Sunday, September 9, 2007

धान के देश में -1

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

- 1 -

"राजो! क्या कर रही हो?"

किसी पुरुष कण्ठ की ध्वनि थी।

"कौन हो भाई? दरवाजा खुला हुआ है, धकेल कर भीतर आ जाओ", रमणी के कण्ठ का मधुर उत्तर था।
संध्या की सुनहरी किरणे अभी पेड़ों के पत्तों पर बिछल रही थीं। खेतों से झुण्ड के झुण्ड गायों को घेर कर लाते हुये ग्वाले अपनी बाँस की बाँसुरी पर सुरीली तान छेड़ रहे थे। पश्चिमी क्षितिज में डूबते हुये सूर्य की लालिमा को उड़ती हुई धूल ने ऐसा ढँक दिया था कि मानो लाल रंग के परदर्शी मलमल से परदा कर दिया गया हो।

गाँव के अंतिम छोर पर मिट्टी का छोटा सा घर था। लाल खपरैल की जगह घास की छत थी। दीवालें नीचे से आधी दूर तक गोबर से लिपी हुई थीं। शेष आधा भाग गेरू से पुता था। घर में एक ही दरवाजा था और एक ही खिड़की। घर तथा दरवाजे के मध्य छोटा सा साफ-सुथरा लिपा-पुता आँगन था जिसके बीचोबीच तुलसी चौरा (एक छोटे से चबूतरे पर बोया गया तुलसी का पौधा) था। आँगन के एक कोने में धनिया और मिर्च के पौधे संध्या की बिखरती हुई कालिमा में उनींदे हो रहे थे। दूसरे कोने में एक गैया कोठा था जिसमें एक देसी गाय बँधी थी जिसके पास ही बँधा बछड़ा रह-रह कर रँभा उठता था - शायद दिन भर के बाद इस समय तक उसे जोरों से भूख लग आई थी।

घर के भीतर से लगभग छत्तीस-सैंतीस वर्ष की एक स्त्री हाथ में टिमटिमाता हुआ दिया लेकर आँगन में आई। क्षीण ज्योति चारों ओर बिखर गई। उसी दिये से उसने तुलसी के पौधे की आरती की और श्रद्धापूर्वक सिर नवाकर प्रणाम करके दिये को तुलसी चौरे पर रख दिया। फिर उसने अपेक्षाकृत कुछ ऊँचे स्वर में आवाज लगाई, "सदाराम, श्यामवती, तुम लोग भी आँगन में आ जाओ। शाम के समय घर में मत घुसे रहो। मैं जरा गाय दुह लेती हूँ। बछड़ा बहत चिल्ला रहा है।"

"आते हैं माँ!" कहते हुये श्यामवती और सदाराम दोनों आँगन में आ गये। ये दोनों उस स्त्री के पुत्र-पुत्री थे। सदाराम लगभग छः-सात वर्ष का था और श्यामवती चार वर्ष की। चड्डी के अतिरिक्त, दोनों के बदन पर कपड़े का कोई अन्य टुकड़ा तक नहीं था। दोनों के बाल रूखे, हाथ-पैर दुबले, छाती धँसी हुई और पेट फूले हुये थे। सदाराम की नाक भी बह रही थी। वे दोनों आँगन में पड़ी हुई खाट पर बैठ गये। यद्यपि ये बच्चे दुर्बल और रोगीले-से थे, फिर भी वे उस स्त्री के प्राणों के स्पंदन थे। स्त्री ने बछड़े को खूँटे से छोर दिया। बछड़ा अपनी माँ की ओर ताबड़तोड़ उछलता हुआ भागा और थनों में से एक को मुँह में भर कर दूध पीने लगा। दो-तीन मिनट बाद ही स्त्री ने बछड़े को खींच कर गाय की अगली टाँग से बाँध दिया और दूध दुहने लगी। बछड़ा ललचाई और विवश आँखों से थन की ओर देख रहा था।

इसी समय पुरुष-कण्ठ की वह ध्वनि सुनाई पड़ी जिसका उल्लेख आरंभ में किया जा चुका है। पाठक परिचित हो चुके हैं कि किसी ने आवाज दी थी, "राजो, क्या कर रही हो?" साथ ही इस प्रश्न के उत्तर से भी। उस स्त्री का नाम राजवती था। गाँव के अनपढ़ वातावरण में 'राजवती' राजो बन गई थी।
दरवाजा धकेल कर एक अधेड़ आदमी ने बेखटके आँगन में प्रवेश किया। गाँव में व्यर्थ के परदे तथा लज्जा के लिये कोई स्थान नहीं रहता। वहाँ की उन्मुक्त प्रकृति और वातावरण वहाँ के लोगों को सरल और उदार बना देते हैं। दूध दुहते राजवती ने कनखियों से उस आदमी को भीतर आते देखा और बोली, "अच्छा तुम हो दुर्गा प्रसाद! आओ, आओ बैठो खटिया पर। अच्छा किया जो आ गये।"

आगंतुक दुर्गा प्रसाद बिना कुछ कहे खाट पर बैठ गया। श्यामवती को उस ने बड़े प्रेम से अपनी गोद में बैठा लिये और सदाराम के सिर पर हाथ फेरते हुये बोला, "क्यों रे सदवा! क्या खाया? श्यामवती बिटिया, तूने भी कुछ खाया या अभी तक भूखी ही है? तुम्हारी माँ तुम लोगों का कुछ ध्यान भी रखती है या नहीं?" कहते-कहते दुर्गा प्रसाद ने राजवती के चेहरे पर प्रेम की नजर डाली।

"हम लोगों ने सबेरे भात खाया था और अभी शाम को 'बोरे' (सुबह के बने चाँवल में पानी डाल कर रख दिया जाये तो उसे छत्तीसगढ़ में 'बोरे' कहा जाता है और यदि वह दूसरे दिन तक भी बचा रह जाये तो 'बासी' कहलता है) भी खाया है।" सदाराम का उत्तर था।

दूध दुह चुकने पर राजवती ने बछड़े को खोल दिया और उसने लपक कर गाय के एक थन को मुँह में भर लिया तथा दुहा जाने के बाद बचे दूध को तृप्तिपूर्वक पीने लगा। राजवती ने आँगन में कंडो को गोलाकार में जमाकर 'अधरा' बनाया और उस पर थोड़ी सी मिट्टी तेल डाल कर माचिस दिखा दिया। मिट्टी तेल जल जाने तथा कंडों के सुलग जाने पर दूध से भरी मिट्टी की छोटी हाँडी को उसके ऊपर रख दिया। फिर खाट से कुछ ही दूर जमीन पर बैठ गई।

दुर्गा प्रसाद ने श्यामवती को गोद से उतार दिया और संभल कर बैठ गया। दोनों बच्चे आँगन में कभी बछड़े को छू कर सहलाते और कभी खेलने लगते थे।

दुर्गा प्रसाद बोला, "राजो! संझा हुई। मैं खेत से लौट रहा था। सोचा तुमसे मिलता चलूँ।"

"गाँव में तुम्हीं तो एक मेरा ध्यान रखते हो। दिन में, संझा तक तुम रोज एकाध बार आ ही जाते हो तो मुझे भी ढाढ़स रहता है", राजवती ने निश्छल भाव से कहा।

दुर्गा प्रसाद ने शिष्टाचार के वातावरण को बदलते हुये, कुछ अधीर होकर, पूछा, "तो क्या निश्चय किया तुमने राजो?"

"किस बात का निश्चय?" राजो का सरल स्वर था।

"मेरे हाथ पकड़ने की बात का। अभी परसों ही तो मैंने तुमसे कहा था क्या भूल गई?" दुर्गा प्रसाद ने निःसंकोच कहा।

राजवती बोली, "मैंने तो उसे ठठ्ठा समझा था पर तुम यदि वास्तव में गंभीर हो तो मैं कहूँगी कि मैं उसके लिये राजी नहीं हूँ।"

"क्यो? आखिर तुम्हें अड़चन किस बात की है? तुम्हारा कोई देवर तो है नहीं जिसके होते यदि तुम मेरा हाथ पकड़ती तो हमारे समाज को ऐतराज होता। आखिर किसी न किसी का हाथ पकड़ोगी ही। पहाड़ जैसी जिंदगी कब तक ऐसी ही गुजारोगी। तो मेरे साथ सम्बंध करने में तुम्हें क्या आपत्ति है?" कुछ नरमाहट भरे स्वर में दुर्गा प्रसाद ने कहा।

"तुम ठीक कहते हो लेकिन - "

"लेकिन क्या?" राजवती की बात को बीच में ही काटते हुये दुर्गा प्रसाद बोल उठा, "देखो राजो! मेरे घर में मेरे लड़के भोला और मेरे सिवा तीसरा और कोई नहीं है। भगवान की दया से लक्ष्मी की भी कमी नहीं है। हर साल चार नौकर लगते हैं। पचीस एकड़ खेती है। और फिर भोला भी तो तुम्हारे बच्चों की उमर का ही है। यही श्यामा से तीन-चार बरस बड़ा होगा। तीनों साथ रहेंगे। तुम्हारी श्यामा को भी मैं अपने भोला के लिये माँगता हूँ।"

"तुम्हारी आखरी बात को मैं मानती हूँ दुर्गा प्रसाद। समय आने पर मैं अपनी श्यामवती का ब्याह तुम्हारे भोला से जरूर कर दूँगी पर तुम्हारा हाथ पकड़ कर मैं तुम्हारे घर नहीं जाउँगी", दृढ़ता के साथ राजवती ने कहा।

राजवती के इस जवाब से दुर्गा प्रसाद के चेहरे से परेशानी झलकने लगी। कुछ पल चुप रहने के बाद वह परेशानी भरे स्वर में बोला, "लेकिन क्यो? क्या तुम मुझे अपने लायक नहीं समझती या फिर तुम्हें कोई दूसरा पसंद आ गया है?"

"देखो दुर्गा प्रसाद, तुम्हारी दोनों ही बातें गलत हैं। तुम सब प्रकार से योग्य हो और मैंने किसी दूसरे के बारे में सोचा तक नहीं है। पर मैं तुम्हारा हाथ नहीं पकड़ूँगी।" राजवती के स्वर में अभी भी वही दृढ़ता विद्यमान थी।

राजवती का उत्तर सुनकर दुर्गा प्रसाद बोला, "देखो राजो, वैसे तो मैं किसी भी दूसरी स्त्री को अपना हाथ पकड़ने के लिये राजी कर सकता हूँ, पर तुम मुझे भा गई हो। मैं तुम्हारे लिये इंतजार कर सकता हूँ। तुम और भी सोच लेना। जब भी तुम्हारा निश्चय बदल जाये, मुझे बता देना। अभी तो मैं जा रहा हूँ।" इतना कहकर दुर्गा प्रसाद उठा और चला गया।

दुर्गा प्रसाद के जाते ही राजवती ने सदाराम और श्यामवती को हृदय से लगा लिया।

(क्रमशः)
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