Friday, September 21, 2007

धान के देश में - 13

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 13 -

दीवाली नजदीक थी। महेन्द्र और सदाराम, खूब सारे फटाके और पूजा के लिये लक्ष्मी जी का चित्र लेकर राजो और श्यामवती के साथ खुड़मुड़ी आ गये। उन सबके आ जाने से दीनदयाल और सुमित्रा को बड़ी खुशी हुई।
गाँव के सभी लोगों पर दीवाली के आनन्द का नशा छाया था। सब अपने-अपने घरों की सफाई और लिपाई पुताई करने में लगे थे। साथ ही जुये का जोर भी बढ़ गया था। खुड़मुड़ी गाँव पाटन थाने के अन्तर्गत है। थाने में सरगर्मी बढ़ गई थी। पुलिस वाले जुये की टोह में गाँव-गाँव का दौरा कर रहे थे। स्वयं सब इस्पेक्टर खुड़मुड़ी आये। गाँव के कोटवार भुलउ ने उनकी बड़ी आवभगत की। चौपाल पर खाट बिछा दी गई। उस पर सब इंसपेक्टर बैठ गये। दारोगा का आगमन सुन कर महेन्द्र और सदाराम भी आ गये। तीनों में बातें होती रहीं। भुलउ चुपचाप बैठा था। गाँव के कुछ लोग भी इकट्ठे हो गये थे। दारोगा ने भुलउ को बताया कि वह रात गाँव में ही रहेगा। सुनकर भुलउ दौड़ता हुआ गया और उसके लिये खाट तथा रसद का प्रबंध कर आया। बेगार और रसद अंग्रेजी शासन के युग में साधारण बात थी। दारोगा आये तो थे जुये की खोज में पर गाँव के दो-चार शौकीन लोगों के साथ स्वयं तास की तीन पत्तियाँ और सोलह कौड़ियों से रात भर जुआ खेलते रहे। दीवाली जो थी और दारोगा शौकीन और दिलचस्प आदमी थे। दूसरे दिन वे दूसरे गाँव के लिये रवाना हो गये।
शाम होने के पहले ही गाँव का नाई चैनसिंह दीनदयाल के घर आता, लालटेनों की चिमनियाँ साफ करता और उनमें मिट्टीतेल भर कर सन्धया होते ही उन्हें जला जाता था। रात को सोने के पहले वह फिर आता और भोजन करके खाट पर लेटे हुये दीनदयाल के सिर और शरीर में तेल मलता और तब तक उसके हाथ-पैर दबाता जब तक वे सो न जाते। उसके बाद महेन्द्र के कमरे में जाता, उसके सिर की मालिश करता, बदन पर तेल मलता और पैर दबाता था। महेन्द्र को यह सब पसन्द नहीं था पर छोटा मालगुजार होने के कारण परिपाटी को निभाना पड़ता था। एक दिन उसने चैनसिंह से पूछा, "क्यों चैन, क्या तुमको हम लोगों की सेवा करना अच्छा लगता है?"
चैनसिंह ने तुरन्त ही उत्तर दिया, "छोटे मालिक, आप लोगों की सेवा करने का मौका बड़े भाग से मिला है। अच्छा क्यों नहीं लगेगा।"
महेन्द्र बोला, "देखो चैन, आदमी आदमी तो सभी बराबर हैं। फिर तुम हमारी सेवा क्यों करो? हम अपने सब काम खुद न कर लिया करें?" लेकिन चैनसिंह के मन में महेन्द्र की बात जमी ही नहीं। वह झट से बोल उठा, "ऐसा कैसे हो सकता है छोटे मालिक? आप ठहरे मालगुजार। आप और हम बराबर कैसे हो सकते हैं? कहीं गंगू तेली भी राजा भोज बन सकता है? आप तो हमारे लिये भगवान हैं" कह कर तुरन्त ही महेन्द्र के पाँव छू लिया।
महेन्द्र ने पूछा, "अच्छा यह बताओ कि गाँव भर के लोगों की हजामत बनाने का तुम्हें क्या मिलता है?" महेन्द्र जानना चाहता था कि गाँव में जो व्यवस्था है उससे लोगों में संतोष है या नहीं।
महेन्द्र की बात सुनकर चैन हँस दिया और इस तरह से समझाया मानो महेन्द्र को कुछ मालूम ही नहीं। उसने कहा, "गाँव भर के लिये नाई, धोबी और रावत (छत्तीसगढ़ में मवेशियों की देख-भाल करने वाले) का प्रबंध साल भर के लिये किया जाता है। नाई गाँव वालों की हजामत बनाता है, धोबी कपड़े धोता है और रावत मवेशियाँ चराता तथा दूध दुहता है। बदले में उसे 'जेवर' मिलता है।
"याने लोग तुम्हें गहने देते है?" महेन्द्र ने अनजान बन कर पूछा।
नहीं छोटे मालिक, जेवर का मतलब गहना नहीं होता। आप जेवर नहीं जानते? जेवर कहते हैं उस अनाज को जो गाँव के मालगुजार और किसान हमें फसल कटने पर देते हैं। हर घर के पीछे हमारा अनाज बंधा रहता है। जब मालिक बहुत ही खुश हो जाते हैं या कोई शुभ अवसर आता है तब वे हम लोगों को एकाध खेत भी इनाम के रूप में दे देते हैं। तालाब के नीचे वाले खेत को बड़े मालिक ने तुम्हारे पिता श्यामलाल के ब्याह के समय मुझे दिया था। तुम्हारे पिता बड़े अच्छे थे। वे इस गाँव के रतन थे। भगवान भी तो उन्हें अधिक चाहते थे, इसीलिये तो जल्दी ही उन्हें अपने पास बुला लिया।" कहते कहते चैनसिंह के मन में श्यामलाल के साथ बिताये हुये दिन याद आ गये और उसकी आँखें डबडबा उठीं।
महेन्द्र भी गम्भीर और उदास हो गया। उसे ऐसा लगा कि पिता की याद में वह अब रो ही देगा। उसने सोचा कि मैं भी कैसा अभागा हूँ जिसे अपने पिता को देखने का सौभाग्य तक नहीं मिला।
(क्रमशः)
Post a Comment