Thursday, October 11, 2007

धान के देश में - 33

लेखक स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
(छत्तीसगढ़ के जन-जीवन पर आधारित प्रथम आंचलिक उपन्यास)

- 33 -

महेन्द्र से मिलने के लिये श्यामवती का हृदय कितना व्याकुल और उतावला हो रहा था यह वही जानती थी। रायपुर पहुँचने पर वह द्विविधा में पड़ गई कि महेन्द्र यहाँ होगा या खुड़मुड़ी में किन्तु अन्त में उसकी आन्तरिक प्रेरणा ने उसे खुड़मुड़ी ही जाने के लिये बाध्य किया। चार मील चलने पर खारून नदी मिली। शिवजी का सुहावना मन्दिर बायीं ओर पड़ता है। श्यामा ने मन ही मन शंकर भगवान को प्रणाम किया। नदी में घुटने तक ही जल था। पार करते समय जल की शीतलता ने हृदय में शान्ति प्रदान किया। गाँव के समीप आने पर उसका हृदय जोरों से धड़कने लगा। गाँव के तीनों विशाल पीपल के पेड़ हहरा रहे थे। उनके हहर हहर स्वर ऐसे मालूम हो रहे थे मानो श्यामवती का स्वागत करते हुये कह रहें हों 'आवो, बिटिया, हमारे प्रदेश का अंचल तुम्हारे सुख-शान्ति के लिये सदैव तत्पर है'।
गाँव के तालाब के पास कुछ बच्चे खेल रहे थे। उन्हें क्या पता कि श्यामवती कौन थी। गाँव के एक बूढ़े की नजर उस पर पड़ी। उसने चौंक कर कहा, "श्यामवती बिटिया, तुम हो। जब से गाँव छोड़ा तुम्हारा पता ही नहीं था। कहाँ रही हो अब तक? कहाँ से आ रही हो?"
"सब कुछ बताउँगी दादा। बड़ी लम्बी कहानी है। माँ यहीं तो है न?" श्यामा ने उत्तर दिया।
"कह नहीं सकता बेटी। कुछ दिनों से काम-काज में ऐसा लगा हूँ कि तुम्हारे घर की ओर जाने का मौका ही नहीं मिला।"
"कोई बात नहीं दादा, मैं घर ही तो जा रही हूँ, पता लग ही जायेगा।" कह कर श्यामा तेजी से चलने लगी। घर पहुँच कर उसने देखा कि दरवाजे पर ताला पड़ा है। समझते देन नहीं लगी कि माँ और भैया सिकोला में होंगे। घर की छाया में विश्राम करने बैठ गई। महेन्द्र से मिलने की उत्कण्ठा उभर आई। वह उठी और महेन्द्र के घर की ओर चली। दो-चार कदम चलने के बाद कुछ सोचा और वापस आ कर फिर छाया में बैठ गई। महेन्द्र के सामने जाने में उसे संकोच हो रहा था। वह बाहर से अपने साथ कृत्रिम जीवन के अनुभवों का जो भण्डार ले आई थी उसने चुपके से उसके मन के कानों में कहा, 'तू पहले माँ से न मिल कर महेन्द्र से मिलेगी तो लोग क्या कहेंगे'। किन्तु श्यामवती की यह शंका एकदम निराधार थी। छत्तीसगढ़ के गाँवों में वह वातावरण था ही नहीं जो श्यामवती देख आई थी। यदि वह महेन्द्र के घर माँ से मिलने के पहले ही चली जाती तो भी लोग कुछ नहीं कहते। इस शंका की अपेक्षा श्यामवती की झिझक अधिक काम कर रही थी। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद वह उठी और सिकोला की ओर चली।
बात की बात में खुड़मुड़ी के कोने कोने में खबर फैल गई कि श्यामवती आई है। महेन्द्र को जब पता लगा तब उसे ऐसा लगा मानो कोई कल्पवृक्ष की कल्पना कर रहा हो और कल्पवृक्ष सामने आ जाय। वह उससे मिलने के लिये अधीर हो उठा। उसने सोचा कि वह स्वयं जा कर श्यामा से मिले पर अब उसके पैरों में मालगुजारी की बेली पड़ी थी। साथ ही पुरुष गर्व लेकर दूसरा विचार भी आया 'मैं क्यों मिलूँ, क्या वह मेरे पास नहीं आ सकती थी'। वह विचारों में उलझ रहा था कि घर के एक बूढ़े नौकर की बड़बड़ाहट सुनाई दी 'वाह री छोकरी, खुड़मुड़ी का आधार ले कर पली-बढ़ी और बरसों बाद यहाँ आने पर भी सुमित्रा मालिकन के दर्शन किये बगैर ही सिकोला चली गई'। इससे महेन्द्र को पता लग गया कि श्यामवती चली गई है। उसके दर्प को आघात पहुँचा। सोचा, उसे बड़ा गरूर हो गया है। फिर विचार आया कि उसका ब्याह हो चुका है, उसे अब पिछले जीवन से क्या मतलब। महेन्द्र मन मसोस कर रह गया।
सिकोला पहुँच कर श्यामवती पहले अपने पैतृक घर में गई। राजवती भोजन करने के बाद आँगन में बर्तन माँज रही थी। उसे देख कर श्यामा "माँ" कहती हुई दौड़ कर उससे ऐसी लिपट गई जैसे कोई बछिया अपनी माँ के पास दौड़े। राजो का मन खुशी से नाच उठा। दोनों की आँखें अविरल आँसू बहा रहीं थीं। दोनों एक दूसरे को अपलक नयनों से देख रहीं थीं। भावनाओं की बाढ़ सामान्य स्थिति में आने के बाद राजो के चरणों के पास श्यामवती बैठ गई। राजो ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी, "कहाँ रही? कैसी रही? अकेली ही आई है क्या? रास्ते में तुझ पर क्या बीती?" श्यामा ने उसके प्रश्नों के उत्तर देने के बदले कहा, "भैया कहाँ हैं?" उसके इस प्रश्न पर राजवती को ध्यान आया और वह बोली, "अरे, मैं भी कैसी पगली हूँ। सदाराम के बारे में बताना ही भूल गई। वह चन्दखुरी में छोटे मैनेजर की नौकरी कर रहा है। डेढ़ सौ रुपये तनखा है। और हाँ, उसकी शादी भी हो गई है। बड़ी सुंदर और सुशील है मेरी बहू।"
सदाराम के ब्याह की सूचना से श्यामवती को अपार सुख मिला पर साथ ही रंज भी हुआ जिसे उसने यों व्यक्त किया, "भैया के ब्याह में तुम लोगोंने मुझे पूछा तक नहीं। मेरी छोड़ी हुई चिट्ठी से तो तुम्हें पता ही रहा होगा कि मैं कालीमाटी में हूँ। कैसे पूछते, मैंने भी तो तुम्हें कोई चिट्ठी तक नहीं लिखा था।"
"नहीं बिटिया, ऐसी बात नहीं है। सदाराम खुद तुझे लाने के लिये गया था। वहाँ उसे भोला की करतूत मालूम हुई। यह भी पता चला कि तू घर के लिये रवाना हो चुकी है। मैं छिन-छिन तेरा रस्ता देखती रही। रोते रोते मेरी आँखें व्याकुल हो गईं। पर तू नहीं आई। तब हम लोगों को और भी फिकर हुई कि तुझे कहीं किसी विपद् ने तो नहीं घेर लिया। बिटिया, मेरे मन में तेरी ही याद के सिवाय और कुछ नहीं था।" राजो की बात सुन कर श्यामा समझ गई कि जिन दिनों वह आश्रम में नरक-यातना भोग रही थी उन्हीं दिनों सदाराम का ब्याह हुआ। राजवती ने कहा, "अच्छा, अब हाथ-पैर धो कर कुछ खा पी ले। बातें फिर होती रहेंगी। तेरे बिना मैं तो मरी हुई-सी थी। तू क्या आ गई, मेरे प्राण लौट आये।"
हाथ-मुँह धोने के बाद श्यामवती खाने बैठी। राजो ने बचा हुआ भोजन परोस दिया। कितने दिनों बाद श्यामा को माँ के हाथ का भोजन मिला था। अमृत भी उस भोजन के सामने तुच्छ था। एक एक दाने में अक्षय तृप्ति थी। भोजन के उपरान्त माँ-बेटी बातों में खो गईं। श्यामा ने अपनी रामकहानी कह सुनाई। सुन कर राजो अपने आँसुओं की बढ़ न रोक सकी। विपत्तियों के कराल मुख से बच कर आने वाली बेटी को माँ ने हृदय से लगा लिया। फिर राजो ने इधर का सब हाल बताया। दीनदयाल की मृत्यु का प्रसंग आते ही दोनों श्रद्धा और विषम विषाद से रो उठीं। महेन्द्र और सदाराम की ऊँची शिक्षा के विषय में सुन कर श्यामवती फूली न समाई।

सिकोला में सबको खबर लग गई कि श्यामा आई है। दुर्गाप्रसाद दौड़ा आया। राजो से उसे भोला के कारनामों का पता पहले ही लग चुका था। आते ही उसने कहा, "बेटी, अच्छा हुआ जो भगवान ने तुझे दुष्ट भोला से छुटकारा दिला दिया और तू कुशल पूर्वक वापस आ गई।" श्यामवती चुपचाप उठी और दुर्गाप्रसाद के पैर छुये। श्यामवती से कालीमाटी में होने वाली दुर्घटना का सच्चा हाल मालूम होने पर दुर्गाप्रसाद बोला, "बड़ा नालायक था। जब तक यहाँ रहा, गाँव वालों को तंग करता रहा, बाप को बाप न समझा और वहाँ जाने पर राक्षस का काम किया। चलो बच कर भाग निकला यही गनीमत है।"
श्यामवती सदाराम से मिलने के लिये व्यग्र हो रही थी। महेन्द्र से मिलने के लिये भी आकुल थी पर उसके लिये राजो को यह बताना कि 'भैया से मिलना है' जितना सरल था उससे कहीं अधिक यह कहना कठिन था कि 'महेन्द्र से मिलना है'। साथ ही उसे इस बात की भी ग्लानि हो रही थी कि सिकोला आने से पहले जब वह खुड़मुड़ी में थी तो उसे महेन्द्र से मिल लेना चाहिये था।
दो दिन सिकोला में रह कर चन्दखुरी जाने का निश्चय किया गया। दो दिन बीतने पर राजो और श्यामा सिकोला से चलीं। सिकोला से आगे पहला गाँव खुड़मुड़ी ही था। वहाँ पहुँचने पर राजवती ने कहा, "चलो, महेन्द्र से मिल लें और तू सुमित्रा मालकिन के दर्शन भी कर ले।" श्यामा कुछ नहीं बोली। मौन सम्मति का लक्षण था। वह राजो के साथ चुपचाप महेन्द्र के घर की ओर चलने लगी। उसका हृदय सुख-दुःख की भावनाओं से ओत-प्रोत हो रहा था। उसे ऐसा लग रहा था मानो प्रलय और सृष्टि एक साथ ही होने वाली है। दोनों महेन्द्र के आँगन में पहुँचे तो देखा कि वह कुर्सी पर बैठा रजिस्टर में कुछ लिख रहा है। पीठ उसकी दरवाजे की ओर थी। राजो ने पुकारा, "महेन्दर"।
महेन्द्र ने मुँह घुमा कर देखा। श्यामवती को अपने पास पाकर उसे कोई विस्मय नहीं हुआ। उसके आने के बारे में तो वह सुन ही चुका था। साथ ही यह भी जानता था कि यदि श्यामा अकेली नहीं आयेगी तो राजो उसे अवश्य ही साथ लायेगी। महेन्द्र के मन में पिछली बातों की स्मृतियों और भावनाओं का तूफान उमड़ रहा था। पर उसने मन पर अंकुश लगा कर शान्त भाव से पूछा, "श्यामवती, कब आई हो?"
श्यामवती महेन्द्र का सामना होते ही काँप उठी थी। उसके चेहरे पर एक के बाद एक भावनायें आ आ कर मिटती जा रही थीं। नेत्र दोनों के एक दूसरे पर लगे हुये थे। श्यामवती सोच रही थी क्या मेरे इस देवता के मन में मेरे लिये अब भी वही भाव है जो पहले था या फिर तब के प्रेम का अंकुर समय की आँधी में कहीं उखड़ तो नहीं गया। जहाँ तक मेरा प्रश्न है सभी परिस्थितियों में मेरा मन तो अपने इस देवता का ध्यान करता ही रहा है। महेन्द्र भी सोच रहा था - क्या श्यामा का मन अब भी वही है जो ब्याह के पहले था।
"तीन दिन हुये आये" श्यामवती ने उत्तर दिया। उसके स्वर का कम्पन महेन्द्र से छिप न सका। दोनों को ऐसा लग रहा था अब रोत हैं - अब रोते हैं। बड़ी कठिनाई से दोनों आँसू रोके हुये थे।
इतने में ही रसोई घर से सुमित्रा बाहर आई। श्यामवती को देख कर पूछा, "कब आई श्यामवती।?"
"तीन दिन हुये।" और श्यामा ने पैर छू कर सुमित्रा को प्रणाम किया आँगन में ही सब बातों में उलझ गये। राजो और सुमित्रा का एक और महेन्द्र-श्यामवती का दूसरा गुट बन कर बातों में खो गया। झिझक जब तक रहती है तभी तक ही रहती है। श्यामवती और महेन्द्र की झिझक मिट गई थी। थोड़ी ही देर में दोनों को ऐसा लगने लगा मानो उनके बीच कोई व्यावधान रहा ही न हो। थोड़ी देर में बचपन से लेकर अब तक की सब बातें हँस हँस कर उन दोनों ने कर डालीं। दोनों एक दूसरे से अपना पूरा पूरा वृतान्त बताते समय कुछ भी नहीं छिपाया। यह जान कर कि महेन्द्र उसे ढूँढने के लिये कलकत्ता गया था और वहाँ उषा का उस पर तिल भर भी प्रभाव नहीं पड़ा, श्यामवती को गर्व का अनुभव हुआ।
सुमित्रा ने एक बात पर ध्यान दिया। उसने देखा कि लम्बे अर्से के बाद श्यामवती को देख कर आज महेन्द्र विशेष रूप से प्रसन्न हुआ है। उसके मन में केवल यही विचार आया कि दोनों का परिचय बचपन से ही घनिष्ठ होने से ऐसा हुआ है। उसने कहा, "श्यामवती, बहुत दिनों के बाद आज तेरे सामने इसे खुश और हँसता हुआ देख रही हूँ। इसे तू ही समझा कि घर और मालगुजारी का बोझ सिर पर पड़ जाने से क्या कोई इस तरह गम्भीर हो जाता है।" श्यामवती चुप रही, वह क्या कहती।
महेन्द्र के घर से निकल कर राजो और श्यामवती ने चन्दखुरी का रास्ता पकड़ा। वहाँ पहुँच कर वे सदाराम और जानकी से स्नेहपूर्वक मिलीं। श्यामा को जानकी बहुत अच्छी लगी। दो दिनों में ही वे दूध और शक्कर की तरह घुल-मिल गईं। दोनों में स्वभाव-साम्यता होना ही इसका एक मात्र कारण था।
कुछ दिन रह कर साथ में जानकी को भी ले कर राजवती और श्यामवती सिकोला लौट आई। सिकोला पहुँच कर श्यामवती अपने ससुर दुर्गाप्रसाद का ध्यान रखने लगी। दुर्गाप्रसाद को शायद पहली ही बार जीवन सुखी और जीवित रहने के योग्य मालूम हुआ। बेटे को खोकर बहू के रूप में उसे बेटी मिल गई थी। कितना अन्तर था भोला और श्यामा में। वह दुष्टता का अवतार था तो यह नम्रता की देवी। यों तो दुर्गाप्रसाद का मन पहले ही भोला से फट चुका था, अब श्यामवती का स्नेह पाकर उसे लगभग भूल ही गया।
राजो और सुमित्रा को एक ही चिन्ता थी कि अब महेन्द्र का ब्याह हो जाना चाहिये। एक महेन्द्र था, जो ब्याह करना ही नहीं चाहता था। और दूसरी श्यामवती थी जो जानती थी कि महेन्द्र क्यों ब्याह नहीं करना चाहता।
(क्रमशः)
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