Friday, September 3, 2010

एक बार पढ़ा है और बार-बार पढ़ने की इच्छा है

मैं ऐसी रचनाओं की बात कर रहा हूँ जिन्हें बार-बार पढ़ने के बाद भी मैं नहीं अघाता पर उस बात पर आने के पहले यह बता दूँ कि इस पोस्ट का शीर्षक मैंने किस आधार पर दिया है। स्कूल के दिनों में मैंने 'किस्सा हातिमताई' पढ़ा था, जिसे बाद में फिर कभी पढ़ने का मौका ही नहीं मिला। हातिमताई से पूछे गए सात सवालों में से एक सवाल मेरी याददाश्त के अनुसार ऐसा था "एक बार देखा है और एक बार देखने की चाहत है"। मुझे लगा कि ऐसा ही कुछ शीर्षक शायद लोगों को आकर्षक लगे, सो मैंने इस पोस्ट का शीर्षक रख दिया "एक बार पढ़ा है और बार-बार पढ़ने की इच्छा है"। जिस प्रकार से किसी व्यक्ति का नाम अन्य लोगों को प्रभावित करती है उसी प्रकार से किसी पोस्ट का शीर्षक भी पाठकों को आकर्षित करता है। मेरा नाम यदि 'गोपाल कृष्ण अवधिया' ना होकर 'चिरकुट प्रसाद अवधिया' होता तो क्या लोग मुझसे प्रभावित होते? खैर, मेरे कहने का तात्पर्य है कि आखिर शीर्षक ही तो वह चीज होती है जो पाठकों की नजर में सबसे पहले आती है और यदि शीर्षक आकर्षक नहीं होगा तो पोस्ट को पढ़ेगा कौन?

तो मैं बता रहा था कि चन्द्रकान्ता सन्तति (देवकीन्नदन खत्री), गोदान (प्रेमचन्द), चित्रलेखा (भगवतीचरण वर्मा), वैशाली की नगरवधू और सोना और खून (आचार्य चतुरसेन) जैसी और भी अनेक रचनाएँ हैं जिन्हें बार-बार पढ़कर भी मैं नहीं अघाता। क्यों नहीं अघाता यह तो आप सोना और खून उपन्यास के निम्न रोचक अंश को पढ़कर ही जान पाएँगेः
दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन के मज़ार पर उस दिन बड़ी भीड़भाड़ थी। बेशुमार हिन्दू और मुसलमान स्त्री-पुरुष वहाँ आए थे। बहुत आ रहे थे, बहुत जा रहे थे। मज़ार का विस्तृत सहन स्त्री-पुरुषों से भरा था। हाजतमंद लोग मज़ार पर आकर दुआ-मुरादें माँग रहे थे। प्रसिद्ध था कि कोई ज़रूरतमन्द इस औलिया के दरगाह से बिना मुराद पूरी किए वापस नहीं लौटता। उर्स का जुलूस था। बहलियों, रथों, पालकियों और सवारियों का ताँता लग रहा था। शानदार मजलिस दरगाह पर जम रही थी। शागिर्द लोग और दूर-दूर के कव्वाल आए थै। दिल्ली के आस-पास के अकीदेवाले लोग हाज़िर थे। बहुत लोग फातिहा और दूसरे पवित्र पाठों का मन्द स्वर से उच्चारण कर रहे थे।

दो स्त्रियाँ बुर्का ओढ़े डोली से उतर कर धीरे-धीरे मज़ार की तरफ को चलीं। दरगाह की ड्योढ़ियों पर पहुँचकर दोनों ने बुर्का उठा दिया। उनमें एक अधेड़ उम्रे की मोटी-ताजी औरत थी। दूसरी असाधारण रूप-लावण्यवती बाला थी। अभी उसकी आयु चौदह बरस ही की होगी। वह फ़िरोज़ी रंग की ओढ़नी और जरी के काम का सुथना पहने थी। उसकी बड़ी-बड़ी कटोरी-सी आँखें मोती-सा रंग और ताजा सेब के समान चेहरा ऐसा लुभावना और अद्भुत था कि उसे देखकर उस पर से आँखें वापस खींच लेना असम्भव था।

दोनों ने दरगाह की ड्योढ़ियों पर जाकर घुटने टेक दिए। फूल और मिठाई चढ़ाई। मुजाविर ने दो फूल मज़ार से उठाकर बालिका को दिए। बालिका ने उन्हें आँखों से लगाया। वृद्धा ने कहा, "या हज़रत, मेरी बेटी को फरहत बख्शना।"

दोनों स्त्रियाँ वापस लौट चलीं। उन्हें इस बात का कुछ भी भान न था कि कोई उन्हें छिपी हुई नज़रों से देख रहा है।

परन्तु दो आदमी चुपचाप उन्हें देख रहे थे। एक की आयु पच्चीस के लगभग थी। रंग गोरा, बड़े-बड़े नेत्र, विशाल छाती और नोकदार नाक। स्पष्ट था कि कोई बड़ा आदमी छद्म वेश में है। इस व्यक्ति के शरीर पर साधारण वस्त्र थे। और वह खूब चौकन्ना होकर दरगाह में घूम रहा थअ। उसके पीछे उससे सटा हुआ दूसरा पुरुष था। यह पुरुष प्रौढ़ और कद्दावर था। वह परछाईं की भाँति उसके साथ था और उसकी प्रत्येक बात अदब से सुनता और जवाब देता थअ।

आगे वाले पुरुष ने कहा, "ज़मीर, देखा तूने उस गुलरू को?"

ज़मीर ने दबी ज़बान से कहा, "खुदाबन्द, हुक्म हो तो पता लगाऊँ?"

"जा डोली वाले कहारों से पूछ।"

ज़मीर ने एक चमचमाती अशर्फी कहार की हथेली पर रख दी। कहार आँखें फाड़-फाड़कर ज़मीर के मुँह की ओर देखने लगा। उसने कहा, "हुज़ूर क्या चाहते हैं?"

"खामोश", ज़मीर ने होंठों पर उँगली रखकर कहा, "यह कहो, सवारियाँ कहाँ से लाए हो?"

कहार ने झुककर ज़मीर के कान में कुछ कहा। ज़मीर सिर हिलाता हुआ लौटकर अपने स्वामी के पास आया। उसने हाथ बाँधकर कहा, "सब मालूम हो गया हुज़ूर।"

"उसे हासिल करना होगा।"

"जो हुक्म खुदाबन्द।"

"चाहे जिस भी कीमत पर।"

"जो हुक्म।"

दोनों भीड़ में मिल गए। डोली आँखों से ओझल हो गई।

उसी रात दोनों जआदमी एक अँधेरी गली में खड़े थे। सर्दी कड़ाके की और रात अँधेरी थी। गली में सन्नाटा था। ज़मीर ने कहा, "आलीजाह, कोठा तो यही है।"

"लेकिन खबरदार, मेरा नाम ज़ाहिर न हो।"

दोनों ऊपर चढ़ गए।

वेश्या का कोठा था। वहीं अधेड़ औरत रज़ाई लपेट छालियाँ कतर रही थी। नवागुन्तकों को उसने अपने साँप की-सी आँखों से घूरकर देखा। एक ने आँख ही आँख में संकेत किया। वृद्धा गम्भीर हो गई। दूसरे आगन्तुक ने कहा, "बड़ी बी, हम लोगों के आने से आपको कुछ तरद्दुद तो नहीं हुआ?"

"नहीं मेरे सरकार, यह तो आप ही की लौंडी का घर है। आराम से तशरीफ रखिए। और कहिए, बन्दी आपकी क्या खिदमत बजा लाए?"

इसी बीच दूसरे व्यक्ति ने कहा, "बड़ी बी, हुक्म हो तो ज़ीने की कुण्डी बन्द कर दूँ।" और उसने वृद्धा का संकेत पाकर द्वार बन्द कर दिया। अब वापस वृद्धा के निकट बैठकर उसने कहा, "बड़ी बी, हमारे सरकार तुम्हारी लड़की पर जी-जान से फिदा हैं। अगर तुम नाराज न हो तो इस बाबत कुछ बात करूँ?"

नायिका ने तन्त की बात उठती देखकर जरा तुनकमिज़ाजी से कहा, "यह तो सरकार की इनायत है, मगर आप जानते हैं, ये गंडेरियाँ नहीं हैं कि चार पैसे की खरीदी और चूस ली।"

वह व्यक्ति भी पूरा घाघ था। उसने कहा, "गंडेरियों की बात ही क्या है बड़ी बी, हर चीज के दाम हैं। और हर एक आदमी के बात करने का ढंग जुदा है। अगर तुम्हें नागवार गुज़रा हो तो हम लोग चले जाएँ।"

बुढ़िया नर्म पड़ गई। उसने जरा दबकर कहा, "आप इतने ही में नाराज हो गए, मैंने यही तो कहा था कि सरकार को हम जानते नहीं हैं। कौन हैं, क्या रुतबा है। सरा शहर जानता है यह ठिकाने का घराना है। मैं कुछ ऐसी रज़ील नहीं हूँ, आपके तुफ़ैल से बड़े-बड़े रईसज़ादों ने बन्दी की जूतियाँ सीधी की हैं।"

उस आदमी ने कड़े होकर कहा, "खैर, तो तुम्हारा जवाब क्या है?"

"बन्दी को क्या उज्र है? पर यह भी तो मालूम हो कि हुज़ूरेआली का इरादा क्या है?"

"वे चाहते हैं कि तुम्हारी लड़की को बेगम बनाएँ, वह खूब आराम से रहेगी। सरकार एक आला रईस हैं।"

बुढ़िया ने तपाक से कहा, "क्यों नहीं। बड़े-बड़े रईस यहाँ आए और यही सवाल किया। मगर मैंने अभी मंजूर नहीं किया। क्योंकि मेरा बेअन्दाज़ रुपया इसकी तालीम और परवरिश में खर्च हुआ है।"

अब अधीर होकर दूसरे पुरुष ने मुँह खोला। उसने कहा, "आखिर कितना, कुछ कहोगी भी?"

वेश्या ने चुंधी आँखें उस प्रभावशाली पुरुष के मुख पर डालकर कहा, "आलीज़ाह पचार हजार रुपया तो मेरा उसकी तालीम और परवरिश पर खर्च हो चुका है।"

दूसरे व्यक्ति ने कहा, "बड़ी बी, इतना अन्धेर क्यों करती हो!"

परन्तु बड़ी बी को बीच ही मे जवाब देने से रोककर प्रथम पुरुष ने कहा, "सौदे की जरूरत नहीं, यह लो।" उसने अपने वस्त्रों में छिपी हुई एक माला गले से उतारकर बुढ़िया के ऊपर फेंक दी। वह उठ खड़ा हुआ और बोला, "ज़मीर, उस परी पैकर को अपने हमराह ले आओ।"

ज़मीर ने कहा, "देखती क्या हो, दो लाख का माल है। अब तो पाँचों घी में और सिर कढ़ाई में! लखनऊ के बादशाह नसीरुद्दीन हैदर हैं। सफाई से चंडूल को फाँस लाया हूँ। अब इसमें से पचास हजार बन्दे को इनायत करो।"

बूढ़ी ने माला को चोली में छिपा  लिया। वह आनन्द से विह्वल होकर बेटी, बेटी पुकारने लगी। लड़की के आते ही वह उसके गले से लिपट गई। उसने कहा "मेरी बेटी, मलिका, अब तेरा इस बुढ़िया से बिछुड़ने का समय आ गया। जा, गरी माँ को भूल मत जाना। दोनों गले मिलकर रोईं। सलाह-मशविरे किए। पट्टियाँ पढ़ाई गईं। ज़मीर उसे डोली में बिठाकर वहाँ से चल दिया।

आचार्य चतुरसेन ने बहुत ही रोचकता के साथ इस कथा में आगे बताया है जिस नवाब नसीरुद्दीन ने एक वेश्या को खरीदने के लिए बात की बात में दो लाख रुपये खर्च कर कर दिए उसका खजाना उन दिनों खाली पड़ा था, बादशाह के अफसरों और कर्मचारियों को कई माह से तनख्वाह नहीं दिया गया था। हाथियों के खाने की व्यवस्था न हो पाने के कारण महावत उन हाथियों को हर तीन-चार दिनों में लखनऊ के बाजारों में खुलेआम छोड़ दिया करते थे वे हाथी बाजार के सभी खाने-पीने की जिन्सों को चट कर जाया करते थे।

मैं फिलहाल अपने अगले एक-दो पोस्टों में इस कथा को जारी रखूँगा इस उम्मीद के साथ कि आप लोगों को भी यह पसन्द आएगी।

चलते-चलते

कुछ लोगों ने मुझे मेल कर के "सोना और खून" उपन्यास को पढ़ने की इच्छा जाहिर की है और पूछा है कि क्या यह उपन्यास खरीदने के लिए उपलब्ध है? तो उनकी जानकारी के लिए मैं बता दूँ कि आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून उपन्यास चार भागों में हैं। चारों भाग आनलाइन खरीदी के लिए उपलब्ध है जिन्हें आप निम्न लिंक से खरीद सकते हैं:

आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून भाग 1 यहाँ खरीदें
आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून भाग 2 यहाँ खरीदें
आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून भाग 3 यहाँ खरीदें
आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून भाग 4 यहाँ खरीदें
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