Thursday, September 13, 2007

धान के देश में - 5

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 5 -

राजवती के ब्याह के समय दीनदयाल का बेटा श्यामलाल भी लगभग दस वर्ष का ही था। उसने प्रायमरी पास कर अंग्रेजी पाठशाला में पैर रखा था। तब रायपुर शिक्षा का केन्द्र नहीं था। रायपुर क्या पूरा छत्तीसगढ़ शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़ा हुआ था। जिसके पास पैसों की सुविधा होती वह अंग्रेजी पढ़ पाता था। लोग अंग्रेजी पढ़ना बड़े ही सौभाग्य की बात मानते थे और अंग्रेजी जानने वालों का बड़ा सम्मान होता था। दीनदयाल श्यामलाल को ऊँची से ऊँची शिक्षा दिलाना चाहते थे।

माता-पिता की प्रबल इच्छा यही होती है कि उनकी सन्तान सदैव सुखी रहे। इसके साथ ही वे अपने पुत्र या पुत्री का विवाह भी अपने सामने कर देना चाहते हैं। श्यामलाल की माता भी इसी सुख के लिये बहुत उत्सुक थी। दीनदयाल सुधारवादी थे। वे बाल-विवाह का विरोध करते थे। उनका विचार श्यामलाल के वयस्क हो जाने के बाद ही उसका विवाह करने का था। पर धर्मपत्नी के आगे उनकी एक न चली और कम उम्र में ही श्यामलाल का ब्याह करने के लिये उन्हें विवश होना पड़ा। फिर भी अपनी पत्नी को इस बात के लिये राजी कर लिये कि जब वर-वधू सयाने हो जावेंगे तभी गौना किया जावेगा। उन दिनों एक प्रथा यह भी थी कि यदि लड़की और लड़का बड़े होते तो उनका विवाह और गौना साथ साथ हो जाता था पर यदि दोनों की उम्र छोटी रहती तो विवाह के तीन या चार या पाँच साल बाद गौना और छः-सात साल बाद ही दूसरा गौना कर दिया जाता था। श्यामलाल के लिये इसी प्रथा का पालन किया जाने वाला था।

श्यामलाल का विवाह विन्ध्य प्रदेश में स्थित अनूपपुर में निश्चित हुआ। श्यामलाल की माता की खुशी का ठिकाना नहीं था। लग्न हुआ, सगाई (फलदान या तिलक) हुई। बारात निकलने के तीन दिन पहले दीनदयाल के रायपुर वाले घर के आँगन में 'मड़वा' (मंडप) गाड़ दिया गया और वर को 'तेल-हल्दी' लगाने का नेग शुरू हुआ। उसी दिन से ही 'मड़वा-नेवता' का भी आरम्भ हुआ जिसमें दीनदयाल के रिश्तेदार तथा सहभोजी बारात निकलने के दिन तक भोजन करते रहे। तीसरे दिन बारात जाने की तैयारी हुई। स्त्रियाँ गुड़ियों की तरह रंग-बिरंगे कपड़ों और गहनों में सज-धज कर उल्लास फैलाती हुईं इधर से उधर व्यस्त थीं। कुछ औरतों की प्रसन्नता गीत बन कर गूँज रही थी -

घेरी बेरी बरजेंवँ दुलरू दमाद राय,
दूर खेलन मत जाव हो।
दूर खेलत सुवना एक पायेव,
लइ लानेव बहियाँ चढ़ाय हो।
बारे दुलरुवा के हरदी चढ़त हय,
सुवना करत किलकोर हो।
तुम तो जाथव बाबा गौरी बिहाये,
हमहु क ले लौ बरात हो।
अइसन दुलरू मैं कबहुँ नहिं देखेंव,
सुवना ला लाये बरात हो।

उन दिनों आजकल जैसे बस, मिनीबस आदि की सुविधा रायपुर में उपलब्ध नहीं थी अतः बारात की भीड़ रात के समय रेल्वे स्टेशन पहुँची। छोटे-बड़े सभी मिला कर कोई दो सौ आदमी रहे होंगे। प्लेटफॉर्म पर कुछ बाराती इधर-उधर घूमते हुये और अधिकांश श्यामलाल और दीनदयाल के साथ अपने बिस्तरों और पेटियों के बाजू से बैठे थे। कुछ अधेड़ और बूढ़े बाराती बंद कालर का लंबा कोट, रेशमी धोती, पैरों में मोजे-जूते पहने और सिर पर पगड़ी बाँधे हुये थे। युवकों ने साफ धुली हुई धोती और कमीज से अपना श्रृंगार कर रखा था। उनमें से प्रायः प्रत्येक के सिर पर टोपी थी। बिरला ही एकाध बाराती बिना टोपी का रहा होता। उन दिनों बारात में कोट-पतलून-टाई से सुसज्जित होकर जाना अशुभ, भद्दा और अनुचित माना जाता था।

समय पर पैसेंजर गाड़ी आई। प्लेटफॉर्म पर हो-हल्ला मच गया। उतरने और चढ़ने वाले यात्रियों की भीड़ की हलचल से प्लेटफॉर्म एक छोटा-सा संसार ही बन गया था। दो डब्बों में बारातियों ने अपना कब्जा ऐसा जमाया मानो वे उनके मालिक ही हों। इस तरह से कहकहे लगाते, हा-हू के आलम में खोये सभी लोग अनूपपुर पहुँचे। वहाँ पर बारात की शानदार अगुवानी हुई। कन्या-पक्ष वालों ने विशेष सतर्कता इस बात के लिये दिखाई कि बारातयों को तिल भर भी कष्ट न हो। वहाँ घोड़े पर बैठकर बैण्ड के साथ श्यामलाल की बारात घुमाई गई, बारात के परम्परायें पूरी होने पर रात्रि भोजन का प्रबंध था जिसमें लोग खाते-खाते छक गये पर कन्या-पक्ष वाले श्रद्धापूर्वक खिलाते हुये नहीं थके। दूसरे दिन शुभ लग्न में श्यामलाल का पाणिग्रहण-संस्कार पण्डित जी के द्वारा वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ वैदि पद्धित से सम्पन्न कराया गया। सम्मान और स्नेह पा कर बारात लौट आई।

परम्परा के अनुसार श्यामलाल की बहू ने 'चौथिया-नेवता' में समस्त रिश्तेदारों तथा सहभोजियों को खिचड़ी परसा। दो-चार दिनों के पश्चात् बहू को मायके भेज दिया गया।

(क्रमशः)
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