Friday, October 16, 2009

दीपावली क्यों मनाई जाती है?... अलग अलग मान्यताएँ हैं ...

जैन धर्म के अनुसार भगवान महावीर को 15 अक्टूबर १५५२७ (ईसवी पूर्व) के दिन, जो कि दीपावली का दिन था, निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। (अंग्रेजी विकीपेडिया http://en.wikipedia.org/wiki/Diwali#In_Jainism)

सिख समुदाय के लोग अनेकों कारण से दीपावली का त्यौहार मनाते हैं। इस दिन उनके छठवें गुरु, गुरु हरगोविंद जी, को 52 हिन्दू राजाओ के साथ कारागार से मुक्ति मिली थी और वे अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में मत्था टेकने गये थे जहाँ पर अनेकों दिये प्रकाशित करके उनका स्वागत किया गया था।

कहा जाता है किस चौदह वर्ष का वनवास काट कर भगवान श्री रामचन्द्र जी दीपावली के दिन ही अयोध्या वापस लौटे थे और अनेकों दीप प्रज्जवलित कर के उनका स्वागत किया गया था।

स्कन्द पुराण के अनुसार देवी शक्ति ने भगवान शिव का आधा शरीर प्राप्त करने के लिये 21 दिनों का व्रत किया था जिसका आरम्भ कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी से हुआ था और उन्हें दीपावली के दिन व्रत का फल मिला था।

दीपावली को फसल काटने का त्यौहार भी माना जाता है। कृषक अपने परिश्रम का फल फसल के रूप में पाकर आनन्द तथा उल्लास से सराबोर हो जाते हैं और त्यौहार मनाते हैं। चूँकि अन्न लक्ष्मी देवी का एक रूप है अतः दीपावली की रात्रि को लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है।

कुछ और जानकारी

दीपावली शब्द "दीप" (दिया) तथा "आवली" (कतार) शब्दों के मेल से बना है अर्थात् दीपावली का अर्थ है "दिये की कतार"।

दीपावली को "लक्ष्मी पूजा" के नाम से भी जाना जाता है। लक्ष्मी पूजा के दिन घरों के द्वारों पर सभी दिशाओ की ओर अनेकों दिये आलोकित किये जाते हैं। ।

दीपावली रोशनी का त्यौहार है। दिया या प्रकाश बुराई पर भलाई के विजय का प्रतीक है।

दीपावली हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक चन्द्रमास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है जो कि अंग्रेजी कैलेन्डर के अनुसार अक्टूबर या नवम्बर महीने में आता है।

लक्ष्मी पूजा के पूर्व का दिन "नर्क चतुर्दशी" कहलाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर पर विजय प्राप्त किया था। नर्क चतुर्दशी के दिन घरों के द्वारों पर दक्षिण दिशा की ओर चौदह दिये आलोकित किये जाते हैं।

लक्ष्मी पूजा के दूसरे दिन "गोवर्धन पूजा" मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने इन्द्र को पराजित किया था।

"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

अहल्या की कथा - बालकाण्ड (13)

एक दिन गौतम ऋषि की अनुपस्थिति में इन्द्र ने गौतम के वेश में आकर अहल्या से प्रणय-याचना की। यद्यपि अहल्या ने इन्द्र को पहचान लिया था तो भी यह सोचकर कि मैं इतनी सौन्दर्यशाली हूँ कि देवराज इन्द्र स्वयं मुझ से प्रणय-याचना कर रहे हैं, अपनी स्वीकृति दे दी।
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