Wednesday, June 30, 2010

हम सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं या सुविधाओं का दास बन चुके हैं?

घर से निकलने के कुछ देर बाद रास्ते में अचानक याद आया कि मैं अपना मोबाइल घर में ही भूल आया हूँ। एक बार सोचा कि चलो आज बगैर मोबाइल के ही काम चला लें किन्तु रह-रह कर जी छटपटाने लगा। घर से बहुत दूर तो नहीं पहुँचा था पर एकदम नजदीक भी नहीं था इसलिये घर वापस जाकर मोबाइल लाने की इच्छा नहीं हो रही थी पर मेरी छटपटाहट ने मुझे घर वापस जाकर मोबाइल लाने के लिये मुझे विवश कर दिया।

मैं सोचने लग गया कि यदि आज मेरे पास मोबाइल नहीं भी रहता तो सिर पर कौन सा पहाड़ टूट जाता? मोबाइल पर जिनसे भी और जो कुछ भी मेरी बात होती है वे कितनी आवश्यक होती हैं? क्या ललित शर्मा जी, राजकुमार सोनी जी, अजय सक्सेना जी आदि से मोबाइल में उनके पोस्ट और टिप्पणियों के बारें में बात करना बहुत ही जरूरी है? क्या एक दिन मोबाइल से अपनी पसंद के गाने सुने बिना रहा ही नहीं जा सकता?

मोबाइल एक सुविधा है जिसका उपभोग आवश्यकता के समय करना अवश्य ही उचित है किन्तु लोगों से घंटों अनावश्यक बातें करते रहने का क्या औचित्य है? ऐसा करना क्या अपने समय और धन की बरबादी नहीं है?

मोबाइल पास में न रहने से जो छटपटाहट होती है क्या वह यह सिद्ध नहीं करती कि हम पूर्ण रूप से मोबाइल के दास बन चुके हैं?

Tuesday, June 29, 2010

पुराणों में श्लोक संख्या

सुखसागर ग्रन्थ के अनुसारः

(1) ब्रह्मपुराण में श्लोकों की संख्या दस हजार हैं।

(2) पद्मपुराण में श्लोकों की संख्या पचपन हजार हैं।

(3) विष्णुपुराण में श्लोकों की संख्या तेइस हजार हैं।

(4) शिवपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं।

(5) श्रीमद्भावतपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं।

(6) नारदपुराण में श्लोकों की संख्या पच्चीस हजार हैं।

(7) मार्कण्डेयपुराण में श्लोकों की संख्या नौ हजार हैं।

(8) अग्निपुराण में श्लोकों की संख्या पन्द्रह हजार हैं।

(9) भविष्यपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार पाँच सौ हैं।

(10) ब्रह्मवैवर्तपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं।

(11) लिंगपुराण में श्लोकों की संख्या ग्यारह हजार हैं।

(12) वाराहपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं।

(13) स्कन्धपुराण में श्लोकों की संख्या इक्यासी हजार एक सौ हैं।

(14) वामनपुराण में श्लोकों की संख्या दस हजार हैं।

(15) कूर्मपुराण में श्लोकों की संख्या सत्रह हजार हैं।

(16) मत्सयपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार हैं।

(17) गरुड़पुराण में श्लोकों की संख्या उन्नीस हजार हैं।

(18) ब्रह्माण्डपुराण में श्लोकों की संख्या बारह हजार हैं।

Monday, June 28, 2010

बड़ा ब्लोगर छोटा ब्लोगर

लिख्खाड़ानन्द ने अपना पोस्ट प्रकाशित किया! पोस्ट को प्रकाशित करने के तत्काल बाद ही सौ मित्रों तथा परिचितों को मोबाइल, ईमेल और चैट मेसेन्जर के माध्यम से सूचना दी कि मेरी पोस्ट प्रकाशित हो गई है। अगले चौबीस घंटों के भीतर लगभग चालीस लोग पोस्ट पर पहुँचे और प्रायः सभी ने टिप्पणी भी की। एक से बढ़कर एक टिप्पणियाँ आईं जिनमें से कुछ का जायजा आप भी लें:
  • शुभकामनाएँ
  • बधाई
  • बधाई स्वीकारे
  • बहुत-बहुत बधाईयाँ
  • शुक्रिया!
  • अच्छा आलेख
  • अनोखी पोस्ट
  • अच्छी रचना
  • बहुत ही सटीक रचना
  • इस रचना के लिये आभार
  • सही लिखा है
  • बढिया लिखा है आपने
  • मजा आ गया पढ़ कर।
  • अंग्रेजी शब्दों का हिन्दीकरण करने का आपका प्रयोग अत्यन्त सराहनीय है!
  • बहुत सुंदर
  • सत्य वचन!
  • nice
  • आपके विचारो से सहमत हूँ
  • टिप्पण्यानन्द जी की टिप्पणी से सहमत
  • आपकी लेखनी तो कमाल करती ही है
  • आपकी लेखनी के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाना है
अनामानन्द ने अपना पोस्ट प्रकाशित किया। पोस्ट को प्रकाशित करने के बाद अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो गये। अगले चौबीस घंटों के भीतर लगभग चार सौ लोग पोस्ट पर पहुँचे पर किसी ने भी टिप्पणी नहीं की, बस पोस्ट को पढ़कर चुपचाप वापस चले गये।

लिख्खाड़ानन्द का पोस्ट संकलकों के हॉटलिस्ट में सबसे ऊपर था! अनामानन्द के पोस्ट का हॉटलिस्ट में कहीं अता-पता भी नहीं था।

लिख्खाड़ानन्द हो गये बड़े ब्लोगर और अनामानन्द बन गये छोटे ब्लोगर!!!

Sunday, June 27, 2010

कभी भारत का नक्शा ऐसा हुआ करता था


(चित्र ब्लोग.लुकइंडिया से साभार)

चलते-चलते

देश दो करेंसी एक

यद्यपि पाकिस्तान को 14th अगस्त, 1947 के दिन, अर्थात् भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पूर्व, स्वतंत्रता प्राप्त हुई किन्तु करेंसी के मामले में उसे 30 September, 1948 तक भारत पर ही निर्भर रहना पड़ा था क्योंकि उस दौरान दोनों देशों के मुद्रा प्रबंधन का पूरा भार भारतीय रिजर्व बैंक पर ही था। देखें सन् 1947 के एक रुपये का चित्र जिसमें, Government of India के साथ ही साथ बायीं ओर, Government of Pakistan भी मुद्रित है।

Saturday, June 26, 2010

इंटरनेट और भारत

इंटरनेट के आविर्भाव ने सम्पूर्ण विश्व में एक नई क्रान्ति उत्पन्न कर दी है। आज हम अपने घर में बैठकर ही अनेकों आवश्यक कार्यों को इंटरनेट की सहायता से निबटा सकते हैं। इंटरनेट ने “वसुधैव कुटुंबकम्” की धारणा को सत्य में परिणित कर दिखाया है। आप किसी भी समय किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति से सम्पर्क कर सकते हैं। ईमेल अथवा एसएमएस के द्वारा कहीं पर भी तत्काल संदेश भेजा जा सकता है।

विकसित देशों में इंटरनेट का प्रयोग एक लम्बे समय से किया जा रहा है। अधिकांश कार्यालयीन तथा निजी कार्य कम्प्यूटर तथा इंटरनेट के द्वारा ही किये जा रहे हैं। यहाँ तक कि नाश्ता, खाना तक भी आनलाइन रेस्टॉरेंटों से मंगवाये जा सकते हैं। बस किसी  आनलाइन रेस्टॉरेंट के वेबसाइट को अपने कम्प्यूटर में खोलिये और मीनू में मनपसंद वस्तुओं को क्लिक कर दीजिये। क्रेडिट कार्ड से भुगतान भी हो जायेगा और कुछ समय में ही आपका नाश्ता या खाना आपके कार्यालय या घर में पहुँचा दिया जायेगा।

किन्तु भारत में पहले उपयुक्त सुविधाओं के अभाव के कारण इंटरनेट का प्रयोग सीमित था। विगत कुछ वर्षों में भारत में भी आधुनिक सुविधाओं का बड़ी तेजी के साथ विकास हुआ है और हम भी अब विकसित देशों की दौड़ में सम्मिलित हो चुके है। एक दो साल पहले इंटरनेट के प्रयोग के मामले में भारत का कोई स्थान नही था पर आज विश्व भर के इंटरनेट यूजर्स के मामले में अब भारत का स्थान चौथा हो गया है। भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या 8,81,00,000 (88.1 मिलियन) है।

टॉप 10 दस देशों की लिस्ट इस प्रकार है:
  • यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका 220 मिलियन यूजर्स
  • चीन 210 मिलियन यूजर्स
  • जापान 88.1 मिलियन यूजर्स
  • भारत 81 मिलियन यूजर्स
  • ब्राजील 53 मिलियन यूजर्स
  • यूनाइटेड किंगडम 40.2 मिलियन यूजर्स
  • जर्मनी 39.1 मिलियन यूजर्स
  • कोरिया 35.5 मिलियन यूजर्स
  • इटली 32 मिलियन यूजर्स
  • फ्रांस 31.5 मिलियन यूजर्स
यद्यपि लगता है कि 88.1 मिलियन एक बहुत बड़ी संख्या है पर देखा जाये तो भारत के 300 मिलियन कर्मचारियों की तुलना में भारत में इंटरनेट यूजर्स की तादात अभी बहुत कम है। लगता है कि भारत में अभी भी इंटरनेट सुविधा की कीमत अपेक्षाकृत ज्यादा है और इसी कारण से अधिकतर लोग अपने आफिस से या फिर साइबर कैफे से ही इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। पर यह तय है कि निकट भविष्य में इस संख्या में इजाफा ही होना है। यदि जल्दी ही भारत का स्थान चौथे से पहले या कम से कम दूसरे में आ जाये तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

Friday, June 25, 2010

भारतीय रेल्वे की आनलाइन सुविधाएँ

वे दिन लद गये जब कि रेल्वे में आरक्षण करवाने के लिये घंटो लाइन में लगे रहना पड़ता था या फिर वेटिंग लिस्ट कन्फर्म हुआ या नहीं जानने के लिये रेल्वे स्टेशन तक चक्कर लगाना पड़ता था। भारत में इंटरनेट के विकास के साथ ही भारतीय रेल्वे ने अपनी समस्त सुविधाओं को इन्टरनेट से जोड़ दिया है। रेल्वे ने आनलाइन आरक्षण की सुविधा दे रखी है और अब आप अपने घर में बैठे बैठे ही अपना आरक्षण करवा सकते हैं तथा रेल्वे के साइट में जाकर देख सकते हैं कि आपका वेटिंग लिस्ट कन्फर्म हो चुका है या नहीं।

किन्तु हमारे देश के आम लोगों में अभी भी जानकारी का अभाव है और वे रेल्वे बुकिंग एजेंट्स के द्वारा ठगे जा कर उन्हें अधिक रुपये दे देते हैं। इस ब्लोग का उद्देश्य है इंटरनेट में उपलब्ध समस्त आनलाइन सुविधाओं के विषय में लोगों को अवगत कराना।

रेल्वे की आनलाइन बुकिंग दो वेबसाइट्स से होती हैं पहला आईआरसीटीसी (इंडियन रेल्वे कैटरिंग एण्ड टूरिज्म कार्पोरेशन) और दूसरा क्लीयरट्रिप डॉट कॉम। इनमें से पहला तो सरकारी साइट है और दूसरा निजी ट्रैव्हल एजेंसी है। क्लीयरट्रिप को रेल्वे बुकिंग की सुविधा अभी कुछ ही दिनों पहले दी गई है, पहले सिर्फ सरकारी साइट में ही यह सुविधा उपलब्ध थी।

आनलाइन रेल्वे बुकिंग दो प्रकार के होते हैं पहला आई-टिकिट और दूसरा ई-टिकिट। आई टिकिट बुकिंग कराने पर आपको कन्फर्म तथा वेटिंग लिस्ट दोनों ही प्रकार के टिकिट मिल सकते हैं किन्तु बुकिंग के बाद रेल्वे टिकिट को कोरियर सर्विस के द्वारा आपके बताये गये पते में भेजती है अर्थात टिकिट पाने के लिये आपको कुछ दिनों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। ई टिकिट बुकिंग में सिर्फ कन्फर्म या आरएसी टिकिट ही मिलते हैं और उन टिकिट को आप अपने कम्प्यूटर के प्रिंटर से स्वयं प्रिंट करते हैं, रेल्वे आपको टिकिट नहीं भेजती। सरकारी साइट अर्थात आईआरसीटीसी में दोनों ही प्रकार की बुकिंग उपलब्ध है किन्तु क्लीयरट्रिप में केवल दूसरे प्रकार की अर्थात ई टिकिट बुकिंग की सुविधा ही मिलती है। मतलब यह है कि यदि आप क्लीयरट्रिप से अपना आरक्षण करवाते हैं तो आपको कन्फर्म या आरएसी टिकिट ही मिलेगी।

तो यदि पहले आप नहीं जानते थे तो अब जान लीजिये कि रेल्वे टिकिट बुकिंग कराने के लिये आपको किसी स्थानीय एजेंट के पास नहीं जाना है बल्कि आईआरसीटीसी या क्लीयरट्रिप में से किसी एक साइट को अपने कम्प्यूटर में खोलना है और घर बैठे ही अपना टिकिट तथा आरक्षण प्राप्त कर लेना है।

Thursday, June 24, 2010

भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ता

क्या आपको जानते हैं कि वर्तमान में कितने भारतीय इंटरनेट का प्रयोग करते हैं? आईटीयू (ITU), जो कि संयुक्त राष्ट्र United Nations की सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के मुद्दों पर जानकारी एकत्रित करने वाली संस्था है, द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार सन् 2010 में भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या 8,10,00,000 (आठ करोड़ दस लाख) और ब्रॉडबैंड प्रयोग करने वालों की संख्या 52,80,000 (बावन लाख अस्सी हजार) है।


निम्न सारिणी दर्शाती है कि भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की संख्या किस सन् में कितनी रही हैः


वर्ष
प्रयोगकर्ता
जनसंख्या
%
जानकारी स्रोत
1998
14,00,000
1,09,48,70,677
0.1%
आईटीयू (ITU)
1999
28,00,000
1,09,48,70,677
0.3%
आईटीयू (ITU)
2000
55.00,000
1,09,48,70,677
0.5%
आईटीयू (ITU)
2001
70,00,000
1,09,48,70,677
0.7%
आईटीयू (ITU)
2002
1,65.00,000
1,09,48,70,677
1.6%
आईटीयू (ITU)
2003
2,25,00,000
1,09,48,70,677
2.1%
आईटीयू (ITU)
2004
3,92,00,000
1,09,48,70,677
3.6%
2005
5,06,00,000
1,11,22,25,812
4.5%
C.I. Almanac
2006
4,00,00,000
1,11,22,25,812
3.6%
2007
4,20,00,000
1,12,96,67,528
3.7%

2009
8,10,00,000
1,15,68,97,766
7.0%
आईटीयू (ITU)
2010
8,10,00,000
1,17,31,08,018
6.9%
आईटीयू (ITU)

(सारिणी http://www.internetworldstats.com/asia/in.htm के सौजन्य से)

Wednesday, June 23, 2010

बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया

ऐसा नहीं है कि संसार में रुपया ही सबसे बड़ा है, रुपये से बढ़ कर एक से एक मूल्यवान वस्तुएँ हैं जैसे कि विद्या, शिक्षा, ज्ञान, योग्यता आदि, किन्तु कठिनाई यह है कि, आज के जमाने में, वे वस्तुएँ भी केवल रुपये अदा करके प्राप्त की जा सकती हैं। आज के जमाने में हर चीज बिकाऊ हैं, पानी तक तो बिकने लगा है फिर शिक्षा और चिकित्सा की बात ही क्या है।

यदि आपके पास रुपया नहीं है तो क्या आप अपने औलाद को, उच्च शिक्षा तो दूर, साधारण शिक्षा ही दिलवा सकते हैं? हमारे समय तो लोग के.जी., पी.पी. आदि क्या होता है नहीं जानते थे और न ही म्युनिसिपालटी के स्कूलों अलावा अन्य खर्चीले प्रायवेट स्कूल हुआ करते थे। पिताजी हमें म्युनिसिपालटी के स्कूल में ले गये थे जहाँ हमें अपने सीधे हाथ को सिर पर से घुमा कर उलटे कान को छूने के लिये कहा गया (ऐसा माना जाता था कि छः वर्ष की उम्र हो जाने पर हाथों की लंबाई इतनी हो जाती है कि हाथ को सिर पर से घुमाते हुये दूसरी ओर के कान को छूआ जा सकता है, छः वर्ष से कम उम्र में नहीं) और हम भर्ती हो गये थे पहली कक्षा में। कपड़े की एक थैली में एक बाल-भारती पुस्तिका और स्लेट पेंसिल, यही था हमारा बस्ता। आज यदि आप किसी तरह से अपने बच्चे को किसी स्कूल में भर्ती करा भी लें तो उसके बस्ते का खर्च उठाते उठाते ही बेदम हो जायेंगे और बच्चा उसका बोझ उठाते उठाते।

उन दिनों प्रायमरी स्कूल में पढ़ने के लिये कोई फीस नहीं पटानी पड़ती थी। मिडिल स्कूल के लिये चार या छः आना और हाई स्कूल के लिये भी आठ आना जैसा मामूली सा फीस पटाना होता था। चिकित्सा के लिये बड़े बड़े अस्पताल न हो कर गिनी-चुनी डिस्पेंसरियाँ ही थीं किन्तु उनके मालिक डॉक्टर की फीस नियत नहीं थी, जहाँ पैसे वालों से अधिक फीस ले लेते थे वहीं गरीबों का मुफ्त इलाज भी कर दिया करते थे। आज आप गरीब हैं या अमीर, इससे डॉक्टर को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी नियत फीस आपको देना ही होगा।

सोचता हूँ कि पचास सालों में जमाना कहां से कहाँ पहुँच गया। सब कुछ बदल चुका है। अधिक वय के लोगों को अतीत की यादें बहुत प्रिय होती हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ इसीलिये आज मेरे विचार भी अतीत में भटकने लग गये थे।

पुराने लोगों को सदैव ही अतीत अच्छा और वर्तमान बहुत बुरा प्रतीत होते रहा है और नये लोगों को पुराने लोग पुराने लोग दकियानूस। खैर यह मानव प्रकृति है। किन्तु कम से कम शिक्षा और चिकित्सा को तो बिकने से रोकना ही होगा, इन पर सभी का समान अधिकार होना चाहिये चाहे वह अमीर हो या गरीब।

Tuesday, June 22, 2010

बंद होना ब्लोगवाणी का और खुश तथा मायूस होना अलग-अलग लोगों का

"सीता की दुविधा ....." पोस्ट पर ब्लोगवाणी का अटके रहने का आज चौथा दिन है। पहले दिन तो हमने यही अनुमान लगाया कि शायद ब्लोगवाणी का रख-रखाव होने के कारण ऐसा है। फिर जब दूसरे दिन भी हालत नहीं बदली तो सोचने लगे कि ब्लोगवाणी किसी जटिल तकनीकी समस्या से जूझ रही होगी। तीसरे दिन आभास होने लगा कि ब्लोगवाणी बंद हो चुकी है। हमें आशा थी कि ब्लोगवाणी की ओर से ब्लोगवाणी के बंद होने का कारण दर्शाते हुए कुछ न कुछ वक्तव्य अवश्य आयेगा पर हमारी इस आशा पर अभी तक तो तुषारापात ही हुआ है।

ब्लोगवाणी क्यों बंद हुई यह तो ब्लोगवाणी वाले ही जानें पर हमें तो यही लगता है कि किसी कारण से उनकी भावनाओं पर आघात लग जाना ही इसका कारण हो सकता है। आलोचनाएँ तो सेवाव्रत धारण करने वालों को ही सहनी पड़ती है और उन्हें काँटों का ताज भी पहनना पड़ता है। अच्छे कार्य करने वालों को प्रायः प्रशंसा कम और आलोचना ही अधिक मिला करती हैं। हमारे छत्तीसगढ़ी में कहावत है "खेलाय-कूदाय के नाव नहि अउ गिराय-पराय के नाव" अर्थात् "किसी बालक को खिलाने वाले की प्रशंसा नहीं होती पर उसी व्यक्ति से यदि बच्चे को जरा भी चोट लग जाये तो उसे बुरा-भला जरूर कहा जाता है"। अस्तु, हम समझते हैं कि ब्लोगवाणी ने लंबे अरसे तक हिन्दी ब्लोगजगत की निस्वार्थ भाव से सेवा की है और इसके लिये वह धन्यवाद की पात्र है।

किन्तु, चाहे कोई ब्लोगवाणी का प्रशंसक रहा हो या फिर आलोचक, ब्लोगवाणी को सहज ही भुला देना किसी के लिये भी आसान नहीं है इसीलिये कुछ लोग खुश होकर भी उसे नहीं भुला पा रहे हैं और कुछ लोग मायूस होकर भी। वो कहते हैं ना "मुश्किलें होती हैं आसान बहुत मुश्किल से!"

हमारे लिये तो ब्लोगवाणी का बंद होना एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ही है।

Monday, June 21, 2010

जरूरी थोड़े ही है कि हर कोई मुझे पढ़े

मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा ब्लोग है। अब जब लिखता हूँ तो मेरी अपेक्षा भी यही रहती है कि अधिक से अधिक लोग मुझे पढ़ें। पर क्या यह जरूरी है कि हर कोई मुझे पढ़े? मेरे विचार से तो यह बिल्कुल ही जरूरी नहीं है क्योंकि मैं लिखता हूँ अपनी रुचियों और विचारों के आधार पर; और दूसरों को पढ़ता भी हूँ अपनी उन्हीं रुचियों और विचारों को ध्यान में रखकर। राजनीति, क्रिकेट जैसे विषय आजकल के अत्यन्त लोकप्रिय विषय हैं किन्तु मुझमें इन विषयों के प्रति किंचित मात्र भी रुचि नहीं है अतः मैं इन विषयों पर लिखी गई सामग्री को चाहकर भी नहीं पढ़ पाता। इसी प्रकार से मेरे पोस्ट में जो कुछ भी लिखा जाता है उन पर प्रायः अतीत का प्रभाव और महत्व ही अधिक होता है। शायद मेरी आयु का अधिक हो जाना ही इसका कारण हो। यह स्वाभाविक बात है कि वृद्धजन प्रायः अतीत में ही जीते हैं। अस्तु, जो लोग वर्तमान में जीने के आदी हैं और जिनके लिये अतीत का कुछ विशेष महत्व ही नहीं है, वे भला मेरे पोस्ट को क्योंकर पढ़ सकेंगे?

अनेक विद्वानों ने ब्लोग की अलग-परिभाषाएँ दी हैं। हिन्दी ब्लोगजगत में जो कुछ भी चल रहा है उससे तो लगता है कि "तुम मुझे पढ़ो, मैं तुम्हें पढ़ूँ और तुम मुझे टिप्पणी दो, मैं तुम्हें टिप्पणी दूँ" ही ब्लोग की परिभाषा बन कर रह गई है। पर मेरी तुच्छ बुद्धि के अनुसार तो ब्लोग जानकारी के आदान-प्रदान का माध्यम है। मैं यही मानता हूँ कि अच्छी तथा ज्ञानवर्धक जानकारी से अवगत करा कर भाषा, समाज, देश और अधिक से अधिक लोगों का कल्याण करते हुए स्वयं का भी हित साध लेना ही ब्लोगिंग का उद्देश्य होना चाहिये।

मुझे इस बात का दुःख नहीं होता कि फलाँ ने मेरे पोस्ट को क्यों नहीं पढ़ा और अपनी टिप्पणी क्यों नहीं दी; बल्कि मुझे तो खुशी इस बात की होती है कि कुछ समय पहले मुझे केवल 40-50 लोग ही पढ़ते थे पर अब मेरे लिखे को लगभग 150 लोग पढ़ते हैं।

Sunday, June 20, 2010

पर ऐसे पोस्ट को पढ़ता ही कौन है?

प्रायः हिन्दी पर अंग्रेजी का अंकुश दिखाई ही देता रहता है। एक दीवार पर विज्ञापन में लिखा था "अंदर स्ट्रांग, चले सबसे लांग"। फिल्म का नाम रखा जाता है "जब वी मेट"। बच्चों को हिन्दी की गिनती नहीं आती, वे अक्सर पूछ बैठते हैं "चौंसठ याने कि सिक्स्टी फोर होता है ना?"

क्या 'मजबूत' के स्थान पर 'स्ट्रांग', 'लंबा' के स्थान पर 'लांग', 'हम मिले' के स्थान पर 'वी मेट' का प्रयोग करके ये दर्शाया जा रहा है कि हिन्दी के पास अपना शब्द भण्डार नहीं है? या फिर यह बता कर खुशी जाहिर की जा रही है कि भाषाई तौर पर हम मानसिक दिवालियेपन की चरम सीमा को भी पार कर चुके हैं?

हर जगह हिन्दी की अंग्रेजी के प्रति दासता ही दिखाई देती है। मीडिया, सिनेमा, शिक्षा वाले हिन्दी को गर्त में गहराई तक गिराने के लिये तुले हुए से लगते हैं। यह सब देखकर वितृष्णा सी भर आती है स्वयं के भीतर। पर किया ही क्या जा सकता है? सिर्फ एक पोस्ट लिखकर मन की भड़ास निकाल लेते हैं। पर ऐसे पोस्ट को पढ़ता ही कौन है?

चलते-चलते

राष्ट्रभाषा के उद्‍गार

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

मैं राष्ट्रभाषा हूँ -
इसी देश की राष्ट्रभाषा, भारत की राष्ट्रभाषा

संविधान-जनित, सीमित संविधान में,
अड़तिस वर्षों से रौंदी एक निराशा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।
तुलसी, सूर, कबीर, जायसी,
मीरा के भजनों की भाषा,
भारत की संस्कृति का स्पन्दन,
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

स्वाधीन देश की मैं परिभाषा-
पर पूछ रही हूँ जन जन से-
वर्तमान में किस हिन्दुस्तानी
की हूँ मैं अभिलाषा?
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

चले गये गौरांग देश से,
पर गौरांगी छोड़ गये
अंग्रेजी गौरांगी के चक्कर में,
भारत का मन मोड़ गये
मैं अंग्रेजी के शिविर की बन्दिनी
अपने ही घर में एक दुराशा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

मान लिया अंग्रेजी के शब्द अनेकों,
राष्ट्रव्यापी बन रुके हुये हैं,
पर क्या शब्दों से भाषा निर्मित होती है?
तब क्यों अंग्रेजी के प्रति हम झुके हये हैं?
ले लो अंग्रेजी के शब्दों को-
और मिला दो मुझमें,
पर वाक्य-विन्यास रखो हिन्दी का,
तो, वो राष्ट्र! आयेगा गौरव तुझमें।

'वी हायस्ट नेशनल फ्लैग एण्ड सिंग
नेशनल सांग के बदले
अगर बोलो और लिखो कि
हम नेशनल फ्लैग फहराते-
और नेशनल एन्थीम गाते हैं-
तो भी मै ही होउँगी-
नये रूप में भारत की राष्ट्रभाषा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

मैं हूँ राष्ट्रभाषा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

(रचना तिथिः गुरुवार 15-08-1985)

Saturday, June 19, 2010

क्या हुआ ब्लोगवाणी को?

कल सायं 03:19 के बाद से ब्लोगवाणी में हिन्दी ब्लोग्स के पोस्टों का अद्यतनीकरण (updation) नहीं हो रहा है। ब्लोगवाणी के प्रशंसक निराश हैं। हमने तो यही अनुमान लगाया था कि शायद ब्लोगवाणी का रख-रखाव (maintenance) हो रहा हो किन्तु रख-रखाव में इतना लंबा समय तो नहीं लगता। हमारे मित्रगण हमें मोबाइल लगा कर पूछ रहे हैं कि ब्लोगवाणी को क्या हुआ है। पर हम कुछ भी बताने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं क्योंकि इस विषय में हमें कुछ भी जानकारी नहीं है। जानकारी के अभाव में सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। अब हमें लग रहा है कि शायद ब्लोगवाणी का सर्व्हर बदला गया हो और उसके डेटा पुराने सर्व्हर से नये सर्व्हर में स्थानांतरित किये जा रहे हों। पर यह भी सिर्फ एक अनुमान ही है। वास्तविकता क्या है यह तो ब्लोगवाणी टीम ही बता पायेगी।

ब्लोगवाणी से चाहे हमें पसन्द मिले या नापसन्द, चाहे हम ब्लोगवाणी को कितना भी बुरा-भला कहें, किन्तु ब्लोगवाणी का महत्व ऐसे ही समय में स्पष्ट हो जाता है जब यह काम करना बंद कर देता है।

Friday, June 18, 2010

जबान संभाल के बड़े भाय ... बहुत मंहगा पड़ेगा हमसे उलझना

क्या चीज है यह जबान भी? कभी बड़े भाई जैसे अपनत्व भरे शब्द को वैमनस्य भरा शब्द बना देती है "जबान संभाल के बड़े भाय ... बहुत मंहगा पड़ेगा हमसे उलझना" के रूप में। तो कभी लल्लू जैसे मखौल उड़ाने के लिये प्रयोग किये जाने वाले शब्द को अत्यन्त प्यारा शब्द बना देती है "काय लल्लू! आज तो जँच रहे हो!!" के रूप में।

जबान याने कि जीभ ... इसे रसना की संज्ञा दी गई है क्योंकि यह सभी प्रकार के रस अर्थात् स्वाद का हमें अनुभव कराती है। ये रसना ना होती तो हम कभी भी न जान पाते कि खट्टा, मीठा, चरपरा, कसैला आदि क्या चीज होती है। आजकल बाजार पटा हुआ है दसहरी, लंगड़ा, सुंदरी, बैंगनपल्ली आदि आमों से; सड़कों के किनारे ठेले भरे हुए दिखाई पड़ते हैं इन आमों से। और इन सुस्वादु आमों के दर्शन हुए नहीं कि जीभ गीली होने लगती है लार से। लज्जतदार खाद्य वस्तुओं का निर्माण मात्र इस रसना की तृप्ति के लिये ही होती हैं। पेट तो सादे भोजन से भी भरता है किन्तु इस रसना का क्या करें जो  पुलाव, बिरयानी, मटर पुलाव, वेजीटेरियन पुलाव, दाल, दाल फ्राई, दाल मखणी, चपाती, रोटी, तंदूरी रोटी, पराठा, पूरी, हलुआ, सब्जी, हरी सब्जी, साग, सरसों का साग, तंदूरी चिकन आदि जायकेदार भोजन की ओर हमें खींचे चले जाती है। पर मुँह में जायका आखिर कितनी देर तक रह पाता है? जीभ से जरा नीचे गले के भीतर भोजन उतरा नहीं कि सारे स्वाद एक हो जाते हैं।

ये जबान जहाँ रस रस का अनुभव कराती है वहीं मुँह से भाँति-भाँति के शब्द निकाल कर कभी सुनने वाले के कानों में मिठास घोलती है वहीं कोड़े बरसाने से भी नहीं चूकती। चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी ने अपनी कहानी "उसने कहा था" के आरम्भ में ही इस जुबान के कमाल को बड़ी दक्षतापूर्वक दर्शाते हैं:

बडे-बडे शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जुबान के कोड़ो से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गये हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकॉर्ट वालों की बोली का मरहम लगायें। जब बडे़-बडे़ शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अंगुलियों के पोरों को चींरकर अपने-ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लड्ढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर, ‘बचो खालसाजी‘ ‘हटो भाईजी‘ ‘ठहरना भाई जी‘ ‘आने दो लाला जी‘ ‘हटो बाछा‘ कहते हुए सफेद फेटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पडे़। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती नहीं; चलती है पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं – ‘हट जा जीणे जोगिए’; ‘हट जा करमा वालिए’; ‘हट जा पुत्ता प्यारिए’; ‘बच जा लम्बी वालिए।‘ समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रों को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिये के नीचे आना चाहती है? बच जा।

अनेक बार तो इस जबान ने बड़े-बड़े युद्ध तक करवा दिये हैं। यदि द्रौपदी ने दुर्योधन से सिर्फ "अन्धे के अन्धे ही होते हैं" न कहा होता तो महाभारत के युद्ध में अठारह अक्षौहिनी सेना के मरने-कटने की कभी नौबत ही ना आती।
जबान के जरा से फिसल जाने से अपनों के बीच बैर व्याप्त जाता है और दूसरी ओर मीठी जबान बैरी को भी अपना बना सकता है। इसीलिये कहा गया हैः

ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय॥

Thursday, June 17, 2010

गूगल सर्च इंजिन के विशिष्ट प्रयोग

गूगल सर्च इंजिन का प्रयोग तो अवश्य ही आप सभी करते होंगे किन्तु आप में से बहुत से लोगों को शायद ही यह जानकारी होगी कि गूगल सर्च इंजिन में बहुत सारी विशिष्टताएँ भी हैं। तो आइये जानें उन विशिष्टताओं के बारे में!

गूगल सर्च इंजिन को केलकुलेटर के तौर पर प्रयोग करें
  • सर्च बॉक्स में कोई भी गणितीय एक्सप्रेसन टाइप करें जैसे कि - 5*23 + 3*44 - 87

[गूगल सर्च इंजन जोड़ (+), घटाना (-), गुणा (*), भाग (/), घात (^), और वर्गमूल (sqrt) की गणना कर सकता है।]

परिभाषाएँ जानिये
  • सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - define: website


गूगल सर्च इंजिन को एक परिवर्तक के तौर पर प्रयोग करें

किलोमीटर को मील में बदलने के लिये:
  • सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - 10 km in mile
फैरनहीट को सेल्सियश में बदलने के लिये:
  • सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - 25F to C
इंच को सेंटीमीटर में बदलने के लिये:
  • सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - 5 inch in cm
किसी इलाके का समय जानिये
  • सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - what time is it Raipur
दो देशों की करेंसी की तुलना कीजिये
  • सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - 1 usd in inr

    मौसम का विवरण जानिये
    • सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - Raipur weather
    फ्लाइट स्टेटस पता करें
    • सर्च बॉक्स में इस प्रकार से टाइप करें - name of airlinne flight number

    Tuesday, June 15, 2010

    कल हमारे नापसन्दीलाल छुट्टी पर थे

    जब कोई वस्तु अनायास ही उपलब्ध हो, और वह भी मुफ्त में, तो उस वस्तु का उपयोग करने की इच्छा जागृत हो ही जाया करती है। ब्लोगवाणी ने भी हम सभी को नापसन्द वाला बटन उपलब्ध करवाया हुआ है; और वह भी बिल्कुल मुफ्त में। यह तो आप जानते ही हैं कि "माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम"! तो इस बटन को क्लिकियाने का शौक भला किसे नहीं होगा। नापसन्द का एक चटका लगा देने में भला अपने बाप का क्या जाता है याने कि आजकल की भाषा में What goes of my father? और फिर खूब मजा भी तो आता है नापसन्द का चटका लगाने में! संकलक के हॉटलिस्ट में ऊपर चढ़ता हुआ पोस्ट दन्न से नीचे आ जाता है और पोस्ट लिखने वाले का हाल तो "कइसा फड़फड़ा रिया है स्साला" वाला हो जाता है। नापसन्द का चटका लगाने वाला उसके इस हाल को रू-ब-रू देख तो नहीं पाता, पर उसकी कल्पना कर के खूब खुश हो लेता है।

    तो बात चल रही थी नापसन्द वाले बटन को प्रयोग करने की। जब इसे प्रयोग करने की इच्छा जोर मारने लगती है तो सोचना पड़ता है कि आखिर कहाँ पर प्रयोग किया जाये इसका? ज्योंही दिमाग में यह प्रश्न उठता है, तत्काल भीतर से आवाज आती है जो भी ब्लोगर हमें पसन्द नहीं है उस पर इस बटन का प्रयोग कर दो। किसी ब्लोगर के पसन्द होने या ना होने के लिये किसी कारण का होना जरूरी थोड़े ही होता है, कई बार तो लोग अकारण ही हमें पसन्द नहीं होते। सामान्य जीवन में भी आपने अनेक बार अनुभव किया होगा कि हम किसी व्यक्ति को जीवन में पहली बार देखते हैं और देखते ही हमें लगने लगता है कि "स्साला एक नंबर का टुच्चा है"। बताइये कई बार ऐसा लगता है कि नहीं? वैसे कई बार इसका उलटा भी होता है कि किसी अनजान व्यक्ति को देखते ही हमें लगने लगता है कि "यार ये तो बहुत ही अच्छा आदमी है"। तो यही बात किसी ब्लोगर के विषय में भी हो जाना अस्वाभाविक तो नहीं है। बस फिर क्या है? जो ब्लोगर मन को नहीं भाता, उसके पोस्ट पर दन्न से चटका लग जाता है नापसन्द का। अब नापसन्द का चटका लगाने के लिये किसी के पोस्ट को पढ़ना जरूरी थोड़े ही होता है!

    तो हम बता रहे थे कि किसी ब्लोगर को नापसन्द करने के लिये किसी कारण का होना जरूरी नहीं है पर हमें नापसन्द करने के लिये तो एक नहीं अनेक कारण हैं। जैसे कि सठियाने के उम्र में भी ब्लोगिंग कर रहा है स्साला। भला ब्लोगिंग भी कोई बुड्ढों की करने की चीज है। पर ये हैं कि किये जा रहा है ब्लोगिंग। सींग कटा कर बछड़ों में शामिल हो गया है। कब्र में पाँव लटके हुए हैं पर छपास की चाह नहीं छूटती। शिरीष के फल के जैसे, सारे फूल-पत्ते के झड़ जाने के बावजूद भी, लटका हुआ है डाली से। अरे भाई, अब गिर भी जाओ नीचे, दूसरे फल को आने के लिये जगह दो।

    चलो, अब जब ये ब्लोगिंग कर ही रहे हैं तो हमारे जैसे भलेमानुष को इन पर तरस भी आ जाता है और हम टिप्पणी भी दे देते हैं इन्हें पर ये हैं कि हमें टिप्पणी देना तो दूर, भूल कर भी कभी झाँकने तक नहीं आते हमारे ब्लोग में। भला ये भी कोई बात हुई? ऊपर से तुर्रा यह कि कई बार हमारी टिप्पणी को मिटा तक देते हैं यह कहते हुए कि तुम्हारी टिप्पणी का हमारे पोस्ट के विषय से कुछ सम्बन्ध ही नहीं है। अब भला किसी टिप्पणी का पोस्ट के विषय से सम्बन्ध होना कोई जरूरी है क्या?

    कहने का तात्पर्य यह है कि हमें नापसन्द करने के लिये बहुत सारे कारण हैं। ऐसे में यदि कोई हमें नापसन्द करने लगे तो ऐसा होना तो स्वाभाविक ही है। तो साहब, एक अरसे से हम देख रहे हैं कि हमारा पोस्ट ब्लोगवाणी में ज्योंही आता है, तड़ाक से उस पर एक चटका लग जाता है नापसन्द का। हम तो यह सोच कर दिल को तसल्ली दे लेते हैं कि यह सिर्फ एक हमारा ही ग़म नहीं है बल्कि और भी बहुत से लोग इस दर्द के मारे हुए हैं।

    पर कल हमें यह देख कर बहुत ही आश्चर्य हुआ कि हमारा पोस्ट संकलक में आ गया है पर नापसन्द का चटका नहीं लगा है। खैर हमने सोचा कि आज हमारे नापसन्दीलाल जी शायद कहीं व्यस्त हैं, बाद में आकर हमें चटका दे जायेंगे। हम इन्तजार करते रहे पर हमारे इन्तजार का कुछ भी सार्थक नतीजा नहीं निकला। यहाँ तक कि कल का दिन बीत गया और आज का दिन आ गया पर वह चटका अभी भी नदारद है। अब हमें लग रहा है कि हमारे नापसन्दी लाल जी शायद कल छुट्टी पर थे। या फिर शायद उन्हे उनके डॉक्टर ने नापसन्द का चटका लगाने के लिये मना कर दिया हो। हमें तो में आशंका हो रही है कि भगवान ना करे कि कहीं बीमार-वीमार ना पड़ गये हों। यदि ऐसा कुछ हो तो हम तो ऊपर वाले से यही दुआ करेंगे कि वे जल्द ही स्वास्थ्यलाभ प्राप्त करें।

    Monday, June 14, 2010

    ब्लोगर महान नहीं होता, महान होता है पोस्ट

    सीनियर ब्लोगर, जूनियर ब्लोगर, बड़े ब्लोगर, छोटे ब्लोगर, महान ब्लोगर ....

    आखिर क्या है यह? ब्लोगर महान होता है या उसका पोस्ट उसे महान बनाता है?

    हमारा तो मानना है कि सिर्फ रचना ही छोटी, बड़ी या महान होती है जो कि रचयिता को भी छोटा, बड़ा या महान बना देती है। लेखन का विषय चाहे जो भी हो, यदि उसके भाव पाठक के दिल में घर कर जाते हैं तो वह लेखन महान हो जाता है। 'भगवतीचरण वर्मा' जी की कृति "चित्रलेखा" इसलिये महान हो गयी क्योंकि वर्मा जी ने अपनी उस कृति में 'नर्तकी चित्रलेखा' और 'तपस्वी कुमारगिरि' के अहं (ego) के टकराव को इतने सुन्दर और प्रभावशाली शैली में व्यक्त किया कि उनकी अभिव्यक्ति पाठकों के मन को छू गई। चित्रलेखा जैसे एक साधारण नर्तकी से कुमारगिरि जैसे महान ज्ञानी का पराजित हो जाने को उन तपस्वी का अहं स्वीकार नहीं कर पाता। किन्तु तपस्वी नर्तकी से सिर्फ एक बार नहीं बल्कि बार-बार पराजित हो  कर पतन के गर्त में गिरते ही चला जाता है और अन्त में योगी से भोगी हो जाता है, पुण्यात्मा से महान पापी हो जाता है। "चित्रलेखा" उपन्यास को नर्तकी और तपस्वी के अहं के टकराव ने महान बना दिया और कृति की महानता ने रचयिता भगवतीचरण वर्मा को महान लेखकों की सूची में सम्मिलित कर दिया। चित्रलेखा उपन्यास वर्मा जी की आरम्भिक कृतियों में से है, जब इस उपन्यास को उन्होंने लिखा था तो उनकी अवस्था बहुत कम थी। तो क्या उम्र कम होने के कारण से ही उन्हें छोटा या जूनियर रचनाकार कहा जाता? हमारे विचार से तो कदापि नहीं।

    अहं के टकराव की प्रभावशाली अभिव्यक्ति ने चित्रलेखा ही नहीं बल्कि और भी अनेक कृतियों को महान बना दिया है। फाँसी की सजा पाये विलक्षण कैदी और जेल के जेलर के अहं के टकराव की अभिव्यक्ति ने 'अनिल बरवे' जी के नाटक "थैंक यू मिस्टर ग्लाड" को अत्यन्त लोकप्रिय और चर्चित बना दिया। 'शरतचन्द्र' जी के उपन्यास "पथ के दावेदार" में माँ के किसी ईसाई के साथ द्वितीय विवाह कर लेने के कारण ईसाई हो गई, किन्तु विशुद्ध हिन्दू संस्कार वाली, मिस भारती जोसेफ और बंगाली युवक अपूर्व के अहं के टकराव की अभिव्यक्ति इतनी सुन्दर है कि पाठक उस काल्पनिक कथा के संसार में खो जाता है और उस टकराव को स्वयं अनुभव करने लग जाता है।

    अनेक बाते हैं जो कि रचनाकार की रचना को महान बनाती हैं जैसे कि पात्रों का चरित्र-चित्रण, रचना में भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति, लेखन शैली आदि-आदि इत्यादि। सूबेदारनी का लहनासिंह के प्रति विश्वास और लहनासिंह का सूबेदारनी के प्रति आत्मिक प्रेम (प्लूटेरियन लव्ह) की अभिव्यक्ति ने "उसने कहा था" को संसार भर में लोकप्रिय बना कर चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी को अमर कर दिया। गोदान में ग्राम्य तथा नगरीय जीवन शैली को समटते हुए ग्रामीण होरी का दर्द, गाँव के जमींदार के द्वारा ग्रामीणों के शोषण, नगर के प्रोफेसर मेहता और मिस मालती के विचारों के अन्तरद्वन्द्व की प्रभावशाली अभिव्यक्ति 'प्रेमचंद' जी के लेखन की ऐसी विशेषता है जो उन्हें अतिविशिष्टता प्रदान कर के महान बना देती है।

    ब्लोगिंग भी अपने विचारों को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है और हमारा मानना है इस माध्यम के द्वारा आप बड़े, छोटे, सीनियर, जूनियर कदापि नहीं बन सकते, हाँ महान अवश्य बन सकते हैं यदि आप अपने पाठकों के हृदय में घर कर लेते हैं तो! आपकी अभिव्यक्ति ही आपको पाठकों की विशाल संख्या प्रदान कर के आपको श्रेष्ठता प्रदान कर सकती है। इसलिये हमारा अनुरोध है कि आप सीनियर ब्लोगर, जूनियर ब्लोगर, बड़े ब्लोगर, छोटे ब्लोगर, महान ब्लोगर आदि बातों का विचार न कर सिर्फ उत्तम लेखन पर ही ध्यान देते रहें।

    Sunday, June 13, 2010

    पैचान कौन?

    नीचे के तीनों चित्र जिन महाशय के हैं उन्हें आप अच्छी तरह से जानते हैं! अब देखना यह है कि आप उन्हें पहचान पाते हैं या नहीं? तो बताइये कि ये चित्र किन महाशय के हैं?

    Saturday, June 12, 2010

    कुछ व्यक्तित्व विकास उक्तियाँ

    अपनी तुलना इस संसार के किसी अन्य व्यक्ति से कभी भी न करें। यदि आप ऐसा करते हैं तो स्वयं का अपमान करते हैं।
    एलेन स्ट्राइक

    यदि हम उस व्यक्ति से प्रेम नहीं कर सकते जिसे कि हम देख रहे हैं तो हम भगवान से कैसे प्रेम कर सकेंगे जिन्हें कि हम देख नहीं सकते?
    मदर टेरेसा

    विजय का अर्थ हमेशा सर्वप्रथम होना नहीं होता बल्कि विजय का अर्थ होता है कि आप किसी काम को पहले से बेहतर ढंग से कर रहे हैं।
    बोनी ब्लेयर

    मैं यह नहीं कहूँगा कि मैं 1000 बार असफल हुआ बल्कि मैं यह कहूँगा कि असफल होने के 1000 रास्ते हैं।
    थामस एडीसन

    हर कोई यह सोचता है कि मैं संसार को बदल दूँगा पर यह कोई नहीं सोचता कि मैं स्वयं को बदल लूँ।
    लियो टॉल्स्टाय

    हर किसी पर विश्वास कर लेना खतरनाक बात है पर उस से भी खतरनाक बात है किसी पर भी विश्वास न करना।
    अब्राहम लिंकन

    यदि कोई यह समझता है कि उसने अपने जीवन में कभी भी कोई गलती नहीं की है तो इसका मतलब हुआ कि उसने अपने जीवन में कभी भी कुछ नया नहीं किया।
    आइंसटीन

    विश्वास, वादा, सम्बन्ध और दिल - इन चारों में से कभी किसी को न तोड़ें टूटने पर ये आवाज उत्पन्न नहीं करते सिर्फ अत्यधिक दर्द उत्पन्न करते हैं।
    चार्ल्स

    Friday, June 11, 2010

    अंग्रेजी शासन के समय की एक झलक

    हिन्दुत्व एवं ब्राह्मणत्व में अखण्ड विश्वास रखने वाला एमएससी पास चोटीधारी बंगाली युवक अपूर्व को एक कंपनी में अफसर पद पर नौकरी मिलती है और वह अपने ब्राह्मण रसोइये तिवारी के साथ, अपने ब्राह्मणत्व की अत्यन्त सावधानी स रक्षा करता हुआ रंगून पहुँच जाता है जहाँ पर कंपनी की ओर से ही उसके लिये एक मकान की भी व्यवस्था कर दी गई रहती है। समुद्र-यात्रा की थकान से चूर अपूर्व तिवारी को भोजन तैयार करने का आदेश करने के लिये अपनी माँ को अपनी कुशलता का तार देने तारघर पहुँच जाता है।

    अपूर्व जब तारघर पहुँचा, तो तार-बाबू खाना खाने चले गये थे। एक घण्टा प्रतीक्षा करने के बाद जब आये, तो घड़ी देखकर बोले, "आज छुट्टी है; दो बजे ऑफिस बन्द हो गया।"

    अपूर्व ऊबे हुए स्वर में बोला, "यह अपराध आपका है। मैं एक घण्टे से बैठा हूँ।"

    बाबू बोला, "लेकिन मैं तो, केवल दस मिनट हुआ, यहाँ से गया हूँ।"

    अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया, झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी; लेकिन सब व्यर्थ समझकर अपूर्व चुप हो गया। वह भूख-प्यास तथा क्रोध से जलते हुए बड़े तारघर पहुँचा। यहाँ से, अपने निर्विघ्न पहुँचने का समाचार जब माँ को भेज सका, तब कहीं उसे सन्तोष हुआ।

    उपरोक्त उद्धरण श्री 'शरतचंद्र चट्टोपाध्याय' के बंगला उपन्यास "पाथेर दावी" के हिन्दी अनुवाद "पथ के दावेदार" से लिया गया है। तो यह थी अंग्रेजी शासनकाल के समय की व्यवस्था जिसे कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् हमारे देश के कर्णाधारों ने ज्यों का त्यों अपना लिया और यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यही व्यवस्था आज तक चली आ रही है।

    थोड़ी सी झलक और देखें:
    अपूर्व जब वापस पहुँचा तो उसने देखा कि तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अनर्गल बकते-झकते जा रहे हैं।

    साथ ही एक दूसरे व्यक्ति, तिमंजले से, हिन्दी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं; और एक घोड़े का चाबुक लेकर बीच-बीच में सट्ट-सट्ट शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी उसे नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है; और इस शिष्टाचार के आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है, उसे न कहना ही उचित है।

    अपूर्व के पूछने पर तिवारी ने उसे कमरे के भीतर ले जाकर क्रोध, दुःख तथा क्षोभ से रोते-रोते बताया, "यह देखिये, उस हरामजादे साहब ने क्या किया है!"

    वास्तव में काण्ड देखकर अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम ही हवा हो गई। खिचड़ी की हांडी से इस समय तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गन्ध निकल रही है; लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। कमरे में बिछा उसका साफ-सुथरा बिछौना, मैले-काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी; यहाँ तक कि पुस्तकें भी पानी में सन गई हैं!

    अपूर्व ने पूछा, "यह सब क्या हुआ?"

    तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया -

    अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आये। आज ईसाइयों का कोई पर्व है। पहले गाना-बजाना और फिर उसके बाद नृत्य आरम्भ हुआ और शीघ्र ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असह्य हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत, साहत का इतना बड़ा आनन्द सम्भवतः, वहन न कर पायेगी। जइसी समय रसोई के पास ही ऊपर से पानी गिरने लगा। भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर आकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब - चाहे वह काला हो या गोरा - देशी आदमी की ऐसी अशिष्टता नहीं सह सकते। वे उत्तेजित हो उठे और देखते-देखते, उन्होंने घर में जाकर बालटी की बालटी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह अपूर्व ने स्वयं अपनी आँखों से देख लिया।

    उपरोक्त उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है कि उन दिनों क्या स्थिति थी।

    शरत्‌चन्द्र जी की इस कृति पाथेर दावी, जिसकी कथा देशभक्त, स्वाधीनता के पुजारी क्रान्तिकारी वीरों के इर्द-गिर्द घूमती है, से अंग्रेजी शासन इतनी भयभीत हुई थी कि इसके प्रथम संस्करण के छपते ही इसे खतरे की चीज समझकर ब्रिटिश-सरकार ने इस पुस्तक को जब्त कर लिया था।
    चलते-चलते

    यदि आप पथ के दावेदार उपन्यास खरीदना चाहें तो निम्न लिंक को क्लिक कर के खरीद सकते हैं:



    (उपरोक्त लिंक मेरा एफिलियेट लिंक हैं, याने कि यदि आप इस लिंक्स से फ्लिपकॉर्ट.कॉम में जाकर पुस्तकें, सीडी, डीव्हीडी आदि खरीदेंगे तो कुछ ना कुछ आर्थिक लाभ मुझे भी प्राप्त होगा।)

    अपनी पसन्द की अन्य पुस्तकें, सीडी, डीव्हीडी आदि खोजने के लिये साइडबार में ब्लोगवाणी पसन्द बटन के नीचे के सर्चबॉक्स का प्रयोग करें।

    Thursday, June 10, 2010

    भगवान राम भला करे उसका जो "वाल्मीकि रामायण" पर भी नापसन्द का चटका लगाता है

    सभी की अपनी अपनी पसन्दगी और नापसन्दगी होती है। हम जानते हैं कि पसन्द और नापसन्द व्यक्ति का अपना निजी मामला होता है इसीलिये हमारे ब्लोग "धान के देश में" में किसी पोस्ट के प्रकाशित होते ही नापसन्द का चटका लग जाने पर हमें कभी भी आश्चर्य नहीं होता। किन्तु हमारे "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" के कल के अन्तिम पोस्ट में एक नापसन्द का चटका लगे देखकर हमें किंचित आश्चर्य अवश्य हुआ क्योंकि प्रायः देखा यही गया है कि किसी ऐसे ग्रंथ को जिसे कि सम्पूर्ण विश्व में मान्यता प्राप्त हो यदि कोई पसन्द नहीं कर पाता तो उसके प्रति, शिष्टाचार के नाते ही सही, अपनी नापसन्दी भी नहीं जताता।



    अस्तु, किसी की पसन्द और नापसन्द से हमें भला करना ही क्या है, हम तो भगवान श्री राम से यही प्रार्थना करते हैं कि उस भले मानुष का कल्याण करे!

    भले ही किसी की पसन्द और नापसन्द से हमें कुछ लेना देना ना हो किन्तु ब्लोगवाणी नापसन्द बटन के विषय में जरूर कुछ कहना चाहेंगे क्योंकि यह बहुत सारे ब्लोगर्स को प्रभावित करता है। इस विषय में हम एक बार फिर से अपने पोस्ट "नापसन्द बटन याने कि बन्दर के हाथ में उस्तरा" कही गई बात को दुहराना चाहेंगे कि:

    खुन्नस रखने वालों के लिये नापसन्द का यह बटन "बन्दर के हाथों उस्तरा" ही साबित हो रहा है।


    चलते-चलते

    A good man in an evil society seems the greatest villain of all.

    खराब समाज में सभी लोगों को एक अच्छा आदमी सबसे बड़ा खलनायक जैसा लगता है।

    A lie can be halfway around the world before the truth gets its boots on.

    सत्य से पराजित होने के पूर्व झूठ आधी दुनिया की यात्रा कर लेता है।

    Bad news travels fast.

    खराब समाचार तेजी से फैलता है।

    An empty vessel makes the most noise.

    खाली बर्तन अधिक आवाज करता है। अधजल गगरी छलकत जाय।

    All that glisters is not gold.

    हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती।

    Wednesday, June 9, 2010

    संगीतप्रेमी श्वान बनाम हिज मास्टर्स व्हायस... संगीत... मेलॉडी... हारमोनी...

    क्या आपको हिज मास्टर्स व्हायस के रेकॉर्ड्स याद हैं जिसमें संगीत का आनन्द लेते हुए श्वान महाशय का चित्र हुआ करता था? अवश्य ही याद होगा क्योंकि आप इन एसपी और एलपी रेकार्ड्स को अपने रेकॉर्ड प्लेयर पर सुना करते थे
    और आनन्द-विभोर हो जाया करते थे। पर हमारे बचपन के दिनों में तो, जब रेकॉर्ड प्लेयर नाम की चीज ही नहीं थी, हमारे घर में ग्रामोफोन हुआ करता था जिसका तवा बगैर बिजली के स्प्रिंग द्वारा घूमा करता था और उसमें से बिना किसी स्पीकर के सिर्फ डॉयफ्राम और भोंपू की सहायता से गाने की आवाज आया करती थी - "चली कौन से देश गुजरिया तू सजधज के, जाऊँ पिया के देश ओ रसिया मैं सजधज के..."। छत्तीसगढ़ी गाने का भी एक रेकॉर्ड हुआ करता था हमारे यहाँ - "नरवा तीर में मोर कारी नौरंगी सँवरपड़री टोरथे भाजी नरवा तीर में ..."


    तो हम बात कर रहे थे  हिज मास्टर्स व्हायस के रेकॉर्ड्स की। कितना सार्थक प्रतीक चिह्न था संगीत के रेकॉर्ड्स बनाने वाली इस कंपनी हिज मास्टर्स व्हायस का! चित्र को देखते ही लगने लगता था कि संगीत में सिर्फ मनुष्य को तो क्या प्राणीमात्र को प्रभावित की शक्ति है, संगीत को सुनकर श्वान महाशय भी भाव-विभोर हो सकते हैं।

    ऐसा माना जाता है कि मेलॉडी भारतीय संगीत की आत्मा है जबकि पाश्चात्य संगीत का आधार हारमोनी है। आखिर क्या है ये मेलॉडी और हारमोनी?

    क्योंकि मेलॉडी और हारमोनी संगीत के अन्तर्गत आते हैं इसलिये पहले संगीत को ही समझना अधिक उचित होगा। संगीत को आप केवल इतने से ही समझ सकते हैं कि कर्णप्रिय लगने वाली ध्वनि संगीत कहलाती है और कानों को कर्कश लगने वाली ध्वनि शोर कहलाता है। कोयल की कूक हमें मधुर प्रतीत होती है अतः वह एक संगीत है किन्तु कौवे का काँव-काँव करना शोर होता है। बाँसुरी से जब लयबद्ध धुन निकलती है तो वह संगीत होता है किन्तु उसी बाँसुरी में यदि जोर की फूँक मार दी जाये तो निकलने वाली ध्वनि कर्कश होने के कारण शोर कहलायेगा।

    जब एक ही स्वर से संगीत का प्रभाव उत्पन्न किया जाता है तो मेलॉडी होता है याने कि यदि कंठ से 'ओऽऽऽऽऽऽऽऽम' की ध्वनि निकल रही हो तो बाँसुरी, वीणा आदि वाद्ययंत्रों से भी, कंठस्वर के साथ ही साथ, 'ओऽऽऽऽऽऽऽऽम' ध्वनि ही निकलेगी और उन समस्त ध्वनियों का संयोग मेलॉडी होगा। इसके विपरीत जब विभिन्न स्वरों के मेल से संगीत का प्रभाव उत्पन्न होता है तो वह हारमोनी कहलाता है। कल्पना कीजिये कि आप किसी समुद्र के तट पर बैठे हैं, लहरों की गर्जना अलग हो रही है, हवा चलने की हहर-हहर करती आवाज अलग आ रही है और दूर समुद्र में किसी नाव पर बैठे हुए माझी के गीत का स्वर अलग सुनाई पड़ रहा है किन्तु इन समस्त ध्वनियों को मेल आपको आनन्द-विभोर कर रहा है। यही है हारमोनी! ध्वनियों का मेल तो सड़क पर भी होता है, सड़क पर जाम लग गया है, कई गाड़ियों के हार्न बज रहे हैं, किनारे पर गन्ना रस निकालने वाली मशीन से 'चूँऽऽऽचररऽऽ' करती अलग प्रकार की आवाज निकल रही है, एक आदमी अपने आगे वाले आदमी को चिल्ला कर कह रहा है 'अबे साइड हो'... किन्तु सड़क पर होने वाली इन ध्वनियों का मेल आपको मधुर लगने के बजाय कर्कश लगता है इसलिये यह शोर होता है न कि हारमोनी। याने कि संगीत में जब कंठस्वर से अलग सुर निकल रहा हो, वायलिन से अलग और बाँसुरी से कुछ अलग किन्तु इन सभी सुरों का मेल मधुर हो तो हारमोनी होगा।

    भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम काल (1950-80) में हमारे संगीतकारों ने मेलॉडी और हारमोनी का इतना सुन्दर प्रयोग किया कि उनकी धुनें अमर हो गईं।

    यह तो आप सभी जानते हैं कि संगीत के सात सुर होते हैं, चलिये आज उन सुरों के नाम भी जान लें:
    1. षडज - सा
    2. ऋषभ - रे
    3. गान्धार - गा
    4. मध्यम - म
    5. पंचम - प
    6. धैवत - ध
    7. निषाद - नि

    उपरोक्त सात सुरों के पाँच सहायक स्वर भी होते हैं - कोमल रे, कोमल ग, तीव्र म, कोमल ध और कोमल नि।

    आपकी जानकारी के लिये मैं बता दूँ कि मैं कोई संगीत विशेषज्ञ नहीं हूँ किन्तु संगीत के विषय में थोड़ी सी जानकारी मुझे थी उसे आज मैंने इस पोस्ट में प्रस्तुत कर दिया। शायद आप लोगों में से कुछ को पसन्द आये।

    Tuesday, June 8, 2010

    मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं

    युवक ने पहली बार अपनी गर्ल-फ्रेंड को अपने कमरे में इन्व्हाइट किया। लड़की इन्व्हीटेशन कबूल करके उसके साथ चल पड़ी। लड़के का कमरा ऊपर की मंजिल पर था जिसके लिये लकड़ी की सीढ़ियाँ बनी थीं। चौथी सीढ़ी के बाद पाँचवी सीढ़ी पर पैर रखते समय लड़के ने लड़की को बड़े प्यार से बताया, "अगली सीढ़ी पर संभल कर पैर रखना क्योंकि उसमें एक छेद है जिसमें पाँव फँस जाने का डर है।"

    आधे घंटे के बाद जब वे दोनों वापस जाने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे तो लड़की का पैर सीढ़ी के छेद में फँस ही गया। उसे फँसे देखकर लड़के ने बड़ी रुखाई के साथ उससे कहा, "आँख की अंधी होने के साथ ही साथ अकल की भी अंधी है क्या? आधे घंटे पहले ही बताई बात को याद नहीं रख सकती?"

    तो मित्रों, यह संसार ऐसा ही है जहाँ पर लोग सिर्फ मतलब का व्यवहार रखते हैं। इसीलिये तो 'गिरिधर' कवि ने कहा हैः

    सांई सब संसार में, मतलब को व्यवहार।
    जब लग पैसा गाँठ में, तब लग ताको यार॥
    तब लग ताको यार, यार संगही संग डोलैं।
    पैसा रहा न पास, यार मुख से नहिं बोलैं॥
    कह 'गिरिधर' कविराय जगत यहि लेखा भाई।
    करत बेगरजी प्रीति यार बिरला कोई सांई॥

    Monday, June 7, 2010

    तिकड़म से ही मिलती हैं टिप्पणियाँ

    टिप्पणियाँ पाना भला किसे अच्छा नहीं लगता? ऊपर-ऊपर से भले ही हम कहें कि हम टिप्पणियों की परवाह नहीं करते पर जब हम अपने भीतर झाँकते हैं तो लगता है कि हमें भी टिप्पणियाँ पाने में खुशी होती है। हिन्दी ब्लोगिंग में टिप्पणियों के महत्व को इतना बढ़ा-चढ़ा दिया गया है कि प्रतीत होने लगा है कि हिन्दी ब्लोगिंग का मुख्य उद्देश्य मात्र टिप्पणी पाना ही है। हिन्दी ब्लोगरों के प्राण टिप्पणियों में ही बसते हैं। अधिकतर ब्लोगर जिन्हें टिप्पणियाँ नहीं मिलतीं या कम टिप्पणियाँ मिलती हैं, स्वयं को अधमरा सा महसूस करने लगते हैं क्योंकि नामी-गिरामी, बड़े तथा नंबर एक ब्लोगर वे ही माने जाते हैं जिनके पोस्टों में टिप्पणियों के अंबार लगे रहते हैं।

    यदि आपने अच्छी पोस्ट लिखी है तो हो सकता है कि दो-चार टिप्पणियाँ बिना किसी प्रयास के मिल जायें किन्तु ढेर सारी टिप्पणियाँ बिना तिकड़म के मिलना मुश्किल ही नहीं असम्भव है। अब ये तिकड़म क्या होते हैं यह मत पूछियेगा। यदि पूछेंगे तो भी आपको जवाब नहीं मिलने वाला क्योंकि सभी के अपने-अपने तिकड़म होते हैं जो कि उनके बिजनेस सीक्रेट्स होते हैं। अक्सर छोटे-मोटे तिकड़म तो हम भी भिड़ाते हैं पर कल हमने अपने पोस्ट "वैदिक कर्मकाण्ड के सोलह संस्कार" के लिये कुछ भी तिकड़म जानबूझ कर नहीं भिड़ाया क्योंकि हम जानना चाहते थे कि क्या ऐसे भी कुछ लोग हैं जो सोलह संस्कारों को जानने की रुचि रखते हैं। नतीजा यह हुआ कि पोस्ट पूरी तरह से पिट गई। पसन्द के नाम पर शून्य रहा वह पोस्ट पर सौभाग्य से चार टिप्पणियाँ मिल गईं। किन्तु हम जानते हैं कि हमारे इस पोस्ट की उम्र मात्र चौबीस घंटे ना होकर बहुत लंबी है और ऐसे पाठक, जिन्हें सोलह संस्कारों के विषय में जानने की रुचि होगी, हमेशा सर्च इंजन से खोज कर आते रहेंगे हमारे इस पोस्ट में।

    कभी-कभी संयोग से बिना तकड़म भिड़ाये भी अच्छी-खासी टिप्पणियाँ मिल जाती हैं क्योंकि हिन्दी ब्लोगिंग भी हिन्दी फिल्मों जैसा है जहाँ पर अच्छी फिल्में पिट जाती हैं और "जै संतोषी माँ" जैसी फिल्में सालों तक बॉक्स आफिस में हिट बनी रह जाती हैं। किन्तु ऐसा बार-बार नहीं बल्कि कभी-कभार ही होता है।

    विषय आधारित ब्लोग्स को या तो टिप्पणियाँ मिलती ही नहीं हैं या फिर नहीं के बराबर मिलती हैं, शायद यही कारण है कि हिन्दी में विषय आधारित ब्लोग बनाने का चलन नहीं के बराबर है। हम तो सोचते थे कि ब्लोगिंग का उद्देश्य समाज, भाषा साहित्य आदि की सेवा करते हुए स्वयं का भी कल्याण करना है और इसीलिये हमने "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" जैसा विषय आधारित ब्लोग बनाया था। किन्तु आजकर जिस प्रकार से टिप्पणियाँ पाने के लिये के लिये घमासान मचा हुआ है उसे देखकर लगता है कि हमारी सोच बिल्कुल गलत है और ब्लोगिंग का उद्देश्य महज टिप्पणियाँ बटोर कर आत्म-तुष्टि पाना ही है। "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" अब अपनी समाप्ति की ओर है। इसके समाप्त होने पर हमने तुलसीकृत "रामचरितमानस" की पर ब्लोग बनाने का निश्चय किया था किन्तु अब इस विषय में सोचना पड़ेगा।

    पुनश्चः कभी कभी हिन्दी ब्लोगिंग की दशा देखकर इतनी निराशा छा जाती है कि नकारात्मक बातें सूझने लगती हैं किन्तु रंजन जी की टिप्पणी ने मुझे संबल प्रदान किया है और मैं "रामचरितमानस" पर ब्लोग अवश्य बनाऊँगा।

    Sunday, June 6, 2010

    वैदिक कर्मकाण्ड के सोलह संस्कार

    बस सुना था कि वैदिक कर्मकाण्ड में मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक सोलह संस्कार के प्रावधान हैं किन्तु उनमें से मात्र तीन चार के नाम ही जानता था। उत्सुकतावश नेट को खंगाला तो जो कुछ भी जानकारी मिली उसे इस पोस्ट में प्रस्तुत कर रहा हूँ। आशा करता हूँ कि अधिक जानकारी वाले लोग अवश्य ही इस विषय में मुझे और भी ज्ञान प्रदान करेंगे।

    वैदिक कर्मकाण्ड के अनुसार निम्न सोलह संस्कार होते हैं:

    गर्भाधान संस्कारः उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिये प्रथम संस्कार।

    पुंसवन संस्कारः गर्भस्थ शिशु के बौद्धि एवं मानसिक विकास हेतु गर्भाधान के पश्चात्् दूसरे या तीसरे महीने किया जाने वाला द्वितीय संस्कार।

    सीमन्तोन्नयन संस्कारः माता को प्रसन्नचित्त रखने के लिये, ताकि गर्भस्थ शिशु सौभाग्य सम्पन्न हो पाये, गर्भाधान के पश्चात् आठवें माह में किया जाने वाला तृतीय संस्कार।

    जातकर्म संस्कारः नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की कामना हेतु किया जाने वाला चतुर्थ संस्कार।

    नामकरण संस्कारः नवजात शिशु को उचित नाम प्रदान करने हेतु जन्म के ग्यारह दिन पश्चात् किया जाने वाला पंचम संस्कार।

    निष्क्रमण संस्कारः शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने की कामना के लिये जन्म के तीन माह पश्चात् चौथे माह में किया जाने वला षष्ठम संस्कार।

    अन्नप्राशन संस्कारः शिशु को माता के दूध के साथ अन्न को भोजन के रूप में प्रदान किया जाने वाला जन्म के पश्चात् छठवें माह में किया जाने वाला सप्तम संस्कार।

    चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कारः शिशु के बौद्धिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास की कामना से जन्म के पश्चात् पहले, तीसरे अथवा पाँचवे वर्ष में किया जाने वाला अष्टम संस्कार।

    विद्यारम्भ संस्कारः जातक को उत्तमोत्तम विद्या प्रदान के की कामना से किया जाने वाला नवम संस्कार।

    कर्णवेध संस्कारः जातक की शारीरिक व्याधियों से रक्षा की कामना से किया जाने वाला दशम संस्कार।

    यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कारः जातक की दीर्घायु की कामना से किया जाने वाला एकादश संस्कार।

    वेदारम्भ संस्कारः जातक के ज्ञानवर्धन की कामना से किया जाने वाला द्वादश संस्कार।

    केशान्त संस्कारः गुरुकुल से विदा लेने के पूर्व किया जाने वाला त्रयोदश संस्कार।

    समावर्तन संस्कारः गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला चतुर्दश संस्कार।

    पाणिग्रहण संस्कारः पति-पत्नी को परिणय-सूत्र में बाँधने वाला पंचदश संस्कार।

    अन्त्येष्टि संस्कारः मृत्योपरान्त किया जाने वाला षष्ठदश संस्कार।

    उपरोक्त सोलह संस्कारों में आजकल नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म (मुण्डन), यज्ञोपवीत (उपनयन), पाणिग्रहण और अन्त्येष्टि संस्कार ही चलन में बाकी रह गये हैं।

    Saturday, June 5, 2010

    कहीं धोखा तो नहीं खा रहे हैं आप?

    इस चित्र को देखकर क्या लग रहा है आपको? देखिये, सच सच बताइयेगा। आप यही सोच रहे हैं ना कि ....

    !

    !!

    !!!

    पर आप जो सोच रहे हैं वह कहीं गलत तो नहीं है? कहीं धोखा तो नहीं खा रहे हैं आप?

    ?


    ??


    ???


    ????


    ?????


     

    Friday, June 4, 2010

    आइना वही रहता है चेहरे बदल जाते हैं

    "क्या करना है साहब लड़के को ज्यादा पढ़ा लिखाकर? आखिर करना तो उसे किसानी ही है। चिट्ठी-पत्री बाँचने लायक पढ़ ले यही बहुत है।" यह बात हमसे गाँव के एक गरीब किसान ने कही थी जब हमने उसे अपने बच्चे को खूब पढ़ाने-लिखाने की सलाह दी थी।

    दूसरी ओर शहर में एक गरीब भृत्य का कहना है कि "चाहे जो हो साहब, भले ही उधारी-बाड़ी ही क्यों ना करना पड़े, पर मैं अपने लड़के को कम से कम ग्रेजुएट तो कराउँगा ही।"

    शिक्षा वही है किन्तु एक की निगाह में उसका मान (value) अलग है और दूसरे की निगाह में अलग।

    जब मैं फील्ड आफीसर था तो एक बार किसी गाँव में एक किसान के घर में जूते पहने हुए घुस गया। वह गरीब किसान मुझसे कुछ कह तो नहीं सका किन्तु उसकी नजरों ने मुझे बता दिया कि मेरा जूते पहने हुए उसके घर के भीतर घुस जाना उसे बहुत ही नागवार गुजरा था। जूते पहन कर घर के भीतर चले आना उसके विचार से अभद्रता थी। तत्काल मैंने उससे माफी माँगी और बाहर आकर जूते उतारने के बाद उसके घर के भीतर घुसा। परिणाम यह हुआ कि जिस किसान के मन में अभी एक मिनट पहले ही मेरे प्रति तुच्छ भाव थे वही अब मुझे बहुत अधिक हार्दिक सम्मान दे रहा था। इस घटना से मुझे बहुत बड़ी सबक मिली और उसके बाद जब कभी भी मैं किसी गाँव में किसी किसान के घर जाता था तो पहले जूते उतार दिया करता था।

    व्यक्ति, वस्तु, गुण आदि भी एक आइना के मानिंद होते हैं। जिस प्रकार से आइनें आदमी को अपना चेहरा दिखता है उसी प्रकार से व्यक्ति, वस्तु, गुण आदि में भी आदमी को अपने ही विचार दिखते हैं। ये आदमी के भीतर के विचार ही किसी व्यक्ति, वस्तु, गुण आदि का मान (value) तय करते हैं। जी.के. अवधिया वही होता है किन्तु कोई उसे "गुरुदेव" सम्बोधन करता है और कोई उसे "चश्मेबद्दूर" (चश्माधारी खूँसट बुड्ढा) कहता है। याने कि अलग-अलग लोगों के लिये जी.के. अवधिया का अलग-अलग मान है। अब कल के मेरे पोस्ट "खुशखबरी... खुशखबरी... खुशखबरी... ब्लोगिंग से कमाई शुरू" का मान (value) भी किसी के लिये कुछ है तो किसी के लिये कुछ। जहाँ श्री सुरेश चिपलूनकर जी टिप्पणी करते हैं:

    चलिये रेट फ़िक्स करके आपने पहल तो की, अब हम जैसे फ़ॉलोअर भी अपने ब्लॉग के रेट्स तय करते हैं…, धन्यवाद आपका…
    वहीं श्री जनक (ये कौन हैं कह नहीं सकता क्योंकि उनका प्रोफाइल नदारद है) का विचार हैः
    अवधिया जी आप क्या हो मई समझ नहीं पाया !
    पोस्ट का शीर्षक क्या लगा रखा है और लिखा है एकदम घटिया मजाक
    क्या सोच है आपकी ,,,,हे भगवान् अब यही सब होगा कोई समझाओ
    अब मैं यदि चिपलूनकर जी की टिप्पणी पढ़कर फूलकर कुप्पा हो जाऊँ और दूसरी टिप्पणी पढ़कर आग-बबूला हो जाऊँ तो क्या यह मेरी मूर्खता नहीं होगी?

    जो भी व्यक्ति इस मान (value) को अच्छी प्रकार से समझ लेता है उसे भले बुरे की समझ भी अपने आप आ जाती है।

    जीवन में घटने वाली छोटी छोटी बातों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं यदि सीखना चाहें तो।

    हम सबको मिलकर अभी ब्लोगिंग का भी मान तय करना है क्योंकि मेरे जैसा ही आप सभी ने अनुभव किया होगा कि ब्लोगिंग का मान भी अलग-अलग ब्लोगर की नजर में अलग-अलग है, किसी के लिये यह मात्र मौज मजा का साधन है तो किसी के लिये भाषा, साहित्य, समाज आदि की सेवा, किसी के लिये यह अधिक से अधिक टिप्पणी पाना है तो किसी के लिये अधिक से अधिक पाठक पाना, किसी और के कुछ और है तो किसी और के लिये कुछ और ....

    Thursday, June 3, 2010

    खुशखबरी... खुशखबरी... खुशखबरी... ब्लोगिंग से कमाई शुरू

    आप तो जानते ही हैं कि आजकल विज्ञापन का जमाना है और आप विज्ञापन के महत्व को भी अच्छी तरह से समझते हैं। ये विज्ञापन चीज ही ऐसी है कि किसी उत्पाद को बाजार में आने के पहले ही सुपरहिट बना देती है। अच्छे से अच्छा उत्पाद विज्ञापन के अभाव में पिट जाता है और सामान्य से भी कम गुणवत्ता वाला उत्पाद विज्ञापन के बदौलत हिट हो जाता है। तो फिर आखिर अपने ब्लोग का अन्य ब्लोग में विज्ञापन करने में बुराई ही क्या है?

    इसीलिये हमने निश्चय किया है कि आप हमारे पोस्टों में टिप्पणी करते हुए अपने ब्लोग का विज्ञापन कर सकते हैं, और वह भी बहुत सस्ते दर पर। विज्ञापन के दर इस प्रकार हैं:

    • बिना किसी लिंक के प्रचार वाली टिप्पणी के लिये रु.100 मात्र
    • आपकी टिप्पणी में एक लिंक के लिये रु.200 मात्र
    • आपकी टिप्पणी में दो लिंक के लिये रु.300 मात्र
    • आपकी टिप्पणी में तीन से पाँच लिंक के लिये रु.500 मात्र
    • हमारे ब्लोग के साइडबार में आपके ब्लोग का विजेट लगाने के लिये रु.2000 प्रतिमाह मात्र
    सीमित संख्या में ही विज्ञापन स्वीकार किये जायेंगे अतः शीघ्रता करें अन्यथा बाद में पछताना पड़ेगा।

    कृपया विज्ञापन देने से पहले हमसे सम्पर्क कर लें ताकि हम आपको अग्रिम भुगतान के तरीके के विषय में बता दें।

    टिप्पणी में लिंक देकर विज्ञापन के आरम्भ होने के कारण आज से टिप्पणी मॉडरेशन शुरू किया जा रहा है। विज्ञापन वाले उन्हीं टिप्पणियों को प्रकाशित किया जायेगा जिनके लिये भुगतान अग्रिम रूप से प्राप्त हो चुका रहेगा।

    आप लोगों ने शायद गौर किया होगा कि आजकल यह रवैया बन गया है कि लोग पोस्ट को पढ़ें या ना पढ़ें किन्तु टिप्पणी अवश्य करते हैं। टिप्पणी कर के लिये लोग पापा, दादा, अनामी, बेनामी कुछ भी बन सकते हैं। याने कि टिप्पणी करके अपना प्रचार करना या फिर दिल की भड़ास निकालना एक शौक बन गया है। टिप्पणी करने वाले इस शौक को छोड़ कर सभी शौक को पूरा करने के लिये आखिर खर्च तो करना ही पड़ता है तो फिर टिप्पपणी वाली यह शौक ही क्यों फोकट में पूरी हो। कम से कम हमारे ब्लोग में तो यह शौक आज से फोकट में पूरा नहीं होगा। यही सोचकर हमने इस प्रकार के विज्ञापन की योजना बनाई है ताकि लोगों का शौक भी पूरा होता रहे और हमें भी कुछ आमदनी हो जाये। खैर आमदनी तो क्या होगी, क्योंकि लोगो खर्च करने का नाम सुनकर ही ऐसे गायब हो जायेंगे जैसे कि "गधे के सिर से सींग",  पर हाँ अवांछित टिप्पणियों से जरूर कुछ ना कुछ छुटकारा मिल जायेगा।

    Wednesday, June 2, 2010

    जरा जोड़ कर बताइये तो... नहीं जोड़ पाये ना?

    जरा जोड़ कर बताइये तो -

    III
    VII
    IX
    I
    + L XI V
    ‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‌‌‌‌----------

    नहीं जोड़ पाये ना? अच्छा अब जोड़िये -

    03
    07
    09
    01
    66

    अब तो आपने तत्काल जोड़कर बता दिया कि इनका का जोड़ 86 है। पर इन्हीं संख्याओं को पहले वाले रूप में जोड़ने के लिये कहा गया तो नहीं बता पाये थे कि जोड़ L XXX VI है। पहली बार जो सवाल आपको मुश्किल लग रहा था वही दूसरी बार आपको सरल इसलिये लगने लग गया क्योंकि संख्याओं को दशमलव पद्धति में लिखा गया था। किन्तु आपको यह जानकर बहुत आश्चर्य होगा कि दशमलव पद्धति के आरम्भ होने के पहले भी हिसाब-किताब हुआ करता था। याने कि हजारों-लाखों साल तक लोग बगैर शून्य और दशमलव पद्धति के जोड़-घटाना-गुणा-भाग आदि करते रहे हैं। बहुत ही जटिल और समय-खाऊ होता था वह गणित।

    जोड़-घटाना-गुणा-भाग का आधार गिनती है। क्या कभी आपने सोचा भी है कि गिनती की शुरुआत कब, क्यों और कैसे हुई?

    मानव आरंभ से ही सामाजिक प्राणी रहा है। प्रगैतिहासिक काल में जब मानव गुफाओं में रहा करता था तब भी उनके समूह हुआ करते थे। जब तक ये समूह छोटे रहे, किसी प्रकार की गिनती की आवश्यकता नहीं थी। दिन भर भोजन की टोह में इधर-उधर भटकने के बाद जब समूह के सदस्य वापस इकट्ठे होते थे तो समूह के सरदार को आभास हो जाया करता था कि पूरे सदस्य आ गये हैं या कोई सदस्य कम है।

    किन्तु जब समूह के सदस्यों की संख्या में वृद्धि होने लगी तो मानवीय आभास से काम चलाना मुश्किल हो गया और उन्हें गिनती की आवश्यकता हुई। सर्वप्रथम मनुष्यों ने अपने हाथों की उंगलियों को गिनती का आधार बनाया। बाद में सदस्यों की संख्या में और वृद्धि होने पर पैरो की उंगलियों को भी गिनती में शामिल कर लिया। संख्या में निरंतर वृद्धि के कारण उन्हें अंकों तथा संख्याओं के लिये संकेत बनाने पड़े।

    आज भी उस प्रकार के संकेतों का प्रयोग किया जाता है जैसे कि I, II...., V...., X...., L...., C...., आदि। अब यदि देखें तो इन संकेतों का आधार पाँच का अंक है जैसे V, X, L, C। मनुष्य के एक हाथ में पाँच उंगलियाँ होने के कारण ही पाँच को अंको और संख्याओं का आधार बनाया गया। शून्य की जानकारी न होने के कारण इन्हीं संकेतों के द्वारा हजारों-लाखों वर्षों तक गणितीय गणना की जाती रही है।

    फिर शून्य का अविष्कार हुआ। हमारे लिये जहाँ यह गौरव की बात है कि शून्य भारत की ही देन है वहीं यह क्षोभ की बात है कि हम आज तक उस महान गणितज्ञ का नाम भी नहीं जानते जिन्होंने शून्य का अविष्कार किया। कहा जाता है कि शून्य का अविष्कार नवीं शताब्दी में हुआ था। उस काल में हिन्दु धर्म के मुख्य रूप से तीन सम्प्रदाय, वैष्णव, शैव और शाक्त, हुआ करते थे। इन तीनों सम्प्रदायों के अनुयायी स्वयं के सम्प्रदाय को महान तथा अन्य सम्प्रदायों को तुच्छ मानकर आपस में झगड़ा किया करते थे। उसी समय जैन सम्प्रदाय का जन्म हुआ। इस नये प्रतियोगी को नीचा दिखाने के लिये पहले के तीनों सम्प्रदाय एक हो गये। अनुमान किया जाता है कि शून्य का आविष्कार करने वाला गणितज्ञ जैन सम्प्रदाय का अनुयायी था और इसीलिये उनके नाम को कभी भी आगे आने नहीं दिया गया।

    लोगों को शून्य का प्रयोग करके गणितीय गणना करना बहुत सरल लगा और शून्य का प्रयोग जोरों से किया जाने लगा। किन्तु शासक के जैन सम्प्रदाय विरोधी होने के कारण शून्य के प्रयोग को राजकीय रूप से मान्यता नहीं दी गई। व्यापारियों को अपने हिसाब-किताब पुरानी पद्धति में ही रखने के राजकीय आदेश दिये गये। अतः एक परपाटी यह चल गई कि कच्चे में शून्य का प्रयोग करके हिसाब किया जाये और पक्के में पुरानी पद्धति से लिखा जाये। चूँकि लिखने का काम भोज पत्र पर हुआ करता था अतः भोज पत्र की खपत कम करने के लिये कच्चे में हिसाब करने के लिये जमीन के एक टुकड़े को लिप पोत कर चिकना बना दिया जाता था और उस पर महीन राख की परत बिछा दी जाती थी। उंगलियों से लिखकर हिसाब किया जाता था। पक्के में पुरानी पद्धति में उतार लेने के बाद जमीन में बनाई गई राख की स्लेट को फिर से लिखने लायक बना लिया जाता था।

    उस काल में व्यापार करने के लिये भारत में अरब देशों के व्यापारी आया करते थे। शून्य का प्रयोग करके गणना करने की सरलता ने उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया और वे हमारे अंको को अपने देश ले गये। चूँकि राख को अरबी भाषा में गुबार कहा जाता है, उन्होंने यहाँ से ले जाये गये अंको का नाम गुबार अंक रखा। गुबार अंक अरब देशों से मिश्र पहुँच गया। इस प्रकार आगे बढते-बढते हमारे ये अंक अलग-अलग नामों तथा संकेतों के साथ पूरे यूरोप में पहुँच गये। कालान्तर में जब अंग्रेजों ने भारत के शासन को हथिया लिया, तब हमारे यही अंक अंग्रेजी अंको के रूप में हमारे सामने आये।

    बाद में गणितज्ञों के शोध कार्यों से सिद्ध हो गया कि अंग्रेजी अंक वास्तव में अंग्रेजी न होकर भारतीय है। इन अंकों को 'भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप' नाम दिया गया जिसे पूरे विश्व ने स्वीकार किया।

    Tuesday, June 1, 2010

    अब रोज-रोज तो कुछ सूझता नहीं इसलिये आज अगड़म-बगड़म लिख रहा हूँ ... जो पढ़ें उसका भी भला, जो ना पढ़ें उसका भी भला

    अजब रोग है ये ब्लोगिंग भी। रोज ही एक पोस्ट लिखने का नशा लगा दिया है इसने हमें। पर आदमी अगर रोज-रोज लिखे भी तो क्या लिखे? कभी-कभी कुछ सूझता ही नहीं तो अगड़म-बगड़म कुछ भी लिख कर पोस्ट प्रकाशित कर देता है। तो आज हम भी ऐसे ही कुछ अगड़म-बगड़म लिख रहे हैं, जिसे पढ़ना हो पढ़े ना पढ़ना हो ना पढ़े। अपना क्या जाता है।

    तो पेश है अगड़म-बगड़मः

    विचित्र प्राणी है मनुष्य। संसार के समस्त प्राणियों से बिल्कुल अलग-थलग। यह एक ऐसा प्राणी जो जन्म के पूर्व से मृत्यु के पश्चात् तक खर्च करवाता है। ईश्वर ने इस पर विशेष अनुकम्पा कर के इसे बुद्धि प्रदान की है ताकि यह इस बुद्धि का सदुपयोग करे किन्तु यह प्रायः बुद्धि का सदुपयोग करने के स्थान पर दुरुपयोग ही करता है। सत्ता, महत्ता और प्रभुता प्राप्त करने के लिये यह कुछ भी कर सकता है।

    मनुष्य यदि ऊपर उठना चाहे तो देवताओं से भी ऊपर जा सकता है और नीचे गिरना चाहे तो पशुओं से भी निकृष्ट बन सकता है इसीलिये मैथिलीशरण गुप्त जी ने पंचवटी में कहा हैः

    मैं मनुष्यता को सुरत्व की जननी भी कह सकता हूँ
    किन्तु मनुष्य को पशु कहना भी कभी नहीं सह सकता हूँ

     
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