Sunday, February 28, 2010

एक तो इतवार ऊपर से होली ... आज तो बस टिपियाओ पोस्ट पढ़ने को मारो गोली

वैसे ही सप्ताहान्त अर्थात् शनिवार और इतवार को लोग ब्लोग्स में कम ही जाते हैं। फिर आज तो इतवार के साथ ही साथ होलिकादहन भी है। याने कि करेला वो भी नीमचढ़ा! आज के दिन भला पोस्ट कौन पढ़ता है? आज तो बस टिपिया टिपया कर शुभकामनाएँ देने का दिन है।

भाई, सप्ताह में केवल एक बार ही तो इतवार आता है। ज्यूडिश/ ईसाई बाइबल में कहा गया है कि ईश्वर ने पहले ब्रह्मांड का निर्माण करने में छः दिन खर्च करने के बाद सातवें दिन अर्थात् रविवार को विश्राम किया था। जब ईश्वर ने इस दिन विश्राम किया था तो हम क्यों नहीं करेंगे? हम तो ये सोचते हैं कि काश! सप्ताह में तीन-चार इतवार आते! कितना मजा आता अगर ऐसा होता तो!

पर ये ब्लोग है कि आराम करने ही नहीं देता। थोड़ा आराम करने के लेटे नहीं कि दिमाग में घूमने लगता है कि क्या पोस्ट लिखें? क्या टिपियायें? और तत्काल उठकर कम्प्यूटर के सामने बैठ जाते हैं।

सोचता हूँ कि ब्लोगिंग का नशा तो पहले से ही है और ऊपर से होली मनाने के लिये दोस्तों के साथ दो-तीन पैग अलग चढ़ा लिया है। याने कि फिर से एक बार नीमचढ़ा करेला। ऐसे में क्या खाक पोस्ट लिखा जा सकता है। दिमाग सोचता कुछ है और उँगलियाँ कुछ और टाइप करने लगती हैं। इसलिये आज इतना ही लिखकर पोस्ट खत्म कर देता हूँ और जा रहा हूँ होली के हुड़दंग में।

आप तथा सभी ब्लॉगर मित्रों को होली की शुभकामनाएँ!

चलते-चलते

बाइबिल के ईश्वर ने तो विश्राम कर भी लिया पर हमारे ब्रह्मा जी हैं कि बिना आराम किये लगातार काम करते रहते हैं। आखिर वे लगातार काम नहीं करेंगे तो फिर सृष्टि में जीवों का जन्म होना जो रुक जायेगा। लाखों वर्ष बीत गये पर एक भी बार छुट्टी नहीं ली उन्होंने। पर एक बार इतना आवश्यक कार्य आन पड़ा कि मजबूर होकर एक माह की छुट्टी लेनी ही पड़ गई। पर यही चिन्ता खाये जा रही थी उन्हें कि मेरे छुट्टी में जाने पर कैसे चलेगा। उनकी चिन्ता देखकर उनके असिस्टेंट ने उन्हें विश्वास दिलाया कि मैं सब कुछ सम्हाल लूँगा, आप निश्चिन्त हो कर छुट्टी में जायें।

एक माह की छुट्टी के बाद आते ही ब्रह्मा जी सुपर कम्प्यूटर खोल कर बैठ गये और निरीक्षण करने लगे कि सब कुछ ठीक हुआ है या नहीं। उनका असिस्टेंट उनके पास ही बैठा था।

सहसा ब्रह्मा जी अपने असिस्टेंट को सम्बोधित कर के बोल उठे, "अरे तूने ये क्या किया? इस एक माह में तूने जितने मनुष्य बनाये हैं उन्हें दिमाग तो तूने दिया ही नहीं।"

असिस्टेंट ने सर खुजाते हुए स्वीकार किया, "हाँ, ये गलती तो हो गई।"

"पर अब क्या होगा?"

"ऐसा करते हैं कि इन लोगों के लिये यहाँ से दिमाग ट्रांसमिट कर देते हैं।"

"पर यहाँ से ट्रांसमिट किया हुआ दिमाग उन्हें मिलेगा कैसे?"

"तो उसके लिये उन्हें एक एक एंटीना दे देते हैं!"

"और किसी के एंटीना ने ज्यादा दिमाग रिसीव्ह कर लिया तो?"

"तो इसके लिये उन्हें एक एक अर्थिंग भी दे देते हैं!"

बुरा ना मानो होली है!

Friday, February 26, 2010

बुद्धू बढ़ गया ब्लोगिंग कर के हाँ जी हाँ जी कहना

कुतिया ले गई बाघ को धर के,
हाँ जी हाँ जी कहना।
बुद्धू बढ़ गया ब्लोगिंग कर के,
हाँ जी हाँ जी कहना॥

कोई कविता करे पोस्ट में,
कोई लिखे कहानी।
कोई लिखे कुछ ऐसा यारों,
समझ नहीं जो आनी।
ब्लोगर लिखते चिंतन कर के,
हाँ जी हाँ जी कहना।
बुद्धू बढ़ गया ब्लोगिंग कर के,
हाँ जी हाँ जी कहना॥

हिन्दी में अंगरेजी डाले,
वो ज्ञानी कहलाये।
हिन्दी मे है शर्म कहाँ जो,
पानी पानी हो जाये।
जोश दिलाओ टिप्पी कर के,
हाँ जी हाँ जी कहना।
बुद्धू बढ़ गया ब्लोगिंग कर के,
हाँ जी हाँ जी कहना॥

ज्ञान ध्यान की बात मिले ना,
तो निराश मत होना।
कुत्ता-बिल्ली पगला-पगली,
पढ़कर तुम मत रोना॥
लिखा है इसको मेहनत कर के,
हाँ जी हाँ जी कहना।
बुद्धू बढ़ गया ब्लोगिंग कर के,
हाँ जी हाँ जी कहना॥

ऊपर-ऊपर से जो निकले,
दर्शन उसे बताओ।
समझ ना आया कहकर क्यों तुम,
अज्ञानी कहलाओ?
दुःखी ना होना उसको पढ़ के,
हाँ जी हाँ जी कहना।
बुद्धू बढ़ गया ब्लोगिंग कर के,
हाँ जी हाँ जी कहना॥

अन्धों की नगरी में भैया,
राजा होता काना।
हिन्दी ब्लोगिंग भी है ऐसी,
लोगों ने है जाना॥
गर कोई कह जाये ऐसा,
ना जी ना जी कहना।
बुद्धू बढ़ गया ब्लोगिंग कर के,
हाँ जी हाँ जी कहना॥

Thursday, February 25, 2010

आप तो बस लिख दीजिये ... आपने क्या लिखा है यह आपके टिप्पणीकर्ता खुद बता देंगे

ये मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि लिख्खाड़ानन्द जी के द्वारा हमें दिया गया गुरु मन्त्र है। उनका कहना है कि पोस्ट लिखने के लिये यह समझने की जरूरत नहीं है कि मैं क्या लिख रहा हूँ। आप तो बस लिख दीजिये! आपने क्या लिखा है यह आपके टिप्पणीकर्ता खुद ही बता देंगे। उदाहरण के तौर पर उन्होंने हमें अपना निम्न पोस्ट और उस पर आई टिप्पणियों को दिखायाः

पोस्टः
[शीर्षक] भ्रमजाल [शीर्षक]

ईश्वर का एक होना अद्वैतवाद है किन्तु सरिता का प्रवाहित होना द्वैतवाद है। सरिता का प्रवाहित होना अपने प्रियतम सागर से मिलन के लिये ही होता है। इसलिये जब हम कहते हैं कि सरिता प्रवाहित होती है तो वह द्वैतवाद होता है। सरिता के साथ अपरोक्ष रूप से सागर सम्मिलित ही रहता है। सरिता प्रवाहित होती है को अद्वैत कहना शोभनीय नहीं है और न ही यह वांछनीय है। सरिता की गति काल की गति के समान एक ही दिशा में होती है। किन्तु जब सरिता का जल किसी विशाल पाषाण से टकरा कर कुछ दूरी तक वापस प्रवाहित होता है तो सरिता की गति काल की गति से भिन्न हो जाती है। जब इतिहास स्वयं को दुहराता है तो आभास होता है कि काल की गति पुनः विरुद्ध दिशा में हो गई है किन्तु यह हमारा भ्रम है।

अद्वैत और द्वैत अत्यन्त जटिल विषय हैं। इन्हें समझने के लिये सरिता, सागर और काल को पहले समझना जरूरी है।

हम सभी भ्रम में जीते हैं और भ्रम में ही मर जाते हैं। हम समझते हैं कि सिगरेट पीने वाले का स्तर बीड़ी पीने वाले के स्तर से ऊँचा होता है। यह हमारा भ्रम है। वास्तव में हम सिगरेट और बीड़ी को ध्यान में रख कर सोचते हैं इसलिये हमें दोनों के स्तरों में अन्तर का भ्रम होता है किन्तु सिगरेट और बीड़ी दोनों का ही उद्देश्य धूम्रपान है इसलिये यदि हम धूम्रपान को ध्यान में रख कर सोचें तो हमें दोनों का स्तर एक ही लगेगा।

ब्लोगजगत को आभासी कहा जाता है किन्तु यह आभासी होते हुए भी आभासी नहीं है। पर यह भी हमें स्मरण रखना होगा कि यह आभासी न होते हुए भी आभासी है। ठीक उसी प्रकार जैसे कि ईश्वर होते हुए भी नहीं है और नहीं होते हुए भी है।

यह संसार एक भ्रमजाल है और जीवन अनेक भ्रमों से घिरा हुआ है। इन भ्रमों को तोड़ कर वास्तविक जीवन जीना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिये।

टिप्पणियाँ:
टिप्पणी (1)

........ ने कहा

अत्यन्त गहन चिन्तन!

टिप्पणी (2)

........ ने कहा

सरिता, सागर और काल के विषय में अच्छी जानकारी मिली।

ब्लोगजगत और ईश्वर की सटीक तुलना अच्छी लगी!

टिप्पणी (3)

........ ने कहा

अद्वैतवाद और द्वैतवाद की जानकारी देती हुई सुन्दर पोस्ट!

टिप्पणी (4)

........ ने कहा

गम्भीर दर्शन!

टिप्पणी (5)

........ ने कहा

सरिता, सागर और काल को अद्वैत और अद्वैत से जोड़ने वाली सार्थक पोस्ट!

टिप्पणी (6)

........ ने कहा

हमेशा की तरह आपकी लेखनी का अद्भुत चमत्कार!

टिप्पणी (7)

........ ने कहा

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता! :)

टिप्पणी (8)

........ ने कहा

सार्थक लेखन!

टिप्पणी (9)

........ ने कहा

दर्शन और चिन्तन का सुन्दर संयोग!

टिप्पणी (10)

........ ने कहा

आपकी लेखनी की प्रशंसा करना सूर्य को दीपक दिखाना है!

टिप्पणी (11)

........ ने कहा

अत्यन्त जटिल विषय को सरलता के साथ समझाने के लिये आभार!

टिप्पणी (12)

........ ने कहा

सुन्दर प्रस्तुति!

टिप्पणी (13)

........ ने कहा

आभार!

टिप्पणी (14)

........ ने कहा

शिक्षाप्रद आलेख!

टिप्पणी (15)

........ ने कहा

अद्वैत और द्वैत को व्यक्त करती महत्वपूर्ण पोस्ट!

टिप्पणी (16)

........ ने कहा

अद्वैत और द्वैत अत्यन्त जटिल विषय हैं। इन्हें समझने के लिये सरिता, सागर और काल को पहले समझना जरूरी है।

nice

टिप्पणी (17)

........ ने कहा

यह टिप्पणी ब्लोग एडमिनिस्ट्रेटर के द्वारा मिटा दी गई है।

(आपकी जानकारी के लिये बता दें कि यहाँ पर टिप्पणी की गई थी "आप एक नंबर के गधे हैं।")

टिप्पणी (18)

लिख्खाड़ानन्द ने कहा

हमसे जेलेसी रखने वाले कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अनाप शनाप टिप्पणी करते हैं। ऐसे लोगों के साथ जब हम स्ट्रिक्तता से पेश आयेंगे तो निश्चतली इन्हें बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़ेगा।

टिप्पणी (19)

........ ने कहा

हमेशा की तरह बेहतरीन पोस्ट!

टिप्पणी (20)

........ ने कहा

सही कहा आपने!

टिप्पणी (21)

........ ने कहा

समझ में आ गया कि जब केवल ईश्वर होता है तो अद्वैत होता है और जब ईश्वर और माया दोनों होते हैं तो द्वैत होता है।

टिप्पणी (22)

........ ने कहा

आपका भी जवाब नहीं!

टिप्पणी (23)

........ ने कहा

उस्ताद जी! आज पूरे फॉर्म में दिखाई पड़ रहे हैं

टिप्पणी (24)

........ ने कहा

क्या बात कही.. मुझे लगता है कि जिस पर आप लिखते हैं, उन विषयों में आप पारंगत हैं इसीलिये एक सार्थक और सशक्त लेख निकल कर आता है।

टिप्पणी (25)

........ ने कहा

"यह संसार एक भ्रमजाल है और जीवन अनेक भ्रमों से घिरा हुआ है। इन भ्रमों को तोड़ कर वास्तविक जीवन जीना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिये।"

गम्भीर किन्तु सच्चा जीवन दर्शन! गहन चिन्तन!!


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लिख्खाड़ानन्द जी हमें बताया, "जब हमने इस पोस्ट को लिखा तो हमें खुद नहीं पता था कि हम क्या लिख रहे हैं पर टिप्पणियाँ आने बाद हमें पता चला कि हमने तो दर्शन और गहन चिन्तन से सम्बन्धित पोस्ट लिखा है। इसीलिये हम आपसे कहते हैं कि आप तो बस लिख दीजिये! आपने क्या लिखा है यह आपके टिप्पणीकर्ता खुद ही बता देंगे।"

Tuesday, February 23, 2010

खुद ऊपर नहीं जा सकते तो क्या हुआ टाँग खींच कर ऊपर वाले को नीचे तो ला सकते है

टॉप याने कि सर्वोच्च! टॉप में रहने की चाहत भला किसे नहीं होती। पर ऊपर चढ़ना हरेक के बस की बात नहीं है। फिर क्या करें? सामने वाला तो ऊपर ही ऊपर चढ़े जा रहा है। अरे भइ हम ऊपर नहीं जा सकते तो क्या हुआ उसकी टाँगे खींच कर उसे नीचे तो ला सकते हैं ना! यही तो संसार का नियम है। हम ऊपर नहीं जा सकते तो साला कोई दूसरा क्यों ऊपर रहे।

ये टाँग खीचने वाला काम मनुष्य तो क्या देवता तक भी करते हैं। विष्णु तक को भी दैत्यराज बलि का ऊँचा जाना नहीं भाया और उसने उसकी टाँग खींचने के बजाय अपने पैरों के नीचे ही दबा कर रख दिया। अब देखो ना, इन्द्र खुद तो तपस्या कर सकता नहीं पर चाहे शिव जी तपस्या करें कि नारद करें या और कोई करे, भेज देता है कामदेव को उसकी तपस्या भंग करने के लिये। ये टाँग खींचना नहीं है तो क्या है?

टाँग खींचने का काम तो युगों से चला आ रहा है। सतयुग में सत्यवादी हरिश्चन्द्र की टाँग खींचने के लिये विश्वामित्र आ गये थे और उन्हें राजा से ऐसा कंगाल बनाया कि डोम का काम करने के लिये विवश हो जाना पड़ा। त्रेता युग में राम ने बालि की टाँग खींच कर रख दिया। द्वापर में तो कृष्ण ने कितनों की टाँग खिंचाई की है इसका तो हिसाब ही नहीं मिलता। उन्होंने तो अपनी बहन सुभद्रा का विवाह अर्जुन से करने के लिये अपने बड़े भाई बलराम तक की भी टाँग खिंचाई कर कर दी थी।

टाँग खींचना तो कलियुग का धर्म ही है। राजनीति हो, मीडिया हो, ब्लोगिंग हो चाहे जो भी हो टाँग खिंचाई का ही काम होता है वहाँ। ब्लोगवाणी ने तो नापसंद बटन देकर टाँग खिंचाई के काम को और भी आसान बना दिया है। एक ब्लोगर अपने पोस्ट में बताता है कि फलाने के ब्लोग की फलाने अखबार में चर्चा हुई है और दूसरा ब्लोगर तड़ से उस पोस्ट को नापसंद करके उसकी टाँग खींच देता है। किसी के ब्लोग की किसी अखबार में चर्चा भी कोई पसंद करने वाली चीज है भला? किसी पोस्ट लिखा है कि आज फलाने ब्लोगर का जन्मदिन है तो उस पर भी नापसंद का चटका लग जाता है। आखिर उस ब्लोगर जन्म हुआ ही क्यों? क्या जरूरत थी उसे इस संसार में आने की? चलो संसार में आ गया तो आ गया पर ब्लोगजगत क्या करने आया? हम तो भाई नापसंद ही करेंगे इसे। समझ में ही नहीं आता कि यह पोस्ट नापसंद है या ब्लोगर नापसंद? पसंद या नापसंद करने के लिये पोस्ट को पढ़ना जरूरी थोड़े ही है! वैसे हमारे लिख्खाड़ानन्द जी एक बार बता चुके हैं कि टिप्पणी करने के लिये भी पोस्ट को पढ़ना जरूरी नहीं है।

अब कहाँ तक लिखें टाँग खिंचाई की महिमा? इसकी महिमा तो अपरम्पार है!

चलते-चलते

फागुन का महीना है, होली नजदीक आ रही है, इसलिये प्रस्तुत है एक फागगीतः

नचन सिखावै राधा प्यारी
हरि को नचन सिखावै राधा प्यारी

जमुना पुलिन निकट वंशीवट
शरद रैन उजियारी
हरि को सिखावै राधा प्यारी

रूप भरे गुण हाथ छड़ी लिये
डरपत कुंज बिहारी
हरि को सिखावै राधा प्यारी

चन्द्रसखि भजु बालकृष्ण छवि
हरि के चरण बलिहारी
हरि को सिखावै राधा प्यारी

Monday, February 22, 2010

बेवकूफ ब्लोगर अब टिप्पणी पर भी पोस्ट निकालने लग गये हैं

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"क्या बात है लिख्खाड़ानन्द जी, कुछ परेशान से लग रहे हैं?"

"क्या बतायें टिप्पण्यानन्द जी, बहुत दुःखी हैं भाई हम तो। अजब-अजब लोग आ गये हैं हिन्दी ब्लोगिंग में। हम तो समय निकाल कर उनके ब्लोग में जाकर टिप्पणी करते हैं पर उनको टिप्पणी पर भी ऐतराज हो जाता है। और लोग तो खुश होते हैं कि हमने याने कि उस्ताद जी ने टिप्पणी की है उनके पोस्ट में जाकर, हम चाहे जो भी टिप्पणी करें सामने वाला पढ़ता तक नहीं है बल्कि हमारी टिप्पणी पाकर खुद को सम्मानित समझता है। पर ऐसे लोगों को क्या कहें जो टिप्पणी का अर्थ निकालना चाहते हैं। भई टिप्पणी तो शान होती है पोस्ट की! उसका भी कुछ अर्थ होता है क्या? हमारे टिप्पणी करने का एहसान मानना तो दूर उल्टे हमारी उस टिप्पणी पर भी पोस्ट निकाल लेते हैं कि ऐसी टिप्पणी क्यों किया तुमने? हमारी टिप्पणी ही उनको चिपक जाती है और उसी पर पोस्ट तान देते हैं। अब कहाँ तक हम सफाई दें उनको? सफाई देते भी हैं तो उस सफाई पर भी एक पोस्ट लिख देंगे। लोग तो अधिक से अधिक टिप्पणी पाने के लिये तरसते हैं और ये ऐसे बेवकूफ हैं कि कहते हैं टिप्पणी में क्या धरा है? पाठक बढ़ाओ। अब आप ही बताइये कि दूसरे ब्लोगर पाठक नहीं होते क्या? पर इनकी उल्टी खोपड़ी तो उन्हें ही पाठक समझती है जो ब्लोगर न होकर केवल पाठक ही हों। ऐसे पाठकों से क्या भला होना है हिन्दी का? ये तो सिर्फ पढ़ना जानते हैं लिखना कहाँ जानते हैं कि पढ़ने के बाद कम से कम एक टिप्पणी ही लिख सकें। भाई ब्लोग तो होता है ब्लोगरों के लिये! तुम हमें टिपियाओ हम तुम्हें टिपयायेंगे। पाठकों का क्या लेना देना है उससे?

"चिट्ठा चर्चाओं की बाढ़ आ रही है सो अलग परेशानी है। आप ही बताइये कोई औचित्य है इतनी सारी चिट्ठा चर्चाओं की? ऐसा लगता है कि लोगों के पास अब चर्चा लिखने के सिवाय कोई काम ही नहीं रह गया है। पहले तो सिर्फ हमारे ही लोगों का चिट्ठा चर्चा हुआ करता था और हमारे ही लोगों का संकलक भी। हम लोगों का ही राज चला करता था। अधिक से अधिक बैकलिंक्स हमें और हमारे लोगों को ही मिला करते थे और हमारे संकलक के टॉप लिस्ट में हम और हमारे साथी ही हुआ करते थे। अब इतने सारे चिट्ठा चर्चा आ जाने से बैकलिंक्स दूसरों को भी मिलने लग गये हैं।"

"पर आप वाले संकलक में तो अभी भी आप और आपके लोगों का ही वर्चस्व है।"

"अरे होगा कैसे नहीं भला? बेवकूफ नहीं हैं हम! हमने फॉर्मूला ही ऐसा बनाया है कि हम लोगों का ही वर्चस्व रहे। हमारे फार्मूले में हमने अपने और अपने लोगों का पूरा पूरा ध्यान रखा है। क्या किसी की मजाल है कि हमारे टॉप लिस्ट में आ जाये? लाख सिर पटक ले, दिन में पचासों पोस्ट लिख ले, लाख बैकलिंक्स पा ले पर हमारे टॉप लिस्ट में वही रहेगा जिसे हम चाहेंगे। हाँ एक दो बाहरी लोगों को भी टॉप लिस्ट में लेना पड़ा है क्योंकि उन्होंने पक्षपात वाला राग अलापना शुरू कर दिया था। वैसे उनको टॉप लिस्ट में शामिल करना एक प्रकार से अच्छा ही हुआ। एक तो उनका मुँह भी बंद हो गया और दूसरे हमारी निष्पक्षता का सन्देश भी प्रसारित हो गया।"

"तो फिर अब क्या परेशानी है आपको?"

"अभी तो कोई परेशानी नहीं है पर बाद में तो हो सकती है ना! ये भी हो सकता है कि और भी कई संकलक आ जायें। अभी हमारे संकलक के अलावा जो दूसरा संकलक है उससे तो खैर कोई परेशानी नहीं है हमें क्योंकि वह बिल्कुल ही निष्पक्ष है और उसमें कोई टॉप लिस्ट भी नहीं है। पर यदि कोई हमारे फॉर्मूले जैसा ही दूसरा संकलक आ गया तो क्या होगा? उस संकलक के टॉप लिस्ट में दूसरे लोग होंगे तो हमारा क्या होगा?"

"तो क्या सोचा है आपने?"

"अरे अभी तक हम टॉप रहे हैं तो आगे भी हम ही टॉप रहेंगे। सर कुचल कर रख देंगे स्सालों का जो हमसे आगे निकलने की कोशिश करेंगे। अंग्रेजी में हिन्दी, हिन्दी में अंग्रेजी के उपसर्ग और प्रत्यय जोड़-जोड़ कर और हिन्दी की टाँगें तोड़ कर ऐसे-ऐसे शब्द बनायेंगे कि लोग खिंचते चले आयेंगे हमारे ब्लोग में! क्या समझ रखा है हमें। आपने देखा नहीं है क्या कि हमारा पोस्ट आते ही पसंद और टिप्पणियों का सिलसिला शुरू हो जाता है!"

"हाँ ये बात तो है! हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ है कि आप सदा टॉप बने रहें। अच्छा तो चलते हैं अब हम। नमस्कार!"

"नमस्कार!"

40000 हजार से 1411 ... कैसे बजा बाघों का 12

बाघ!

वही बाघ जिसका मुँह खोलकर बालक भरत, जी हाँ दुष्यन्त और शकुन्तला का महान पुत्र भरत जिसके कारण हमारे देश का नाम भारतवर्ष हुआ, ने उसके दाँत गिने थे!

वही बाघ जो हमारा राष्ट्रीय पशु है!

वही बाघ जिनकी संख्या एक सदी के भीतर 40000 हजार से 1411 हो गई। पता नहीं अब तक 1411 भी है या उससे भी कम हो गई है।

कहीं ऐसा हो कि बाघ विलुप्त ही हो जाये और हमें अपने बच्चों को बाघ दिखाने के लिये हमारे राष्ट्रीय प्रतीक को दिखाना पड़े कि बाघ यह होता है। कम से कम इतना तो है कि कोई कितना ही कोशिश कर ले पर राष्ट्रीय प्रतीक के चार बाघों, जिसके नीचे कठोपनिषद का उद्धरण "सत्यमेव जयते" है, का अवैध शिकार तो कर ही नहीं सकता। क्या बाघों का विनाश ही सत्य की विजय है?

हमारे देश में होने वाले अवैध शिकार ही तो इन बाघों के विनाश के मुख्य कारणों में से एक है। कैसे हो जाते हैं ये अवैध शिकार? क्या हमारे कानून में इतना दम नहीं है कि इन शिकारों को रोक सकें? क्या "बाघ परियोजना" (Project Tiger) अपना लक्ष्य पूर्ण कर सकेगी? वास्तविकता तो यह है कि बाघों के अवैध शिकार में कानून बनाने वालों और उसकी रक्षा करने वालों का भी सहयोग रहता है क्योंकि उससेसे हुई कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन्हें भी मिलता है। रक्षक ही यदि भक्षक बनेंगे तो कैसे रुक पायेगा यह अवैध शिकार का देशद्रोही घृणित कर्म?

अब आप पूछेंगे कि इसमें हम क्या कर सकते हैं?

अजी आप तो बहुत कुछ कर सकते हैं। आप ब्लोगर हैं, आप के पास अपनी आवाज को प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाने की शक्ति है। आपकी रचनाएँ अवश्य ही इनकी रक्षा कर सकती हैं, बाघों की रक्षा ही क्या ये तो क्रान्ति ला सकती हैं, भ्रष्टाचारियों का तख्ता पलट सकती हैं, देश को खुशहाल बना सकती हैं, युग बदल सकती हैं बशर्तें कि इन रचनाओं की कृति निःस्वार्थ भाव से अपने देश और अपनी भाषा के प्रति पूर्ण निष्ठा और लगन के साथ की जाये, यदि हमारी ये कृतियाँ लोगों को ऐसा प्रभावित करे कि वे एक नई क्रान्ति के लिये तत्पर हो जायें।

पर क्या हम आत्मप्रतिष्ठा को त्याग कर देश और भाषा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो पायेंगे? क्या हम ऐसी प्रभावशाली कृतियाँ लोगों को दे पायेंगे?

Sunday, February 21, 2010

"पतली कमर मोरे लचके" शीर्षक वाले पोस्ट पर तो भीड़ उमड़ पड़ेगी पर "कृष्ण की वंशी गोपियों को मोहती थी" जैसे शीर्षक वाले पोस्ट को क्या कोई पढ़ना पसंद करेगा?

"पतली कमर मोरे लचके" शीर्षक वाले पोस्ट पर तो भीड़ उमड़ पड़ेगी पर "कृष्ण की वंशी गोपियों को मोहती थी" जैसे शीर्षक वाले पोस्ट को क्या कोई पढ़ना पसंद करेगा? बिल्कुल नही करेगा। जमाना बदल गया है तो नये जमाने के लोगों का टेस्ट भी बदल गया है। लोग तो यही सोचेंगे कि यार क्या ये भी कोई कृष्ण गोपियों वाला जमाना है? क्यों ऐसे पोस्ट लिख कर बोर कर रहे हो हमें?

एक बार एक सज्जन से वैदिक मैथेमेटिक्स के विषय में कुछ कहने की गलती कर बैठा। सुनकर उन्होंने कहा, "क्या उपयोगिता है इस वैदिक गणित की आज के जमाने में? केलकुलेटर उठाओ और बात की बात में कुछ भी हिसाब कर लो!" तो मैंने कहा, "हाँ भाई उपयोगिता तो अब बूढ़े माँ बाप की भी नहीं रह गई है, काहे रखे हुए हो इन्हें अपने साथ? और ये तुमने अपने स्वर्गवासी दादा दादी की तस्वीर क्यों कमरे में लगा रखी है? निकाल कर क्यों नहीं फेंक देते इन तस्वीरों को?"

खैर साहेब, मैं तो यही समझता हूँ कि चीजें पुरानी हो या नयीं, उपयोगिता तो उनकी होती ही है। और नहीं तो कुछ न कुछ ज्ञानवर्द्धन तो होता ही है।

इतना सब कुछ मैंने इसलिये लिख मारा क्योंकि फागुन का यह महीना मुझे, इतनी उमर का हो जाने के बावजूद भी, मदमस्त कर देता है। फागगीतों का दीवाना हूँ मैं। आज के जमाने में फागुन के महीने में झाँझ, मंजीरा, मृदंग, ढोल, डफ, नगाड़े आदि के ताल धमाल बहुत ही कम सुनने को मिलते हैं। हमारे समय में तो बसंत पंचमी से लेकर रंग पंचमी तक एक भी दिन ऐसा नहीं होता था कि फाग की लय न सुनाई पड़े। कृष्ण और गोपियों के प्रेमरस से सने मधुर फाग!

तो प्रस्तुत हैं एक फागगीतः

मुरली धुन नेक बजाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया
अरे मोह लिये सब ग्वालनिया हो मोह लिये सब ग्वालनिया
मुरली धुन नेक बजाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया

काहेन के तोरे मूरलिया हो काहेन के तोरे मूरलिया
काहेन बंद लगाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया
मुरली धुन नेक बजाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया

सोनेन के तोरे मूरलिया हो सोनेन के तोरे मूरलिया
रेशम बंद लगाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया
मुरली धुन नेक बजाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया

कहँवा बाजे मूरलिया हो कहँवा बाजे मूरलिया
कहँवा शब्द सुनाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया
मुरली धुन नेक बजाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया

गोकुल बाजे मूरलिया हो गोकुल बाजे मूरलिया
मथुरा शब्द सुनाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया
मुरली धुन नेक बजाय हो साँवरिया मोह लिये सब ग्वालनिया

चलते-चलते

मिला बन में मुरलिया वाला सखी मिला बन में मुरलिया वाला सखी

कोई कहे देखो मोहन है आये
कोई कहे नन्दलाला सखी
मिला बन में मुरलिया वाला सखी

धर पिचकारी खड़े ग्वाल सब
कोई धरे है गुलाला सखी
मिला बन में मुरलिया वाला सखी

सारी साड़ी मेरो भिगोये
देखो नन्द के लाला सखी
मिला बन में मुरलिया वाला सखी

बैजनाथ कहे श्याम सलोना
लेकिन मन का काला सखी
मिला बन में मुरलिया वाला सखी

Saturday, February 20, 2010

परेशान कर डाला था फायरफॉक्स के अपग्रेडेशन ने ... ब्लोग्स को खुलने ही नहीं देता था

रोज की तरह कम्प्यूटर खोलने के बाद हमने फायरफॉक्स ब्राउसर के एक टैब में अपना ब्लोगर खाता खोला ताकि देख पायें कि जिन ब्लॉग्स को हम फॉलो करते हैं उनमें से कौन कौन से अपडेट हो चुके हैं और दूसरे टैब में ब्लोगवाणी खोल दिया। इतने में में फायरफॉक्स का सन्देश मिला कि उसका नया संस्करण 3.6 हिन्दी में आ चुका है। खुश होकर हमने तत्काल नये संस्करण को डाउनलोड और इंस्टाल कर दिया।

इतना करने के बाद हम अपना पोस्ट "झलक रहा लालित्य ललित का" लिखने बैठ गये। हम पोस्ट लिख ही रहे थे कि कुछ देर बाद अचानक ही फायरफॉक्स क्रैश हो गया। अब ब्राउसर का क्रैश हो जाना कोई असामान्य बात तो है नहीं, वह तो कभी भी क्रैश हो जाता है। इसलिये हमने फिर से फायरफॉक्स को खोल लिया और अपने पोस्ट को पूरा करने में तल्लीन हो गये।

जब पोस्ट पूरा हो गया तो उसे प्रकाशित करने के लिये ब्लोगर में गये। पर यह क्या? ब्लोगर तो खुल ही नहीं रहा। गूगल टाक भी बुझा हुआ पड़ा था। हमने सोचा कि शायद कुछ समय के लिये गूगल डाउन होगा, थोड़ी देर में वापस आ जायेगा। दूसरों के पोस्ट देखने शुरू किये पर जिनके ब्लोग ब्लोगर में हैं वे भी नहीं खुले। हम इन्तजार करते रहे गूगल बाबा के वापस आने का। जब एक घंटे तक गूगल बाबा वापस नहीं आये तो हमारी चिंता बढ़ी। ललित शर्मा जी को मोबाइल लगाया तो पता चला कि उनके यहाँ तो गूगल महोदय बिल्कुल सही काम कर रहे हैं।

अब हमें विश्वास हो गया कि हमारे कम्प्यूटर में ही कुछ न कुछ बीमारी आ गई है। कम्प्यूटर में प्रायः कोई बीमारी तभी आती है जब कुछ नया चीज इंस्टाल किया जाता है। हमने तो फायरफॉक्स का नया वर्सन इंस्टाल किया था इसलिये हमने अनुमान लगाया कि जरूर बीमारी भी इसी के कारण से ही है। अब हमने सर्च करके बीमारी के विषय में पता लगाना चाहा तो गूगल सर्च भी नदारद। गूगल सर्च इंजिन हमारा प्रिय सर्च इंजिन है पर क्या कर सकते थे? झख मार कर याहू सर्च में गये। आधा पौन घंटा माथा फोड़ने के बाद आखिर पता लगा ही लिया कि बीमारी का कारण क्या है। फिर बीमारी को दूर करने के बाद हमने अपना पोस्ट डाला।

अब और अधिक आपका माथा नहीं चाटने वाले हम बीमारी के बारे में बता कर। हम तो बस इतना ही बताना चाहते हैं कि यदि कभी आपके साथ भी ऐसा हो जाये तो आपको क्या करना है। घबराइये नहीं बहुत सरल है इस बीमारी को दूर करना। फायरफॉक्स को खोलकर उसके औजार मेनू में विकल्प को क्लिक करें।


अब नये खुलने वाले विंडो में संजाल को क्लिक करके सेटिंग को क्लिक करे।

अब "इस संजाल के लिये प्रॉक्सी सेटिंग स्वतः जाँचे" को चेक कर दीजिये।

अब सभी फायरफॉक्स ब्राऊसर्स को बंद दीजिये। एक दो मिनट बाद फायरफॉक्स फिर खोलिये और आपको पता चलेगा कि आपकी समस्या समाप्त हो चुकी है। यदि इतने पर भी समस्या न सुलझे तो अपने कम्प्यूटर को बंद कर के एक बार फिर से चालू करें, समस्या 100% सुलझ गई रहेगी।

झलक रहा लालित्य ललित का

मैं बात कर रहा हूँ ललित शर्मा जी के लालित्य की। कोई और ललित नहीं बल्कि हमारे ही ब्लोगर मित्र ललित शर्मा जी की! उनके माता पिता ने न जाने क्या सोचकर उनका नाम ललित रखा रहा होगा किन्तु वे अपने माता पिता का पूर्ण सम्मान करते हुए लालित्यपूर्ण काव्य रचनाएँ कर के अपने नाम को सार्थक कर रहे हैं।

कई बार मुझे लगता था कि रस, छंद और अलंकार अब दम तोड़ रहे हैं। अब 'नवकंज लोचन, कंजमुख, करकंज, पदकंजारुणं' जैसी अनुप्रास अलंकार से युक्त पंक्तियाँ शायद ही लिखी जायेंगी। किन्तु ललित शर्मा जी की संयोग श्रृंगार रस और अनुप्रास अलंकार से अलंकृत निम्न रचना को पढ़ कर समझ में आया कि मेरी यह सोच सरासर गलत हैः

सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..

कंचनकाया कनक-कामिनी,
वह गाँव की छोरी
चन्द्रमुखी चंदा चकोर
चंचल अल्हड-सी गोरी.
ठुमक ठुमक कर ठिठक-ठिठक कर
करती मस्त ठिठोली.
सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..

छन-छन, छनक-छनन छन
पायल मृदुल बजाती
सन-सन सनक सनन सन
यौवन-घट को भी छलकाती
रंग रंगीले रसिया के छल से
भीगी नव-चोली
सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..

पीताम्बर ने प्रीत-पय की
भर करके पिचकारी
मद-मदन मतंग मीत के
तन पर ऐसी मारी
उर उमंग उतंग क्षितिज पर
लग गई जैसे गोली
सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..

गज गामिनी संग गजरा के
गुंजित सारा गाँव
डगर-डगर पर डग-मग
डग-मग करते उसके पांव
सहज- सरस सुर के संग
सजना खाये भंग की गोली
सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..
शीर्षक सहित रचना की प्रत्येक पंक्ति में अनुप्रास का इतना सुन्दर प्रयोग ललित जी के लालित्य का ही तो प्रदर्शित करता है!

अलंकारों की बात चली है तो आइये थोड़ा इस विषय में जान भी लें। अलंकार का अर्थ होता है आभूषण या गहना। जिस प्रकार से नारी का सौन्दर्य में स्वर्ण, रत्न आदि से निर्मित अलंकारों से वृद्धि हो जाती है उसी प्रकार से साहित्य के के सौन्दर्यवर्द्धन के लिये अलंकारों का प्रयोग किया जाता है।

अलंकार के निम्न तीन प्रकार होते हैं:

शब्दालंकारः जहाँ शब्द चातुर्य के द्वारा काव्य का सौन्दर्यवर्द्ध किया जाता है वहाँ शब्दालंकार होता है। अनुप्रास, यमक और श्लेष अलंकार शब्दालंकार के अन्तर्गत् आते हैं।

अर्थालंकारः जहाँ अर्थ में चमत्कार के द्वारा काव्य का सौन्दर्यवर्द्ध किया जाता है वहाँ अर्थालंकार होता है। उपमा, रूपक, भ्रान्तिमान आदि अलंकार अर्थालंकार के अन्तर्गत् आते हैं।

उभयालंकारः जहाँ अर्थ में चमत्कार के द्वारा काव्य का सौन्दर्यवर्द्ध किया जाता है वहाँ अर्थालंकार होता है।

अलंकारों के कुछ उदाहरणः

सिसिर में ससि को सरूप वाले सविताऊ,
घाम हू में चाँदनी की दुति दमकति है।
(अनुप्रास वर्णों की आवृति)

दिनान्त था थे दिननाथ डूबते सधेनु आते गृह ग्वालबाल थे
(अनुप्रास एक ही वर्ग के वर्णों के साथ साथ अन्य वर्णों की आवृति)

घोर मन्दर के अन्दर रहनवारी घोर मन्दर के अन्दर रहाती हैं
(यमक एक ही शब्द के अलग अलग बार प्रयोग में अलग अलग अर्थ)

पानी गये ना ऊबरे मोती मानुस चून
(श्लेष एक शब्द के एकाधिक अर्थ)

कुन्द इन्दु सम देह, उमा रमन करुना अपन
(उपमा)

विरह आग तन में लगी जरन लगे सब गात।
नारी छूअत बैद के परे फफोला हाथ॥
(अतिशयोक्ति )

Friday, February 19, 2010

प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे

नीर अर्थात् सलिल, नीरद, नीरज, जल या पानी! यह नीर कभी नयन से बरसता है तो कभी मेघ से बरसता है। नयन से नीर जहाँ गम में बरसता है वहीं खुशी में भी बरसता है। प्रियतम के विरह में प्रियतमा कहने लगती हैः

प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे

तो दूसरी ओर तुलसीदास जी कहते हैं:

नयन नीर पुलकित अति गाता

यह नीर जिस किसी के संसर्ग में आता है उसे निर्मल कर देता है। इसीलिये कबीर कहते हैं:

कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर

रहीम कहते हैं कि इस नीर याने कि पानी के बिना उबरना मुश्किल हैः

पानी गये न ऊबरे मोती मानुस चून

विचित्र है पानी की महिमा! कभी पानी पिलाना पुण्य का काम होता था पर आज पानी बेचना कमाई का काम है। आज के जमाने में आगे बढ़ना है तो दूसरों का पानी उतारते रहिये।

Thursday, February 18, 2010

मोहे रहि रहि मदन सतावै, पिया बिना नींद नहि आवै

नींद नहि आवै पिया बिना नींद नहि आवै।
मोहे रहि रहि मदन सतावै पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि लागत मास असाढ़ा, मोरे प्रान परे अति गाढ़ा,
अरे वो तो बादर गरज सुनावै, परदेसी पिया नहि आवै।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि सावन मास सुहाना, सब सखियाँ हिंडोला ताना,
अरे तुम झूलव संगी सहेली, मैं तो पिया बिना फिरत अकेली।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि भादों गहन गम्भीरा, मोरे नैन बहे जल-नीरा,
अरे मैं तो डूबत हौं मँझधारे, मोहे पिया बिना कौन उबारे।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि क्वार मदन तन दूना, मोरे पिया बिना मन्दिर सूना,
अरे मैं तो का से कहौं दुख रोई, मैं तो पिया बिना सेज ना सोई।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि कातिक मास देवारी, सब सखिया अटारी बारी,
अरे तुम पहिरौ कुसुम रंग सारी, मैं तो पिया बिना फिरत उघारी।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि अगहन अगम अंदेसू, मैं तो लिख-लिख भेजौं संदेसू,
अरे मैं तो नित उठ सुरुज मनावौं, परदेसी बलम को बुलावौं।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि पूस जाड़ अधिकाई, मोहे पिया बिना सेज ना भाई,
अरे मोरे तन-मन-जोबन छीना, परदेसी गवन नहि कीना।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि माघ आम बौराये, चहुँ ओर बसंत बिखराये,
अरे वो तो कोयल कूक सुनावै, मोरे पापी पिया नहि आवै।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

सखि फागुन मस्त महीना, सब सखियन मंगल कीन्हा,
अरे तुम खेलव रंग गुलालै, मोहे पिया बिना कौन दुलारै।
पिया बिना नींद नहि आवै॥

आप इसे मेरी स्वरचित रचना मत समझ लीजियेगा क्योंकि यह किसी अन्य की रचना है जिनका नाम तक मुझे पता नहीं है। वास्तव में यह ताल धमाल के साथ गाया जाने वाला फागगीत है जिसे बारहमासी फाग के नाम से जाना जाता है।

चलते-चलते

जमुना गहरी कइसे भरौं जमुना गहरी

ठाढ़े भरौं राजा राम देखत हैं
निहुरे भरौं भीजै चुनरी
जमुना गहरी ...

धीरे चलौं घर बालक रोवत है
जल्दी चलौं छलकै गगरी
जमुना गहरी ...

Wednesday, February 17, 2010

ब्लोगवाणी लिंक क्यों काम नहीं कर रहा? ... क्या आप कुछ सहायता कर सकते हैं?

पहले मैं अपने "धान के देश में", "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" आदि ब्लॉग्स में प्रविष्टि करने के बाद ज्योंही ब्लोगवाणी लोगो को क्लिक करता था तो मेरा पोस्ट ब्लोगवाणी में तत्काल दिखाई देने लगता था। किन्तु कुछ दिनों से मैं अनुभव कर रहा हूँ कि अपने पोस्ट में ब्लोगवाणी लिंक को क्लिक करने के बाद वह ब्लोगवाणी में तुरन्त नहीं पहुँचता बल्कि ५ से लेकर १५ मिनट बाद ही वहाँ पर दिखाई देता है।

प्रत्येक ब्लोगर के जैसे ही मैं भी चाहता हूँ कि मेरा पोस्ट प्रकाशित होते ही वह ब्लोगवाणी में दिखाई देने लगे। मैंने ब्लोगवाणी के पुराने कोड को मिटा कर फिर से नया कोड लगा कर भी देख लिया किन्तु समस्या हल नहीं हुई।

क्या आप इस समस्या को सुलझाने में मेरी मदद कर सकते हैं?

Tuesday, February 16, 2010

आज नहीं दे पायेंगे आपका साथ ... परघानी है हमें प्यारी भांजी की बारात

आज हम न आपके पोस्ट पढ़ पायेंगे और न ही टिप्पणी कर पायेंगे। लाडली भांजी के विवाहोत्सव की व्यस्तता हमें इजाजत ही नहीं देगी इन सब के लिये। सोचा था कि आज कम्प्यूटर खोलेंगे ही नहीं पर याद आया कि आप लोगों को तो अब तक निमन्त्रण भेजा ही नहीं है हमने। इसलिये इस पोस्ट के माध्यम से आप लोगों को निमन्त्रण दे ही देते हैं। दुल्हा-दुल्हन को आप लोगों का आशीर्वाद से अभिभूत करने के लिये!

Monday, February 15, 2010

यह हिन्दी की समृद्धि है या हिन्दी की ऐसी तैसी?

हिन्दी में सबसे पहला निजी चैनल जीटीवी आया और आते ही उसने हिन्दी में अंग्रेजी को घुसेड़ कर खिचड़ी प्रसारण शुरू कर दिया। चूँकि वह हिन्दी का पहला चैनल था इसलिये उसे लोकप्रिय तो होना ही था उसे किन्तु शायद बाद में आने वाले निजी चैनलों ने उसके खिचड़ी भाषा को ही उसकी लोकप्रियता का कारण समझ लिया और उसी ढर्रे पर चल कर हिन्दी की और भी चिन्दी करने लगे। यह हिन्दी की समृद्धि है या हिन्दी की ऐसी तैसी?

अब अन्तरजाल में ब्लोग्स का साम्राज्य है। हिन्दी ब्लोग्स की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है और उसी अनुपात में हिज्जों तथा व्याकरण की गलतियाँ भी अधिक से अधिक देखने को मिल रही हैं। यद्यपि यह क्षम्य नहीं है किन्तु, यह सोचकर कि अनेक अहिन्दीभाषी भी हिन्दी ब्लोग लिख रहे हैं और उनसे ऐसा होना स्वाभाविक है, एक बार इसे अनदेखा किया भी जा सकता है। पर हिन्दी ब्लोग्स में भी जबरन अंग्रेजी घुसेड़ा जाना और ऐसे शब्दों का प्रयोग करना जिसका अर्थ न तो नलंदा विशाल शब्दसागर जैसे हिन्दी से हिन्दी शब्दकोश में खोजने पर नहीं मिलता और यह मानकर कि शायद यह अंग्रेजी शब्द हो आक्फोर्ड, भार्गव आदि अंग्रेजी से हिन्दी शब्दकोशों में खोजने से भी नहीं मिलता क्या है? यह हिन्दी की समृद्धि है या हिन्दी की ऐसी तैसी?

Sunday, February 14, 2010

शकुन्तला का प्रेमपत्र दुष्यन्त के नाम - वेलेंटाइन डे स्पेशल

मेरे अनुरागी दुष्यन्त!

पिछले वर्ष वेलेंटाइन डे के दिन तुमने मुझे यह लाल गुलाब दिया था तभी से आँखें बंद करती हूँ तो तुम सामने नजर आते हो। आँखें खोलती हूँ तब भी तुम मेरे सामने रहते हो। तुम्हारा मुखड़ा, तुम्हारी आँखें, तुम्हारी मुस्कुराहट मैं एक पल भी नहीं भूल पाती। रात में सब सो जाते हैं लेकिन मुझे नींद नहीं आती। छटपटाते रहती हूँ। तकिये में मुँह छुपा लेती हूँ। मुझे लगता है तकिया ही तुम्हारा विशाल सीना है जहाँ मैं सदैव के लिये समा गई हूँ।

आज हमारे मिलन को एक वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इस दौरान हम दोनों कितने ही बार मुँह में रूमाल बाँध कर लांग ड्राइव्ह में गये हैं और किसी ने भी हमें पहचाना तक नहीं। किन्तु पिछले कई दिनों से तुमने मुझे मेरे मोबाइल पर कॉल भी नहीं किया है। आज फिर से वेलेंटाइन डे आ गया है और मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ किन्तु तुम्हारा कहीं भी पता नहीं लग रहा है। मुझे भय लग रहा है कहीं आज तुम किसी और को लाल गुलाब देने के लिये तो नहीं चले गये हो। कहीं तुमने महाभारत कालीन दुष्यन्त की तरह से मुझ शकुन्तला को भुला दिया तो मेरे गर्भ में पलते भरत का क्या होगा। क्या मेरी माता मेनका मुझे कश्यप ऋषि के पास आज भी छोड़ेगी?

जल्दी ही आ जाओ। आने के पहले मोबाइल कर देना ताकि मैं अपने मुँह पर रूमाल बाँधकर तुम्हारे साथ हमेशा हमेशा के लिये चले जाने के लिये तैयार रहूँ।

कहीं ऐसा न हो जाये किः

नजर को जगंल नही अब मकान मिलते हैं
अब हवा मे यहां बि्जली के तार हिलते हैं
प्यार मे पागल यहां आ गयी है शकुंतला
सड़क पर चलते हुए उसके पाँव छिलते हैं

(उपरोक्त पंक्तियाँ ललित शर्मा के सौजन्य से)

सिर्फ तुम्हारी
शकुन्तला

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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" में आज पढ़ें

लंका में सीता की खोज - सुन्दरकाण्ड (3)

Saturday, February 13, 2010

तो अब हम भी चलें

मजबूरी है। जाना तो पड़ेगा ही। जिस प्रकार से संसार असार है उसी प्रकार से यह ब्लोगजगत भी असार है। कब तक बने रहेंगे यहाँ? कब तक सींग कटा कर बछड़ों में शामिल होते रहेंगे? कब तक नये लोगों को पुरानी बातें बता बता कर बोर करते रहेंगे? आखिर कब तक? हमारे कई साथी तो इस नश्वर संसार को ही छोड़ कर चले गये हैं अब तक और एक हम हैं कि साठ साल की उम्र होने के बावजूद भी लटके हुए हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि शिरीष के फल सूख जाने पर भी पेड़ से लटके ही रहते हैं। फूल-पत्तियाँ झड़ जाती हैं पर ये सूखे और हवा में डोलते फल हैं कि लटके ही रहते हैं। वाह रे शिरीष के फल!

अरे भाई हमने तो हमारे टिप्पण्यानन्द जी के ब्लोग छोड़ने वाली धमकी वाले फॉर्मूले को आजमाने के लिये ये सब लिख डाला वरना पक्के बेशर्म हैं हम। आप हमें अगर भगाओगे भी तो भी नहीं जाने वाले। वैसे तीन चार दिनों के लिये थोड़ा दूर होना पड़ेगा हमें आप लोगों से, आखिर हमारी प्यारी भांजी की शादी जो है १६ तारीख को! सबसे बड़े मामा हैं हम उसके तो वहाँ रहना तो होगा ही हमें। वैसे काम वाम करने के लिये बहुत लोग हैं वहाँ पर, हमारा काम तो केवल उन लोगों के काम पर निगाह रखना ही होगा। फिर भी कोशिश यही रहेगी कि भले ही टिप्पणी कम कर पायें या नहीं ही कर पायें पर कम से कम हमारे पोस्ट तो नियमित रहें। याने कि छुट्टी लेने के बाद भी आप लोगों से मिलने का प्रयास करते ही रहेंगे।

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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

हनुमान जी का लंका में प्रवेश - सुन्दरकाण्ड (२)

Friday, February 12, 2010

किस चीज का चित्र है ये? ... ललित जी की चित्र पहेली

कल मेरे साथ ललित जी ने यह चित्र लिया था। क्या आप बता सकते हैं कि किस चीज का चित्र है यह?

आपको तो पता ही है कि ललित शर्मा जी आजकल छुट्टी में चल रहे हैं। पर छुट्टी में होने के बावजूद भी उनके पोस्ट आ रहे हैं क्योंकि उन्हें ललित जी ने पहले ही शेड्यूल्ड करके रख दिया था। कल लगभग सवा बजे दिन को उनका फोन आया मेरे पास। बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि राजिम मेला घूमने का विचार बन रहा है उनका साथ ही निमन्त्रण मिला उनके साथ मेला चलने के लिये। तो मैंने भी कल आधे दिन की छुट्टी ले ली और बस पकड़ कर एक घंटे के भीतर रायपुर से अभनपुर पहुँच गया। रायपुर से अभनपुर आखिर मात्र २८ कि.मी. की दूरी पर ही तो है। ललित जी वहाँ पर मेरा इन्तिजार करते मिले मुझे अपने मोटरसायकिल के साथ।

उनके मोटरसायकल से ही हम लोग निकल पड़े राजिम के लिये जो कि अभनपुर से मात्र १७ कि.मी. दूरी पर है। राजिम मेला छत्तीसगढ़ का अत्यन्त प्राचीन और सबसे बड़ा मेला है जो कि माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक चलता है। राजिम महानदी के तट पर स्थित है और यहाँ पर महानदी के साथ पैरी तथा सोंढुर नदियों का त्रिवेणी संगम होता है। इसीलिये राजिम को छत्तीसगढ़ के प्रयाग की संज्ञा दी गई है। महानदी छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी नदी है और प्राचीनकाल में इसे चित्रोत्पला के नाम से जाना जाता था।

ललित जी को फोटोग्राफी और ग्राफिक्स के क्षेत्र में महारथ हासिल है सो उन्होंने बड़े सुन्दर सुन्दर चित्र भी लिये वहाँ पर जिनमें से कुछ यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ





(चित्रों को बड़ा करके देखने के लिये उन पर क्लिक करें।)

राजिम मेला जाने का एक सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि वहाँ पर हमें गीताप्रेस गोरखपुर के स्टॉल में वाल्मीकि रामायण द्वितीय भाग की प्रति, जो हमसे गुम हो गई थी, मिल गई और आज से हमने अपने "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण", जो कि बहुत दिनों से रुका हुआ था, में प्रविष्टियाँ पुनः आरम्भ कर दिया।

"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

हनुमान का सागर पार करना - सुन्दरकाण्ड (1)

Thursday, February 11, 2010

ये ब्लोगिंग है इस ब्लोगिंग का यही है यही है यही है रंग रूप

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"लिख्खाड़ानन्द जी बड़े चालाक हैं आप! उस दिन आपने हमें ब्लोगिंग फॉर्मूले बताये जरूर थे पर पोस्ट हिट कराने के जो असली टॉप फार्मूले हैं उनको गोल कर गये।"

"अरे नहीं भाई! पोस्ट हिट कराने का सबसे हिट फॉर्मूला तो सिर्फ विवादास्पद पोस्ट लिखना है सो हमने आप को बता ही दिया था।"

"पर लिख्खाड़ानन्द जी अब ये विवादास्पद पोस्ट लिखने वाला फॉर्मूला टॉप नहीं रह गया है क्योंकि आजकल लोग नर-नारी और धर्मों के विवाद को ज्यादा तूल नहीं देते। आपने तो देखा ही होगा कि पिछले कुछ समय से नर-नारी और धर्मों के विवाद वाले पोस्ट आ ही नहीं रहे हैं। और एकाध पोस्ट आ भी जाता है तो वो हिट बिल्कुल नहीं होता। हाँ वो साइबर स्क्वैटिंग वाले एक पोस्ट ने जरूर धूम मचाया था। और हम तो ऐसा पोस्ट लिख ही नहीं सकते क्योंकि इसमें तो बहुत कानूनी लोचा है। हमने ऐसा पोस्ट लिखा और किसी ने यदि कोर्ट-कचहरी के चक्कर में घसीट ही दिया तो हमें तो लेने के देने पड़ जायेंगे। भाई, बड़ी मुश्किल से तो मौज लेने के लिये हम ब्लोगिंग करने का समय निकाल पाते हैं, कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाने के लिये कहाँ समय है हमारे पास?"

"कह तो आप रहे हैं सही टिप्पण्यानन्द जी! पर गलत है। अगर पोस्ट हिट कराना है तो रिस्क तो लेना ही पड़ेगा। वो कहते हैं ना 'नो रिस्क नो गेन!' याने कि "चाहे जूते पड़े हजार, तमाशा घुस के देखेंगे!" अब जब ब्लोगिंग रूपी ओखली में सिर दे ही दिया है तो कानूनी लफड़ों की मूसलों से भला क्या डरना?"

"नहीं नहीं लिख्खाड़ानन्द जी! हम तो ऐसा रिस्क बिल्कुल नहीं ले सकते क्योंकि हम कानूनी लफड़ों से बहुत डरते हैं।"

"आप तो बस 'सिटल्ली साव' ही निकले भई! ठीक है, मत लो रिस्क पर आपका पोस्ट भी हिट नहीं होगा।"

"अरे कैसे हमारा पोस्ट हिट नहीं होगा? हम तो करा के ही रहेंगे अपने पोस्ट को हिट!"

"कैसे करवा लोग अपना पोस्ट हिट? भला हम भी तो जानें!"

"वो क्या है लिख्खाड़ानन्द जी! आपकी इस बात को हमने गाँठ बाँध कर धर लिया है कि हिन्दी पोस्ट को पाठकों से कुछ लेना देना नहीं है। अंग्रेजी ब्लोगिंग को विराट कवि सम्मेलन जैसा समझा जा सकता है जहाँ पर कुछ संख्या में कविगण आते हैं और उन्हें सुनने के लिये विशाल संख्या में श्रोतागण पहुँचते हैं। किन्तु हिन्दी ब्लोगिंग कवि सम्मेलन होकर कवि गोष्ठी है जहाँ पर सिर्फ कवि ही कवि आते हैं और एक-दूसरे की कविताएँ सुन-सुना कर वाह वाह करते हैं। यही कारण है कि हिन्दी पोस्ट तब हिट होती है जब वहाँ पर अधिक से अधिक ब्लोगर्स आयें और टिप्पणी करें। इसका मतलब यह है कि हमें सिर्फ ब्लोगर्स की पसंदीदा बातें लिख कर उन्हें अधिक से अधिक संख्या में आकर्षित करना है। इसी बात को ध्यान में रखकर हमने पोस्ट हिट कराने के दो और टॉप फॉर्मूलों की खोज कर ली है। वैसे हम इन फॉर्मूलों को किसी को बताना तो नहीं चाहते थे पर आप से हमारी कौन सी बात छुपी है भला? इसलिये आपको बता देते हैं।"

"तो फिर देर किस बात की? जल्दी बताइये ना!"

"तो दिल थाम लीजिये और सुनिये! एक फॉर्मूला तो यह है कि किसी पोस्ट में की गई भविष्यवाणी की सत्यता साबित करते हुए पोस्ट लिख मारना। बस आप एक ऐसी पोस्ट लिख भर दें और देखें कि कैसे धड़ाधड़ टिप्पणियाँ आनी शुरू होती है! ऐसे पोस्ट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जहाँ भविष्यवाणी की सत्यता के पक्ष में टिप्पणियाँ मिलती हैं वही उसके विपक्ष में भी बहुत सारी टिप्पणियाँ मिल जाती हैं। इस प्रकार से पोस्ट हिट हो जाता है।"

"आपकी बात में तो दम जरूर है टिप्पण्यानन्द जी!"

"धन्यवाद लिख्खाड़ानन्द जी! अब हम आपको पोस्ट हिट कराने का एक और सबसे टॉप फॉर्मूला बताते हैं। बस एक पोस्ट ब्लोगिंग छोड़ देने की धमकी देते हुए लिख दीजिये और देखिये कि वह पोस्ट कितनी अधिक पसंद प्राप्त करती है। ऐसे पोस्ट को पसंद किया जाना साबित करता है कि आपके ब्लोगिंग छोड़ देने को बहुत से लोग पसंद करते हैं। कई लोग तो सिर्फ इसलिये ऐसे पोस्ट को पसंद कर लेते हैं कि उन्हें लगता है कि आपका यह पोस्ट आखरी पोस्ट है और बाद में आपके पोस्ट को पसंद करने और उसमें टिप्पणी लिखने से जान छूट जायेगी!"

"अच्छा टिप्पण्यानन्द जी! अब आप अपनी हिट होने वाली पोस्ट की कुछ झलकी भी तो दीजिये हमें."

"तो लीजिये, पेश करता हूँ

ये ब्लोगिंग है इस ब्लोगिंग का यही है यही है यही है रंग रूप
थोड़ा झगड़ा थोड़ा लफड़ा यही है यही है यही है छाँव धूप

ज्ञान से न विद्या से धन से ना व्यवसाय से
पोस्टों की डोर बंधी है टिप्पणी की आय से
तोड़ो मरोड़ो कुछ भी छोड़ो सब कुछ ही ब्लोगिंग है
ये ब्लोगिंग है .... "

"वाह! वाह!! क्या खूब लिखा है!!! आप की ये पोस्ट तो अभी से ही हिट हो गई जी!!!!

"टिप्पण्यानन्द जी! आज तो कमाल की बातें बतलाईं आपने! चलिये इसी खुशी में हम आपको चाय पिलवाते हैं"

"धन्यवाद लिख्खाड़ानन्द जी! पर मैं जरा जल्दी में हूँ, यदि देर हो जायेगी तो श्रीमती जी का पारा चढ़ जायेगा। इसलिये अब चलते हैं। नमस्कार!"

"नमस्कार!"

अस्वीकरण (डिस्क्लेमर): इस पोस्ट का उद्देश्य निर्मल आनन्द मात्र है अतः कृपया इसे गम्भीरतापूर्वक लेने का प्रयास न करें।

Wednesday, February 10, 2010

ब्लोगिंग के गुर सीख लिये हम .. प्रयास एक वर्णिक छंद रचने का

एक विचार आया कि क्या मैं एक वर्णिक छंद की रचना कर सकता हूँ? वह भी ब्लोगिंग के ऊपर? आपको पता ही है कि मैं कोई कवि नहीं हूँ। वैसे लेखक, साहित्यकार या पत्रकार भी नहीं हूँ। फिर भी प्रयोग के रूप में एक वर्णिक छंद रचने के प्रयास में जुट गया। सोचा कि गुरु|लघु|लघु मात्राओं याने कि भगण का प्रयोग करते हुए लिखा जाये। गण तो याद है ना आपको? अरे वही जो स्कूल में पढ़ा था "यमाताराजभानसलगा" वाला। चलिये अब तो याद आ ही गया होगा।

तो बनी ये पंक्तियाँ

ब्लोगिंग के गुर सीख लिये हम पोस्ट लिखो कुछ जो हिट होइ जाये।
पाठक आय न आय वहाँ पर ब्लोगर धावत धावत आये॥
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अब यहाँ आकर अटक गया मैं क्योंकि कवि तो हूँ ही नहीं। इसलिये सोचा कि क्यों न आप सभी की सहायता ली जाये। अब आगे पूरा करने के लिये बाकी पंक्तियाँ आपको सुझाना है। पंक्तियों में भगण का ही प्रयोग करना है याने कि शब्दों का चयन ऐसा हो कि क्रम से गुरु|लघु|लघु मात्राएँ ही आयें।

उदाहरण के लिये रसखान का यह छंद पढ़ लीजियेः

धूरि भरे अति शोभित श्याम जु तैसि बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरै अँगना पग पैजनिया कटि पीरि कछौटी॥
वा छवि को रसखान बिलोकत वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ से ले गयो माखन रोटी॥

तो बस फिर देर क्या है? शुरू हो जाइये अगली पंक्ति बनाने के लिये।

और हाँ, आपकी इस सहायता के लिये अग्रिम धन्यवाद!

Tuesday, February 9, 2010

पैसे की मैं बारिश कर दूँ गर तू हो जाये मेरी

शीर्षक पढ़ते ही यही सोचा ना आपने कि "बुड्ढा स्साला सठिया गया है जो इस उमर में भी किसी को अपना बनाने की बात कर रहा है"। तो हम आपको बता दें कि हमारा अब इस उमर में किसी को अपना बनाने जैसा हमारा कोई विचार नहीं है। अपनी बुढ़िया से ही हम इतने परेशान हैं कि किसी और को अपना बनाने की सोच भी नहीं सकते। और फिर पैसों की बारिश करने की बात तो कोई नवयुवक ही कर सकता है जो समझता है कि मैं तो सारी दुनिया को पाल सकता है। किसी जमाने में हम भी यही समझा करते थे कि हम सारी दुनिया को पाल सकते हैं पर अब तो यही सोचते हैं कि काश! सारी दुनिया मिलकर हमें पाल ले!

दरअसल हम आटो से आ रहे थे तो उस आटो में जो गाना बज रहा था उसमें ऐसा ही कुछ कहा जा रहा था कि "पैसे की मैं बारिश कर दूँ गर तू हो जाये मेरी"। इन बोलों को सुनकर लगा कि भाई जमाना बहुत बदल गया है। हमारे जमाने में तो किसी को अपना बनाने के लिये चांद-सितारे तोड़ लाने की बात कही जाती थी पर आज के जमाने में किसी को अपना बनाने के लिये पैसे की बारिश करना ज्यादा जरूरी है। चांद-सितारों का भला माशूका क्या करेगी? पुराने जमाने की माशूकाएँ भोली-भाली होती थीं और सुन्दर चांद-सितारों के लालच में आ जाया करती थीं पर आज के जमाने की माशूकाएँ तो अच्छी तरह से जानती है कि ये चांद-सितारे तो बड़े-बड़े पिंड मात्र हैं जो सिर्फ दूर से सुन्दर दिखाई देते हैं पर वास्तव में बहुत कुरूप हैं। और यदि चांद सितारों की आवश्यकता पड़ ही गई तो पैसे से खरीद ही लेंगे। यही कारण है कि आज के जमाने में माशूका के लिये पैसे की बारिश करनी जरूरी है। वैसे यह बात भी सही है कि संसार में सिर्फ पैसा ही सब कुछ नहीं है, पैसे से अधिक महत्वपूर्ण वस्तुएँ भी हैं। पर मुश्किल यह है कि उन महत्वपूर्ण वस्तुओं को प्राप्त करने के लिये पैसे की ही जरूरत होती है।

बात चाहे चांद सितारे तोड़ने की हो या पैसे की बारिश की, इन्हीं बातों को कह कर आदमी ऐसा फँसता है कि जिन्दगी भर नहीं निकल पाता।

चलते-चलते

गरीब लकड़हारे की वो कहानी तो आपने जरूर ही सुनी होगी जिसकी कुल्हाड़ी तालाब में गिर जाती है। उसी लकड़हारे का पुनर्जन्म आज के जमाने में हो गया। पर रहा वह गरीब लकड़हारा ही। एक बार वह लकड़ी काटने के लिये अपनी पत्नी के साथ जंगल में गया तो उसकी पत्नी फिसल कर तालाब में डूब गई। लकड़हारा के प्रार्थना पर इस बार भी भगवान उसकी सहायता के लिये आ गये।

भगवान ने उसकी पत्नी को तालाब से निकालने के लिये डुबकी लगाया और ऐश्वर्या रॉय को लेकर बाहर निकले और पूछा, "क्या यही है तेरी पत्नी?"

लकड़हारे ने खुश होकर कहा, "हाँ भगवान! यही है।"

इस पर भगवान ने कहा, "पिछले जनम में कितना ईमानदार था तू और इस जनम में बेईमान हो गया।"

लकड़हारा बोला, "ऐसी बात नहीं है प्रभु! पिछली बार पहले आपने सोने की कुल्हाड़ी निकाली थी फिर चांदी की और आखरी में मेरी लोहे की कुल्हाड़ी निकाली थी और अन्त में आपने मुझे तीनों कुल्हाड़ी दे दी थी। इस बार आपने पहले ऐश्वर्या रॉय को निकाला है, मेरे नहीं कहने पर फिर अमिषा पटेल को निकालते फिर आखरी में मेरी घरवाली को निकालते। अब आप सोचिये कि यदि खुश होकर आप मुझे तीनों को ही दे देते तो मेरा क्या होता? एक घरवाली को तो मैं चला नहीं पाता, तीन तीन को कैसे चलाता?"

Monday, February 8, 2010

कर गईं मस्त मुझे फागुन की हवा ... व्हीडियों देख कर समझ सकते हैं कि कैसे?

वैसे तो हमारे ब्लोग जगत में तरह-तरह की हवाएँ बहती हैं। जब टिप्पणी हवा बहती है तो सभी टिप्पणीमय हो जाते हैं और कभी कभी विवाद की हवा बहती है तो वह उग्र रूप धारण करके आँधी भी बन जाती है। पर आज ललित जी ने ब्लोगजगत में "फागुनी बयार" बहाई है। अब फागुनी हवा बहे तो मजाल है किसी की कि मदमस्त न हो? सो हम भी मस्ती में आ गये और अनायास ही होठों पर आ गये सन् 1978 में प्रदर्शित वासु चटर्जी की फिल्म दिल्लगी के गीत के ये बोल - "कर गईं मस्त मुझे फागुन की हवा"।

video

आज की आपाधापी में तो फाग सिर्फ होली के समय सिर्फ एक दो दिन ही गाये जाते हैं किन्तु पहले के दिनों में वसन्त पंचमी के दिन से ही फाग गाने की शुरुवात हो जाती थी जो कि रंग पंचमी तक चलती थी। याद आ गये वो दिन जब हम झांझ, मंजीरों, नगाड़ों आदि के ताल धमाल के साथ फाग गाया करते थे:
आज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना
हाँ प्यारे ललना ब्रज में होली खेलै ना

इत ते निकसी नवल राधिका उत ते कुँअर कन्हाई ना
हाँ प्यारे ललना उत ते कृष्ण कन्हाई ना
हिल मिल फाग परस्पर खेलैं शोभा बरनि ना जाई ना
आज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना

बाजत झांझ मृदंग ढोल डफ मंजीरा शहनाई ना
हाँ प्यारे ललना मंजीरा शहनाई ना
उड़त गुलाल लाल भये बादर केसर कीच मचाई नाआज श्याम संग सब सखियन मिलि ब्रज में होली खेलै ना
हमारे यहाँ गाये जाने वाले अधिकतर फाग 'चन्द्रसखी' के द्वारा रचे गये हैं जो कि कृष्ण भक्ति के भाव से ओत प्रोत हैं। एक उदाहरण देखियेः
जाने दे जमुना पानी मोहन जाने दे जमुना पानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

रोज के रोज भरौं जमुना जल
नित उठ साँझ-बिहानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

चुनि-चुनि कंकर सैल चलावत
गगरी करत निसानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

केहि कारन तुम रोकत टोकत
सोई मरम हम जानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

हम तो मोहन तुम्हरी मोहनिया
नाहक झगरा ठानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

ले चल मोहन कुंज गलिन में
हम राजा तुम रानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी

चन्द्रसखी भजु बालकृष्ण छवि
हरि के चरन चित लानी
मोऽहन जाने दे जमुना पानी
ऐसे और भी फाग का संग्रह है हमारे पास जिन्हें हम होली तक के अपनी प्रविष्टियों में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।

Sunday, February 7, 2010

ब्लोगिंग की समस्यायें

तीन चार रोज पहले पाबला जी ने मुझे फोन करके बताया कि वे मेरे ब्लोग पर टिप्पणी नहीं कर पा रहे हैं। मैंने समझा कि शायद ब्लोगर में कोई अस्थाई समस्या होने के कारण ऐसा हुआ हो अतः उनसे अनुरोध किया कि कुछ समय बाद नये ब्राउजर में मेरा पोस्ट खोल कर टिप्पणी करने का प्रयास करें। बात आई गई हो गई। और लोगों की टिप्पणियाँ आती रहीं मेरे ब्लोग में। पाबला जी के फोन आने के एक दो दिन बाद डॉ. महेश सिन्हा जी ने मुझे मेल करके बताया कि वे भी मेरे ब्लोग में टिप्पणी नहीं दे पा रहे हैं। कुछ और भी मेरे पाठकों से भी मुझे पता चला कि उनके साथ भी यही समस्या आ रही है। यह मेरे लिये बड़ी अजीब बात थी क्योंकि कुछ लोगों की टिप्पणियाँ आ रही थीं और कुछ लोग टिप्पणी कर ही नहीं पा रहे थे। मैंने सोचा कि शायद यह समस्या टेम्पलेट के कारण है इसलिये टेम्पलेट बदल दिया।

कल फिर पाबला जी ने मुझे फोन करके बताया कि मेरे ब्लोग में वे अभी भी टिप्पणी नहीं कर पा रहे हैं। मैंने बहुत प्रकार समस्या का समाधान करने का असफल प्रयास किया और अन्ततः फिर से एक नया टेमप्लेट लाकर अपलोड कर दिया। इससे टिप्पणी वाली समस्या सुलझ गई किन्तु आज राजकुमार ग्वालानी जी ने फोन करके बताया कि मेरा ब्लोग इंटरनेट एक्सप्लोरर में नहीं खुल पा रहा है। याने कि समस्या अभी तक पूरी तरह से अभी भी नहीं सुलझ पाई है।

खैर, इस समस्या को भी सुलझायेंगे ही हम किन्तु फिलहाल इस पोस्ट को इसलिये प्रकाशित कर रहे हैं ताकि आप लोगों को भी पता चले कि कैसी कैसी समस्यायें आती रहती हैं ब्लोगिंग में।

Saturday, February 6, 2010

हम पोस्ट लिखते हैं नामी बनकर ... वे चुटकियों में उड़ा देते हैं बेनामी बनकर

Anonymous said...

याने कि बेनामी ने कहा ...

अरे भाई कुछ कहना है तो सामने आकर कहो! बुरका ओढ़ कर क्यों कहते हो। प्रशंसा करो, आलोचना करो, जो चाहे सो करो पर अपना परिचय देकर तो करो। जैसे हमने नामी बनकर पोस्ट लिखा है वैसे ही आप भी नामी बनकर टिप्पणी करो।

हमने पोस्ट लिखा "ये इन्द्रधनुष होगा नाम तुम्हारे........." बाकायदा अपना नाम देकर। अब किन्हीं सज्जन को हमारी यह पोस्ट बचकानी लगी। लगी तो लगी। हम रोक थोड़े ही सकते हैं बचकानी लगने से। तो पोस्ट के बचकानी लगने को उन्होंने व्यक्त किया अपनी टिप्पणी में कुछ इस तरह सेः

Anonymous said...

i think aap logon ko blog kaa naam change kar lena chaahiye.
science blogger association ki jagah " children kahani assosiation" theek rahega. haa haa haa haa......
याने कि उन्हें पोस्ट इतनी बचकानी लगी कि उन्होंने ब्लॉग का नाम ही बदल देने का सुझाव दे दिया। शायद वे विज्ञान के महारथी होंगे और उनके विचार से विज्ञान से सम्बन्धित भारी भरकम शब्दों में लिखी गई विशिष्ट जानकारी ही आनी चाहिये। शायद उनकी नजर में विज्ञान की अत्याधुनिक क्लिष्ट बाते हीं विज्ञान हैं। हम उनके विचार का सम्मान करते हैं किन्तु अपनी मन्दबुद्धि का क्या करें जो यह सोचती है कि चर्खी (Wheel), घिर्री (Pulley), धुरी (Axle) , लिव्हर (Lever), कोणीय तल (Inclined Plane), पेंच (Screw) आदि सामान्य यन्त्र भी विज्ञान के अन्तर्गत ही आते हैं और इनके विषय में भी बताया जाना चाहिये। भले ही हमारे ये पोस्ट अति विद्वान वैज्ञानिक मित्रों को बचकानी लगे किन्तु हम तो यही सोचते हैं कि बहुत से लोगों को यह पसंद ही आयेगा क्योंकि ब्लोग पढ़ने वाले सभी व्यक्ति विज्ञान के महारथी नहीं हैं, बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनका विषय कभी विज्ञान रहा ही नहीं है।

हम तो यही बताना चाहेंगे कि हम तो पोस्ट लिखते ही रहेंगे नामी बनकर भले ही कोई उन्हें चुटकियों में उड़ाता रहे बेनामी बनकर।

Friday, February 5, 2010

कहाँ है आज वसन्त की मादकता?

वसन्त ऋतु है अभी! किन्तु मुझे तो मादकता का किंचितमात्र भी अनुभव नहीं हो रहा है। टेसू और सेमल के रक्तवर्ण पुष्प, जो कि वसन्त के श्रृंगार माने जाते हैं, तो कहीं दृष्टिगत हो ही नहीं रहे हैं। कहाँ हैं आम के बौर? कहाँ गई कोयल की कूक? यह वसन्त का लोप बड़े नगरों की देन है। छोटे गाँवों और वनों में शायद हो वसन्त पर मेरे रायपुर में तो नहीं है।

रीतिकालीन कवि 'सेनापति' ने लिखा थाः

बरन बरन तरु फूले उपवन वन,
सोई चतुरंग संग दल लहियतु है।
बंदी जिमि बोलत विरद वीर कोकिल है,
गुंजत मधुप गान गुन गहियतु है॥
आवे आस-पास पुहुपन की सुवास सोई
सोने के सुगंध माझ सने रहियतु है।
सोभा को समाज सेनापति सुख साज आजु,
आवत बसंत रितुराज कहियतु है॥

यदि आज वे होत तो क्या ऐसी रचना कर पाते?

Thursday, February 4, 2010

"कुकुर के मुँह में लउड़ी हुड़सना" ... याने कि किसी को जबरन छेड़ना

मानव मस्तिष्क भी विचित्र वस्तु है। कभी-कभी यह किसी को जबरन छेड़ कर मौज लेता है। इसे ही छत्तीसगढ़ी हाना (लोकोक्ति) में "कुकुर के मुँह में लउड़ी हुड़सना" कहा जाता है। मनोविज्ञान के अनुसार यह एक मानसिक खेल है जो अक्सर महज मौज-मजा लेने के लिये किया जाता है और संसार का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने कभी भी ऐसा न किया हो। एक सीमा तक ही यह खेल जारी रहे तो कुछ अधिक नुकसानदायक नहीं है यह किन्तु प्रायः यह खेल अपनी सीमा पार कर जाती है और साधारण चुहलबाजी एक विवाद का रूप धारण कर लेती है। बेहतरी इसी में है कि हम इस मानसिक खेल से बच कर ही रहें।

लोकोक्ति की बात चली है तो आपको हम यह बता दें कि जब जीवन का यथार्थ ज्ञान नपे-तुले शब्दों में मुखरित होता है तो वह लोकोक्ति बन जाता है याने कि लोकोक्ति एक प्रकार से "गागर में सागर" होता है। छत्तीसगढ़ी में लोकोक्ति को "हाना" के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत से सुन्दर हाना हैं जिन्हें उनके हिन्दी अर्थसहित जानकर आपको बहुत आनन्द आयेगा। यहाँ पर हम कुछ ऐसे ही रोचक छत्तीसगढ़ी हाना उनके हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं:
  • "अपन पूछी ला कुकुर सहरावै" अर्थात् अपनी तारीफ स्वयं करना याने कि अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना।
  • "चलनी में दूध दुहय अउ करम ला दोष दै" अर्थात् खुद गलत काम करना और किस्मत को दोषी ठहराना।
  • "घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध" अर्थात् घर के ज्ञानी को नहीं पूछना और दूसरे गाँव के ज्ञानी को सिद्ध बताना याने कि आप कितने ही ज्ञानी क्यों न हों घर में आपको ज्ञानी नहीं माना जाता।
  • "अपन मरे बिन सरग नइ दिखय" अर्थात् स्वयं किये बिना कोई कार्य नहीं होता।
  • "आज के बासी काल के साग अपन घर में काके लाज!" अर्थात् अपने घर में रूखी-सूखी खाने में काहे की शर्म।
  • "अजान बैद परान घातिया" अर्थात् नीम-हकीम खतरा-ए-जान।
  • "कउवा के रटे ले बइला नइ मरय" अर्थात् कौवा के रटने से बैल मर नहीं जाता याने कि किसी के कहने से किसी की मृत्यु नहीं होती।
  • "उप्पर में राम-राम तरी में कसाई" अर्थात् मुँह में राम बगल में छुरी।
  • "करनी दिखय मरनी के बेर" अर्थात् किये गये अच्छे या बुरे कर्मों की परीक्षा मृत्यु के समय होती है।
  • "खेलाय-कुदाय के नाव नइ गिराय पराय के नाव" अर्थात् प्रशंसा कम मिलती है और अपयश अधिक।

Wednesday, February 3, 2010

क्या हिन्दी का कम से कम एक ब्लॉग ऐसा नहीं बन सकता जो पूरी दुनिया में धूम मचा दे?

अंग्रेजी के ऐसे अनेक ब्लॉग्स हैं जिनमें संसार भर से प्रतिदिन हजारों से लेकर लाखों की संख्या में लोग आते हैं। किसी एग्रीगेटर से नहीं बल्कि सर्च इंजिन से खोज कर। ऐसे ब्लॉग्स को बुकमार्क करके रखा है लोगों ने ताकि रोज उनमें सिर्फ एक क्लिक से पहुँच सकें।

चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी ने हिन्दी में एक कहानी "उसने कहा था" ऐसी लिखी कि संसार भर में वह लोकप्रिय हो गया। संसार के सभी प्रमुख भाषाओं में उसका अनुवाद पाया जाता है। इससे सिद्ध हो जाता है कि हिन्दी भाषा में संसार भर में धूम मचाने की भरपूर शक्ति है। फिर क्यों आज हिन्दी का एक भी ब्लॉग ऐसा नहीं है जो कि संसार भर में धूम मचा सके? पाठकगण खोज कर उस ब्लॉग में आयें। क्यों नहीं है हिन्दी में ऐसा एक भी ब्लॉग? क्या हिन्दी में भी हम ऐसा नहीं कर सकते?

मित्रों! यह मेरी निराशा नहीं है बल्कि मैं यह पोस्ट आप सभी को प्रोत्साहित करने के लिये लिख रहा हूँ कि आप हिन्दी में कुछ ऐसा लिखें जिसे पढ़ने के लिये पाठक टूट पड़ें। कब तक हम आपस में एक दूसरे को पढ़ते रहेंगे? क्या एक अखबार को सिर्फ दूसरा अखबार वाला ही पढ़ता है? एक पत्रिका को दूसरी पत्रिका वाला ही पढ़ता है? फिर क्यों एक ब्लॉग को दूसरा ब्लॉगर ही पढ़े? जिस प्रकार से अखबार, पत्रिका आदि का महत्व पाठक के बिना नहीं है उसी प्रकार से ब्लोग भी पाठक के बिना महत्वहीन है। मैं जानता हूँ कि आप सभी अपने अपने विषय में माहिर हैं और मुझे विश्वास है कि आप अवश्य ही पाठकों को खींच कर लाने वाली सामग्री प्रस्तुत करेंगे।

 
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