Friday, July 2, 2010

सच बोलूँगा तो माँ मारेगी और झूठ बोलूँगा तो बाप कुत्ता खायेगा

एक फिल्म आई थी "साधू और शैतान" और उस फिल्म के कामेडियन हीरो नायक ने उसमें एक डॉयलाग बोला था "सच बोलूँगा तो माँ मारेगी और झूठ बोलूँगा तो बाप कुत्ता खायेगा"

मेरे साथ गाहे-बगाहे ऐसी परिस्थितियाँ आती रहती हैं कि 'सच बोलूँगा तो माँ मारेगी और झूठ बोलूँगा तो बाप कुत्ता खायेगा'। स्वैच्छिक सेवानिवृति के बाद इंटरनेट में झक मारते रहता हूँ ताकि कुछ कमाई हो जाये। एक जगह 'सेल्फ ड्राफ्टिंग' का काम भी करता हूँ। इंटरनेट से चाहे कमाई हो या न हो पर जहाँ काम करने जाता हूँ वहाँ से तो कुछ रुपये बन ही जाते हैं।

सच पूछो तो ये 'रुपया' भी बहुत कमीनी चीज है। जिसके पास नहीं है क्या क्या नहीं करवाता उससे? अकरणीय से भी अकरणीय करवाता है, इज्जत-आबरू तक उतार देता है। जिसके पास नहीं है उसे तो तंगाता ही है और जिसके पास है उसे भी बर्बाद करने पर तुला रहता है। पर किसी ने ठीक ही कहा है कि संसार में रुपया ही सब कुछ नहीं है, रुपये से बढ़ कर भी बहुत सारी चीजें हैं पर मुश्किल यह है कि वे चीजें भी रुपये से ही खरीदनी पड़ती हैं।

आप यही सोच रहे हैं न कि मैं नशा करके लिखने बैठा हूँ, बहक गया हूँ, विषय कुछ है और लिख कुछ रहा हूँ। पर ऐसा कतइ नहीं है। मैं विषयान्तर नहीं कर रहा हूँ जनाब, आ रहा हूँ विषय पर। बात यह है कि मैं झूठ को पसंद नहीं करता। अब आप सोचेंगे कि मैं धार्मिक हूँ, आदर्शवादी हूँ, महान हूँ, ये हूँ, वो हूँ, न जाने क्या क्या हूँ और इसीलिये झूठ को पसंद नहीं करता। पर आपकी सोच बिल्कुल गलत है। दरअसल मैं जब भी झूठ बोलता हूँ तो तत्काल पकड़ा जाता हूँ और सिर्फ इसीलिये मैं झूठ को पसंद नहीं करता। हमेशा छीछालेदर करवा देता है मेरा।

तो मैं बता रहा था कि मैं कहीं पर सेल्फ ड्राफ्टिंग का काम भी करता हूँ। मेरा पूरा काम 'करेस्पांडिंग' का है। सारी चिट्ठी-पत्री अंग्रेजी में होती हैं और 'बॉस' अंग्रजी समझ तो लेता है पर 'ड्राफ्टिंग' नहीं कर पाता। इसीलिये मुझे क्या लिखना है हिंदी में बताया जाता है और मैं उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर के तथा टाइप कर के दे देता हूँ। और इसी काम की वजह से ऐसी परिस्थिति में फँस जाता हूँ कि 'सच बोलूँगा तो माँ मारेगी और झूठ बोलूँगा तो बाप कुत्ता खायेगा'।

आगे की बात लिखने के पहले यह बता दूँ कि यह कहावत कैसे बनी। बात यह है कि लड़के के बाप ने बड़े शौक से मटन लाकर अपनी पत्नी को दिया और बोला कि इसे तैयार कर के रखना। ड्यूटी से वापस आकर खाउँगा। लड़के की माँ ने मटन बनाया और कैसा बना है जानने के लिये चखा। मटन इतना जोरदार बना था लड़के की माँ को बार-बार उसे चखने की इच्छा होने लगी और चखते-चखते वह पूरा मटन चट कर गई। मटन के खत्म हो जाने पर उसे भय ने घेरा कि पति वापस आयेगा तो बहुत नाराज होगा। उसे एक उपाय सूझा, उसने पास के मुहल्ले के एक आवारा कुत्ते को मारा और उसके मटन को पका कर रख दिया। लड़का सब कुछ देख रहा था और परेशान था कि क्या करूँ। 'सच बोलूँगा तो माँ मारेगी और झूठ बोलूँगा तो बाप कुत्ता खायेगा'।

हाँ तो जहाँ मैं सेल्फ ड्राफ्टिंग का काम करता हूँ वहाँ का 'बॉस' बहुत रुपये वाला आदमी है। बहुत बड़ा व्यवसाय है उसका। पर वहाँ पर सच का प्रयोग 'दाल में नमक' के हिसाब से किया जाता है। रुपये यदि लेने के निकलते हैं तो देनदार को फोन पर फोन करके ऐसा तंगाया जाता है कि 'नानी याद आ जाये'। जितना लेना निकलता है उसमें पता नहीं क्या क्या चार्जेस, ब्याज आदि जोड़ कर अधिक से अधिक बताये जाते हैं। और अगर रुपये किसी को देने के निकलते हैं तो ऐसे आदमी को फोन अटेंड करने के लिये कहा जाता है जिसे कि लेनदार जानता ही नहीं। (आजकल कॉलर आईडी फोन और मोबाइल होने के कारण पता तो चल ही जाता है कि फोन किसका है।) और फोन अटेंड करने वाला बड़े मजे के साथ कह देता है कि 'बॉस' आवश्यक मीटिंग में है, मुख्यालय से बाहर गया है आदि आदि। वैसे 'बॉस' भी अपनी जगह सही है, यदि व्यवसायी झूठ नहीं बोलेगा तो रुपये कैसे कमायेगा।

तो साहब झूठ बोलने तक ही सीमित रहे वहाँ तक तो ठीक है पर मुझसे तो चिट्ठी पत्री में भी झूठ लिखने के लिये भी कहा जाता है। मैं मना करने की कोशिश करता हूँ तो 'बॉस' कहता है, "अरे अवधिया जी, बोलने से ही तो आपका झूठ पकड़ा जाता है न, आपके चेहरे के भाव देख कर या आपकी आवाज सुन कर। पर चिट्ठी में न तो आपके चेहरा दिखाई पड़ता है और न ही आपकी आवाज सुनाई पड़ती है। फिर क्यों मना करते हैं आप?"

अब क्या करूँ साहब, झूठ लिखने के लिये अंतरात्मा (यदि इस नाम की कोई वस्तु हो तो) धिक्कारती है और 'बास' के अपने साथ अच्छे व्यवहार तथा रुपये कमाने की लालसा के कारण काम छोड़ना हो नहीं पाता। बस इसीलिये ऐसी परिस्थितियों में फँस जाता हूँ कि 'सच बोलूँगा तो माँ मारेगी और झूठ बोलूँगा तो बाप कुत्ता खायेगा'।

8 टिप्पणियाँ:

अन्तर सोहिल said...

@ आदरणीय
अगर आप बॉस या उस कम्पनी के बारे में यह सब नहीं जानते होते तो क्या आपकी अंतरात्मा धिक्कारती, नहीं ना। आप निर्लिप्त होकर अपना कार्य करते रहिये।

प्रणाम स्वीकार करें

राज भाटिय़ा said...

जी.के. अवधिया जी अब क्या कहे, हम तो कभी ऎसी स्थिति मै फ़ंसे नही, आप बढे है, आप को क्या राय दे, लेकिन मेरे एक बहुत अच्छे दोस्त को झुठ बोलने की आदत है, जिस पर मै बहुत विश्वास करता था, ओर उस के झुठ बोलने मात्र से मुझे दो तीन लाख का नुकसान हो गया, मै चुप रहा, दोस्ती नही तोडी लेकिन अब पहले वाली बात भी नही रही, इस लिये आप खुद विचारे

सूर्यकान्त गुप्ता said...

आदरणीय अवधिया साहेब! नमस्कार! बहुत ही कड़वा सच आपने यहां प्रस्तुत किया है। आभार! जब नौकरी की बात आती है तो जिसका खाते हैं उसकी तो बात माननी ही पड़ती है। क्या किया जा सकता है?

शिवम् मिश्रा said...

सही कह रहे है आप जीवन में अक्सर ही ऐसे ही मौका आते रहते है ! जब समझ में नहीं आता कि सच का साथ दें या झूट का !

प्रवीण पाण्डेय said...

झूठ बोलने में निपुण होने के लिये कई पापीय पाठ्यक्रम पास करने पड़ते हैं ।

PADMSINGH said...

अच्छी पोस्ट ... आदरणीय मै पिछले एक वर्ष से इसी सच का भुक्तभोगी हूँ ... भ्रष्टाचार का विरोध करने के एवज़ मे बॉस ने घर बैठा कर वेतन देना उचित समझा ... क्योकि वेतन उनकी जेब से न् जा कर विभाग का है ...हर परिस्थिति मे सही और गलत के मायने अलग तरह से हो जाते हैं
अभी मै सच और झूठ के औचित्य की खोज मे हूँ मिलने पर दुबारा आऊंगा ... नमस्ते

राम त्यागी said...

बढ़िया बात कही है आपने. पहली बार सुना है ये मुहावरा मैंने तो ...वैसे नौकरी पर हम वही करते है जो सही होता है, मैंने कभी बॉस नाम कि चीज के बारे में नहीं सोचा ...:) ज्यादा होगा तो देश वापस आकर खेती करेंगे

निर्झर'नीर said...

सच बोलूँगा तो माँ मारेगी और झूठ बोलूँगा तो बाप कुत्ता खायेगा

abhar aapne itne sarthak muhaavre ki jaankari dii

 
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