Friday, January 1, 2010

कर दिया ना कबाड़ा इस नये साल ने ... हमारा तो हेडर ही गायब हो गया

नया साल आ गया! खुशी के साथ हम अपना ब्लॉग में गये किन्तु यह क्या? यहाँ तो हमारा हेडर ही गायब है। इस नये साल ने हमें हमारे ब्लॉग का हेडर गायब करके शायद कोई नये प्रकार का गिफ्ट दिया है। चलिये कोई बात नहीं, हम समझते हैं कि ब्लोगर में शायद कुछ परेशानी आ गई होगी जिसे गूगल वाले जल्दी ही ठीक कर लेंगे और हमारा हेडर फिर से वापस आ जायेगा।

अब नये साल से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न

नया साल तुम क्या लाये हो?
विश्व-शान्ति है क्या तुममें?
या उर में विस्फोट छियाये हो?

ये प्रश्न मैं नहीं कर रहा बल्कि उन्तीस साल पहले 01-01-1981 के दिन मेरे पिता स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया ने नये साल से ये प्रश्न किये थे अपनी कविता "नया साल तुम क्या लाये हो?" में। ये प्रश्न आज भी अपनी जगह पर खड़े हैं।

प्रस्तुत है वही कविताः

नया साल तुम क्या लाये हो?
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

नया साल तुम क्या लाये हो?
विश्व-शान्ति है क्या तुममें?
या उर में विस्फोट छियाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?

उल्लास नया है,
आभास नया है,
पर थोड़े दिन के ही खातिर,
फिर तो दिन और रात बनेंगे
बदमाशी में शातिर
वर्तमान में तुम भाये हो,
नया साल तुम क्या लाये हो?

असुर न देव बनेंगे,
जो जो हैं वे वही रहेंगे,
शोषण कभी न पोषण बनेगा
रक्त पियेगा बर्बर मानव
जो चलता था वही चलेगा।
फिर क्यों जग को भरमाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?

पिछला वर्ष गया है,
आया समय नया है।
क्या भीषण आघातों से
मानवता का किला ढहेगा?
बोलो, तुम क्यों सकुचाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?

(रचना तिथिः 01-01-1981)


चलते-चलते

एक और प्रस्तुति:

नया साल है
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

नया साल है-
लेकिन कौन खुशहाल है?
जो पहले चलता था
वही अब भी बहाल है।

नये वर्ष में-
क्या स्वभाव बदल जायेगा?
जो बदरंग रंग जमा था अब तक,
वही रंग फिर रंग लायेगा।
दुनिया पशुता का कमाल है
नया साल है।

वर्ष आते और जाते रहते हैं,
साथ में खुशियाँ और गम लाते रहते हैं,
सच तो यह है कि-
काल का चक्र एक-सा चलता है,
वर्ष नहीं बदलते पर
भावना का संसार बदलता है
और संसार एक जंजाल है,
नया साल है।

कल्याण का संकल्प दृढ़ है तो,
अवश्य ही नया साल है,
अन्यथा न नूतन है न पुरातन है वरन्
सृष्टि में निरन्तर महाकाल है,
नया साल है।

(रचना तिथिः 01-01-1982)
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