Thursday, September 2, 2010

सठियाने वाली उम्र में ब्लोगिंग कर के तू कौन सा तुर्रमखां बन जाएगा?

पता नहीं किस झोंक में आईने के सामने खड़ा हो गया। आईने के सामने खड़ा हुआ ही था कि आवाज आई 'शर्म नहीं आती? सठियाने वाली उम्र में ब्लोगिंग करता है, क्या ऐसा करके समझता है कि तू बड़ा तुर्रमखां बन जाएगा'।

सुन कर आश्चर्य हुआ।, घर में उस दिन मेरे सिवा और कोई नहीं था, मैं अकेला ही था। इधर उधर देखने लगा कि आखिर ये आवाज कहाँ से आई? इतने में फिर से सुनाई पड़ा 'इधर उधर क्या देख रहा है? सामने देख, मैं तुझसे ही कह रहा हूँ'।

अरे, ये तो मेरी ही आवाज है और ठीक सामने से आ रही है। मैंने आइने को देखा तो मेरा प्रतिबिंब मुझसे कहने लगा, "हाँ हाँ, मैं तुझसे ही कह रहा हूँ कि सठियाने वाली उम्र में ब्लोगिंग कर के तू कौन सा तुर्रमखां बन जाएगा!"

मैं बोला, "भाई मेरे तुझे क्या ऐतराज है मेरे ब्लोगिंग करने पर? पर पहले ये बता कि तू है कौन?"

उसने जवाब दिया, "मैं तेरी 'अन्तरात्मा' हूँ।"

जवाब सुन कर मै भड़क उठा, "अबे क्यों झूठ बोल रहा है? 'अन्तरात्मा' नाम की चिड़िया आज के ज़माने में कहाँ पाई जाती है? वह तो एक ज़माने पहले ही मर चुकी है। फिर तू कहाँ से आ गया?

उसने मेरे भड़कने का बुरा नहीं माना, बोला, "यकीन करो कि मैं तुम्हारी अन्तरात्मा ही हूँ।"

मेरा गुस्सा कम नहीं हुआ, मैंने कहा, "मुझे क्या बेवकूफ़ समझते हो? मैंने कहा न कि 'अन्तरात्मा' नाम की चीज तो एक अरसे पहले ही मर चुकी है। फिल्मों में भी आइने के माध्यम से 'अन्तरात्मा' से हू-ब-हू करवाने की टेक्नीक आजकल खत्म हो गई है क्योंकि अन्तरात्मा नाम की कोई चीज होती ही नहीं है। 40-45 साल पहले अन्तरात्मा शायद मरी न रही हो और इसीलिए उस जमाने में यह टेक्नीक हुआ करती थी। जब अन्तरात्मा होती ही नहीं है तो फिर तू कहाँ से आ गया? क्या तेरा पुनर्जन्म हुआ है?"

उसने कहा, "अरे अब गुस्सा थूक भी दो यार, शान्त हो कर मेरी बात सुनो। वास्तव में मैं मरा नहीं था। सिर्फ 'कोमा' में चला गया था। 40 साल बाद 'कोमा' खत्म हुआ है और नींद टूट गई है।"

मैं बोला, "अच्छा नींद टूट गई है तो सिवा मुझे तंग करने के और कोई और काम नहीं रह गया है क्या तुम्हारे पास? मैंने तुमसे क्या परामर्श माँगा था कि सलाह देने चले आये?"

वो बोला, "नही भाई, मैं तुम्हें भला क्यों तंग करने चला। तुम और मैं तो एक ही हैं, अगर तुम्हें तंग करूंगा तो मैं स्वयं भी तंग हो जाउँगा। मैं तो केवल यह कहने आया था कि ये ब्लोगिंग व्लोगिंग नये जमाने की चीज है। नौजवानों के लिये है, तुम जैसे उम्रदराज लोगों के लिये नहीं। तुम्हीं बताओ कि आज तुम्हारी उम्र वाले कितने ब्लोगर हैं? तुम्हारे और अन्य ब्लॉगरों के बीच बहुत बड़ी खाई है 'जनरेशन गैप' का। तुम्हारे विचार अलग हैं और उनके अलग। वे टिप्पणियों को महत्व देते हैं तो तुम टिप्पणियों को गौण बता कर पाठकों की संख्या को महत्वपूर्ण बताते हो। तुम्हारे चिल्लाने से क्या लोग बदल जाएँगे या फिर जमाना बदल जाएगा? याद रखो तुम्हारी आवाज सिर्फ 'नक्कारखाने में तूती की आवाज' है। तुम कुछ भी नहीं कर सकते। तो तुम क्यों 'सींग कटा कर बछड़ों में शामिल होने' की कोशिश कर रहे हो? सठियाने की उम्र में ब्लोगिंग करके क्यों अपनी छीछालेदर करवाने पर तुले हो। बाज आ जाओ और बन्द कर दो अपनी ब्लोगिंग।"

मैंने कहा, "जब तुम 40 साल से कोमा में थे तो तुम्हें कैसे पता कि मेरी उम्र सठियाने की हो गई है? इन 40 सालों में क्या क्या बदल चुका है तुम जानते हो? क्या तुम जानते हो कि 'इकन्नी', 'दुआन्नी', 'चवन्नी' खत्म हो चुके हैं। 'मन-सेर-छटाक' के स्थान पर 'क्विंटल-किलो-ग्राम' आ गया है। 'तोला-माशा-रत्ती' को अब कोई नहीं जानता। गाँव कस्बे में, कस्बे नगर में और नगर महानगर में बदल चुके हैं। तुम्हारे कोमा में जाने के समय जो थोड़ी-सी ईमानदारी बची थी वह भी पूरी तरह से खत्म हो गई है। उस जमाने में नेता अगर खुद भर पेट खाता था तो जनता को भी थोड़ी सी खाने के लिये देता था, वैसे ही जैसे कि अगर कोई मटन खाता है तो हड्डी कुत्ते को डाल देता है, पर अब तो हड्डी तक को चबा लिया जाता है वो भी बिना डकार लिये। शिक्षा, चिकित्सा आदि सेवा कार्य से व्यसाय बन गये हैं। अब क्या क्या गिनाऊँ, और भी बहुत सारी बातें हैं। क्या जानते हो ये सब कुछ?"

उसने झेंप कर उत्तर दिया, "नहीं, ये सब तो मैं नहीं जानता।"

मैं बोला, "जब तुम ये सब नहीं जानते तो कैसे कह सकते हो कि मेरी सठियाने की उम्र है। दोस्त मेरे, मैं सठियाने की उम्र में नहीं हूँ बल्कि बहुत साल पहले ही से सठिया चुका हूँ। तुम्हें बता दूँ कि पहले आदमी साठ साल में सठियाता था पर अब कभी भी सठिया सकता है। सठियाने के लिये अब उम्र का कोई बन्धन नहीं रह गया है। और मैं ब्लोगिंग इसलिये करता हूँ क्योंकि मैं सठिया गया हूँ। ब्लोगिंग या तो सयाना आदमी कर सकता है या कोई नादान या फिर कोई सठियाया हुआ आदमी। ब्लोगिंग को जन्म दिया था सयाने आदमी ने। 'डॉलर', 'पाउंड', 'यूरो' जमा करने के उद्देश्य से, मतलब कि कमाई करने के लिये, अपनी भरी हुई तिजोरी को और अधिक भरने के लिये। पर ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो सिर्फ अपनी सन्तुष्टि के लिये, कमाई करने के बजाय अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई को खर्च कर के भी, ब्लोगिंग करते हैं। ऐसे लोग नादान होते हैं या फिर सठियाये हुये। अब बताओ मुझे कि मैं ब्लोगिंग कर रहा हूँ तो क्या मैं सठिया नहीं गया हूँ?"

मेरी बात सुन कर उसे ऐसा मानसिक आघात लगा कि वो फिर से 'कोमा' में चला गया।
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