Wednesday, June 30, 2010

हम सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं या सुविधाओं का दास बन चुके हैं?

घर से निकलने के कुछ देर बाद रास्ते में अचानक याद आया कि मैं अपना मोबाइल घर में ही भूल आया हूँ। एक बार सोचा कि चलो आज बगैर मोबाइल के ही काम चला लें किन्तु रह-रह कर जी छटपटाने लगा। घर से बहुत दूर तो नहीं पहुँचा था पर एकदम नजदीक भी नहीं था इसलिये घर वापस जाकर मोबाइल लाने की इच्छा नहीं हो रही थी पर मेरी छटपटाहट ने मुझे घर वापस जाकर मोबाइल लाने के लिये मुझे विवश कर दिया।

मैं सोचने लग गया कि यदि आज मेरे पास मोबाइल नहीं भी रहता तो सिर पर कौन सा पहाड़ टूट जाता? मोबाइल पर जिनसे भी और जो कुछ भी मेरी बात होती है वे कितनी आवश्यक होती हैं? क्या ललित शर्मा जी, राजकुमार सोनी जी, अजय सक्सेना जी आदि से मोबाइल में उनके पोस्ट और टिप्पणियों के बारें में बात करना बहुत ही जरूरी है? क्या एक दिन मोबाइल से अपनी पसंद के गाने सुने बिना रहा ही नहीं जा सकता?

मोबाइल एक सुविधा है जिसका उपभोग आवश्यकता के समय करना अवश्य ही उचित है किन्तु लोगों से घंटों अनावश्यक बातें करते रहने का क्या औचित्य है? ऐसा करना क्या अपने समय और धन की बरबादी नहीं है?

मोबाइल पास में न रहने से जो छटपटाहट होती है क्या वह यह सिद्ध नहीं करती कि हम पूर्ण रूप से मोबाइल के दास बन चुके हैं?

18 comments:

रंजन said...

दिल है की मानता नहीं..

मुझे लगता है की हम भारतीय मोबाइल के लिए बहुत पजेसिव है.. एक पल के लिए भी फोन नहीं छोड़ना चाहते.. जबकि मेरे यूरोपीय और अमरिकी साथी.. शनिवार रविवार शाम को पांच बजे के बाद मोबाइल की तरफ देखते ही नहीं...

महेन्द्र मिश्र said...

हम ....सुविधाभोगी हो गए हैं ....

महेन्द्र मिश्र said...

हम ....सुविधाभोगी हो गए हैं ....

जी.के. अवधिया said...

महेन्द्र मिश्र

सुविधाभोगी होने तक तो ठीक है किन्तु सुविधाओं का दास बन जाना?

डॉ टी एस दराल said...

सुविधाओं का उपभोग करना तो सही है । वर्ना क्या अभी भी बैल गाड़ी में चलना चाहेंगे ?
लेकिन इनके वश में होना सही नहीं ।
इसलिए कभी कभी इनसे व्रत भी रखना चाहिए ।

निर्मला कपिला said...

बिलकुल आपकी बात से सहमत हूँ हम सही मे बहुत सी सुविधाओं की दास न गये हैं।

AlbelaKhatri.com said...

sach !

aapne sahi kaha........

durbhaagya hai ki hum suvidhaaon ke daas ho gaye hain

अन्तर सोहिल said...

बिल्कुल सही कहा जी
हम सुविधाओं के दास बन गये हैं
मोबाईल भूल जाने पर ऐसा लगता है कि जैसे आज हमने कच्छा नहीं पहना हुआ:-)
मेरा मतलब बार-बार उसी की याद आती रहती है।

प्रणाम

महफूज़ अली said...

आपकी यह पोस्ट दिल को छू गई....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

विचारणीय.....सुविधा तक ठीक है...पर उसके बिना छटपटाहट ठीक नहीं

माधव said...

nice

ललित शर्मा said...

Nice

राजकुमार सोनी said...

आपने बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है।
इस विषय पर तो सोचा ही नहीं।

राज भाटिय़ा said...

अजी सही कहा आप ने मेरे पास दो मोबाईल है, एक जिस का नम्बर सब के पास है उसे हमेशा नही रखता अपने पास, दुसरा जिस का ना० सिर्फ़ बीबी ओर बच्चो के पास है उसे हमेशा अपने पास रखता हुं, लेकिन अगर कभी उसे भुल भी जाऊ तो कोई बात नही, यानि इन का दास नही बना, दुसरी बात मेरे किसी भी मोबईल का ना० मेरे बास के पास नही.बाकी रंजन जी की बात से सहमत हुं

ajit gupta said...

असल में मोबाइल और उसका बारबार बजना स्‍टेटस सिम्‍बल बन गया है। कई बार तो किसी से मिलने जाओ और उससे बात ही नहीं हो पाती क्‍योंकि वह तो मोबाइल पर ही लगा रहता है। इसलिए इसके उपयोग को भी नियमित करना चाहिए।

प्रवीण पाण्डेय said...

आपका कहना बिल्कुल सच है । हाथ में मोबाइल न रहने से कुछ खटकता सा है ।

girish pankaj said...

aapne theek farmayaa hai. lekin ab yah jeevan ka hissa hai...isake binaaadhoora har kissaa hai. gir bhi kabhi-kabhi mai janboojh kar mobile-mukt ho jataa hooo.

बेचैन आत्मा said...

suvidha hai to suvidha bhogi bhii hain. daas hona ya niyantrak hona apne uupar hai.