Thursday, September 20, 2007

धान के देश में - 12

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 12 -

दिन के तीन बजे दुर्गाप्रसाद रायपुर में दीनदयाल के घर के सामने आ पहुँचा जहाँ श्यामवती, महेन्द्र और सदाराम को साथ लिये राजवती रहती थी। वह दरवाजे पर ठिठक गया। उसे याद आ गया कि उसके कारण ही राजवती को सिकोला छोड़ना पड़ा था। उसका हृदय जोरों से धक् धक् करने लगा। कुछ देर के लिये असमंजस की स्थिति में चुपचाप खड़ा रहा। फिर साहस कर के उसने आवाज दी, "राजो!"। आवाज सुनकर राजो ने दरवाजा खोला। दुर्गाप्रसाद को देख कर आदर भरे स्वर में "आवो दुर्गाप्रसाद" कह कर उसे घर के भीतर बुला लिया।
कमरे में आकर बैठते ही दुर्गाप्रसाद ने कहा, "राजो, मैं तो समझ रहा था कि तुम अभी तक मुझसे नाराज होओगी। सबसे पहले तुम मुझे पिछली बातों के लिये माफ कर दो।"
राजवती शान्त भाव से बोली, "मैं तो उन बातों को बहुत पहले भी भूल चुकी हूँ। तुम्हें उसके लिये चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। और फिर उसमें तुम्हारा दोष ही कहाँ था? जैसा रिवाज है वैसा ही तो तुमने किया।"
यह जानकर कि राजवती उसके दोषों को भुला चुकी है या वास्तव में कहा जाय कि उसे क्षमा कर चुकी है दुर्गाप्रसाद के हर्ष का पारावार न रहा। जिस काम के लिये वह आया था उस काम के बनने की उम्मीद भी उसे बँधने लगी। उसने गद्-गद् कण्ठ से कहा, "हमारे समाज कि सभी स्त्रियाँ यदि तुम जैसी हो जायें तो कितना अच्छा हो।"
"पर ऐसा होता कहाँ है?" राजवती बोली, "अब देखो न, जिस दिन मैं सिकोला छोड़ कर खुड़मुड़ी आई उसी दिन की बात है कि अगनू की औरत रधिया, भगवानी के घर घुस गई थी। तुम तो जानते ही हो कि रधिया और भगवानी अलग-अलग समाज के हैं फिर भी ऐसा हुआ।"
"अच्छा तुम्हारे मायके की वो रधिया। उसने केवल उतना ही नहीं किया बल्कि कुछ पहले वह भगवानी को भी छोड़कर किसी और के साथ दूसरे गाँव चली गई। राजो, पढ़ाई-लिखाई में अत्यधिक उपेक्षित होने के कारण ही शायद हमारे गाँवों में ऐसा होता है। पहले मुझे भी ये बातें स्वाभाविक लगती थीं और तुम्हारी बातें मुझे चुभती थीं। किन्तु तुमने मेरी आँखें खोल दीं। मैं समझ चुका हूँ कि जब तक ऐसा होता रहेगा, कोई भी हमें इज्जत की नजर से नहीं देखेगा।" दुर्गाप्रसाद ने अपनी बातों में बुद्धिमानी का पुट देते हुये कहा।
"पर दुर्गाप्रसाद, मुझे विश्वास है कि आज नहीं तो कल हमारे गावों से ये बुराइयाँ अवश्य ही दूर हो जायेंगी। खैर छोड़ो इन बातों को, यह बताओ कि तुम्हारा रायपुर कैसे आना हुआ?"
बातों ही बातों में दुर्गाप्रसाद कुछ देर के लिये अपने पर बीती बातों को भूल गया था। पर राजो के इस प्रश्न ने उसे सारी बातें फिर से याद दिला दीं। उदासी फिर से उसके मुख पर दिखाई देने लगी। वह बोला, "राजो, मैं तो बड़ी विपदा में पड़ गया हूँ और उससे छुटकारा पाने के लिये बहुत सी उम्मीदें ले कर तुम्हारे पास आया हूँ।"
"क्या विपदा आ पड़ी तुम पर?"
"यही मेरा भोला...."
"अरे हाँ, मैं तो भोला के बारे में पूछना ही भूल गई थी।" बात काटती हुई राजवती ने कहा, "अब तो वह भी मेरे सदवा जितना ही बड़ा हो गया होगा। उसका ब्याह किया या नहीं?"
"ब्याह तो नहीं किया और उसी सिलसिले में मैं तुम्हारे पास भीख माँगने आया हूँ।" दुर्गाप्रसाद ने राजवती के सामने मुख्य बात रखी।
"तो इसमें भीख माँगने की क्या बात है? मैं तो पहले ही तुम्हें वचन दे चुकी हूँ कि मेरी सामवती का ब्याह तुम्हारे भोला के साथ कर दूँगी।" राजो ने सीधी-सीधी बात कही।
पहले तो दुर्गाप्रसाद ने सोचा था कि वह राजवती को भोला के कपूत होने के विषय में कुछ नहीं बतायेगा। किन्तु राजवती की बातें सुनकर उसकी आत्मा उसे कचोटने लगी। भोला के विषय में राजो को अंधेरे में रखना उसकी आत्मा सहन नहीं कर पा रही थी। उसने निश्चय कर लिया कि वह राजो से कुछ भी नहीं छुपायेगा। वह बोला, "लेकिन राजो, मैं तुम्हें साफ-साफ बता देना चाहता हूँ कि भोला बड़ा कपूत निकल गया है। उसके करम ऐसे हैं कि उसके लिये किसी से लड़की माँगने जाने पर अवश्य ही लड़की वाला मुझे अपमानित कर के बाहर निकाल देगा। तुमने मुझे वचन दिया था इसलिये बहुत हिम्मत जुटा कर तुम्हारे पास आने का साहस कर पाया हूँ।"
उसकी बातें सुनकर राजवती ने कहा, "तुम्हारी अक्कल पर क्या पत्थर पड़ गये हैं दुर्गा? बेटा सपूत हो या कपूत, आखिर होता तो अपना ही बेटा है न। इस उमर में शरारत नहीं करेगा तो क्या बुढ़ापे में करेगा?"
राजवती की सरल बातें सुनकर दुर्गाप्रसाद एकदम गम्भीर होकर बोला, "राजो, तुम तो रीत की बात कहती हो पर भोला बहुत दूर तक बिगड़ चुका है। तुम्हें पता नहीं है कि मुझे तमाचे मार कर उसने बाप-बेटा के बीच की मरजादा भी तोड़ दिया है।"
"जरूर तुमने ही उसके साथ ज्यादती की होगी, तुम्हें भी बराबरी के लड़के से नहीं लगना चाहिये।" राजवती ने कहा।
"ठीक है। मुझे भी उम्मीद है कि ब्याह हो जने पर सामबती बिटिया अवश्य ही उसे सुधार लेगी।" दुर्गाप्रसाद ने आशा भरे स्वर में कहा।
"जरूर सुधर जायेगा अपना भोला। सामबती उसे सुधारे या न सुधारे, ब्याह के बाद पड़े घर-गिरस्ती का बोझ जरूर ही उसे ठीक रास्ते पर ले आयेगा।"
राजवती की बातों से दुर्गाप्रसाद की आशा की ज्योति और प्रज्वलित हो उठी। उसने पूछा, "तो कब तक यह ब्याह हो जायेगा?"
"बैसाख के महीने में ब्याह करना ठीक रहेगा। उस समय सदवा की भी छुट्टी रहेगी। इसी बीच मैं दीनदयाल काका से भी सलाह ले लूँगी।" राजो ने उत्तर दिया।
दीनदयाल से सलाह वाली बात सुनकर दुर्गाप्रसाद की आशा कमजोर पड़ने लगी। वह कुछ सहम सा गया। उसे लगा कि हाथ में तारा आकर फिर आसमान में जा लटका हो। वह जानता था कि सिकोला में नंगा नाच नाचने वाले भोला की बात दीनदयाल से छिपी न होगी। नाउम्मीदी के स्वर में वह बोला, "दीनदयाल मालिक यदि इस ब्याह के लिये राजी नहीं हुये तो?"
"मैं उन्हें तुमसे अधिक जानती हूँ दुर्गा। वे मेरी इच्छा और रास्ते में रुकावट कभी नहीं बनेंगे। मरजादा के लिये उनसे सलाह लेना मेरा धर्म है। उन्होंने मुझे और मेरे बच्चों को सहारा दिया है। वे मेरे लिये परम आदरणीय हैं।" राजवती ने कहा।
राजो का उत्तर सुनकर दुर्गाप्रसाद चुप हो गया। राजो के मान जाने के लिये उसका रोम रोम राजो का धन्यवाद कर रहा था। उसे लग रहा था कि उसका मनोरथ अब सिद्ध हो जायेगा किन्तु दीनदयाल से सलाह वाली बात उसके मन में निराशा भर रही थी।
आशा और निराशा के झूले में झूलते हुये दुर्गाप्रसाद वहाँ से विदा हुआ।
(क्रमशः)
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