Monday, October 15, 2007

धान के देश में - 37

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 37 -

उषा और श्यामवती को मिले छः महीने से अधिक हो गया। जब से जानकी के साथ श्यामवती सिकोला चली गई तब से वह एक बार भी खुड़मुड़ी नहीं आई। उषा भी ऐसी व्यस्त हुई कि कहीं आ-जा न सकी। श्यामवती इन दिनों अपने विचारों के अनुसार काम कर रही थी। उसने जानकी की सहायता से सिकोला में ऐसे काम किये जो इस भू भाग के लिये नये थे। उषा ने महेन्द्र को कई बार सिकोला चलने के लिये कहा पर उसका गर्व उसे हर बार रोकता रहा। अन्त में एक दिन उषा महेन्द्र पर विजय पा ही गई और दोनों सिकोला गये।
वहाँ उन दोनों ने प्रगति देखी। एक नया पर आधुनिक ढंग का मकान बना था जिसके चारों ओर कमर तक ऊँची दीवाल का हाता बना हुआ था। यह था श्यामवती के परिश्रम का परिणाम। हाते में एक ओर प्रवेश द्वार था। फाटक पर बड़े बड़े सुन्दर अक्षरों में लिखा था "वन्देमातरम्"। वहाँ पहुँचते ही उषा का मन शान्ति और उल्लास से भर गया। दोनों ने भीतर प्रवेश किया। मकान का बरामदा पार करने पर एक छोटा सा 'हॉल' जैसा कमरा था। उसके भीतर जाकर महेन्द्र और उषा ने देखा कि उसकी दीवालों पर देश के महान नेताओं के चित्र टंगे थे। उन दोनों को लगा कि स्वर्ग ही पृथ्वी पर उतर आया है। एक कोने में पाँच-सात छोटे बच्चे तकली कात रहे थे और दो औरतें चरखा चला रही थीं उन सबने दोनों का अभिवादन किया। उषा ने एक स्त्री से पूछा, "क्या यह सब श्यामवती ने किया है?"
"हाँ, यह सब उसी के विचारों और परिश्रम का नतीजा है। दिन-रात एक कर यह आश्रम चार महीने में बना और दो महीने से काम चल रहा है।" उस स्त्री ने उत्तर दिया।
"श्यामवती कहाँ है?" उषा का प्रश्न था।
"आपको बाहर ही हाते के भीतर मिल जायेंगी।" उषा और महेन्द्र बाहर आये। मकान की छत की ओर देखा। वहाँ तिरंगा लहरा रहा था। हाते में चारों और क्यारियाँ बनी थीं जिनमें फूलों से लदे पौधे थे। एक ओर एक छायादार पेड़ के नीचे एक काला तख्ता रखा था। सामने खुली हवा में दस-बारह बालक-बालिकायें बैठी थीं। श्यामवती उनको पढ़ा रही थी। उषा और महेन्द्र को देखकर उसने बच्चों को छुट्टी दे दी और उन दोनों का स्वागत किया। तीनों पास ही पड़ी हुई चटाई पर बैठ गये।
"वाह श्यामा! तुमने तो गजब कर दिया। लगता है कि इन्हीं कामों में लगे रहने के कारण तुम खुड़मुड़ी नहीं आई। मैं तो सिद्धान्त में ही उलझी रही पर तुम व्यहार के क्षेत्र में उतर आई।" उषा ने मुस्कुरा कर कहा।
"उषा, यह ऐसा क्षेत्र है जहाँ काम करने में बड़ी कठिनाई हुई पर जानकी भाभी हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाती रहीं।" कह कर श्यामा महेन्द्र से बोली, "आप अपना और अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते क्या?"
"मुझे क्या हुआ है। ठीक ही तो हूँ।" महेन्द्र ने क्षीण और सूखा-सा उत्तर दिया।
उषा और श्यामवती बातों में व्यस्त हो गईं। महेन्द्र वहाँ से उठ कर आश्रम की एक एक चीज का निरीक्षण करने लग गया। महेन्द्र के जाते ही उषा बोली, "श्यामा, मैं आज तुमसे साफ साफ एक बात करने आई हूँ।"
"कहो ना क्या कहना चाहती हो।" आत्मीयता के स्वर में श्यामवती बोली।
"तुम महेन्द्र से ब्याह कर लो। यही मेरा तुमसे अनुरोध है। इसके लिये सुमित्रा माता को मैं राजी कर लूँगी।" उषा ने अपने स्पष्टवादी स्वभाव के अनुसार कहा।
"महेन्द्र से तुम क्यों ब्याह नहीं कर लेती।" शान्त और संयत स्वर में श्यामवती बोली। यह कुछ दिनों से उसके मन में उठने वाला विचार था जो शब्द बनकर प्रकट हुआ।
सुनकर उषा एकदम चौंक गई। उसने कल्पना तक नहीं की थी कि उसके सामने ऐसा प्रसंग आ सकता है। उसका अचेतन मस्तिष्क व्यग्र हो उठा और वह सोचने लगी कि वह रायपुर में रुकी ही क्यों - क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित होने वाले का विचार क्या इतना दुर्बल होता है? फिर वह खुड़मुड़ी आ कर महेन्द्र के अत्यन्त समीप रहती हुई क्यों अपना जीवन बिता रही है। क्या वह स्वयं महेन्द्र से प्यार नहीं करती? अवश्य ही करती है और अपने उसी प्रेम में त्याग का संचार करने के लिये ही तो वह श्यामा को महेन्द्र से ब्याह कर लेने का अनुरोध कर रही है। इन बातों के मस्तिष्क के अचेतन भाग में उभर जाने से उषा तिलमिला उठी। उसे ऐसा लगा कि उसका गला सूख रहा है। हाथ-पैर में कम्पन उत्पन्न हो गया। शरीर में सनसनी दौड़ने लगा। श्यामवती उषा के भावों का अध्ययन कर रही थी। बोली, "देखो बहन, तुम आज जो कुछ सोच रही हो, मैं उस परिणाम पर बहुत पहले ही पहुँच चुकी थी। मैं जानती हूँ कि तुम्हें महेन्द्र से प्रेम हो गया है। तुम यहाँ रुक जाने के लिये भी उसी कारण से तैयार हो गई। तुम उनके जैसी ही कुलीन घराने की भी हो और सुमित्रा माता तुम्हें स्वीकार भी कर लेंगी। मेरा और महेन्द्र का विवाह इस जन्म में कदापि सम्भव नहीं है। मेरा शेष जीवन तो अब अपने क्षेत्र की सेवा में ही बीतेगा। मेरी बात मान कर तुम उनसे ब्याह कर लोगी तो यह मेरे ऊपर भी तुम्हारा एक महान उपकार होगा क्योंकि मैं नहीं चाहती कि महेन्द्र का पूरा जीवन ऐसे ही नीरस बीते।"
श्यामा की बात सुनकर उषा गम्भीर होकर सोचने लगी। इसी समय महेन्द्र भी वहाँ आ कर बैठ गया। आज पहली बार ही उषा को महेन्द्र के सामने लज्जा का अनुभव हुआ। उसने चुपचाप कनखियों से महेन्द्र की ओर देखा। उसकी दृष्टि नई थी और महेन्द्र का रूप भी उसके लिये नया था। किन्तु ज्योंही महेन्द्र की निगाह उस पर पड़ी वह दूसरी ओर देखने लगी और पैर के नाखून से नाखून कुरेदने लगी। महेन्द्र को भी बड़ा अटपटा-सा लग रहा था। तभी श्यामा महेन्द्र से बोली, "महेन्द्र, तुम मुझसे प्यार करते हो तो मेरी कामना तुम्हें पूरी करनी होगी। तुम्हें उषा से ब्याह करना होगा क्या तुम मेरी इतनी सी इच्छा को भी पूरी नहीं करोगे? विशाल दृष्टि से देखो तो उषा को पाकर तुम मुझे ही पावोगे। प्रेम इतना संकुचित नहीं होता कि स्वार्थ को आश्रय दे। जब हम तीनों एक दूसरे को सुखी करने के लिये प्रयत्न कर रहे हैं तो हममें भेद ही कहाँ रह गया है। हमारा प्रेम संकुचित हो कर व्यक्तिगत स्वार्थ तक ही सीमित न रह कर एक दूसरे पर छलकता रहे, यही मेरी कामना है।" तीनों ने एक दूसरे की ओर देखा और उनकी आँखें छलछला आईं।
अगले महीने उषा और महेन्द्र का ब्याह हो गया।
(उपन्यास समाप्त)
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