Wednesday, October 17, 2007

हाल्ट! हुकम सदर

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कहानी)

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राधा के साथ गाँव पहुँच कर प्रेमा ने प्रकृति के बीच जहाँ शान्ति का अनुभव किया वहीं प्रकृति की मादकता और उत्तेजक शक्ति रह रह कर उसे अशांत भी कर देती थी। उसे सूना सूना सा लगता था। वसन्त का सुहावना समय था। चारों ओर सुन्दर फूल खिले थे। इधर उधर अंगारों जैसे लाल लाल टेसू मन में उत्साह और उत्तेजना भर रहे थे। दिन भर बासन्ती बयार बहती थी। अमराई में कोयल की कूक संगीत के पंचम स्वर के सुरीलेपन को भी लज्जित कर देती थी। प्रेमा को गाँव में कोई विशेष काम तो था नहीं। वह प्रकृति की शोभा निरखने में अपने आपको खोकर आँखें बिछा देती थी। जहाँ एक ओर वह प्रकृति को निरख कर आनन्द का अनुभव करती वहीं उसे अपने भीतर ही भीतर एक अजीब सी कसक और अजीब सी निराशा का भी अनुभव होता था। उसे यह तक पता नहीं था कि यह उसकी अवस्था का प्रभाव है।

प्रातःकाल की सुहावनी बेला में प्रेमा तालाब के घाट में अकेली स्नान कर रही थी। उसके ठीक बाजू के पत्थर पर स्नान करने के लिये चढ़ती हुई उमर का एक तरुण आ बैठा। वह तरुणाई और युवावस्था की वयःसन्धि में था। मूछों की रेख फूट चली थी। ललाट के चौड़ेपन में निश्चिन्तता थी। चेहरे पर रोब, रौनक और आकर्षण लहरा रहा था। भुजायें मांसल व फड़कती हुई थीं। प्रेमा की दृष्टि से यह सब छिप न सका। गाँव आने के बाद इस तरुण को उसने पहली ही बार देखा और तरुण भी पहली ही बार इस अनिंद्य सुन्दरी को अपने गाँव में देख कर हृदय में हलचल का अनुभव करने लगा। तालाब में और लोग भी स्नान कर रहे थे पर वे कुछ दूर के घाट में थे।

प्रेमा और तरुण पहले तो एक दूसरे को कनखियों से देखते रहे। फिर प्रेमा ने अपनी निगाह फेर ली पर वह मुग्ध तरुण अब खुले रूप में बार बार अतृप्त नयनों से रह रह कर प्रेमा प्रेमा के रूप लावण्य को निहार लेता था। यह देख कर प्रेमा को उसकी बेचैनी पर हँसी-सी आ रही थी पर वह केवल हल्की मुस्कान से ही उसके हृदय में तीर चला कर रह गई। उसे मन्द मन्द हँसती देखकर तरुण सहसा झेंप सा गया और साथ ही साथ उसके साहस में कुछ लहरियाँ भी उठीं। साहस उसका प्रबल हो उठा - वह बोला, "तुम मुझे देख कर हँस क्यों रही हो?" इस प्रश्न का उत्तर प्रेमा क्या देती। यदि स्पष्ट कह देती कि तुम्हारी चंचल गति से मुझे हँसी आ गई तो यह एक प्रकार से उसे ठेस पहुँचाना ही हो जाता। चुप रहती तो उस तरुण की उलझन उलझती ही जाती। प्रेमा को क्रोध तो था नहीं, प्रसन्नता की एक धुंधली सी झलक का ही उसके हृदय में स्फुरण हो रहा था।

प्रेमा की शरारत जाग उठी। उसके प्रश्न का उत्तर देने के बदले वह बनावटी खीझ और झुँझलाहट के स्वर में बोली, "तुम यहाँ क्यों आ बैठे जी? तुम्हें तो उधर नहाना था जहाँ और सब लोग नहा रहे हेँ। देखते नहीं मैं अकेली ही यहाँ पर नहा रही हूँ।" सुनकर युवक सकपका सा गया और अपने गीले कपड़े घाट पर के पत्थर से उठा कर चुपचाप भीगी बिल्ली की तरह वहाँ से खिसक जाने की तैयारी में लग गया। यह देख कर प्रेमा ने कहा, "अब कहाँ जा रहे हो? देखने वाले क्या समझेंगे? जब नहाना शुरू किया है तो नहा ही लो।" युवक ने फिर से पत्थर पर अपने गीले कपड़े रख दिये और नहाने लगा। उसे लगा कि यदि वह कुछ पूछे तो युवती नाराज नहीं होगी। उसने प्रेमा से सरल सा प्रश्न किया, "तुम तो इस गाँव की नहीं हो। कहीं बाहर से आई हो क्या?"

"हाँ, मैं अपनी बुआ राधा के घर आई हूँ।"

"क्या नाम है तुम्हारा?"

"प्रेमा। और तुम्हारा?"

"मैं रामसिंह हूँ। रहने वाला तो यहीं का हूँ पर बाहर गया हुआ था। कल ही वापस आया हूँ। यहाँ अपनी माँ के साथ खेती की देखभाल करने के लिये। बड़े भाई शहर में नौकरी करते हैं। उन्हीं के पास गया था। तुम्हारी राधा बुआ से तो हमारा दूर का रिश्ता है।" एक साँस में ही रामसिंह ने अपना पूरा परिचय दे दिया।

बातचीत के बीच दोनों ही अपना हृदय एक दूसरे को देते जा रहे थे।

उस दिन से प्रेमा और रामसिंह की घनिष्ठता बढ़ती ही गई। रामसिंह अधिकतर राधा के घर आ बैठता। वहाँ उसे प्रेमा से मिलने और बातें करने का अवसर सरलता से मिल जाता था। राधा न तो उसे कुछ कह ही सकती थी और न रोक ही सकती थे - राधा की ससुराल की ओर से उससे दूर का रिश्ता जो ठहरा। पर राधा दोनों पर पैनी दृष्टि अवश्य ही रखती। लड़की वालों को बड़ी सावधानी से व्यवहार करना पड़ता है। यदि राधा रामसिंह को घर आने से रोक देती या उसका प्रेमा से मिलना-जुलना और बात करना एकाएक बन्द कर देती तो गाँव के अनपढ़ वातावरण में न जाने लोग क्या क्या सोचने लग जाते। अन्ततः प्रेमा के प्रति कोई लांछन ही लग जाता तो। परिस्थिति जटिल होती जा रही थी। प्रेमा और रामसिंह अब घर के बाहर भी मिल लेते थे। यदा-कदा दोनों साथ साथ इधर-उधर घूम भी आते थे। राधा हैरान थी कि वह क्या करे, क्या न करे। उसने कई बार यह भी सोचा कि प्रेमा को वापस भेज आवे पर उसके हृदय के किसी कोने से यह भाव भी उठता था कि ऐसा करने पर प्रेमा के हृदय पर आघात न पहुँचे। अन्त में जब परिस्थिति उसके नियन्त्रण के बाहर हो चुकी तब उसने अपने भाई और प्रेमा के पिता सुजानसिंह को कहला भेजा कि वह आकर अपनी प्रेमा को स्वयं ही संभाले।

घबराहट में फँसकर दो दिनों की छुट्टी ले सुजान सिंह आ पहुँचे।

आते ही उन्होंने राधा से पूछा, "क्या बात है राधा? ऐसा क्या हो गया जो तुमने मुझे उलझन और घबराहट में डाल दिया। प्रेमा कहा हैं?"

और प्रेमा सचमुच उस समय घर में नहीं थी।

"हमारी प्रेमा ने ऐसा कदम उठाया है जो गलत रास्ते पर पड़ सकता है," बिना किसी भूमिका के ही राधा बोली।

राधा के शब्दों ने सुजान सिंह की मुद्रा को कठोर बना दिया। आँखें लाल हो गईं। उसका सारा शरीर
एकबारगी काँप उठा। वे कर्कश स्वर में चीख उठे, "यह बतावो कि वह है कहाँ?"

"कहाँ होगी। दो-चार बार तो मैनें स्वयं ही उसे गाँव के छोकरे रामसिंह के साथ तालाब के बाजू वाली अमराई में बैठे बातें करते देखा है। अभी भी वहीं होगी।" राधा ने स्पष्ट सूचना दी।

सुजान सिंह कराल-काल से बन कर हाथ में कुल्हाड़ी लेकर चल पड़े अमराई की ओर। उबलते हुये हृदय के झकोरे खा कर पैर उनके सीधे नहीं पड़ रहे थे। घर से अमराई कोई दो फर्लांग ही दूर रही होगी किन्तु सुजान सिंह को लगा कि वह दूरी दो हजार मील से भी अधिक की हो। श्वाँस तेज हो चली थी उनकी। आँखों में खून उतर आया था और मस्तिष्क में गुस्से का भूत ताण्डव कर रहा था। ज्यों ज्यों अमराई नजदीक आती जाती थी त्यों त्यों सुजान सिंह का क्रोध बढ़ रहा था। किन्तु विवेक ने अभी भी साथ नहीं छोड़ा था इसलिये अमराई के बाहरी भाग में पहुँचने पर सुजान सिंह वास्तविकता का पता लगाने के उद्देश्य से एक ओर छिप गये।

स्पष्ट सुना सुजान सिंह ने -

"और यदि हम दोनों का ब्याह नहीं हो सका तो।" प्रेमा के शब्द थे। स्वर में कम्पन, कम्पन में चिन्ता और चिन्ता में व्यग्रता थी। वह रामसिंह के बाजू में पर उससे अलग बैठी थी। उसके चेहरे की प्रसन्नता पर उदासी के हल्के से बादल छा रहे थे।

तो क्या। हम दोनों एक दूसरे को याद करते हुये मन मसोस कर जीवन बिता देंगे।" रामसिंह ने हँसते हुये उत्तर दिया।

"पर मेरी शादी किसी दूसरे के साथ हो जाने पर पति के होते हुये मैं तुम्हारी याद कैसे कर सकूँगी? यह तो पाप होगा। प्रेमा की सरलता ही शब्द बन कर व्यक्त हुई। उसे लग रहा था कि उसके आँसू अब ढले - अब ढले।

प्रेमा की बात सुन कर रामसिंह के ओंठों में हँसी का सूखापन झलक गया। चेहरा गम्भीर हो उठा। हृदय में लहराती हुई सचाई उसके शब्दों में फूट पड़ी, वह बोला, "प्रेमा, नियम अवश्य ही बनाया गया है कि जिसके साथ अग्नि को साक्षी देकर सात फेरे पड़ जावें वही उस स्त्री का पति होता है और उसके सिवाय दूसरे की याद करना तक पाप माना गया है। साथ ही इस नियम को धर्म का रूप दे दिया गया है, किन्तु सोचो, जब एक स्त्री किसी और को चाहती है और उसका प्रेमी भी उसे प्राणों से बढ़ कर चाहता है तब ऐसी दशा में, अग्नि देव की साक्षी देकर उसका हाथ किसी और को दे देना अग्नि देव का अपमान नहीं है? यह तो उनका खिलवाड़ है, उन्हें झुठलाना है। क्या अग्नि देव इतना भी नहीं जानते कि अदालत के झूठे गवाह की तरह उनका दुरुपयोग किया जा रहा है।"

"मैं यह सब कुछ नहीं जानती। सिर्फ इतना ही मुझे पता है कि यदि तुमसे मेरी शादी नहीं हुई तो मैं जीते जी मर जाउँगी या फिर ब्याह के पहले ही आत्महत्या कर लूँगी।"

प्रेमा की अन्तिम बात से सुजान सिंह का हृदय काँप उठा।

"पगली! आत्महत्या तो सबसे बड़ा पाप है। धीरज रखो। ईश्वर अन्यायी नहीं है।" रामसिंह ने कहा और प्रेमा का हाथ थाम लिया। उस रमणी का सिर रामसिंह के वक्ष में सन्तोष, शान्ति और रक्षा का अनुभव कर रहा था।

"तुम दोनों का यह साहस कैसे हुआ?" सुजान सिंह का कड़कता हुआ स्वर सुन कर दोनों सम्भल कर अलग हो गये किन्तु उनके चेहरे पर घबराहट और डर की हल्की सी रेखा तक नहीं थी। दोनों की मुख-मुद्रा शान्त और अलौकिक दमक से मन को खींच लेने वाली थी।

आड़ से निकल कर सुजान सिंह दोनों के सामने थे।

अब पिता को सामने देख कर प्रेमा के हृदय की धड़कन में तीव्र गति आ गई। उसने सिर नीचा कर लिया।

"क्यों, तुम्हें अपनी जान प्यारी नहीं हे क्या? देखते नहीं मेरे हाथ में यह कुल्हाड़ी।" सुजान सिंह का एक एक शब्द वज्र की भाँति कठोर था। किन्तु रामसिंह ज्यों का त्यों बिना कुछ कहे खड़ा ही रहा।
"चुपचाप क्या खड़ा है! ये ले।" कहने के साथ ही सुजान सिंह ने दोनों हाथों से पकड़ कर रामसिंह के सिर के ऊपर कुल्हाड़ी उठाई कि प्रेमा चीख कर रामसिंह से लिपट गई और उसके मुँह से केवल निकला, "बापू......"

सुजान सिंह ने कुल्हाड़ी नीचे फेंक दी और प्रेमा से स्नेहयुक्त स्वर में कहा, "बेटी, तू समझती है कि मैं कुल्हाड़ी चला देता। मैं तो इसके साहस और तुम्हारे प्रेम की परीक्षा ले रहा था। मैं तुम दोनों का ब्याह कर दूँगा।"

"बापू...." प्रेमा के स्वर की एक एक झनकार में उल्लास थिरक रहा था।

रामसिंह अभी भी शान्त था किन्तु उसकी आँखें सुजान सिंह को कृतज्ञता और श्रद्धा से देख रही थीं।

(तीन किश्तों में से द्वितीय किश्त)
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