर देखूँ, काम में हाथ बटाऊँ। कुछ हेस-नेस हो गई तो गूजरवाड़े की नाक कट जाएगी। आप हैं गूजरों के राजा। कहिए, आपकी इज्जत का सवाल है या मेरी इज्जत का?”

राजा रनवीरसिंह ने कहा, “नवाब साहब, खता माफ हो, मैं इस वक्त बारात में नहीं आया हूँ, आपसे कुछ …..”

“क्या फर्माया आपने? बारात में नहीं आया हूँ? यह क्या फिकरा कहा? तौबा-तौबा!” नवाब साहब ने दोनों कान पकड़कर गालों पर तमाजे जड़े और कहा, “आप बारात में नहीं आए है - यही कहा न आपने? जी चाहता है कि खुदकुशी कर लूँ, या आप ही को गोली मार दूँ। यार राजा हैं, आप भी सोच लें। खैर, आइए - भीतर आइए।”

“आ तो अब गया ही हूँ। बड़ा पहरा बैठाया है आपने नवाब साहब, लेकिन मैं तो जानता था - बारात विदा कब की हो चुकी होगी। शादी तो गर्मियों में थी न? उस वक्त मैं बीमार था, न आ सका।”

“तो अब आए। खैर, तो बारात अभी विदा नहीं हुई है। गनीमत है सुबह का भूला शाम को घर लौट आया।”

“खैर, अब हुक्म हो तो मतलब की बात करूँ, जिसलिए मैं आया हूँ।”

“अर्ज़ कीजिए फुर्सत में। अभी डेरा तो आपको दे लूँ - अरे कोई है?” दो-चार शागिर्द दौड़े। नवाब ने राजा साहब के और उनके आदमियों के ठहरने का मुनासिब प्रबन्ध करने का उन्हें हुक्म दिया। फिर कहा, “अब कहिए!”

“क्या कहूँ, आप भी न जाने क्या समझेंगे सुनकर। इधर आप फँसे हैं शादी के हंगामे में।”

“तो म्याँ, मदद करो लिल्लाह तुम्हारी भी तो भतीजी है शबनम।”

“लेकिन सुनिए तो?”

“सुन रहा हूँ साहब, फर्माइए भी कुछ।”

“मैंने एक नागौरी बैलों की जोड़ी खरीदी थी। निहायत नायाब। अभी परसों वह खुल गई।”

“खुल गई? खैर सल्ला, बस यही बात थी?”

“जी हाँ!”

“तो भाई, अब बारात की खातिर-तवाजा में मेरा हाथ बँटाइए। बस तुम आ गए तो तसल्ली हो गई। अब जरा साँस लेने की फुर्सत मिलेगी।”

“लेकिन नवाब साहब, मेरी जोड़ी का क्या होगा?”

“कैसी जोड़ी?”

“नागौरी बैलों की, परसों ही खुल गई है।”

“अरे यार राजा साहब! तुम भी क्या बोदी बातें करते हो! खुल गई तो खुल जाने दो, मेरे यहाँ ग्यारह जोड़ी नागौरी बैलों की हैं, एक से बढ़कर एक। पसन्द कर लो, और जो पसन्द हो खोल ले जाओ।”

“तो हुक्म हो तो मैं जरा देख लूँ?”

“देख लो भाई, पूछना क्या है, मगर जाना होगा बारात विदा होने के बाद।”

“बारात कब विदा हो रही है?”

“अभी तो कुछ ऐसा इरादा नहीं है।”

“तो तब तक मुझे यहीं ठहरना पड़ेगा?”

“कमाल का सवाल है आपका, राजा साहब! एक तो आए ही अब, और तिस पर उखड़ी-उखड़ी बातें करते हो।”

“लेकिन नवाब साहब, मैं ठहर तो न सकूँगा।”

“लाहौल बलाकू, म्याँ राजा साहब, लड़ने का इरादा हो तो वह कहो।”

“नहीं, नवाब साहब, लेकिन मुझे और जरूरी काम है।”

“वे सब काम जब यहाँ से लौटें तब अंजाम दें।”

“लेकिन मैं लौटूँगा कब?”

“बारात विदा हो ले - उसके बाद।”

“आखिर बारात विदा कब होगी?”

“देखा जाएगा, अभी कोई इरादा नहीं है।”

“और मुझे भी तब तक रहना पड़ेगा?”

“यकीनन। और काम में मेरा हाथ बँटाना पड़ेगा। अकेला हूँ भाईजान, यह भी तो सोचो, इज्जत का मामला है। लड़की की शादी है। हँसी-खेल नहीं।”

नवाब की आँखों में पानी भर आया। राजा साहब को जवाब देते नहीं बना। वे चुपचाप नवाब की ओर ताकते देखते रह गए।

…….

राजा हो, रंक हो, डाकू हो, चोर हो, हिन्दू हो, मुसलमान हो, बेटी की विदाई सबकी आँखें तर कर देती है। बारात को आए जब पूरे छः महीने हो चुके थे, और आखिर नवाब इकरामुल्ला खां को बरात विदा करनी पड़ी। जो नवाब इकरामुल्ला बात-बात में शेर की तरह दहाड़ते थे, हाथी के समान जिनका शरीर था - आज वे बात-बात में हकला रहे थे। अपने ही हुक्म वे भूल जाते थे। एक बार कुछ कहते और दूसरी बार अपनी ही बात का काट कर देते थे। आँखें उनकी गीली हो रही थीं - आवाज गले में अटकती थी। वे चाहते थे - उनके दिल की यह हालत किसी पर प्रगट न हो। पर उन्हें जो देखता - वही जान जाता, कि यह एक बाप है, जिसकी बेटी आज विदा हो रही है।

और बारात विदा हुई। दहेज का सामान छकड़ों और बहलों में लदा। खाने-पीने की जिन्सें, मिठाइयाँ और पकवान बहलियों में चले। बाराती हाथियों, घोड़ों, रथों, फीनसों और पालकियों पर। यूसुफ मियाँ उसी सुरंग घोड़ी पर, और दुलहिन दुबर्जी रथ पर, जिसकी सारी सजावट लाल और साज सारा चाँदी का था। रथ में वही राजा रनवीरसिंह की नागौरी बैलों की जोड़ी जुती थी। राजा साहब खड़े टुकुर-टुकर देख रहे थे।
Post a Comment