Saturday, September 4, 2010

दूसरों को बदलने की कोशिश करने से अच्छा है कि स्वय को ही बदल लें... कल की कहानी का अगला किश्त..

मैं किश्तों में कही जाने वाली किसी पोस्ट की अगली किश्त लिखने के पहले यह सुनिश्चित कर लेना उचित समझता हूँ कि पहले वाली किश्त कितनी सफल रही थी? चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ पठन में मेरे पोस्ट को अच्छा स्थान मिलना सिद्ध करता है कि कल की कथा को बहुत सारे लोगों ने पढ़ा और इस बात की मुझे खुशी है। टिप्पणियों की संख्या से किसी पोस्ट के स्तर को मापना मेरी फितरत में शामिल नहीं है इसलिए मुझे धड़ाधड़ टिप्पणियाँ से कुछ खास मतलब नहीं रहता। मैं टिप्पणियों को बुरा-भला नहीं कहता किन्तु आजकल अधिक से अधिक टिप्पणियाँ पाने का जो क्रेज बन गया है उसे अवश्य ही मैं अच्छा नहीं समझता। खैर, मेरे विचार से सभी सहमत हों यह जरूरी नहीं है, 'मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना'! मैं दूसरों के समक्ष अपने विचार तो अवश्य ही रख सकता हूँ जरूरी नहीं हैं कि वे मेरे विचार से प्रभावित हों। वैसे भी दूसरों को बदलने की कोशिश करने से अच्छा है कि स्वय को ही बदल लें।

तो अब प्रस्तुत है आचार्य चतुरसेन जी "सोना और खून" के कल के अंश से आगे की कहानीः

(कृपया पूर्व की कथा यहाँ पढ़ें - एक बार पढ़ा है और बार-बार पढ़ने की इच्छा है)

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बादशाह ने उसका नाम रखा कुदसिया बेगम। उसे नवाब का खिताब दिया, जो किसी दूसरी बेगम को प्राप्त न था। और उसे ताज पहनने का भी अधिकार दे दिया। अपने सौन्दर्य, प्रतिभअ और खुशअखलाक के कारण वह उस विशाल महलसरा में सब बेगमों की सरताज बन गई। नसीरुद्दीन हैदर उसके गुलाम बने हुए थे। सम्पत्ति उसकी ठोकरों में थी। वह खुले हाथों खर्च करती थी। रुपये-अशर्फियाँ उसके लिए कंकर-पत्थरों का ढेर थीं। उसका केवल पानों का खर्च रोजाना आठ सौ रुमया था। सेरों मोती चूने के लिए रोज पीसे जाते थै। रोज सौ रुपये के फूलों के हार उसके लिए मोल लिए जाते थे। सात सौ रुपये माहवार उसकी चूड़ियों का खर्च था, जो उसकी दासियाँ पहनती थीं। उसके बावर्चीखाने में छः सौ रुपया रोज खर्च होता था। सोने के थाल में सब प्रकार के रत्नों का सतनजा प्रति सन्ध्या को अपने सिरहाने रखकर सोती थी। और प्रातःकाल होते ही वह गरीबों को खैरात कर दिया जाता था। उसकी पोशाक के लिए हजार रुपये रोज खर्च किए जाते थे, जिसे वह सिर्फ एक बार पहनकर शैदानियों को दे देती थी।

गर्मियों में जो खस की टट्टियाँ उसके लिए लगाई जाती थीं, वह केवड़ा और गुलाब से छिड़की जाती थीं। सर्दियों में ऊनी कपड़ों के गट्ठे के गट्ठे उसके अमलों में बाँटे जाते थे। दस-दस हजार रुपयों की लागत की उसकी रजाइयाँ बनती थीं। और एक बार ओढ़ लेने के बाद जिसके भाग्य में होती थीं, उसे बख्श दी जाती थीं। वह एक-एक लाख रुपये रुपये जल्सेवालियों को दे डालती थी। उसे नवाब का खिताब दिया गया था और वह रत्नजटित ताज सिर पर पहनती थी।

बसन्त की ऋतु थी बेगममहल में हर कोई बसन्ती बाना पहने था। बादशाह का खास बाग सजाया गया था। मैदान में अपने-अपने डेरे-तम्बू डालकर दरबारी अमीर-उमरा और राजकर्मचारी जश्न मना रहे थे।

बादशाह को बड़ी लालसा थी कि इस बेगम के गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो और उसे वह अपना वारिस बनाए। इस काम के लिए बड़े-बड़े उपचार किए गए थे। बड़े-बड़े हकीम, तबीब, वैद्य, स्याने-दीवाने बुलाए गए थे। बड़े-बड़े पीर, फकीर, शाह और औलिया वहाँ पहुँचे थे। उनकी अच्छी बन पड़ी थी। सबने अच्छी लूट मचाई थी। बहुत-से निर्धन धनी हो गए। राज्य भर के फकीरों को निमन्त्रण दिया क्योंकि बेगम को गर्भ रह गया था। रियाया में जश्न मनाने का हुक्म जारी हो गया था।

चारों तरफ फव्वारे चल रहे थे। खवासनियाँ दौड़-धूप कर रही थीं। बादशाह एक मसनद पर अधलेटे पड़े थे। कुदसिया बेगम उनके पहलू में थीं। खवासें शराब के प्याले बादशाह को देतीं और बादशाह उन्हें कुदसिया बेग के होंठों से लगाकर और आँखें बन्द करे पी जाते थे। नाचनेवालियाँ नाच रही थीं। एक नाचनेवाली की अदा पर फिदा होकर बेगम ने जअपने गले का जड़ाऊ हार उसकी ओर फेंककर सबको वहाँ से भाग जाने का संकेत किया। सबके चले जाने पर हँसकर उसने बादशाह के गले में हाथ डाल दिया और कहा, "मेरे मालिक, तुम्हारी इनायत से मैं नाचीज क्या से क्या हो गई। तुमने मुझको इस कदर निहाल कर दिया कि अब मैं दुनिया को आनन-फानन में निहाल कर सकती हूँ।"

बादशाह ने उसका मधर चुम्बन लिया। एक आह भरी और कहा, "प्यारी बेगम, तुमसे मुझे जो राहत मिली है, उसके सामने यह बादशाहत भी हेच है। लाओ, अपने हाथ से एक प्याला दो। अपने होंठों से छूकर उसमें अमृत डालकर।"

बेगम ने हँसकर दो प्याले शराब लबालब भरे और बादशाह को दिए।

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आज लखनऊ के बाजार में बड़ी उत्तेजना फैली हुई थी। पहर दिन चढ़ गया, परन्तु अभी तक आधी से अधिक दूकानें बन्द थीं। बकरू नानबाई ने दूकान में तंदूर को गरमाने के बाद पाव-रोटी सजाते हुए पड़ोस के लाला मटरूमल से कहा, "चाचा मटरू, अभी तक दूकान नहीं खोली, इस तरह गुमसुम कैसे बैठे हो? दोपहर दिन चढ़ गया।

मटरू लाला सिकुड़े हुए दूकान के आगे हाथ में चाबियों का गुच्छा लिए बैठे थे। उन्होंने नाक-भौं सिकोड़कर कहा, "क्या करूँ दूकान खोलकर? अभी सरकारी हाथी आएँगे और सब जिन्स चबा जाएँगे। कौन लड़ेगा भला इन काली बलाओं से?"

"सचमुच चचा यह तो बड़ा अन्धेर है। कल ही की लो, पाँच सेर आटा गूंधकर रखा था, एक ही चपेट में सफा कर गया। तंदूर तोड़ गया घाट में। खुदा गारत करे। नवाब आसफुद्दौला के जमाने से दूकानदारी करता हूँ पर ऐसा अन्धेर तो देखा नहीं।"

"तुम अपने तंदूर और पाँच सेर आटे की गाते हो म्याँ! मेरी तो मन भर मक्का साफ कर गया। महावत साथ था। महावत को मैंने डाँटा तो वह शेर हो गया औ‌र उल्टा मुझी को आँख दिखाने लगा। कहने लगा 'मैं क्या करूँ? सरकार से फीलखाने के खर्च का रुपया मिलता ही नहीं; इसलिए एक-एक महावत अपने हाथी के साथ तीसरे दिन बाजार आता है। जो हाथ लगा उससे पेट भरता है।'.."

इतने में नसीबन कुंजड़िन वहाँ आ गई। उसने कहा, "अधेले की रोटी और अधेले का सालन दो म्याँ बकरू, जरी बोटियाँ ज्यादा डालना।"

"अधेले में क्या तुम्हें सारी देग उलट दूँ?"

"तो मरे क्यों जाते हो, सालन के नाम तो नीला पानी ही है।"

"लखनऊ भर में कोई साला मेरे जैसा सालन बना तो दे, टाँगों तले निकल जाऊँ। ला प्याला दे। कल हाथी ने तेरा भी तो नुकसान किया था।"

"ए खुदा की मार इस हाथी पर, मुआ टोकरे-भर खरबूजे खा गया। धेले तक की बोहनी न हुई थी, बस लाकर रखे ही थे। मैंने डराया तो मुआ सूंड उठाकर झपटा मेरे ऊपर। मैं भागी गिरती-पड़ती। पर किससे कहें, यहाँ लखनऊ में तो बस इन दाढ़ीजार फिरंगियों की चलती है। और किसी की दाद-फरियाद कोई नहीं सुनता।"

इसी समय मियाँ नियामत हुसैन चकलादार हाथ में ऐनक लिए आ बरामद हुए। फटा पायजामा, फिड़क जूतियाँ और पुरानी शेरवानी, दुबले-पतले, फूँस से आदमी। आते ही बोले, "म्याँ बकरू, झपाके से दमड़ी का रोगनजोश, दमड़ी की रोटी और अधेले की कलेजी दो।"

"खूब हैं आप, पैसे के तीन अधेले भुनाते हैं। लाइए पैसा नगद।"

"म्याँ अजब अहमक हो, चकलेदार हैं हम, कोई उठाईगीर नहीं।"

"माना आप चकलेदार हैं, इज्जतवाले हैं; मगर सुबह-सुबह उधार के क्या मानी? फिर पिछला भी बकाया है। अब आपको उधार भी दे् और अहमक भी बनें।"

"अगले-पिछले सभी देंगे, तनख्वाह मिलने पर।"

"यह तो मैं साल भर से सुनता आ रहा हूँ।"

"तो भई, मैं क्या करूँ? तीन बरस से तलब नहीं मिली।"

"तो छोड़ दो नौकरी।"

"नौकरी छोड़कर क्या करूँ?"

"घास खोदो।"

"कमजर्फ आदमी, हमें घास छीलने को कहता है। हम चकलादार हैं नहीं जानता!"

"तो हजरत, पैसा नगद दीजिए और सौदा लीजिए। क्या जरूरी है कि हम अपना माल दें और गालियाँ खाएँ?"

"अजब जमाना आ गया है, रज़ील लोग शरीफों का मुँह फेरते हैं, सरकारी अफसरों को आँखें दिखाते हैं।"

"तो साहब, हम तो अपना पैसा माँगते हैं। उधार बेचें तो खाएँ क्या?"

"तुफ है उसपर जो इस बार तनख्वाह मिलने पर तुम्हारा चुकता न करे। लो लोगों हम चले।"

"खैर इस वक्त तो लेते जाइए चकलादार साहब, हम रज़ील लोग हैं, मुल दुकान के आगे गाहक को खाली नहीं भेज सकते।"

"चकलादार साहब नर्म हुए। कहने लगे, "भई, हम क्या करें, मुल्केजमानिया साहब लोगों को लाखों रुपये रोज देते हैं, पर नौकरों को तलब नहीं मिलती। हाथी आवारा बाजारों में फिरते हैं, उन्हें राशन नहीं दिया जाता।"

इसी वक्त मौलाबख्श खानसामा आ गया। पिछली बात सुनकर कहा, "भई अब तो दो साल और तलब नहीं मिलेगी। नवाब कुदसिया बेगम को लड़का हुआ है। उसके जश्न मनान का हुक्म है। करोड़ों रुपया खर्च होगा। सुना नहीं तुमने, बेगम ने करोड़ रुपये का चबूतरा लुटवा दिया।"

"हाँ भाई, बादशाह हैं। पर रियाया का भी तो ख्याल रखना लाजिम है।"

"सामने की दुकान पर करीमा फुल्कियाँवाला गर्मागर्म फुल्कियाँ उतार रहा था। मियाँ अमजद तहमद कड़काते आए - एक पैसा झन्नाटे से थाल में फेंककर कहा, "म्याँ दे तो एक पैसे का गर्मागर्म।"

"एक पैसे की क्या लेते हो, कल्ला भी गर्म न होगा। दो पैसे की तो लो।"

"दो ही पैसे की दे दो यार, मगर चटनी जरा ज्यादा देना।"

फुल्कीवाले ने बीस फुल्कियाँ दोने में भरकर अमजद के हाथ में दीं और चटनी की हांडी आगे सरकाकर कहा, "ले लो जितनी जी चाहे।"

अमजद ने चटनी दोनो में भरी और कहा, "यार, चटनी तो बासी मालूम पड़ती है।"

"लो और हुई। म्याँ, अभी तो पाव भर खटाई की चटनी बनाई है। आप पहचानने में खूब मश्शाक हैं।"

"तो तेज क्यों होत हो म्याँ? मैंने बात ही तो कही।"

"और मैंने क्या तमाचा मारा? क्या जमाना आ गया! लखनऊ शहर में अब तमीजदारों की गुजर नहीं।"

"आक्खाह, तो आप तमीजदार है!"

ये बातें हो ही रहीं थीं कि हुसेनखां जमदार रकाबी लिए लपकत आए। बोले, "म्याँ करीम, जरा दो पैसे की फुल्कियाँ तो देना, यर घान जरा खरा करके निकालो, खूब फुल्कियाँ बनते हो यार! इस कदर मुँह लग गई हैं कि खुदा ही पनाह। नखास से आना पड़ता है तुम्हारी दुकान पर।"

"तो पैसे निकालिए साहब।"

"इसके क्या माने? शरीफों से ऐसी बात?"

"तो हुज़ूर, मैं उधार कहाँ से दूँ। गरीब दुकानदार हूँ। पेट भरने को सुबह-सुबह यहाँ पर खून जलाता हूँ। आप हैं कि सुबह-सुबह हाजिर। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, आखिर कब तक? पूरे नौ आने उधार हो गए हैं।"

"इसे कहते हैं कमीनापना। न किसी की इज्जत का ख्याल, न रुतबे का। मुँह में आया बक गए। अबे, हम सरकारी जमादार हैं, चरकटे नहीं।"

"तो जमादार साहब, पैसे नकद दीजए, उधार की सनद नहीं।"

जमादार ने दो पैसे टेंट से निकालकर फेंक दिए। तैश में आकर बोले, "अबे, कौन तुमसे मुँह लगे। अब से जो तुम्हारी दुकान पर आए उसपर सात हर्फ।"

दुकानदार ने पैसे उठाए और जरा नर्म होकर कहा, "नाराज न हों। हम टके के आदमी, इतनी गुंजाइश कहाँ कि उधार सौदा दें, जमदार साहब! लीजिए चटनी चखिए, क्या नफ़ीस बनाई है। ये मियाँ कहते हैं - बासी है।"

उसने रक़ाबी में गर्मागर्म फुल्कियाँ और चटनी रख दी। जमादार साहब ने खुश होकर कहा, "ये फुल्कियाँ-चटनी तो तुम लखनऊ में बनाने वाले एक ही हो।"

"हुज़ूर यह आँच का खेल है, निगाह चूकी कि बिगड़ा।"

"भअई बड़ी कारीगरी का काम है, बस तुम्हारा ही दम है। पैसों का खयाल न करना, हाँ, बस तनख्वाय मिली कि तुम्हारे पैसे खरे। अजी बरसों से हम तुम्हारी दुकान से फुल्कियाँ लेते हैं। अब चलता हूँ। हसनू की दुकान से धेले का तम्बाकू और रज्जब कूंजड़े से धेले की अरबियाँ लेनी है। मगर यार हसनू का जंगी हुक्का हर वक्त तैयार रहता है। उर से जानेवाले पर लाजिम है कि एक कश जरूर लगाए। सौदा ले या न ले। ओफ्फो, दो पैसे की अफीम की पुड़या भी लेनी है। लो भई, अब तो सदर तक दौड़ना पड़ा।" जमादार तेजी से चल दिए।

चलते-चलते

कुछ लोगों ने मुझे मेल कर के "सोना और खून" उपन्यास को पढ़ने की इच्छा जाहिर की है और पूछा है कि क्या यह उपन्यास खरीदने के लिए उपलब्ध है? तो उनकी जानकारी के लिए मैं बता दूँ कि आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून उपन्यास चार भागों में हैं। चारों भाग आनलाइन खरीदी के लिए उपलब्ध है जिन्हें आप निम्न लिंक से खरीद सकते हैं


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आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून भाग 3 यहाँ खरीदें
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