Wednesday, October 28, 2009

मृत्यु निकट अनुभव

मृत्यु निकट अनुभव उन व्यक्तियों के अनुभवों का संग्रह तथा अध्ययन है जो कि मृत्यु के अत्यन्त समीप से गुजर चुके होते हैं (जैसे कि हृदयाघात से बच जाने वाले लोग, दुर्घटना में मौत के पास पहुँच जाने के बाद भी जीवित रह जाने वाले लोग आदि)। अध्ययन से ज्ञात होता है कि ऐसे लोगों को विभिन्न प्रकार के अनुभव होते हैं जैसे कि स्वयं को अपने ही शरीर से बाहर होते देखना, चरम भय, चरम शांति, अत्यन्त सुरक्षित महसूस करना, भयानक गर्मी का अनुभव, देवताओं की उपस्थिति, अलौकिक प्रकाश का दर्शन आदि।

मृत्यु निकट अनुभव परामनोविज्ञान से सम्बन्धित विषय है और इस विषय में संसार भर में अनेकों शोध कार्यों किये जा रहे हैं।

  • कुछ संस्कृतियाँ और व्यक्ति मृत्यु निकट अनुभव को अपसामान्य घटना और मृत्यु पश्चात् असाधारण तथा आध्यात्मिक झलक के रूप में देखते हैं।
  • चूँकि इस प्रकार के प्रकरणों का वर्णन आमतौर से ऐसे व्यक्ति करते हैं जो कि मौत के बहुत करीब पहुँच कर वापस आये होते हैं, इसलिये इन्हें मृत्यु निकट अनुभव का नाम दिया गया है।
  • श्री रेमंड मूडी के द्वारा सन् 1975 में लिखी गई पुस्तक "Life After Death" ने "मृत्यु निकट अनुभव" के प्रति आम लोगों की जिज्ञासा एव रुचि को बढ़ा दिया। इस विषय की लोकप्रियता को देखते हुये श्री मूडी ने सन् 1978 में International Association for Near-Death Studies (IANDS) नामक संस्था की स्थापना की।
  • गेलुप पोल (Gallup poll) के अनुसार लगभग अस्सी लाख अमेरिकनों ने "मृत्यु निकट अनुभव" करने का दावा किया है।
  • कुछ प्रकरणों में व्यक्तियों के मृत्यु निकट अनुभव उनके विश्वास के अनुसार बदले हुये पाये गये हैं अर्थात् व्यक्ति का जैसा विश्वास था वैसा ही उसने मृत्यु निकट अनुभव किया।
अधिकतर व्यक्तियों के मृत्यु निकट अनुभव निम्न क्रम में पाये गये हैं।

1. एक अत्यन्त अप्रिय ध्वनि/शोर सुनाई पड़ना (संदर्भः लाइफ आफ्टर डेथ)।

2. स्वयं के मरे हुये होने का ज्ञान।

3. सुखद भावनाओं, शांति और स्थिरता का अनुभव।

4. शरीर से बाहर होकर हवा में तैरते हुये आसपास के क्षेत्र को देखने का अनुभव।

5. नीले सुरंग, जिसके अंत में चमकदार प्रकाश या कोई उपवन हो, में तैरते हुये जाने का अनुभव।

6. मरे हुये लोगों या आध्यात्मिक चरित्रों से मुलाकात।

7. अलौकिक प्रकाश दिखाई पड़ना(प्रायः समझा जाता है कि वह प्रकाश उस देवता का रूप होता है जिस पर व्यक्ति का अटूट विश्वास होता है)।

8. स्वयं के जीवन-काल का पुनरीक्षण अर्थात् जीवन में घटित घटनाओं का चलचित्र के समान दिखाई पड़ना।

9. एक आखरी सीमा में पहुँच जाना (Reaching a border or boundary)।

10. अपने स्वयं के शरीर में फिर से, प्रायः अनिच्छापूर्वक, पहुँचा हुआ महसूस करना।

11. निर्वस्त्र होने पर भी उष्णता (गर्मी) महसूस करना।

Rasch model-validated NDE मापदंड के अनुसार मृत्यु निकट अनुभव का केन्द्र शांति, आनन्द और एकलयता, जिनमें गूढ़ तथा रहस्यमय आध्यात्मिक अनुभव निहित होते हैं, से घिरा रहता है।

मृत्यु निकट अनुभव के प्रति आम लोगों की रुचि को मूलतः एलिसाबेथ कुबलेर रोस (Elisabeth Kübler-Ross), जार्ज रिचे (George Ritchie), पी.एम.एच एटवाटर (P.M.H. Atwater) के शोध कार्यों और रेमण्ड मूडी की पुस्तक "लाइफ आफ्टर डेथ" ने उकसाया। परिणामस्वरूप मृत्यु निकट अनुभव के क्षेत्र में अध्ययन एवं शोधकार्यों के लिये सन् 1978 में "इंटरनेशनल एसोसियेशन फॉर नियर डेथ स्टडीज" नामक संस्था की स्थापना हुई।

चलते-चलते

एक राजनीतिबाज की मृत्यु हो गई। यमदूत उसकी आत्मा को यमराज के पास ले गए। यमराज ने चित्रगुप्त से उसके कर्मों का लेखा-जोखा पूछा। चित्रगुप्त ने बताया कि इसके कर्मों में मात्र तीन सुकर्म हैं और शेष कुकर्म।

यमराज ने राजनीतिबाज से कहा, "कुकर्मों की सजा तो तुम्हें मिलेगी ही पर तुम्हारे द्वारा किए गए तीन सुकर्मों के बदले तुम तीन चीजें माँग सकते हो, माँगो क्या माँगते हो?"

मृतात्मा ने कहा, "मैं कुछ माँगू उससे पहले यह बताओ कि बाद में कहीं मुकर तो नहीं जाओगे?"

यमराज ने आश्वस्त उसे कर दिया कि उसकी तीन माँगे अवश्य ही पूरी की जायेंगी।

मृतात्मा ने कहा, "तो यमराज, मेरी पहली माँग ये है कि सबसे पहले तो ये जो तुम्हारे पास जो तुम्हारी सवारी याने कि भैंसा बैठा है उसके दो सींगों को एक कर दो।"

यमराज ने भैंसे के सींगों को जोड़ कर एक बना दिया।

मृतात्मा फिर बोला, "मेरी दूसरी माँग है कि अब सींग को अपने मुँह में डाल लो।"

यमराज घबराया, पर कर ही क्या सकता था? उसने भैंसे के सींग को अपने मुँह में डाल लिया।

अब मृतात्मा ने कहा, "यमराज! अब यदि तुमने मेरे सारे कुकर्मों सुकर्म में नहीं बदला तो मैं माँगूंगा कि सींग फिर से दो हो जाए।"

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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

भीलराज गुह - अयोध्याकाण्ड (13)

13 टिप्पणियाँ:

sada said...

बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रोचक ...चलते चलते बेहतरीन है

पी.सी.गोदियाल said...

पहले तो जानकारी पूर्ण लेख के लिए शुक्रिया
और अब यह भी बताने का कष्ट करे कि महाशय कभी लालू-राबडी के मत्रीमंडल में भी रहे थे क्या? हा-हा-हा

Mohammed Umar Kairanvi said...

मृत्‍यु के समीप से गुजरने वालों की बातें पढते पढते जो हम पर गम सवार होता है, उस को चलते चलते में आपने ऐसा भगाया है कि यह कमाल केवल आप ही कर सकते थे, आज चलते चलते अधिक उपयुक्‍त है, बधाई

Murari Pareek said...

बहुत सुन्दर बात बताई मृत्यु के बाद क्या?? दरअसल मुझे लगता है की मनुष्य जब मरता है या मरने लगता है तो वो पहले बहुत घबराता है अचानक शरीर छुट जता है, और सूक्षम शरीर में आत्मा रहती है जो की अपने ही मृत देह को देखती है ! और बहुत चीखती चिल्लाती है पर ओर्गंस जो की सूक्षम होते हैं इसलिए ध्वनि नहीं निकलती है !! और सूक्षम शरीर को कोई देख नहीं पाता ! अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु समय सीमा से पहले होती है तो वो प्रेत योनी में रहता है ! जब उसका समय काल पूरा होता है तो पूर्व निर्धारित गर्भ में जाता है ! इसलिए कहा है : घबरा के लोग कहते हैं मर जायेंगे | मर के भी चैन न मिला तो किधर जायेंगे |
अगर किसी की आकस्मिक मृत्यु होती है तो जीतनी आयु उसकी लिखी हुई है वो प्रेत योनी में पूरी करनी पड़ती है !!

शिवम् मिश्रा said...

यमराज को एक राय, आगे से किसी भी राजनीतिबाज कुछ भी नहीं पूछने का............ सीधा नरक का रास्ता दिखाने का ...समझा क्या ??

अवधिया जी,
बेहद रोचक आलेख !

AlbelaKhatri.com said...

ये सींग कहाँ से लाये साहेब

बड़े खतरनाक हैं...

दया करो महाराज ....अगर यमराज ही नहीं रहेंगे तो हमारे भ्रष्ट नेताओं को उठाएगा कौन ?

राज भाटिय़ा said...

जी.के. अवधिया जी आप के यह दोनो अनुभव मुझे भी हुये है... बिलकुल सामने मोत खडी है... ओर उस समय आदमी बिलकुल शांत हो कर, सिर्फ़ दिमाग से उस स्थिति से बचने का उपाय ही ढुढता है... वरना उसे कुछ भी बताने का मोका नही मिलता.
दो बार ऎकसीडेण्ड मै बचा, उस समय सिर्फ़ दिमाग मै यही था कि यहां से बचना केसे है, ओर आने वाली स्थिति से सामाना करने की हिम्मत जुटाना.
दुसरा हृदयाघात से पहले आप को निर्यण करना है कि बचना है या मरना है बाकी कुछ नही होता
धन्यवाद
ओर चलते चलते बहुत सुंदर लगा

रंजना said...

मृत्यु का रहस्य इतना भयप्रद होते हुए भी इतना रोमांचक है की मुझे नहीं लगता कोई ऐसा होगा जो इसे न जानना चाहता होगा...सुन्दर लेख प्रस्तुत किया आपने...

"चलते चलते" ... तो लाजवाब है...हंसी रुक ही नहीं रही है पढ़कर...

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

मैने अपने मित्र को इस प्रकार का अपना अनुभव बताते सुना था और मैं कन्फ्यूज महसूस कर रहा था।

Mishra Pankaj said...

अवधिया जी,
बेहद रोचक आलेख !

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

सुन्दर और रोचक जानकारी ...

MD. SHAMIM said...

sir ji, chalte chalte ka kya kahna, maja aa gaya,

 
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