Sunday, May 30, 2010

अपने ब्लोग का प्रचार अवश्य कीजिये किन्तु इस तरह से नहीं ...

आप एक पोस्ट लिखते हैं और उसमें एक टिप्पणी भी आ जाती है कुछ इस तरह सेः

"मेरे फलाँ ब्लोग में आकर कृपया अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें।"

याने कि आपने अपने पोस्ट में क्या लिखा है, क्यों लिखा है, सही लिखा है या गलत लिखा है इन बातों से टिप्पणी करने वाले को कुछ भी मतलब नहीं है, मतलब है तो सिर्फ अपने ब्लोग के प्रचार से।
आप अपना ईमेल खोलते हैं कई ईमेल आपको सिर्फ यह सूचना देते हुए मिलते हैं कि मेरे ब्लोग में नया पोस्ट आ चुका है।

ऐसी बातों की कैसी प्रतिक्रिया होती है आप पर? क्या ये अच्छा लगता है आपको? या दिमाग भन्ना जाता है?

हमारा मानना तो यह है कि यदि किसी ने प्रभावशाली एवं पठनीय पोस्ट लिखा है तो पढ़ने वाले तो आयेंगे ही! ऐसा कैसे हो सकता है कि गुड़ हो और मक्खियाँ ना आयें?

पर हम प्रचार को भी गलत नहीं समझते। आखिर बाजारवाद का जमाना है आजकल। विज्ञापन, सेल्समेनशिप आदि लोगों को लुभाने के समस्त तरीके बिल्कुल जायज हैं। आपका पोस्ट आपका उत्पाद है और अपने उत्पाद को बेचने के लिये एक अच्छा विक्रेता (सेल्समेन) बनना जरूरी है।

एक सफल विक्रेता (सेल्समेन) के पास विक्रयकला (सेल्समेनशिप) का होना निहायत जरूरी है। आज ही नहीं बल्कि सदियों से विक्रयकला का चलन चलता ही चला आ रहा है। लगभग सौ साल पहले लिखी गई पुस्तक "भूतनाथ" में 'खत्री' जी ने उस जमाने के विज्ञापन और विक्रयकला को कुछ इस प्रकार से पेश किया हैः

(विज्ञापन की बानगी)

इस जमींदार सूरत वाले आदमी की निगाह चौक की एक बहुत बड़ी दूकान पर पड़ी जिसके ऊपर लटकते हुए तख्ते पर बड़े हरफों में यह लिखा हुआ था -

"यहाँ पर ऐयारी का सभी सामान मिलता है, ऐयारी सिखाई जाती है, और ऐयारों को रोजगार भी दिलाया जाता है। आइये दूकान की सैर कीजिये - "
(विक्रयकला सेल्समेनशिप की बानगी)
कुछ देर देखने के बाद वह आदमी दूकान के अन्दर चला गया और वहाँ की चीजों को बड़े गौर से देखने लगा। एक आदमी जो शायद सौदा बेचने के लिये मुकर्रर था उसके सामने आया और बड़ी लनतरानी के साथ तारीफ करता हुआ तरह-तरह की चीजें दिखाने लगा जो कि शीशे की सुन्दर आलमारियों में करीने से सजाई हुई थीं, दूकानदार ने कहा, "देखिये, तरह-तरह की दाढ़ी और मूँछें तैयार हैं, बीस से लेकर सौ वर्ष का आदमी बनना चाहे तो बन सकता है। जो पूरी तौर पर ऐयारी नहीं जनते, बनावटी दाढ़ी-मूछें तैयार करने का जिन्हें इल्म नहीं  वे इन दाढ़ी-मूछों को बड़ी आसानी से लगा कर लोगों को धोखे में डाल सकते हैं, मगर जो काबिल ऐयार हैं और मनमानी सूरत बनाया करते हैं अथवा जो किसी की नकल उतारने में उस्ताद हैं उनके लिये तरह-तरह के खुले हु बाल अलग रक्खे हुए हैं। (लकड़ी के डिब्बों को खोलकर दिखाते हुए) इन सुफेद और स्याह बालों से वे अपनी मनमानी सूरतें बना सकते हैं, देखिये बारीक, मोटे, सादे और घुँघराले वगैरह सभी तरह के बाल मौजूद हैं, इसके अलावा यह देखिये (दूसरी आलमारी की तरफ इशारा करके) तरह-तरह की टोपियाँ जो कि पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्खिन के मुल्कों वाले पहिरा करते हैं तैयार है और इसी तरह हर एक मुल्क की पोशाकें इधर-उधर खूँटियों पर देखिये तैयार लटक रही हैं। साफे, पगड़ियों और मुड़ासों की भी कमी नहीं है, बस सर पर रख लेने की देर है। आइये इधर दूसरे कमरे में देखिये ये तरह-तरह के बटुए लटक रहे हैं जिनमें रखने के लिये हर एक तरह का सामान भी इस दूकान में मौजूद रहता है। (तीसरे कमरे में जाकर) इन छोटे-बड़े हल्के-भारी सभी तरह के कमन्द और हर्बों की सैर कीजिये जिनकी प्रायः सभी ऐयारों को जरूरत पड़ती है। ....."
तो बन्धु, आप भी अपने पोस्ट का प्रचार अवश्य कीजिये किन्तु इस तरह से नहीं कि आपके प्रचार का उलटा ही प्रभाव पड़े।

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