Friday, September 14, 2007

धान के देश में - 6

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 6 -

सिकोला पहुँच कर राजवती ने नये जीवन में पैर रखे। उसने अपने आपको ससुराल के योग्य बना लिया। घर में सास, ससुर और श्यामलाल के सिवाय और कोई नहीं था। घर सम्पन्न था तथा किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं था। सास ससुर बहुत दिनों तक जीते रहे किन्तु उनके जीते जी राजवती को कोई सन्तान नहीं हुई। पर उन दोनों ने इसके लिये न तो कभी कोसा और न ही कभी मंशाराम के दूसरे ब्याह की बात की। सास-ससुर का देहांत होने तक राजवती सत्ताइस-अट्ठाइस वर्ष की हो चुकी थी।
राजवती के सास-ससुर की मृत्यु की घटना भी बड़ी अपूर्व थी। दोनों बहुत दिनों से बीमार थे और उसके सास की मृत्यु के दिन दस मिनट बाद ही ससुर की भी मृत्यु हो गई। गाँव के रिवाज के अनुसार खटिया उल्टी की गई और उस पर उन दोनों की लाशें एक साथ रखकर गाँव के पास नाले के किनारे स्थित श्मशान में पहुँचाई गई। वहाँ मिट्टी के टीले गाँव के दिवंगत व्यक्तियों की याद दिला रहे थे। कहीं टूटी खाट पड़ी थी तो कहीं खाट की टूटी रस्सियाँ। एक ही गढ़ा खोद कर दोनों की लाशे दफना दी गईं।

अब घर गृहस्थी का पूरा भार मंशाराम पर आ पड़ा। वह मनमौजी तबियत का आदमी था। राजवती को वह कुछ भी कष्ट नहीं देता था बल्कि अपनी राजो को वह राजरानी बना कर रखता था। उसके मनमौजी होने के कारण गृहस्थी का बोझ यथार्थ में राजवती के सिर पड़ा जिसे उसने बड़ी धीरता और चतुराई से संभाला। इधर उसके मायके खुड़मुड़ी में उसके माता-पिता भी स्वर्ग सिधार चुके थे। वहाँ की थोड़ी-सी पैतृक खेती उसे ही मिली थी जिसकी देखभाल वह समय-समय पर वहाँ जाकर खुद करती थी। सास-ससुर के मरने के सालभर बाद ही सदाराम का जन्म हुआ और उसके जन्म के दो साल बाद श्यामवती का जन्म हुआ। मंशाराम अब मूछों पर ताव देता फिरता था। राजवती के लिये उसका प्रेम चौगुना हो गया था और दोनों बच्चों को प्राणों से भी बढ़ कर चाहता था। पर उसके मनमौजी स्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ा। सिकोला के लोग कहते थे कि श्यामवती और सदाराम के रूप में राजो के सास-ससुर ने ही फिर से जन्म लिया है।

उन्हीं दिनों गाँव में एक साधु आया। साँप पकड़ने के मंत्र में वह सिद्ध था। उसने मंत्रों से कई विषधर पकड़े और लोगों को आमंत्रित किया कि वे भी साँप पकड़ने का मंत्र सीख लें। और तो कोई नहीं पर मंशाराम ने साधु की बड़ी सेवा की और मंत्र सीख लिया। साधु रमता जोगी थे। वे चले गये।
बरसात के दिन थे। भादो का महीना। घनघोर घटा छाई हुई थी। मूसलाधार वर्षा हो रही थी। दिन के बारह बजे होंगे पर काली घटाओं के कारण ऐसा मालूम हो रहा था कि शाम के सात बज गये हों! मंशाराम खेत से लौट रहा था। चौपाल तक आते-आते उसे सुनाई दिया, "साँप साँप"। कुछ ही दूरी पर कुछ लोग जुड़े हुये थे और एक काला नाग सनसनाता हुआ खेत की ओर चला जा रहा था। मंशाराम अकड़ता हुआ भीड़ के पास गया और लोगों को पीछे हटाते हुये कड़क कर बोला, "हट जाओ और अब मेरी करामात देखो।"

उसने मंत्र बुदबुदाते हुये साँप को सिर के पास दबा कर उठा लिया। साँप ने मंशाराम के हाथ को पूरी तरह से जकड़ रखा था। मंशाराम गर्व से छाती फुलाये चला। उसके पीछे हँसती-उछलती भीड़ भी चली। दस कदम ही चलने पर "आह" कह कर गिर पड़ा। मंशाराम के उँगलियों के बंधन में कुछ शिथिलता होने पर अवसर पाकर साँप ने काट दिया था। लोगों में सनसनी फैल गई। क्षण भर में ही यह दुर्घटना सबको मालूम हो गई और लोग दौड़ कर वहाँ इकट्ठे हो गये। मंशाराम के गिरते ही साँप मंशाराम के हाथ को छोड़ कर खेतों की ओर सरकने लगा। बहुत देर तक जकड़े रहने के कारण वह शिथिल हो गया था और जल्दी भाग नहीं पा रहा था। तुरन्त ही लोगों ने उसे लाठियों और पत्थरों से मार डाला। मंशाराम अचेत हो गया। झाड़-फूँक करने और जहर उतारने वाले बुलाये गये। किन्तु मंशाराम फिर कभी नहीं उठा। राजवती रोती-चिल्लाती पछाड़ खाकर लाश पर गिर पड़ी। अंततः मंशाराम की स्याह पड़ी हुई लाश को दफना दिया गया।

राजवती अपने दोनों बच्चों का पालन-पोष करती हुई दुःख के दिन बिताने लगी। घर में काम करने वाला कोई मर्द नहीं रह गया था और वह स्वयं बच्चों के कारण काम के लिये बहुत कम समय निकाल पाती थी। धीरे-धीरे खेत के टुकड़े बिकते गये और सम्पन्नता समाप्त होती गई। इस प्रकार सदाराम सात वर्ष का और श्यामवती पाँच वर्ष की हो गई। वैसे तो गाँव के सभी लोग राजवती के उजड़े परिवार से सहानुभूति रखते थे पर दुर्गाप्रसाद उसके प्रति विशेष प्रेम रखता था और प्रथा के अनुसार उसे 'चूड़ी पहना' कर अपनी पत्नी बना लेना चाहता था पर उस दिन राजो का अंतिम उत्तर सुनकर उसे घोर निराशा हुई।

जिस शाम को दुर्गाप्रसाद निराश होकर राजवती के घर से चला गया उस रात वह सो न सकी। मंशाराम के मरने के बाद उसने किसी के साथ सम्बंध न जोड़ने का निश्चय कर लिया था। आज उसका वही निश्चय घोर विपत्ति में था। दुर्गाप्रसाद की बातों पर बड़ी देर तक सोचने के बाद राजो ने अपने निश्चय पर टिके रहने का दृढ़ संकल्प किया़ उसे ऐसा जान पड़ा मानो उसका घर, गाँव, यहाँ तक कि समस्त संसार उससे दूर जाकर धुँधला होता हुआ अदृश्य हो गया है। पर उसके मुखमण्डल पर दिव्य ज्योति थी।

(क्रमशः)
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