Wednesday, September 1, 2010

कृष्ण और राम – असमानता में समानता

श्री कृष्ण और श्री राम दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार हैं किन्तु यदि देखा जाए तो दोनों का चरित्र एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होते हैं।

श्री राम का जन्म त्रेता युग में चैत्र शुक्ल नवमी को दिन के ठीक बारह बजे हुआ था जबकि श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में भादों के कृष्णपक्ष अष्टमी को रात्रि के बारह बजे हुआ। जहाँ राम के जन्म के समय चारों ओर उजाला ही उजाला है वहीं कृष्ण के जन्म के समय घटाटोप अंधेरा है, मूसलाधार वर्षा होने के कारण अंधेरे की कालिमा अत्यधिक बढ़ गई है। सिर्फ रात और दिन तथा उजाला और अंधेरा का ही अन्तर नहीं है बल्कि पंचांग के हिसाब से तिथि भी एकदम विपरीत है। हिन्दू वर्ष बारह चन्द्रमासों का होता है और चैत्र माह से ठीक छः माह बीतने के बाद भादों माह आता है। जहाँ राम का जन्म शुक्लपक्ष में हुआ है वहीं कृष्ण का जन्म कृष्णपक्ष में हुआ है।

दूसरा बहुत बड़ा अन्तर है दोनों के वैवाहिक जीवन में। राम एकपत्नी व्रत रखते हैं तो कृष्ण की सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ हैं। राम स्वयं को सद् गृहस्थ दर्शाते हैं जबकि देखा जाये तो गृहस्थी का सुख उन्हें नहीं के बराबर ही मिला है। विवाह के कुछ दिनों पश्चात ही वनवास हो जाता है। वन में भी रावण उनकी पत्नी को हर कर ले जाता है। रावण का वध कर के पत्नी को जब वे वापस लाते हैं तो लोकापवाद के भय से उन्हें पत्नी का त्याग करना पड़ जाता है। तात्पर्य यह कि गृहस्थी का सुख उन्हें मिला ही नहीं फिर भी वे स्वयं को सद् गृहस्थ कहते हैं। इसके ठीक विपरीत कृष्ण को सदैव ही गृहस्थी का सुख मिला है, रुक्मणी; जाम्बवन्ती; सत्यभामा; कालिन्दी; मित्रबिन्दा; सत्या; भद्रा; लक्ष्मणा आठ पटरानियों के साथ ही साथ उनकी शेष सभी रानियाँ सदैव उनकी सेवा में प्रस्तुत रहती हैं किन्तु वे स्वयं को ब्रह्मचारी कहते हैं। जी हाँ अभिमन्यु के वध के पश्चात् जब सुभद्रा को मोह हो जाता है तो वे स्वयं के ब्रह्मचर्य शक्ति से ही सुभद्रा से अभिमन्यु की आत्मा का मिलाप करा के उनका मोह भंग करते हैं।

श्री राम मर्यादापुरषोत्तम कहलाते हैं क्योंकि उन्होंने सभी कार्य मर्यादा में रह कर ही किया किन्तु श्री कृष्ण ने मर्यादा को कभी बहुत अधिक महत्व नहीं दिया, अर्जुन की सहायता करने के लिये अपना वचन भंग करके शस्त्र धारण कर लिया, द्रोणाचार्य के वध के लिये धर्मराज युधिष्ठिर को असत्य का सहारा लेने के लिये प्रेरित कर दिया।

राम अपने मित्रों को बिना माँगे ही उनकी वांछित वस्तु दे देते हैं जैसे कि सुग्रीव और विभीषण को उन्होंने बिना माँगे ही क्रमशः बालि और रावण का राज्य प्रदान कर दिया। इसके विपरीत कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को उसके याचना करने के बाद ही वैभव प्रदान किया।

देखा जाये तो बहुत सारी विपरीतियाँ हैं दोनों अवतारों में किन्तु सभी विपरीतियों के बावजूद भी सबसे बड़ी समानता है कि दोनों अवतारों ने अपने काल में लोगों को त्रास, अन्याय, अधर्म आदि से मुक्ति दिलाई।

चलते-चलते

कृष्ण एक असाधारण पुरुष

चाहे कोई कृष्ण को अवतार माने या केवल एक ऐतिहासिक पात्र माने पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि वे एक असाधारण पुरुष थे। यही कारण है कि पौराणिक कथाओं से लेकर मध्यकालीन कवियों कि रचनाओं तक में वे एक प्रमुख पात्र रहे हैं। उनका व्यक्तित्व इतना असाधारण था कि न केवल हिन्दू बल्कि अन्य धर्मावलम्बियों में भी कृष्ण के भक्त पाये जाते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भी श्री कृष्ण का विशेष व्यक्तित्व रहा है और इसीलिये भगवान विष्णु के दस अवतारों में से सिर्फ कृष्णावतार को ही पूर्णावतार माना गया है क्योंकि सभी दस अवतारों में सिर्फ श्री कृष्ण ही सोलह कलाओं से परिपूर्ण थे जो कि उन्हें पूर्णत्व प्रदान करता है।

गीता में श्री कृष्ण ने 'कर्म करो और फल की चिंता मत करो' कह कर बहुत ही सरल शब्दों में समस्त मानव जाति को जीवन के गूढ़ रहस्य से परिचय करवा दिया है। वास्तव में उनका यह संदेश किसी जाति, सम्प्रदाय या धर्मविशेष के लिये न होकर समस्त मानव जाति के लिये है।

कृष्ण जैसा अद्भुत तथा महान चरित्र न तो उनके जन्म के पहले ही कभी देखने में आया और न ही बाद में कभी आयेगा। यह चरित्र तो भूतो न भविष्यति बन कर रह गया है। इसी कारण से समस्त विश्व में कृष्ण के अनुयायी पाये जाते हैं।
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