Sunday, October 7, 2007

धान के देश में - 29

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 29 -

टाटानगर में जब लोगों ने भोला और बुधराम को एक साथ देखा तब सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। आपस में तरह तरह की बातें होने लगीं। अधिकांश लोग इसी नतीजे पर पहुँचे कि इस तरह के झगड़े और मनमुटाव तो होते ही रहते हैं। फिर उसे ही लेकर कोई कहाँ तक चल सकता है। एक बात पर सभी एक मत थे और कहते थे कि भोला जैसा भोला आदमी दूसरा कोई नहीं होगा, क्योंकि जिस आदमी ने उसकी इज्जत पर हमला किया था उसी को उसने अपना लिया।
श्यामवती को बुधराम के वापस आ जाने और भोला का उसके साथ रहने से आश्चर्य हुआ और भोला पर बेहद क्रोध भी आया पर वह न तो कुछ बोली और न बोलना ही चाहती थी। वह बार बार सोचती थी कि इनको क्या सूझा जो उस बदमाश को साथ ले आये। अन्त में उसकी विचार धारा इस नतीजे पर आकर रुक गई कि बुधराम के बिना उनका पीना रुक गया था, इसीलिये उसे ढूँढ कर ले आये।
कारखाने के मैनेजर से सिफारिश कर भोला ने बुधराम को नौकरी भी दिला दी। दोनों फिर पहले जैसे एक हो गये और शराब की दूकान पर जाकर पीने लगे किन्तु अबकी बार परिस्थिति विपरीत थी। भोला बड़ी चालाकी से कम पीता था और बुधराम को इतनी अधिक पिलाता था कि वह दीन-दुनियाके साथ साथ अपने आपको भी पूरी तरह भूल जाता था।
भोला और बुधराम अलग अलग सेक्शन में काम करते थे। कुछ दिनों के बाद भोला को भी बुधराम के ही सेक्शन में काम करने का अवसर मिल गया। दोनों भट्ठी में कोयला झोंकने का काम करते थे। एक दिन ज्यों ही बुधराम कोयला झोंकने के लिये झुका त्यों ही भोला ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उसे भट्ठी में ढकेल दिया। ठीक उसी समय मैनेजर किसी काम से उधर से निकल रहा था और उसने इस घटना को देख लिया। भोला वहाँ से बेतहाशा भागा और मैनेजर "पकड़ो, पकड़ो" कहता हुआ उसके पीछे दौड़ा पर भोला निकल ही भागा। मैनेजर ने सबको बताया कि भोला खूनी है और उसने बुधराम को भट्ठी के भीतर झोंक दिया है। सुनते ही सब सन्न रह गये। पुलिस को भी सूचना दे दी गई।
भोला हाँफता हुआ घर पहुँचा। उसका रौद्र रूप देखकर श्यामवती एकदम घबरा गई। भोला ने गरज कर कहा, "तुम्हारी इज्जत पर डाका डालने वाले बुधराम को मैंने भट्ठी में ढकेल कर जला दिया है। अब मैं जरूर पकड़ा जाउँगा। मैं नहीं चाहता कि मेरे बाद और कोई तुम्हें छेड़े। इसलिये तुम्हें भी जिन्दा नहीं छोड़ूँगा।" इतना कह कर वह तेजी से घर के भीतर घुस गया और कुछ ही क्षणों में हाथ में फरसा लिये श्यामवती की ओर झपटा। वह समझ गई कि उस पर खून सवार है। प्राणों के मोह ने उसे चपल बना दिया और वह बिजली की भाँति बाहर भागी। उसके पीछे हाथ में फरसा उठाये भोला दौड़ा। श्यामवती परसादी के घर में घुस गई। भोला भी उसके पीछे-पीछे परसादी के घर में घुसने वाला ही था कि उसने देखा कुछ लोग उसके पीछे दौड़े चले आ रहे हैं। उन लोगों को देख कर भोला परसादी के घर में घुसने के बदले एक ओर भाग गया। अब तक कुछ सिपाही भी आ गये थे पर भोला काफी दूर भाग कर सुरक्षित हो गया था। पुलिस ने भोला के घर की तलाशी ली। दो-एक उसके पीछे दौड़े और अन्त में उसके घर के चारों ओर कड़ा पहरा बैठा दिया गया कि शायद वह कहीं लुक-छिप कर आवे।
परसादी के घर घुसते ही श्यामवती बेहोश होकर गिर पड़ी। लोगों ने उसका उपचार किया और वह होश में आई। उसके प्रति सभी की सहानुभूति थी। उससे भोला का घर छुड़वा दिया गया - इस डर से कि कहीं भोला मौका-बेमौका आ न जाय और उसकी हत्या न कर दे। श्यामवती परसादी के घर रहने लगी। भोला की खोज पुलिस के द्वारा जारी थी। श्यामवती इस अचानक आ पड़ने वाली विपत्ति से एकदम घबरा गई थी। धीरे धीरे जब वह कुछ स्वस्थ हुई तब उसे मायके के लोग याद आये। उन लोगों से मिलने के लिये उसका हृदय क्षुब्ध और अशान्त हो उठा। एक दिन वह परसादी से बोली, "परसादी भैया, मैं यहाँ अकेली रह कर क्या करूँगी। इसलिये रायपुर लौट जाना चाहती हूँ जहाँ से खुड़मुड़ी चली जाउँगी।" परसादी काफी बुद्धिमान था और उसने दुनिया देखी थी। वह बोला, "बहन, मैं तु्म्हें अकेली नहीं जाने दूँगा। कुछ दिन ठहरो। तब तक यदि कोई रायपुर जाने वाला होगा तो उसके साथ तुम्हें भेज दूँगा।" कुछ दिन बीतने पर परसादी को पता लगा कि रामनाथ नाम का एक मजदूर रायपुर जाने वाला है। उसके साथ श्यामवती को भेजना निश्चित किया गया।
रामनाथ को कलकत्ते में कुछ आवश्यक काम था इसलिये श्यामवती और रामनाथ दोनों पहले कलकत्ते के लिये रवाना हो गये जहाँ से काम निबटाने के बाद दोनों रेल में सवार होकर रायपुर के लिये चल पड़े।
(क्रमशः)
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