Tuesday, December 29, 2009

अब दादी मरेगी तब मजा आयेगा

कल रात घर पहुँचा तो पता चला कि पड़ोस के सेवानिवृत वृद्ध डॉक्टर साहब की श्रीमती जी का देहान्त हो गया था। उस समय तक वे लोग अग्नि संस्कार करके भी आ चुके थे। शोक के इस अवसर पर सारा कुनबा इकट्ठा हो गया था याने कि दोनों बेटे और बहुएँ तथा तीनों बेटियाँ और दामाद अपने अपने बच्चों के साथ वहाँ पर थे।

अब आजकल इस प्रकार से पूरा का पूरा कुनबा एक साथ सिर्फ किसी के मौत होने पर ही तो इकट्ठा होता है। दोनों बेटों और तीनों बेटियों के बच्चों को आपस में मिलने का अवसर ही कहाँ मिल पाता है। अब सभी मिले थे तो खूब हँस-खेल रहे थे। लग रहा था कि त्यौहार जैसा माहौल बन गया है। उन बच्चों को अपनी दादी या नानी की मृत्यु का शोक हो भी तो कैसे? दादी या नानी के साथ रहना कभी हुआ ही नहीं। संयुक्त परिवार टूटने और छोटे परिवार बनने का परिणाम साफ दिखाई पड़ रहा था।

मुझे तो ऐसा लगा मानों वे बच्चे सोच रहे हों कि आज नानी मरी है तो कितना मजा आ रहा है! अब जब दादी मरेगी तो मजा आयेगा!!
Post a Comment