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Saturday, October 1, 2011

हिन्दी की प्यारी बहन उर्दू

जब भारत की अनेक भाषाओं की बात चले तो उर्दू को भुला देना बहुत मुश्किल होता है। देखा जाए तो हिन्दी और उर्दू ऐसी दो ऐसी बहनें हैं जो एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं सकतीं। रोजमर्रा की बोलचाल वाली हमारी हिन्दी में सैकड़ों ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है जो कि उर्दू के हैं और हिन्दी ने उसे अपना लिया है - जैसे कि हम "विशेष रूप से" कहने के स्थान पर प्रायः "खास तौर पर" का इस्तेमाल (अब यहीं देखिए कि मैंने "प्रयोग" जैसे हिन्दी शब्द के स्थान पर "इस्तेमाल" जैसा उर्दू शब्द टाइप कर डाला) करते हैं। हमें कभी भी नहीं लगता कि "खास" (विशेष), "तौर" (रूप या प्रकार), "शख्स" (व्यक्ति) "सुबह" (प्रातः), "आरजू" (अभिलाषा), "रिश्ता" (सम्बन्ध) इत्यादि शब्द हिन्दी के न होकर उर्दू के हैं, उल्टे हमें ये सारे शब्द हिन्दी के ही लगते हैं। इसी प्रकार से उर्दू के विद्वान भी सैकड़ों हिन्दी शब्दों को अपनी उर्दू रचना में शामिल कर लेते हैं। बिना एक दूसरे के शब्दों को अपनाए हिन्दी और उर्दू में से किसी भी एक का काम चल ही नहीं सकता। हिन्दी के सुविख्यात साहित्यकार प्रेमचंद जी की रचनाओं में न केवल उर्दू शब्दों के भरमार मिलते हैं बल्कि उन्होंने अपनी कृतियों को उर्दू लिपि में ही लिखा था।

यह भी सही है कि आम लोगों के बीच हिन्दी के चलन में आने बहुत पहले ही से उर्दू का चलन था। यही कारण है कि हिन्दी के आरम्भिक दिनों की रचनाओं में उर्दू शब्दों की बहुतायत पाई जाती है। देवकीनन्दन खत्री जी, जिन्होंने अपने जमाने में हिन्दी को सबसे अधिक पाठक दिए, जानते थे कि उन दिनों उर्दू का चलन हिन्दी की अपेक्षा बहुत ज्यादा है इसीलिए उन्होंने अपने उपन्यास "चन्द्रकान्ता" के आरम्भ में ढेर सारे उर्दू शब्दों का प्रयोग किया और "चन्द्रकान्ता सन्तति" के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते शनैः-शनैः उनका प्रयोग कम करते हुए हिन्दी के अधिक से अधिक शब्दों का प्रयोग किया है।

उर्दू वास्तव में तुर्की का एक शब्द है जिसका अर्थ होता है "पराया" या "खानाबदोश"। हिन्दी की तरह ही उर्दू का जन्म भारत में हुआ है और यह भाषा कैसे बनी यह जानना भी बहुत रोचक है। मुगल शासनकाल में उनकी सैनिक छावनी में फारसी, अरबी, हिन्दी तथा हिन्दी की विभिन्न उपभाषाओं के जानने वाले सैनिक एक साथ रहा करते थे जिन्होंने आपस की बोलचाल के लिए एक नई भाषा विकसित कर ली जो कि उर्दू कहलाई। यही कारण है कि उर्दू को लोग अक्सर खेमे की या छावनी की भाषा कहा करते थे। अमीर खुसरो, मीर तक़ी मीर, मिर्जा ग़ालिब, फैज़ अहमद फैज़ जैसे विद्वानों को यह भाषा भा गई और उन्होंने इसका साहित्यिक रूप विकसित करना शुरू कर के इस एक प्रकार से कविता की भाषा बना दिया। ब्रिटिश शासन के आने पर इसने राज्य भाषा का दर्जा भी पा लिया। भारत-पाक विभाजन के समय भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने वालों के साथ यह भाषा पाकिस्तान चली गई और वहाँ की मुख्य भाषा बन गई।

उर्दू भाषा की एक अलग प्रकार की अपनी मिठास है जो कि मुंशी प्रेमचंद, ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, सआदत हसन मंटो, कृष्ण चन्दर, इस्मत चुग़ताई, बलवन्त सिंह जैसे अनेकों रचनाकारों को लुभाती रही। भारत में सवाक् सिनेमा के आने पर हिन्दुस्तानी भाषा अर्थात् उर्दू मिश्रित हिन्दी के रूप में यह फिल्मों में छा गई और आम जनता इससे अच्छी तरह से वाक़िफ़ होने लगी। आज भी भारत में उर्दू के कद्रदानों की संख्या बहुत अधिक है क्योंकि उर्दू खालिस तौर पर एक हिन्दुस्तानी ज़ुबान है।

Sunday, August 8, 2010

ब्लोग तो हर कोई बना सकता है ना! ब्लोग बनाना भला क्या मुश्किल काम है?

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"आज हम आपके पास अपनी कुछ शंकाओं के समाधान के लिए आए हैं लिख्खाड़ानन्द जी!"

"हम अवश्य ही आपकी शंकाओं का निवारण करेंगे टिप्पण्यानन्द जी! बताइये आपकी क्या शंकाएँ हैं?"

"तो यह बताइये लिख्खाड़ानन्द जी, जब किसी फिल्म को देखकर दर्शक कहें कि बहुत ही बेकार फिल्म है तो फिल्म बनाने वाला इसके जवाब में दर्शक से यह नहीं कहता कि तुम्ही कोई अच्छी सी फिल्म बना कर दिखाओ, जब किसी कवि सम्मेलन में श्रोता किसी कवि की कविता को हूट करते हैं तो कवि श्रोताओं से यह नहीं कहता कि तुम्ही कोई अच्छी सी कविता लिख कर दिखाओ तो फिर जब कोई पाठक किसी ब्लोग पोस्ट को पढ़ कर उसकी निरर्थकता के बारे में कुछ कहता है तो उससे कुछ सार्थक करके दिशा बदलने के लिए क्यों कहा जाता है? उन्हें पनठेलिये, मजमा लगाने वाले और खुद कुछ भी नहीं करने वाले क्यों कहा जाता है?"

"बहुत ही सीधी और सरल सी बात है टिप्पण्यानन्द जी! फिल्म हर कोई नहीं बना सकता, कविता भी हर कोई नहीं कर सकता पर ब्लोग तो हर कोई बना सकता है ना! ब्लोग बनाना भला क्या मुश्किल काम है? और आपको हम बता दें कि ब्लोग बना लेने को ही सार्थक कर के दिशा बदलना कहा जाता है! यदि हम पनठेलियों और मजमा लगाने वालों को प्रोत्साहित कर के ब्लोगर बना दें तो फिर वे भी सार्थक करने वालों की श्रेणी में आ जायेंगे। ब्लोगर बनाना तो देश और समाज के लिए बहुत ही कल्याणकारी काम है! और फिर किसी को ब्लोगर बनाने का सबसे बड़ा फायदा तो खुद को ही मिलता है ना! जिस किसी को भी आप ब्लोगर बनाते हैं वह आपका पक्का मुरीद हो जाता है और आपके प्रत्येक पोस्ट में टिप्पणी करना नहीं भूलता। यदि कभी कोई आपकी आलोचना करे तो वह आपके गुट का सदस्य बनकर आपके पक्ष में जी-जान लड़ा देने के लिए हमेशा तैयार रहता है!"

"लगता है कि खुदा-ए-शाह 'खुदगर्ज' को आपने आपने ही ब्लोगर बनाया है! तभी तो वे आपकी किसी भी आलोचना-समालोचना का सामना करने के लिए हमेशा सामने आ जाते हैं।"

"हें हें हें हें, आप तो बड़ी दूर की कौड़ी ले आया करते हैं!"

"लिख्खाड़ानन्द जी! हमने तो हिन्दी में सिर्फ 'लघु', 'लघुतर' और 'लघुतम' ही पढ़ा है किन्तु आजकल कथा-कहानियों के साथ 'लघुत्तम' विशेषण का प्रयोग देखने में आ रहा है।"

"टिप्पण्यानन्द जी! आपने कभी लघुत्तम समापवर्तक नहीं पढ़ा है क्या?"

"पढ़ा तो है लिख्खाड़ानन्द जी! किन्तु वह तो गणित से सम्बन्धित शब्द है, कथा-कहानियों के साथ लघुत्तम विशेषण का प्रयोग क्या व्याकरण की दृष्टि से अनुचित नहीं है?"

"आप भी अजीब सिड़ी आदमी हैं! आज हिन्दी के व्याकरण का ज्ञान कितने लोगों को है? आप ही बताइए कि सही हिन्दी का प्रयोग कितने लोग लोग करते हैं आज के जमाने में? कितने ही ट्रकों और बसों के पीछे 'हार्न दिजीये' लिखा होता है, पेट्रोल पंप में 'यहाँ पेट्रोल मीलता है' लिखा होता है। शासकीय कार्यालयों में जाकर देखें कि कैसी हिन्दी का चलन है वहाँ पर। आज तक किसी ने कभी कोई ऐतराज किया है क्या? फिर लघुत्तम कथा पर आपको ऐतराज करने का क्या अधिकार है? हम तो कहेंगे कि लघुतम के स्थान पर लघुत्तम का प्रयोग तो और भी अधिक प्रभावशाली है। हम तो यह भी कहेंगे कि लघुत्तम लघु और उत्तम शब्दों की संधि से बना हुआ शब्द है याने कि लघुत्तम कथा का अर्थ है लघुकथाओं में उत्तम लघुकथा!"

"संधि और समास तो हमने भी पढ़ा है पर जिस प्रकार से आप संधि-विच्छेद कर रहे हैं वैसा तो कभी नहीं पढ़ा भई!"

"आप हमारे पास शंका-समाधान के लिए आए हैं या हम से शास्त्रार्थ करने के लिए? भूल जाइये आप अपने जमाने में पढ़ी हुई हिन्दी को। वह पुराने जमाने की हिन्दी हो गई। हिन्दी तो जमाने के साथ-साथ बदलती ही रही है! एक जमाने में गाँधी जी ने 'साहब राम' और 'बेगम सीता' वाली हिन्दुस्तानी हिन्दी चलाई थी। और आज के जमाने में वही हिन्दी चलती है जिसे आज के महान साहित्यकार, पत्रकार, प्रकाशक और हम जैसे महान ब्लोगर लिखते और पढ़वाते हैं। आज हिन्दी की कोई भी नामी पत्र-पत्रिका या अखबार को पढ़ कर देख लीजिए आपको चन्द्रबिन्दु का प्रयोग कहीं नहीं मिलेगा, आज की हिन्दी में 'बच्चा हँस रहा है' कोई नहीं लिखता, 'बच्चा हंस रहा है' ही लिखा जाता है। आज के पाठक 'हंस' और 'हँस' के चक्कर में नहीं पड़ा करते। आज के जमाने में तो पढ़ने वालों को बस समझ में आना चाहिए कि आप क्या कहना चाहते हैं, हिन्दी में हिज्जे और व्याकरण की गलतियों को कोई नहीं देखता। जो लोग आज भी शुद्ध हिन्दी की बात करते हैं वे लोग लकीर के फकीर हैं। ऐसे बेवकूफों की बात कोई सुनने वाला भी नहीं है। इन मूर्खों को तो यह भी नहीं पता है कि यदि हम लोग नहीं लिखते तो हिन्दी कब की रसातल में चली गई होती!"

"धन्यवाद लिख्खाड़ानन्द जी! आपसे हमेशा ज्ञान की बातें ही सीखने को मिलती हैं। अब मैं चलता हूँ, नमस्कार!"

"नमस्कार!"

Friday, July 30, 2010

अपना हिन्दी ज्ञान परखिये

पिंटू, जो कि मेरे छोटे भाई के समान है, ने एक प्रतियोगी परीक्षा दी है और उसने मुझे अपना प्रश्नपत्र देते हुए कहा, "भैया इस प्रश्नपत्र के जितने भी सही उत्तर आप बता सकते हैं, मुझे बतायें ताकि मैं जान सकूँ कि मैंने कितने सवालों का सही हल किया है।"

प्रश्नपत्र में अधिकतर प्रश्न हिन्दी और सामान्य ज्ञान से सम्बन्धित देखकर मैंने सोचा कि इसमें से कुछ अच्छे प्रश्नों को अपने ब्लोग में पोस्ट कर दिया जाये ताकि मेरे पाठक लोग भी अपने ज्ञान को परख सकें।

तो प्रस्तुत हैं प्रश्नः

दिये गये वाक्यों में रेखांकित शब्दों के पर्याय (समानार्थक शब्द) के लिये चार-चार विकल्प दिए गए हैं। उचित विकल्प चुनियेः

1. स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना प्रगति के लिये आवश्यक होती है।

(क) जोड़-तोड़

(ख) दाँव-पेंच

(ग) प्रतिस्पर्धा

(घ) क्षिप्रता


2. वैचारिक संकीर्णता असहिष्णुता का प्रमुख कारण होती है।

(क) अस्थिरता

(ख) संकुचितता

(ग) अनियमितता

(घ) उदीयता

3. हरेक भारतीय से अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य दो-तीन भाषाओं का कामकाजी ज्ञान रखने की अपेक्षा की जाती है।

(क) संचालनीय

(ख) व्यवहारिक

(ग) प्राथमिक

(घ) कार्यसाधक

निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित शब्दों के विलोम के लिये चार-चार विकल्प दिए गए हैं। उचित विकल्प चुनियेः

4. प्राकृतिक चिकित्सा में कायिक उपचार एक महत्वपूर्ण अंग है।

(क) मानसिक

(ख) बौद्धिक

(ग) हार्दिक

(घ) दैहिक

5. अनावृष्टि से किसानों का भविष्य अधर में लटका है।

(क) अतिवृष्टि

(ख) अवृष्टि

(ग) न्यूनवृष्टि

(घ) असामयिकवृष्टि

6. शहरों के प्रदूषित वातावरण से दूर प्रकृति का आकर्षण सभी का मन लुभाता है।

(क) घृणा

(ख) जुगुप्सा

(ग) पलायन

(घ) विकर्षण

7. विश्व समुदाय में भारतीयों का अभ्युदय चतुर्दिक चर्चा का विषय बन गया है।

(क) अधःपतन

(ख) पूर्णोदय

(ग) पराजय

(घ) अंतोदय

निम्नलिखित लोकोक्तियों/मुहावरों के चार-चार वैकल्पिक अर्थ दिए गए हैं। सही अर्थ चुनियेः

8. ज्यों-ज्यों भीजे कामरी त्यों-त्यों भारी होय

(क) कामरी भीगने पर भारी हो जाती है।

(ख) जैसे-जैसे कामरी भीगती जाती है वह भारी होती जाती है।

(ग) कर्ज चुकाते रहना चाहिये नहीं तो वह चढ़ता जाता है।

(घ) कामरी को भीगने से बचाना चाहिए।

9. कौवा चला हंस की चाल।

(क) छोटों द्वारा बड़ों की नकल

(ख) छोटा मुँह बड़ी बात

(ग) अपनी झूठी प्रशंसा करना

(घ) मूर्ख द्वारा बुद्धिमानी का प्रदर्शन

10. नौ दिन चले अढ़ाई कोस।

(क) ऊँची चढ़ाई चढ़ना

(ख) बहुत सुस्ती से काम करना

(ग) चक्करदार रास्ते से जाना

(घ) गड़बड़ी से काम करना

11. घर में नहीं दाने बुढ़िया चली भुनाने।

(क) झूठा आडम्बर करना

(ख) अधिक दिखावा करना

(ग) डींग हाँकना

(घ) मुश्किल से गुजारा करना

12. काम का न काज का दुश्मन अनाज का।

(क) बेकार के काम करना

(ख) स्वार्थी होना

(ग) बेकार का आदमी

(घ) किसी उपयोग लायक न होना

निम्नलिखित वाक्यों में उपयुक्त शब्द द्वारा रिक्त स्थान की पूर्ति के लिये चार-चार विकल्प दिए गए हैं। सही विकल्प चुनियेः

13. भारतीय परंपरा में ............. को सौन्दर्य का प्रतीक माना गया है।

(क) यति

(ख) शची

(ग) रति

(घ) इन्द्राणी

14. सूर्य की ............. किरणें और भी अधिक पीड़ित कर रही थीं।

(क) संतप्त

(ख) तेजस्वी

(ग) प्रखर

(घ) दुष्कर

15. उसके हाथों ............. का खजाना लग गया।

(क) गन्धर्व

(ख) कुबेर

(ग) यक्ष

(घ) प्रजापति

16. बड़ों से बात करने का ............. तुम्हें सीखना चाहिए।

(क) शिष्टाचार

(ख) सदाचार

(ग) आचरण

(घ) हौसला

निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित शब्दों के विलोम रूप के लिये चार-चार विकल्प दिए गए हैं। उचित विकल्प चुनिएः

17. सिदार्थ जितना संसार में अनुरक्त होने की चेष्टा करते, मन उतना ही ............. होता जाता था।

(क) सशक्त

(ख) विरक्त

(ग) अशक्त

(घ) कोमल

18. वे जितना तटस्थ होने की चेष्टा करते उतना ही ............. होने का आरोप उनके सिर मढ़ दिया जाता।

(क) पक्षपाती

(ख) क्रूर

(ग) निर्भय

(घ) संयमी

19. अदालत में वादी व ............. दोनों पक्षों के वकील उपस्थित थे।

(क) संवादी

(ख) विवादी

(ग) प्रतिवादी

(घ) विपक्षी

20. प्रेमचंद साहित्य में यथार्थ और ............. का अच्छा संतुलन है।

(क) स्वप्न

(ख) उड़ान

(ग) आदर्श

(घ) कल्पना

निम्नलिखित मुहावरों तथा लोकोक्तियों के अर्थ के लिये चार-चार विकल्प दिए गए हैं। उचित विकल्प चुनिएः

21. पल्ला छुड़ाना

(क) दल बदलना

(ख) अपना पक्ष बलवान होना

(ग) छुटकारा पाना

(घ) अधिक विपत्ति में पड़ना

22. कान खड़े होना

(क) गलत बात पर जल्दी विश्वास करना

(ख) चुगली करना

(ग) ऊब जाना

(घ) चौकन्ना होना

23. सिर उठाना

(क) विद्रोह करना

(ख) आदर देना

(ग) आधिपत्य जमाना

(घ) चुगली करना

24. उल्टी गंगा बहना

(क) लोक रीति के विरुद्ध काम करना

(ख) पवित्र कार्य में लगना

(ग) धार्मिक अनुष्ठान

(घ) पाप धोना

25. ऊधो का लेना न माधो का देना

(क) भक्तिभाव प्रबल होना

(ख) निर्लिप्त भाव से रहना

(ग) उधार पैसे लेकर आनन्द मनाना

(घ) निराहार रहना

निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित शब्द की वर्तनी के लिये चार-चार विकल्प दिए गए हैं। उचित विकल्प चुनिएः

26. घायल व्यक्ति के शरीर से बहुत अधिक मात्रा में रक्तसार्व हो रहा था।

(क) रकतसार्व

(ख) रक्तस्राव

(ग) रक्तस्त्राव

(घ) रक्तसाव

27. पाण्डवों में केवल अभिमन्यु ही चर्कव्यूह का भेदन जानता था।

(क) चक्रव्यूह

(ख) चकृव्यूह

(ग) चक्रव्युह

(घ) च्रकव्यूह

28. "उसने कहा था" कहानी का शीषर्क अत्यन्त उपयुक्त है।

(क) शीर्षक

(ख) शीर्शक

(ग) शिर्षक

(घ) शीषर्क

29. "मृगनयनी" एक एतिहासिक उपन्यास है।

(क) ऐतीहासिक

(ख) ऐतिहासिक

(ग) ऐतिहासीक

(घ) एतीहासीक

30. बच्चे की आक्रति अपने पिता से मिलती है।

(क) आकर्ति

(ख) आकृति

(ग) आक्रर्ति

(घ) आकृती

प्रश्नों के सही उत्तर जानने के लिये क्लिक यहाँ करें - अपना हिन्दी ज्ञान परखिये : प्रश्नों के सही उत्तर

Sunday, June 20, 2010

पर ऐसे पोस्ट को पढ़ता ही कौन है?

प्रायः हिन्दी पर अंग्रेजी का अंकुश दिखाई ही देता रहता है। एक दीवार पर विज्ञापन में लिखा था "अंदर स्ट्रांग, चले सबसे लांग"। फिल्म का नाम रखा जाता है "जब वी मेट"। बच्चों को हिन्दी की गिनती नहीं आती, वे अक्सर पूछ बैठते हैं "चौंसठ याने कि सिक्स्टी फोर होता है ना?"

क्या 'मजबूत' के स्थान पर 'स्ट्रांग', 'लंबा' के स्थान पर 'लांग', 'हम मिले' के स्थान पर 'वी मेट' का प्रयोग करके ये दर्शाया जा रहा है कि हिन्दी के पास अपना शब्द भण्डार नहीं है? या फिर यह बता कर खुशी जाहिर की जा रही है कि भाषाई तौर पर हम मानसिक दिवालियेपन की चरम सीमा को भी पार कर चुके हैं?

हर जगह हिन्दी की अंग्रेजी के प्रति दासता ही दिखाई देती है। मीडिया, सिनेमा, शिक्षा वाले हिन्दी को गर्त में गहराई तक गिराने के लिये तुले हुए से लगते हैं। यह सब देखकर वितृष्णा सी भर आती है स्वयं के भीतर। पर किया ही क्या जा सकता है? सिर्फ एक पोस्ट लिखकर मन की भड़ास निकाल लेते हैं। पर ऐसे पोस्ट को पढ़ता ही कौन है?

चलते-चलते

राष्ट्रभाषा के उद्‍गार

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

मैं राष्ट्रभाषा हूँ -
इसी देश की राष्ट्रभाषा, भारत की राष्ट्रभाषा

संविधान-जनित, सीमित संविधान में,
अड़तिस वर्षों से रौंदी एक निराशा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।
तुलसी, सूर, कबीर, जायसी,
मीरा के भजनों की भाषा,
भारत की संस्कृति का स्पन्दन,
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

स्वाधीन देश की मैं परिभाषा-
पर पूछ रही हूँ जन जन से-
वर्तमान में किस हिन्दुस्तानी
की हूँ मैं अभिलाषा?
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

चले गये गौरांग देश से,
पर गौरांगी छोड़ गये
अंग्रेजी गौरांगी के चक्कर में,
भारत का मन मोड़ गये
मैं अंग्रेजी के शिविर की बन्दिनी
अपने ही घर में एक दुराशा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

मान लिया अंग्रेजी के शब्द अनेकों,
राष्ट्रव्यापी बन रुके हुये हैं,
पर क्या शब्दों से भाषा निर्मित होती है?
तब क्यों अंग्रेजी के प्रति हम झुके हये हैं?
ले लो अंग्रेजी के शब्दों को-
और मिला दो मुझमें,
पर वाक्य-विन्यास रखो हिन्दी का,
तो, वो राष्ट्र! आयेगा गौरव तुझमें।

'वी हायस्ट नेशनल फ्लैग एण्ड सिंग
नेशनल सांग के बदले
अगर बोलो और लिखो कि
हम नेशनल फ्लैग फहराते-
और नेशनल एन्थीम गाते हैं-
तो भी मै ही होउँगी-
नये रूप में भारत की राष्ट्रभाषा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

मैं हूँ राष्ट्रभाषा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

(रचना तिथिः गुरुवार 15-08-1985)

Monday, April 26, 2010

हिन्दी और हिन्दी ब्लोगिंग ... इक समुन्दर ने आवाज दी मुझको पानी पिला दीजिये

हिन्दी भाषा भी तो एक समुन्दर ही है; एक ऐसा महासागर जिसने अपनी गहराइयों में अनेक रत्नों को छिपा कर रखा हुआ है। इन रत्नों की प्राप्ति के लिये हिन्दी ब्लोगिंग इसके मंथन का कार्य कर रहा है।

पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि समुद्र मंथन से निकलने वाली वस्तुएँ रत्न होती हैं। जब देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था तो चौदह रत्न प्राप्त हुए थे जिनके नाम हैं – (1) हलाहल (विष), (2) कामधेनु, (3) उच्चैःश्रवा घोड़ा, (4) ऐरावत हाथी, (5) कौस्तुभ मणि, (6) कल्पवृक्ष (कल्पद्रुम), (7) रम्भा, (8) लक्ष्मी, (9) वारुणी (मदिरा), (10) चन्द्रमा, (11) पारिजात वृक्ष, (12) शंख, (13) धन्वन्तरि वैद्य और (14) अमृत।

इससे स्पष्ट होता है कि जब भी किसी समुद्र का मंथन होता है तो सबसे पहले हलाहल अर्थात् विष ही निकलता है। आज हिन्दी ब्लोगिंग की स्थिति देख कर मुझे लगता है कि हिन्दी रूपी सागर के मंथन से पहला रत्न निकल चुका है। इस प्रथम रत्न, हलाहल अर्थात् विष, के कारण एक अस्थाई व्याकुलता व्याप्त हो गई है और हिन्दी रूपी समुद्र पानी पीने के लिये तरस रहा है, किसी शायर ने सही कहा हैः

"इक समुन्दर ने आवाज दी मुझको पानी पिला दीजिये"

किन्तु यह स्थिति अस्थाई ही है, शीघ्र ही ज्ञान, विद्या, जागृति, आलोक रूपी रत्न भी निकलेंगे और अन्त में अमृत की भी प्राप्ति होगी।

Thursday, March 25, 2010

कितना हित हो रहा है हिन्दी का हिन्दी ब्लोगिंग से?

माना कि हिन्दी ब्लोगिंग अभी भी अपने शैशव काल में हैं लेकिन यह भी सही है कि इसे शुरू हुए एक अच्छा खासा-समय भी बीत चुका है और इस अन्तराल में हजारों की संख्या में हिन्दी पोस्ट आ चुके हैं। पर इन पोस्टों में कितने पोस्ट ऐसे हैं जिनमें हिन्दी ब्लोगिंग से अनजान लोग, नेट में कुछ खोजते-खोजते, आते हैं? क्या कोई पोस्ट कालजयी बन पाया है?

ऐसा लगता है कि जिस प्रकार से लोकतन्त्र "जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है", उसी प्रकार से हिन्दी ब्लोगिंग "ब्लोगरों द्वारा, ब्लोगरों के लिए, ब्लोगरों की ब्लोगिंग है"। जैसे लोकतन्त्र में कोई राष्ट्र के हित के लिये नहीं सोचता वैसे ही हिन्दी ब्लोगिंग में कोई हिन्दी के हित के लिये नहीं सोचता। लोकतन्त्र नेतागिरी कर के पैसे पीटने के लिये है और हिन्दी ब्लोगिंग अधिक से अधिक संख्या मे टिप्पणी बटोरकर आत्म-तुष्टि के लिये है।

हमारे पोस्ट की अधिकतम उम्र उतनी ही होती है जब तक वह लोकप्रिय संकलकों में दिखाई देता है याने कि मात्र चौबीस घंटे की!

जरा हृदय पर हाथ रख कर सोचें कि हम क्या दे रहे हैं हिन्दीभाषी लोगों को? क्या स्तर है हमारे लेखन का? क्या हमारे लेखन से हिन्दी "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" वाली भाषा बन कर नेट में एकछत्र राज्य करने लायक बन पायेगी?

मैं उपरोक्त बातों को कई बार कह चुका हूँ (और भविष्य में भी कहता ही रहूँगा), कभी व्यंगात्मक लहजे में तो कभी रो-धो कर। मैं जानता हूँ कि मेरे इन पोस्ट को पढ़कर प्रायः लोग यह सोचते हैं कि यह तो दूसरों को नीचा दिखाने के लिये और स्वयं को हिन्दी का बहुत बड़ा हितचिन्तक बताने के लिये ऐसा लिखता रहता है। किन्तु मैं बार-बार इस मुद्दे को सिर्फ इसलिये उछालते रहता हूँ कि कोई तो मेरे व्यंग से तिलमिला कर या मेरे रुदन पर तरस खाकर यह सोचने लगे कि बुढ्ढे की बात कुछ तो सही है और ऐसा सोचकर ही आत्म-तुष्टि की भावना को त्याग कर हिन्दी के हित के लिए कुछ करने की ठान ले।

मेरे विषय में यदि कोई गलत राय बना भी लेता है तो क्या फर्क पड़ना है मुझे उससे?

पर मुझे पढ़ कर यदि कोई हिन्दी के हित के लिये जूझने के लिये तत्पर हो जाता है तो मुझे अवश्य ही बहुत फर्क पड़ेगा, सफलता प्राप्त करके भला किसे फर्क नहीं पड़ता?

Sunday, March 7, 2010

अरे भाई हम हिन्दी ब्लोगर हैं!

जितने भी पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने हमारी रचनाओं को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था उन्हें हम बता देना चाहते हैं कि हमें भी अब उनकी कोई परवाह नहीं है। अब हम उन्हें अपनी कोई भी रचना छापने के लिये नहीं भेजने वाले। बड़े आये थे कहने वाले कि हमारी रचनाएँ कूड़ा-कर्कट हैं, उनका कोई स्तर नहीं है। अब धरे रहो अपनी पत्र-पत्रिकाओं को। नहीं छपना अब हमें तुम्हारी पत्र-पत्रिकाओं में। अब हम हिन्दी ब्लोगर बन गये हैं। किसी में दम है तो रोक ले हमें अपने ब्लोग में छपने से।

क्या कहा? तुम्हारे ब्लोग को पढ़ेगा कौन? अरे तुम लोगों ने क्या सिर्फ हमारी रचनाओं को ही रद्दी की टोकरी में फेंका है? तुमने तो हमारे कई मित्रों की रचनाओं का भी तो यही हाल किया है। तो तुम्हें जान लेना चाहिये कि वे सब भी ब्लोगर बन गये हैं। अब हम सब एक-दूसरे के ब्लोग को पढ़ते हैं और टिपियाते भी हैं। हम तो अभी और भी बहुत से लोगों को ब्लोगर बनाने में जुटे हुए हैं, वो सब भी पढ़ेंगे हमारी रचनाओं को।

येल्लो! अब कहने लग गये कि हमारी पत्र-पत्रिकाओं को तो आम लोग पढ़ते हैं तुम्हारे ब्लोग को नहीं। तो जान लो कि तुम ऐसा कह कर हमें जरा भी हतोत्साहित नहीं कर सकते। भाड़ में जायें आम लोग, न तो वे पहले हमें पढ़ते थे और न अब पढ़ते हैं। दरअसल उनके पास इतनी अकल ही कहाँ है कि हम जो लिख रहे हैं उसे समझ पायें। हमारे लिखे को तो सिर्फ हमारे ब्लोगर मित्र ही समझ सकते हैं और वे ही हमें पढ़ने के काबिल हैं। आखिर हम सब हिन्दी ब्लोगर हैं भाई!

Monday, February 22, 2010

बेवकूफ ब्लोगर अब टिप्पणी पर भी पोस्ट निकालने लग गये हैं

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"क्या बात है लिख्खाड़ानन्द जी, कुछ परेशान से लग रहे हैं?"

"क्या बतायें टिप्पण्यानन्द जी, बहुत दुःखी हैं भाई हम तो। अजब-अजब लोग आ गये हैं हिन्दी ब्लोगिंग में। हम तो समय निकाल कर उनके ब्लोग में जाकर टिप्पणी करते हैं पर उनको टिप्पणी पर भी ऐतराज हो जाता है। और लोग तो खुश होते हैं कि हमने याने कि उस्ताद जी ने टिप्पणी की है उनके पोस्ट में जाकर, हम चाहे जो भी टिप्पणी करें सामने वाला पढ़ता तक नहीं है बल्कि हमारी टिप्पणी पाकर खुद को सम्मानित समझता है। पर ऐसे लोगों को क्या कहें जो टिप्पणी का अर्थ निकालना चाहते हैं। भई टिप्पणी तो शान होती है पोस्ट की! उसका भी कुछ अर्थ होता है क्या? हमारे टिप्पणी करने का एहसान मानना तो दूर उल्टे हमारी उस टिप्पणी पर भी पोस्ट निकाल लेते हैं कि ऐसी टिप्पणी क्यों किया तुमने? हमारी टिप्पणी ही उनको चिपक जाती है और उसी पर पोस्ट तान देते हैं। अब कहाँ तक हम सफाई दें उनको? सफाई देते भी हैं तो उस सफाई पर भी एक पोस्ट लिख देंगे। लोग तो अधिक से अधिक टिप्पणी पाने के लिये तरसते हैं और ये ऐसे बेवकूफ हैं कि कहते हैं टिप्पणी में क्या धरा है? पाठक बढ़ाओ। अब आप ही बताइये कि दूसरे ब्लोगर पाठक नहीं होते क्या? पर इनकी उल्टी खोपड़ी तो उन्हें ही पाठक समझती है जो ब्लोगर न होकर केवल पाठक ही हों। ऐसे पाठकों से क्या भला होना है हिन्दी का? ये तो सिर्फ पढ़ना जानते हैं लिखना कहाँ जानते हैं कि पढ़ने के बाद कम से कम एक टिप्पणी ही लिख सकें। भाई ब्लोग तो होता है ब्लोगरों के लिये! तुम हमें टिपियाओ हम तुम्हें टिपयायेंगे। पाठकों का क्या लेना देना है उससे?

"चिट्ठा चर्चाओं की बाढ़ आ रही है सो अलग परेशानी है। आप ही बताइये कोई औचित्य है इतनी सारी चिट्ठा चर्चाओं की? ऐसा लगता है कि लोगों के पास अब चर्चा लिखने के सिवाय कोई काम ही नहीं रह गया है। पहले तो सिर्फ हमारे ही लोगों का चिट्ठा चर्चा हुआ करता था और हमारे ही लोगों का संकलक भी। हम लोगों का ही राज चला करता था। अधिक से अधिक बैकलिंक्स हमें और हमारे लोगों को ही मिला करते थे और हमारे संकलक के टॉप लिस्ट में हम और हमारे साथी ही हुआ करते थे। अब इतने सारे चिट्ठा चर्चा आ जाने से बैकलिंक्स दूसरों को भी मिलने लग गये हैं।"

"पर आप वाले संकलक में तो अभी भी आप और आपके लोगों का ही वर्चस्व है।"

"अरे होगा कैसे नहीं भला? बेवकूफ नहीं हैं हम! हमने फॉर्मूला ही ऐसा बनाया है कि हम लोगों का ही वर्चस्व रहे। हमारे फार्मूले में हमने अपने और अपने लोगों का पूरा पूरा ध्यान रखा है। क्या किसी की मजाल है कि हमारे टॉप लिस्ट में आ जाये? लाख सिर पटक ले, दिन में पचासों पोस्ट लिख ले, लाख बैकलिंक्स पा ले पर हमारे टॉप लिस्ट में वही रहेगा जिसे हम चाहेंगे। हाँ एक दो बाहरी लोगों को भी टॉप लिस्ट में लेना पड़ा है क्योंकि उन्होंने पक्षपात वाला राग अलापना शुरू कर दिया था। वैसे उनको टॉप लिस्ट में शामिल करना एक प्रकार से अच्छा ही हुआ। एक तो उनका मुँह भी बंद हो गया और दूसरे हमारी निष्पक्षता का सन्देश भी प्रसारित हो गया।"

"तो फिर अब क्या परेशानी है आपको?"

"अभी तो कोई परेशानी नहीं है पर बाद में तो हो सकती है ना! ये भी हो सकता है कि और भी कई संकलक आ जायें। अभी हमारे संकलक के अलावा जो दूसरा संकलक है उससे तो खैर कोई परेशानी नहीं है हमें क्योंकि वह बिल्कुल ही निष्पक्ष है और उसमें कोई टॉप लिस्ट भी नहीं है। पर यदि कोई हमारे फॉर्मूले जैसा ही दूसरा संकलक आ गया तो क्या होगा? उस संकलक के टॉप लिस्ट में दूसरे लोग होंगे तो हमारा क्या होगा?"

"तो क्या सोचा है आपने?"

"अरे अभी तक हम टॉप रहे हैं तो आगे भी हम ही टॉप रहेंगे। सर कुचल कर रख देंगे स्सालों का जो हमसे आगे निकलने की कोशिश करेंगे। अंग्रेजी में हिन्दी, हिन्दी में अंग्रेजी के उपसर्ग और प्रत्यय जोड़-जोड़ कर और हिन्दी की टाँगें तोड़ कर ऐसे-ऐसे शब्द बनायेंगे कि लोग खिंचते चले आयेंगे हमारे ब्लोग में! क्या समझ रखा है हमें। आपने देखा नहीं है क्या कि हमारा पोस्ट आते ही पसंद और टिप्पणियों का सिलसिला शुरू हो जाता है!"

"हाँ ये बात तो है! हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ है कि आप सदा टॉप बने रहें। अच्छा तो चलते हैं अब हम। नमस्कार!"

"नमस्कार!"

Monday, February 15, 2010

यह हिन्दी की समृद्धि है या हिन्दी की ऐसी तैसी?

हिन्दी में सबसे पहला निजी चैनल जीटीवी आया और आते ही उसने हिन्दी में अंग्रेजी को घुसेड़ कर खिचड़ी प्रसारण शुरू कर दिया। चूँकि वह हिन्दी का पहला चैनल था इसलिये उसे लोकप्रिय तो होना ही था उसे किन्तु शायद बाद में आने वाले निजी चैनलों ने उसके खिचड़ी भाषा को ही उसकी लोकप्रियता का कारण समझ लिया और उसी ढर्रे पर चल कर हिन्दी की और भी चिन्दी करने लगे। यह हिन्दी की समृद्धि है या हिन्दी की ऐसी तैसी?

अब अन्तरजाल में ब्लोग्स का साम्राज्य है। हिन्दी ब्लोग्स की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है और उसी अनुपात में हिज्जों तथा व्याकरण की गलतियाँ भी अधिक से अधिक देखने को मिल रही हैं। यद्यपि यह क्षम्य नहीं है किन्तु, यह सोचकर कि अनेक अहिन्दीभाषी भी हिन्दी ब्लोग लिख रहे हैं और उनसे ऐसा होना स्वाभाविक है, एक बार इसे अनदेखा किया भी जा सकता है। पर हिन्दी ब्लोग्स में भी जबरन अंग्रेजी घुसेड़ा जाना और ऐसे शब्दों का प्रयोग करना जिसका अर्थ न तो नलंदा विशाल शब्दसागर जैसे हिन्दी से हिन्दी शब्दकोश में खोजने पर नहीं मिलता और यह मानकर कि शायद यह अंग्रेजी शब्द हो आक्फोर्ड, भार्गव आदि अंग्रेजी से हिन्दी शब्दकोशों में खोजने से भी नहीं मिलता क्या है? यह हिन्दी की समृद्धि है या हिन्दी की ऐसी तैसी?

Wednesday, February 3, 2010

क्या हिन्दी का कम से कम एक ब्लॉग ऐसा नहीं बन सकता जो पूरी दुनिया में धूम मचा दे?

अंग्रेजी के ऐसे अनेक ब्लॉग्स हैं जिनमें संसार भर से प्रतिदिन हजारों से लेकर लाखों की संख्या में लोग आते हैं। किसी एग्रीगेटर से नहीं बल्कि सर्च इंजिन से खोज कर। ऐसे ब्लॉग्स को बुकमार्क करके रखा है लोगों ने ताकि रोज उनमें सिर्फ एक क्लिक से पहुँच सकें।

चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी ने हिन्दी में एक कहानी "उसने कहा था" ऐसी लिखी कि संसार भर में वह लोकप्रिय हो गया। संसार के सभी प्रमुख भाषाओं में उसका अनुवाद पाया जाता है। इससे सिद्ध हो जाता है कि हिन्दी भाषा में संसार भर में धूम मचाने की भरपूर शक्ति है। फिर क्यों आज हिन्दी का एक भी ब्लॉग ऐसा नहीं है जो कि संसार भर में धूम मचा सके? पाठकगण खोज कर उस ब्लॉग में आयें। क्यों नहीं है हिन्दी में ऐसा एक भी ब्लॉग? क्या हिन्दी में भी हम ऐसा नहीं कर सकते?

मित्रों! यह मेरी निराशा नहीं है बल्कि मैं यह पोस्ट आप सभी को प्रोत्साहित करने के लिये लिख रहा हूँ कि आप हिन्दी में कुछ ऐसा लिखें जिसे पढ़ने के लिये पाठक टूट पड़ें। कब तक हम आपस में एक दूसरे को पढ़ते रहेंगे? क्या एक अखबार को सिर्फ दूसरा अखबार वाला ही पढ़ता है? एक पत्रिका को दूसरी पत्रिका वाला ही पढ़ता है? फिर क्यों एक ब्लॉग को दूसरा ब्लॉगर ही पढ़े? जिस प्रकार से अखबार, पत्रिका आदि का महत्व पाठक के बिना नहीं है उसी प्रकार से ब्लोग भी पाठक के बिना महत्वहीन है। मैं जानता हूँ कि आप सभी अपने अपने विषय में माहिर हैं और मुझे विश्वास है कि आप अवश्य ही पाठकों को खींच कर लाने वाली सामग्री प्रस्तुत करेंगे।

Tuesday, February 2, 2010

ब्लोगिंग तो मौज लेने के लिये होती है ... ब्लोगिंग फॉर्मूले

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"लिख्खाड़ानन्द जी, हम तो आपके लेखन के कायल हैं! लाज़वाब लिखते हैं आप! लोग आपको उस्ताद जी कहते और मानते हैं। क्या बात है आपकी! आज हम जानना चाहते हैं कि आखिर इतना अच्छा लिख कैसे लेते हैं जिसे पढ़ने और टिपियाने के लिये लोग दौड़े चले आते हैं? भई मानना पड़ेगा कि इधर आपकी पोस्ट आई नहीं कि टिप्पणियाँ आनी शुरू हो जाती है, लगता है कि लोग इंतजार करते रहते हैं कि कब आपका पोस्ट आये और कब वे टिप्पणी करें। हमें भी बताइये ना कि आप इतना अच्छा कैसे लिख लेते हैं? आखिर आपकी सफलता का रहस्य क्या है?"

"अरे टिप्पण्यानन्द जी, भला ऐसे रहस्य कभी किसी को बताये जाते हैं क्या? हमसे हमारा रहस्य जानकर कल को खुद हमारी जगह लेना चाहते हैं क्या आप?"

"हे हे हे हे! हम भला क्या खा के आपकी जगह लें पायेंगे? हमें लिखना आता ही कहाँ है? बस कुछ ऐसा वैसा घसीट दिया करते हैं। हमें तो बताना ही पड़ेगा आपको अपना रहस्य।"

"ठीक है हम आपको बताते हैं अपना रहस्य पर आप किसी और को मत बताना। देखिये टिप्पण्यानन्द जी! हिन्दी ब्लोग्स को प्रायः हिन्दी ब्लोगर्स ही पढ़ते हैं। इसलिये सबसे पहले तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जो भी पोस्ट लिखा जाये वह सामान्य पाठकों को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि दूसरे ब्लोगरों को ध्यान में रखकर लिखी जाये। सामान्य पाठक तो किसी विषय पर अच्छी से अच्छी जानकारी वाली अच्छी सामग्री (कंटेंट्स) पढ़ना पसंद करते हैं। अब हमारे पोस्टों को तो पढ़ने वाले हमारे साथी ब्लोगर्स ही हैं जिनके पास पहले से ही बहुत सारी जानकारी है इसलिये यदि आप कोई जानकारी वाली पोस्ट लिखोगे तो वह फ्लॉप ही होने वाला है। अब देखिये ना ललित शर्मा जी ने पोस्ट लिखा "सफलता कैसे मिले?" तो उस पोस्ट ने कितने लोगों को आकर्षित किया? अरे भाई जो लोग पहले से ही सफल हैं उन्हें अपने पोस्ट में सफलता सिखाओगे तो भला वे क्यों उस पोस्ट को पढ़ने के लिये आयेंगे? जो पहले से ही सफल हैं उन्हें सफलता सिखाना, जिनके पास पहले से ही जानकारी है उन्हें जानकारी देना, जिनका पेट पहले से ही भरा हुआ है उन्हें खाना देना भला कहाँ की बुद्धिमत्ता है?"

"पर पोस्ट में अच्छी सामग्री नहीं होगी तो नेट में हिन्दी आगे कैसे बढ़ेगी?"

"अच्छी सामग्री? अरे कैसी बात कर रहे हैं आप? नेट में क्या हिन्दी आगे बढ़ रही है? अरे नेट में तो हिन्दी ब्लोगर्स ही बढ़ते जा रहे हैं जो आपस में एक दूसरे को पढ़ें या ना पढ़ें पर टिप्पणी जरूर करते हैं। यदि नेट में हिन्दी आगे बढ़ रही होती तो ब्लोग्स को पढ़ने के लिये ब्लोगर्स के साथ ही साथ आज जो करोड़ों हिन्दीभाषी नेट यूजर्स हैं वे भी क्या नहीं आते? आपने अभी ही हमारे लेखन को लाजवाब बताया है क्योंकि आप एक ब्लोगर हैं। पर हम जानते हैं कि हम अपने पोस्टों को किसी अच्छी पत्रिका में प्रकाशित करने के लिये भेज दें तो वह प्रकाशित होने के बदले कूड़ेदान में ही जायेगा। संपादक को चाहिये ऐसी रचनाएँ जिन्हें पाठक पसंद करे। हमारे पास ऐसी रचना तो है ही नहीं। हम तो सिर्फ वो लिखते हैं जिन पर दूसरे ब्लोगर अपनी टिप्पणी दें। हमारी ब्लोगिंग तो मौज लेने के लिये होती है, टिप्पणी पाने के लिये होती है, गुट बनाने के लिये होती है, नये ब्लोगर बनाने के लिये होती है नये नये पाठक लाने के लिये थोड़े ही होती है। हम कौन सा यहाँ हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिये आये हैं? हमें तो खुद को आगे बढ़ाना है भाई! हम आगे बढ़ेंगे तो हिन्दी भी अपने आप ही आगे बढ़ जायेगी। फालतू बातें करके टोकते रहते हैं आप। जो हम बता रहे हैं उसे सुनना है तो सुनिये नहीं तो अपना रास्ता लीजिये।"

"अरे आप तो नाराज ही हो गये। चलिये अब बीच में कुछ भी नहीं बोलेंगे हम, आप जारी रखिये।"

"तो मैं बता रहा था कि पोस्ट लिखते समय जानकारी आदि को ताक में रखकर इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि हमारे ब्लोगर मित्र क्या पसंद करते हैं। यदि आपने उनकी पसंद को जान लिया तो समझ लीजिये कि आप सफल भी हो गये।"

"तो यही बताइये कि क्या पसंद करते हैं हमारे ब्लोगर मित्र?"

"उनकी सबसे पहली पसंद है कि लोग उनके पोस्टों में टिप्पणी करें। अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं की ब्लोगिंग में अच्छे पोस्ट का मापदंड पाठकों की संख्या और डिग, टेक्नोराटी जैसे सोशल बुकमार्किंग साइट में बुकमार्क्स की संख्या होती है पर हिन्दी ब्लोगिंग में अच्छे पोस्ट का मापदंड पोस्ट में मिली टिप्पणियों की संख्या होती है। इसलिये सबसे पहले तो आप दूसरे ब्लोगर्स के पोस्टों में जाकर टिप्पणी कीजिये। इससे फायदा यह होगा कि जब आपका पोस्ट प्रकाशित होगा तो वे लोग भी आपके पोस्ट में टिप्पणी करने जरूर आयेंगे। हो सकता है कुछ सिरफिरे टाइप के लोग न भी आयें पर यकीन मानिये कि बहुत से लोग आयेंगे और जो लोग नये नये ब्लोगर बने हैं वे लोग तो गारंटीड आयेंगे।"

"यहाँ तक तो हम आपकी बात समझ गये जी, पर टिप्पणी करने के लिये सारे पोस्टों को पढ़ना तो पड़ेगा। इतना समय हम कैसे निकालें?

"अरे टिप्पण्यानन्द जी! रहे आप भी पोंगू के पोंगू ही। टिप्पणी करने के लिये भला पोस्टों को पढ़ने की क्या जरूरत है? ये रही टिप्पणियों की लिस्टः

  • शुभकामनाएँ
  • बधाई
  • बधाई स्वीकारे
  • बहुत-बहुत बधाईयाँ
  • शुक्रिया!
  • अच्छा आलेख
  • अनोखी पोस्ट
  • अच्छी रचना
  • बहुत ही सटीक रचना
  • इस रचना के लिये आभार
  • सही लिखा है
  • बढिया लिखा है आपने
  • मजा आ गया पढ़ कर।
  • बहुत सुंदर
  • सत्य वचन!
  • nice
  • आपके विचारो से सहमत हूँ
  • फलाने (जिसे आप अच्छा टिप्पणीकर्ता समझते हैं) से सहमत
  • आपकी लेखनी तो कमाल करती ही है
  • आपकी लेखनी के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाना है
बस आप इनमें से किसी एक को चेंप दीजिये।"

"अच्छा अब यह बताइये कि पोस्ट में क्या लिखा जाये जो पढ़ने वालों को पसंद आये?"

"सीधी सी बात है कि जब भी किसी प्रकार का विवाद होता है तो सभी को मजा आता है। इसलिये ऐसे पोस्ट लिखिये जिससे विवाद की स्थिति पैदा हो। आप चाहो तो किसी बहाने से दो लोगों को आपस में लड़वा दो और उसी पर पोस्ट लिख डालो।"

"भाई ये लोगों को लड़वाना, झगड़वाना और विवादास्पद पोस्ट लिखना तो अपने बस की बात नहीं है। कोई और तरीका बताइये।"

"तो फॉर्मूलों का प्रयोग कीजिये, जिस प्रकार से हिन्दी फिल्मों को हिट कराने के फॉर्मूले होते हैं उसी प्रकार से पोस्ट को भी हिट कराने के फॉर्मूले होते हैं।"

"हमें भी कुछ फॉर्मूले बताइये ना।"

"ठीक है हम आपको फॉर्मूलों की लिस्ट दे रहे हैं पर इन फॉर्मूलों के आधार को पहले समझ लीजिये। यह तो आप जानते ही हैं कि मॉडर्न आर्ट को कोई समझ नहीं पाता पर तारीफ उसकी खूब करता है। ऐसे ही जो पोस्ट ऊपर ही ऊपर से गुजर जाये वह पोस्ट खूब पसंद की जाती है और उसे खूब टिप्पणियाँ मिलती हैं। तो यह है फॉर्मूलों की लिस्टः
  • पोस्ट किसी एक विषय से शुरू कीजिये और उसका अन्त किसी और विषय से करिये
  • ऑफिस में सहकर्मियों के साथ की गई बातचीत ऑफिस में किये गये काम आदि को लिख कर उसे हिन्दी ब्लोगिंग से जोड़ दीजिये
  • रात को नींद पूरी क्यों नहीं हुई, खाना हजम क्यों नहीं हुआ आदि बातें बताते हुए पोस्ट लिख मारिये
  • आप कहाँ गये, क्या किये इन बातों को लिख कर उन्हें दर्शन शास्त्र से जोड़ दीजिये
  • कुत्ते के पिल्ले, बिल्ली के बच्चे, बकरी के मेमने इत्यादि पर चित्र सहित पोस्ट लिखिये और उन्हें मानवीयता के साथ जोड़ दीजिये
  • भिगमंगे, बावले आदि पर पोस्ट लिखकर दया, करुणा आदि मानवीय भावनाओं के साथ जोड़ दीजिये
  • शुद्ध हिन्दी में कभी पोस्ट मत लिखिये बल्कि पोस्ट के बीच बीच में ऐसे अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अवश्य कीजिये जिसका जो जैसा भी चाहे अर्थ निकाल सके, आप तो जानते ही हैं कि एक ही अंग्रेजी शब्द के कई हिन्दी अर्थ होते हैं, अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से पोस्ट प्रभावशाली बनता है
  • पोस्टों में हिन्दी भाषा तथा शब्दों के साथ खूब खिलवाड़ याने कि प्रयोग कीजिये ताकि हिन्दी भाषा और अधिक निखरे और सँवरे
  • पोस्ट के बीच-बीच में अंग्रेजी और हिन्दी दोनों के कुछ क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग करिये जिनका अर्थ या तो समझ में ही ना आये या फिर समझने के लिये डिक्शनरी देखना पड़े
  • यात्रा के दौरान कहाँ कहाँ क्या क्या हुआ और क्या तकलीफ हुई बताते हुए पोस्ट लिख मारिये और तकलीफ के लिये सरकारी विभाग को दोषी ठहरा दीजिये
  • यदि कुछ विशेष जानकारी दे रहे हैं तो आधी अधूरी दीजिये और जहाँ से जानकारी मिली उस अंग्रेजी साइट का लिंक दे दीजिये
"तो टिप्पण्यानन्द जी, अभी इतने ही फॉर्मूलों से काम चलाइये, बाद में और भी फॉर्मूले देंगे हम आपको।"

"धन्यवाद लिख्खाड़ानन्द जी! अब मैं चलता हूँ, नमस्कार!"

"नमस्काऽर!"

Sunday, January 31, 2010

मैं ब्लोगिंग क्यों करता हूँ

कोई भी व्यक्ति यदि कुछ करता है तो उस कार्य का कुछ न कुछ उद्देश्य अवश्य ही होता है। मैं भी यदि ब्लोगिंग करता हूँ तो मेरा भी अवश्य ही कुछ न कुछ उद्देश्य होना ही चाहिये। मैं न तो कवि हूँ, न लेखक और न ही पत्रकार। याने कि लेखन से मेरा कुछ विशेष सम्बन्ध नहीं है, बस ऐसे ही कुछ कुछ लिख लेता हूँ। अक्टूबर 2004 में मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ली तो बहुत अधिक खाली समय रहने लग गया मेरे पास। मैंने सुन रखा था नेट से कमाई के बारे में। तो दिन भर मैं नेट में खँगालते रहा करता था कि नेट से कमाई कैसे हो। वहीं मुझे पता चला कि ब्लोगिंग नाम की कोई चीज होती है जिसके द्वारा विज्ञापन से कमाई की जा सकती है। हिन्दी ब्लोगिंग के विषय में मुझे उस समय तक कुछ भी पता नहीं था। मैंने अंग्रेजी के कुछ ब्लोग बना लिये। कुछ काल के बाद मेरा एडसेंस का खाता भी खुल गया। अपने अंग्रेजी ब्लोग्स में मैंने एडसेंस के विज्ञापन भी लगा दिये। रोज देखा किया करता था अपने एडसेंस खाते को कि कुछ कमाई हो रही है या नहीं मगर महीनों तक एक भी क्लिक नहीं हुआ किसी विज्ञापन पर। मैं निराश होने लगा। पर ज्यों-ज्यों मैं निराश होता था त्यों-त्यों मेरा जुनून बढ़ते जाता था कि जब दूसरे लोग एडसेंस से कमाई कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं? अवश्य ही मुझमें ही कुछ न कुछ खामी है। खैर साहब, लगे ही रहा मैं अपनी कोशिश में और उस दिन मेरी खुशी का पारावार न रहा जब मैंने देखा कि एडसेंस विज्ञापन पर एक क्लिक हुआ है और मेरे खाते में $0.02 का बैलेंस हो गया है। मुझे वो $0.02 कुबेर के खजाने जैसा लगा और मैं और भी उत्साहित होकर काम करने लग गया। अपने ब्लोग्स में एडसेंस के विज्ञापन लगभग आठ महीने बाद मुझे गूगल से मेरी कमाई का पहला चेक मिला। फिर मैंने agoodplace4all.com नामक डोमेननेम, वेब होस्टिंग और अंग्रेजी का एक बना बनाया वेबसाइट भी खरीद लिया। दूसरा चेक मुझे पाँच माह बाद मिला और तीसरा उसके दो माह बाद। उसके बाद हर माह मेरी कमाई होने लगी।

इसी बीच नेट को खँगालते खँगालते मुझे नेट में हिन्दी के विषय में पता चला तो मैंने अपने हिन्दी ब्लॉग्स भी बना लिये और उनमें भी एडसेंस विज्ञापन लगा दिया। जब मैंने देखा कि हिन्दी के विज्ञापनों से भी कमाई हो रही है तो अंग्रेजी वेबसाइट के साथ साथ हिन्दी वेबसाइट भी बना लिया क्योंकि मैं चाहता था कि कमाई होने के साथ ही साथ यदि मातृभाषा की भी सेवा हो। मेरा हिन्दी लेखन यहीं से शुरू हुआ। यहीं से अंग्रेजी के प्रति रुचि कम हो गई, आखिर हिन्दी माध्यम से ही मेरी शिक्षा हुई थी।

बाद में गूगल के नीति में परिवर्तन हो गया और हिन्दी में एडसेंस विज्ञापन आने बन्द हो गये। किन्तु, बावजूद कमाई कम हो जाने के भी, हिन्दी के प्रति अपने मोह को मैं त्याग नहीं सका और इसीलिये मैँ हिन्दी ब्लोगिंग करता हूँ।

हिन्दी ब्लोगिंग के पीछे अभी भी मेरा उद्देश्य यही है कि नेट में हिन्दी आगे बढ़े और साथ ही साथ पाठकों की संख्या तेजी के साथ बढ़े क्योंकि पाठकों की अधिक से अधिक संख्या ही नेट में हिन्दी के द्वारा विज्ञापनों से कमाई करवा पायेगी। गूगल भी हिन्दी पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिये जी जान से जुटा हुआ है। हिन्दी पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिये गूगल ने 'है बातों में दम?' प्रतियोगिता आयोजित किया है जिसका कि आज अन्तिम तिथि है। इस प्रतियोगिता में अपने ब्लोग जैसे अपने नोल में पोस्ट लिखना पड़ता है।

मेरे ब्लोग प्रोफाइल को मुश्किल से कुछ सौ लोग ही देखते हैं किन्तु मेरे नोल प्रोफाइल को पिछले एक सप्ताह में 1261 लोगों ने देखा है। इससे पता चलता है कि गूगल के इस प्रयास से अवश्य ही हिन्दी पाठकों की संख्या बढ़ रही है।

Saturday, January 9, 2010

संगीता पुरी जी का सराहनीय कार्य ... 5 दिन में 45 लेख दिये गूगल के 'है बातों में दम?' प्रतियोगिता को

यह देखकर मुझे अपार हर्ष हुआ कि संगीता पुरी जी ने 5 दिन में 45 लेख दिये हैं गूगल के 'है बातों में दम?' प्रतियोगिता को! प्रतियोगिता में उनके द्वारा डाले गये लेखों की लिस्ट आप यहाँ क्लिक करके देख सकते हैं।

संगीता जी ने 4 जनवरी 2010 को प्रतियोगिता में भाग लेना आरम्भ किया मात्र 5 दिन में 45 लेख समर्पित कर दिया प्रतियोगिता को। नेट में हिन्दी के विस्तार के लिये यह अत्यन्त सराहनीय कार्य है उनका! मैं आशा करता हूँ कि उनका यह कार्य आपके लिये भी प्रेरणा बनेगी और आप भी बढ़ चढ़ कर इस प्रतियोगिता में अवश्य ही भाग लेंगे।

आपके इस कार्य के लिये हार्दिक धन्यवाद संगीता जी!

आज नेट में हिन्दी के जानकारीयुक्त अच्छे लेखों की अधिक से अधिक संख्या में जरूरत है और इस जरूरत को पूरा करने में आप सभी का सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण है।

Friday, January 8, 2010

सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ

"क्या बात है टिप्पण्यानन्द जी? किस सोच में डूबे हुए हैं?"

"भाई लिख्खाड़ानन्द जी! क्या बतायें हाथ बहुत तंग है आज कल। कुछ कमाई-धमाई की जुगत में लगा हुआ हूँ। सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ।"

"टिप्पणियों की दूकान?"

"हाँ भई, टिप्पणियों की दूकान! आजकल हिन्दी ब्लॉगजगत में खूब माँग है टिप्पणियों की। वहाँ पर हाल यह है कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे। होड़ मची है हमारे ब्लोगरों में अधिक से अधिक टिप्पणी पाने के लिये। करोड़ों हिन्दीभाषी इंटरनेट यूजरों के होते हुए भी हिन्दी ब्लोगों के पाठकों की संख्या मात्र कुछ सौ तक ही सीमित है इससे साफ है कि हिन्दी ब्लोगर को हिन्दी ब्लोगर लोग ही पढ़ते हैं। अब जब पाठक ही नहीं हैं तो पाठकों की संख्या को भला पोस्ट की लोकप्रियता और गुणवत्ता का पैमाना कैसे माना जाये? इसलिये टिप्पणियों की संख्या ही इस पैमाने का काम करती हैं। इसीलिये आपस में एक दूसरे के पोस्ट पर टिप्पणी करने का चलन हो गया है। यदि एक ब्लोगर ने किसी दूसरे ब्लोगर के पोस्ट पर टिप्पणी किया है तो दूसरे ब्लोगर का कर्तव्य बनता कि कि वह भी जाकर पहले ब्लोगर के पोस्ट में टिप्पणी करे। टिप्पणियाँ पाने के लिये बहुत से गुट बन गये हैं। जैसे नेता लोग भीड़ बढ़ाने के लिये रुपये देकर ट्रकों में लोगों को लाते हैं उसी प्रकार से टिप्पणियाँ पाने के लिये एक से बढ़कर एक हथकंडे अपनाये जाते हैं, लोग ईमेल और फोन कर के एक दूसरे को बताते हैं कि मेरी पोस्ट लग गई है और अब आपको टिप्पणी करना है। पर बहुत से ऐसे ब्लॉगर भी हैं जो लिखते तो बहुत अच्छे हैं पर उनके पोस्ट में टिप्पणियाँ ही नहीं आती। हम तो ऐसे ब्लोगरों को ही अपना ग्राहक बनायेंगे। जोरदार चलेगी अपनी दूकान। उचित दाम लेकर सही टिप्पणी देंगे तो भला कोई क्यों नहीं खरीदेगा हमसे टिप्पणियाँ?"

"विचार तो आपका बहुत अच्छा है! सच में खूब चलेगी आपकी दूकान। पर यह तो बताइये कि आपने ऐसे कैसे कह दिया कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे?"

"अरे आप किसी पोस्ट और उसकी टिप्पणियों को पढ़ कर तो देखिये! आप को खुद पता चल जायेगा कि हमने ऐसा क्यों कहा। पोस्ट गम्भीर है तो उसमें टिप्पणी हँसी-मजाक और नोंक-झोंक वाली मिलेंगी। ऐसी टिप्पणियाँ मिलेंगी जिनका पोस्ट के विषय से दूर-दूर का भी कोई सम्बन्ध नहीं है। तो ऐसी टिप्पणी पोस्ट को पढ़ने के बाद तो नहीं की जा सकती ना? और यदि पोस्ट को पढ़ने के बाद की गई होंगी तो स्पष्ट है कि टिप्पणी करने वाला या तो गम्भीर पोस्ट लिखने वाले की खिल्ली उड़ाना चाहता है या फिर उसे नीचा दिखा कर उसका कद छोटा कर देना चाहता है। भाई टिप्पणी करके किसी का सहयोग करने का यह अर्थ तो नहीं है ना कि हमारे ही सहयोग से सामने वाले का कद हमसे भी ज्यादा ऊँचा हो जाये?

"अच्छा अब यह बताइये कि रेट क्या रखेंगे आप टिप्पणियों के?"

"रेट तो टिप्पणी की क्वालिटी के अनुसार रखेंगे। "nice", "वाह! वाह!!", "बेहतरीन!", "बहुत सुन्दर!", "क्या खूब!" जैसी एक दो शब्दों वाली टिप्पणियों के रेट रहेंगे मात्र दस रुपये प्रति टिप्पणी! "गहरी बात कह गये!", "बहुत अच्छा लिखा है!" जैसी एक वाक्य वाली टिप्पणियों के रेट होंगे बीस रुपये प्रति टिप्पणी!"

"इतने कम रेट टिप्पण्यानन्द जी? भाई माना कि ये टिप्पणियाँ छोटी हैं पर लोगों के ब्लोग में जाने और टिप्पणी करने में समय तो लगता ही है। इतना अधिक समय गवाँ कर इतने सस्ते में कैसे टिप्पणियाँ बेच पायेंगे आप?"

"दिक्कत की कोई बात नहीं है लिख्खाड़ानन्द जी! हमें कौन सा किसी ब्लॉग में जाना है, पोस्ट को पढ़ना है और टिप्पणी करना है? ऐसी टिप्पणियों के लिये ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर आती है ना, बस वही खरीद लेंगे। एक बार उसमें टिप्पणियों और ब्लोगों के यूआरएल को फीड भर कर देना है। फिर तो अपने आप ही टिप्पणियाँ होती रहेंगी। हाँ टिप्पणी खरीदने वाले के लिये शर्त सिर्फ यही रहेगी कि कम से कम एक हजार रुपये की टिप्पणी खरीदना होगा उसे, क्योंकि मात्र पाँच दस टिप्पणियों के लिये तो हम ऑटोमेटेड साफ्टवेयर में बार बार ब्लोगों के यूआरएल तो बदलने से रहे।"

"वाह! तब तो खूब कमाई होगी आपकी!"

"बिल्कुल होगी जी! और फिर किसी की टाँगें खींचने, गाली गलौज करने जैसी स्पेशल टिप्पणियाँ करवाने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे। इस प्रकार की स्पेशल टिप्पणियों के रेट भी स्पेशल रखेंगे हम। हमारे नियम के अनुसार टिप्पणियों के दाम मिल जाने के बाद चौबीस घंटे के भीतर टिप्पणियाँ की जायेंगी और यदि कोई तुरन्त टिप्पणी करवाना चाहेगा तो फिर अर्जेंट चार्जेस अलग लगेंगे।"

"अच्छा यदि कोई लंबी टिप्पणी खरीदना चाहे तो?"

"तब तो उनके रेट भी तगड़े रहेंगे, कम से कम एक हजार रुपये प्रति टिप्पणी क्योंकि ऐसी टिप्पणियों के लिये तो ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर से तो काम लिया नहीं जा सकता, खुद ब्लोग में जाकर पोस्ट को पढ़ना पड़ेगा।"

"तो चलिये जल्दी खोलिये अपनी टिप्पणियों की दूकान। हम भी कुछ टिप्पणियाँ खरीद लिया करेंगे आपसे।"

"अरे आपको भला टिप्पणियाँ खरीदने की क्या क्या जरूरत है, आप तो महान और धुरन्धर लिख्खाड़ हैं! लोग तो आपके पोस्ट का इंतजार करते बैठे रहते हैं। इधर पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि टिप्पणियाँ आनी चालू हो जाती हैं।"

"हाँ भाई, टिप्पणियाँ तो खूब मिल जाती हैं हमें! पर ऐसे ही थोड़े मिल जाती हैं हमें ये टिप्पणियाँ। खूब मेहनत करनी पड़ती है हमें इनके लिये। हजारों ब्लोगों में जा जा कर टिप्पणी करते हैं हम तब कहीं जाकर सौ-पचास टिप्पणी मिल पाती है। हाँ तो हम कह रहे थे कि टिप्पणियाँ तो जरूर खरीदेंगे हम आपसे। टिप्पणियाँ जितनी अधिक मिले उतना ही ज्यादा अच्छा होता है।"

"फिर तो लिख्खाड़ानन्द जी हम भी आपके लिये डिस्काउंटेड रेट लगायेंगे। आखिर आप हमारे मित्र जो हैं।"

"तो कब खुल रही है आपकी टिप्पणियों की दूकान?"

"बहुत ही जल्दी! ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर के लिये ऑर्डर दे रखा है। बस सॉफ्टवेयर आई कि दूकान खुली।"


(मेरे लिये हर्ष की बात है कि यह धान के देश में ब्लोग का 401वाँ पोस्ट है!)

Monday, January 4, 2010

क्या टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड हैं?

टिप्पणियों के मोह से आज कोई भी हिन्दी ब्लोगर अछूता नहीं है। टिप्पणियों का मोह कोई अस्वाभाविक बात नहीं है किन्तु जिस प्रकार से हिन्दी ब्लोगजगत में टिप्पणियाँ पा लेने का मोह है उससे तो लगता है कि टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड है। याने कि जिस पोस्ट में जितनी अधिक टिप्पणियाँ वह उतना ही अच्छा पोस्ट! इस लिहाज से तो विवादास्पद पोस्ट ही सबसे अच्छे हैं जहाँ पर बहुत सारी टिप्पणियाँ मिलती हैं, भले ही उन टिप्पणियों में गाली-गलौज तक शामिल हो।

टिप्पणी आखिर है क्या? एक प्रतिक्रिया मात्र तो है यह। यह मानव स्वभाव है कि जब कभी भी वह किसी के विचार को पढ़ता या सुनता है तो उसके अंदर भी प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ न कुछ विचार अवश्य उठते हैं। जब लोग अपने भीतर उठने वाले इन विचारों को व्यक्त कर देते हैं तो वह टिप्पणी की संज्ञा प्राप्त कर लेती है। प्रतिक्रियात्मक विचार तो सभी पाठकों के भीतर उठते हैं किन्तु यह जरूरी नहीं है कि वे सभी अपने विचारों को व्यक्त ही करें। विचारों की अभिव्यक्ति के लिये लेखन क्षमता भी चाहिये।

मैं तो समझता हूँ कि किसी पोस्ट की गुणवत्ता तय करने वाले वास्तव में उसके पाठकगण हैं न कि टिप्पणियाँ। नेट में आम पाठकों में एक बड़ा वर्ग ऐसे पाठकों का भी होता है जिनमें लेखन क्षमता नहीं होती और इसी लिये वे पोस्ट पढ़ कर भी टिप्पणी नहीं करते। ऐसे पोस्टों की कमी नहीं है जिनमें टिप्पणियाँ तो नहीं के बराबर हैं किन्तु पढ़े बहुत अधिक लोगों के द्वारा गये हैं और बहुत अधिक पसंद भी किये गये हैं। डिग.कॉम में जाकर देखें तो सैकड़ों की संख्या में डिग (पसंद) प्राप्त करने वाले पोस्टों में टिप्पणी ही नहीं है या है भी तो नहीं के बराबर।

ऐसा लगता है कि हिन्दी ब्लोगजगत में पाठक के ब्लोगर भी होने के कारण उसमें लेखन क्षमता भी होती ही है और वे अच्छी प्रकार से टिप्पणी कर लेते हैं इसीलिये यह भ्रान्ति बन गई है कि टिप्पणियाँ ही पोस्ट का मापदंड है। शायद इसीलिये यहाँ पर टिप्पणी मोह भी अधिक है।

जब हिन्दी ब्लोगों को आम पाठक मिलने शुरू हो जायेंगे तो टिप्पणी मोह अपने आप कम हो जायेगा और लोग अधिक से अधिक पाठक तैयार करने में ही अपनी सफलता मानना शुरू कर देंगे।

Saturday, January 2, 2010

हिन्दी को बढ़ावा देना है तो गूगल की 'है बातों में दम?' प्रतियोगिता में बढ़-चढ़ कर भाग लें ... मैंने वहाँ 100 लेख दिये हैं आप मुझसे भी ज्यादा दें

क्या आप जानते हैं कि आपका कितना महत्व है? जी हाँ आपका बहुत महत्व है क्योंकि आपके लेख बहुत महत्वपूर्ण हैं। आपके लेखों में इतनी शक्ति है कि ये नेट में हिन्दी को वर्चस्व दिला सकते हैं। और मैं यह भी जानता हूँ कि नेट में हिन्दी को सबसे आगे लाना आपका उद्देश्य भी है। तो क्यों देर कर रहे हैं गूगल के 'है बातों में दम?' प्रतियोगिता में अपने लेख देने के लिये?

हम और आप के साथ साथ गूगल भी चाहता है कि नेट में हिन्दी आगे बढ़े। नेट में जितनी अधिक अच्छी सामग्री (अच्छे कंटेंट) आयेगी उतनी ही अधिक हिन्दी आगे बढ़ती जायेगी। अधिक से अधिक अच्छी सामग्री (अच्छे कंटेंट) लाने के लिये ही गूगल ने आयोजित किया है 'है बातों में दम?' प्रतियोगिता!

मुझे गूगल का यह प्रयास पसंद आया। 8 दिसम्बर 2009 को पहली बार मुझे इस प्रतियोगिता के विषय में पता चला। जब मैंने वहाँ जाकर देखा तो पाया कि मात्र दो-तीन लेख ही हैं वहाँ पर। मैंने वहाँ के लेखों की संख्या को बढ़ाने के लिये निश्चय कर लिया और अपने सामर्थ्य के अनुसार अलग-अलग वर्गों लेख डालने शुरू कर दिये। 31 दिसम्बर 2009 तक मैं वहाँ पर 92 लेख डाल चुका था। कल याने कि नये साल के पहले दिन मैंने ठान लिया कि आज यहाँ पर अपने लेखों का शतक बना कर ही रहूँगा और अन्ततः इसमें सफल भी हो गया। आप मेरे उन लेखों को यहाँ क्लिक कर के देख सकते हैं।

वहाँ पर वत्स जी और अन्तर सोहिल जी के लेख देख कर खुशी हुई मुझे! पर मात्र एक लेख से काम नहीं चलना है। मेरा आप सभी लोगों से अनुरोध है कि आप अपने अधिक से अधिक अच्छे लेख इस प्रतियोगिता में दें। इस प्रकार से आप न केवल नेट में हिन्दी को बढ़ावा देंगे बल्कि पुरस्कार प्राप्त करने का अवसर भी पा सकेंगे, याने कि "आम के आम गुठलियों के दाम"! ये पुरस्कार हैं:

हर विषय श्रेणी के विजेता के लिए एक लैपटॉप [श्रेणियाँ हैं (1) मनोरंजन संस्कृति और साहित्य (2) यात्रा (3) खेल (4) स्वास्थ्य और (5) सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दे]

हर विषय श्रेणी में 9वीं से 12वीं कक्षा के विद्यार्थी द्वारा प्रस्तुत की गई सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को किसी ऑनलाइन पुस्तक की दुकान के 5000 रु के गिफ्ट वाउचर

सभी विषय श्रेणियों में से छांटी गईं पहली 50 प्रविष्टियों को 6 महीने का मुफ़्त इंटरनेट सब्सक्रिप्शन

सभी विषय श्रेणियों में से छांटी गईं अगली 250 प्रविष्टियों के लिए Google गुडीज़
तो फिर देर बिल्कुल मत करें, अपना कम से कम एक अच्छा लेख तो अभी ही डाल दें वहाँ जा कर क्योंकि "काल करे सो आज कर आज करे सो अब्ब पल में परलय होयगा बहुरि करेगा कब्ब"।

लेख डालने के लिये सिर्फ श्रेणी के आगे "अपनी प्रविष्टि दें" बटन को क्लिक करना है, अपने गूगल आईडी से लागिन करना है और आपके सामने स्क्रीन होगा लेख डालने के लिये!

click here

Monday, December 21, 2009

हिन्दी ब्लोगर्स का दरवाजा खटखटाने वाली है लक्ष्मी जी

वो दिन अब दूर नहीं है जब लक्ष्मी माता हिन्दी ब्लोगर्स का दरवाजा खटखटाते नजर आयेंगी। गूगल का पहले 'हैबातों में दम?' प्रतियोगिता आयोजित करना और बाद में "हिन्दी बुलेटिन बोर्ड" बनाना इस बात का संकेत है कि गूगल अब हिन्दी को नेट में तेजी के साथ बढ़ाना चाहता है। यद्यपि हिन्दी को नेट में आगे लाने के पीछे गूगल की मंशा भारत में अपने व्यवसाय को फैलाना है किन्तु इस बात में भी दो मत नहीं हो सकता कि गूगल के इस कार्य से हिन्दी का बहुत भला होने वाला है।

वास्तव में देखा जाये तो नेट में आगे बढ़ने के लिये हिन्दी को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। और इसके लिये एक नहीं अनेक कारण हैं जिनमें से कुछ मुख्य कारण ये हैं

सबसे बड़ा कारण है लिखने के मामले में हिन्दी का कुछ जटिल होना। एक ही शब्द को एक से अधिक प्रकार से लिखा जाता है जैसे कि कोई "विंध्याचल" लिखता है तो कोई उसी को "विन्ध्याचल" लिखता है।

हिन्दी शब्द सूची (वोकाबुलारी) का विशाल डेटाबेस न होना। हिन्दी शब्दों का डेटाबेस जितना अधिक बढ़ेगा उतने अधिक समानार्थी शब्दों का नेट में प्रयोग होने लगेगा। उदाहरण के लिये कोशिश, प्रयास, प्रयत्न, चेष्टा आदि समानार्थी शब्द हैं। इंटरनेट में भाषाओं के लिये जो सॉफ्टवेयर बनते हैं वे बहुत ही जटिल होते हैं। ये सॉफ्टवेयर न केवल हमारे लेखों को पढ़ते हैं बल्कि उसे समझने और दूसरी भाषाओं मे अनुवाद करने का भी कार्य करते हैं। सही डेटाबेस उपलब्ध नहीं होने के कारण ये सॉफ्टवेयर सही काम नहीं कर पाते। यही कारण है कि गूगल ट्रांसलेट के द्वारा किया गया अनुवाद गलत और यहाँ तक कि हास्यास्पद भी हो जाता है। यदि हम He is a kind man. वाक्य का गूगल ट्रांसलेट से अनुवाद करें तो वह "वह एक तरह का आदमी है." बताता है। इसका स्पष्ट कारण है कि उसके डेटाबेस में अंग्रेजी के kind शब्द के लिये हिन्दी में "तरह" के साथ ही साथ "प्रकार", "दयालु", "कृपालु" आदि शब्द नहीं हैं, यदि होता तो अवश्य ही अनुवाद सही याने कि "वह एक दयालु आदमी है." होता। गूगल अपने अनुवादक में “contribute better translation” कह कर हम से इसके लिये सहायता भी माँगता है (नीचे चित्र देखें) किन्तु हम ही उसे सहयोग नहीं दे पाते।

हिन्दी शब्दों के हिज्जों में गलतियों का बहुतायत से पाया जाना जैसे कि 'कोशिश' को 'कोशीश', 'पुरी' को 'पूरी' लिखना आदि। कोशिश को कोशीश लिखने पर भी पढ़ने वाला एक बार समझ लेता है कि हिज्जे की गलती हो सकती है क्योंकि हिन्दी में कोशीश शब्द नहीं होता किन्तु पुरी को पूरी लिखने से भ्रम की स्थिति बन जाती है क्योंकि हिन्दी में ये दोनों अलग अलग शब्द हैं।

खैर ये तो हिन्दी की कुछ कठिनाइयाँ हैं। अब आते हैं "लक्ष्मी जी" वाली बात पर! लक्ष्मी जी हमारे पास तभी आयेंगी जब हमारे पास पाठकों का एक विशाल समूह होगा और पाठकों का विशाल समूह तब होगा जबः

  • हम हिन्दी में अच्छे, जानकारीपूर्ण, पाठकों को पसंद आने वाले, जहाँ तक हो सके हिज्जों की गलतियों से रहितसामग्री लिखेंगे।
  • "हिन्दी बुलेटिन बोर्ड" में अपने विचारों को रखेंगे। इसमें आप अपने ब्लोग का लिंक देक अपने ब्लोग कोलोकप्रिय भी बना सकते हैं।
तो मित्रों, अब हमें ठान लेना है कि हिन्दी को नेट में आगे बढ़ाने के लिये हम गूगल का जी जान से सहयोग करेंगे ताकि लक्ष्मी जी की हमपर जल्दी से जल्दी कृपा हो।

Thursday, December 3, 2009

कभी सोचा भी न था कि लिखने लगूँगा

आज रोज एक पोस्ट लिख लेता हूँ तो मुझे स्वयं के ऊपर बहुत आश्चर्य होता है क्योंकि कभी सोचा भी नहीं था कि लिखने लगूँगा। चार साल पहले मैं नेट में आया था कमाई करने के चक्कर में। साल भर तक नेट को कमाई करने के तरीके जानने के लिये खंगालता रहा। इसी चक्कर में ब्लोगिंग (अंग्रेजी) के बारे में पता चला तो अपने कुछ अंग्रेजी ब्लोग बना डाले और सपने देखने लगा सपना कि एडसेंस से धन बरसने लगेगा और बन जाउँगा मैं धनकुबेर। रोज देखा करता था अपने एडसेंस खाते के बैलेंस को जो कि एक डेढ़ महीनों तक जीरो ही रहा। निराशा तो आती थी पर निराशा से अधिक क्रोध आता था अपने आप पर यह सोच कर कि लोग कमा सकते हैं पर मैं कुछ भी नहीं कमा रहा। फिर धीरे धीरे दो तीन-सेंट रोज के हिसाब से एडसेंस में रकम आने लगी। आठ माह बाद सौ डालर हो जाने पर पहला चेक मिला गूगल से। दूसरा उसके पाँच माह बाद, तीसरा फिर तीन माह बाद। इस प्रकार से कमाई शुरू हो गई।

लगभग एक साल तक तो नेट में हिन्दी और हिन्दी ब्लोग के विषय में पता ही नहीं चला। फिर नेट में हिन्दी के बारे में पता चलने के बाद डोमेननेम, होस्टिंग आदि लेकर अपना एक हिन्दी वेबसाइट भी बना लिया क्योंकि उन दिनों हिन्दी साइट में भी एडसेंस के विज्ञापन आते थे।

तो मैं बता रहा था कि मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं कभी लिखने लगूँगा। कवि, लेखक, साहित्यकार, पत्रकार कुछ भी तो नहीं हूँ मैं, कभी रहा भी नहीं था। हाँ, मेरे पिता, स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया, अवश्य साहित्यकार थे, साहित्य की हर विधा में लिखा था उन्होंने। मन में विचार आया कि क्यों न एक हिन्दी ब्लोग बनाकर पिताजी के उपन्यास "धान के देश में" को नेट में डाला जाये। बस बना डाला अपना ब्लोग पिता जी के उपन्यास के नाम पर ही। पिताजी के उपन्यास के पूरा हो जाने पर उनकी अन्य कविता कहानियों को डालने लगा पर धीरे-धीरे वे सब भी मेरे ब्लोग में डल गईं। अब कहाँ से कोई पोस्ट लाता मैं? मजबूर होकर कुछ कुछ लिखने लगा। विश्वास नहीं था कि कोई पसंद करेगा मेरे लिखे को। पर आप लोगों का स्नेह मुझे मिलने लगा और मैंने लिखना जारी रखा। अब तो थोड़ी सी पहचान भी बन गई है मेरी।

इस हिन्दी लेखन के चक्कर में कमाई तो बहुत कम हो गई और रोज हिन्दी लिखने की एक लत अलग से लग गई याने कि "आये थे हरि भजन को और ओटन लगे कपास"

चलते-चलते

धर्मार्थ अस्पताल में डॉक्टर से एक व्यक्ति ने आकर कहा, "मोशन क्लियर नहीं हो रहा है डॉ. साब।"

डॉक्टर ने दवा दे दी।

दूसरे दिन फिर वह आ गया और बोला, "आज भी मोशन क्लियर नहीं हुआ।"

डॉक्टर ने पिछले दिन से अधिक स्ट्रॉग दवा दी।

तीसरे दिन फिर वह आ गया और बोला, "आप की दवा ने आज भी असर नहीं किया।"

डॉक्टर ने और अधिक स्ट्रॉग दवा दी।

चौथे दिन फिर वह आ पहुँचा और बताया कि अभी भी दवा ने असर नहीं किया।

डॉक्टर ने झल्ला कहा, "अरे यार, तुमको मैंने कल जो जुलाब दिया था उसको घोड़े को भी खिला दो तो उसकी टट्टी निकल जाये! आखिर तुम हो क्या बला? करते क्या हो तुम?"

"मैं हिन्दी ब्लोगर हूँ साहब।"

सुनकर डॉक्टर साहब कुछ नरम पड़े और जेब से बीस का एक नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, "ये बीस रुपये लो और जाकर खाना खा लो, कल जरूर मोशन क्लियर हो जायेगा।"

Monday, October 12, 2009

ये हिन्दी बलॉगिंग तो हमारा दिवाला निकाल रहा है

हम तो नेट के संसार में आए थे कुछ कमाई करने के उद्देश्य से। हमने सुन रखा था कि नेट से भी कमाई की जाती है इसलिए सन् 2004 में स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने के बाद हम लग गए इसी चक्कर में। बहुत शोध किया, डोमेननेम रजिस्टर कराया, होस्टिंग सेवा ले ली और कुछ अंग्रेजी लेख डाल कर खोल दिया अपना वेबसाइट। कुछ अंग्रेजी ब्लॉग्स भी बना लिया। एडसेंस पब्लिशर बन गये। बहुत सारे एफिलियेट लिंक्स डाल दिया अपने वेबसाइट्स में। कहने का मतलब यह कि बहुत पापड़ बेला। और आखिर में आठ महीने बाद हमारा पहला एडसेंस चेक हमें मिला।

इस बीच में हिन्दी ब्लॉगिंग के विषय में पता चला तो उसमें घुस गये। हिन्दी में भी गूगल एड्स आते थे उस समय। बस क्या था अपने मेन साइट को हिन्दी कर डाला। बहुत सारे सबडोमेन बना डाले और कई प्रकार के लेख लिख डाले उदाहरण के लिए देखे हमारी साइट भारतीय सिनेमा। एडसेंस ने भी रंग दिखाना शुरू किया और आठ महीने से पाँच, पाच से तीन होते होते हर महीने चेक आने लगा। तो अंग्रेजी लेखन के तरफ से ध्यान हटा कर हिन्दी में ही लिखने लगे। पर एकाएक हिन्दी में एडसेंस आना बंद हो गया, आता भी था तो गूगल का सार्वजनिक सेवा विज्ञापन। तो कमाई कम हो गई। अंग्रेजी के कुछ साइट्स से अभी भी कमाई हो रही है कुछ कुछ, याने कि हर तीसरे महीने गूगल से एक चेक मिल जाता है।

तो इस प्रकार से हिन्दी ब्लॉग ने दिवाला निकाल कर रख दिया हमारा। अब अंग्रेजी लेखन के तरफ ध्यान जाता ही नहीं। हिन्दी ब्लॉगिंग का चस्का ऐसा लग गया है कि सारा समय उसी में बीत जाता है। बस हम तो यही मना रहे हैं कि हिन्दी से भी जल्दी से जल्दी कमाई होना शुरू हो जाये।

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संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण की दूसरी किश्त - राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म - बालकाण्ड (2)
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Tuesday, October 6, 2009

गूगल सर्च में अब हिन्दी सर्च बढ़ते जा रहा है

हिन्दी में गूगल सर्च करने के प्रति अब लोगों की रुचि बढ़ते जा रही है। यकीन नहीं होता तो http://google.co.in खोलिए और अंग्रेजी के एक दो अक्षर टाइप कीजिए। फौरन आपके समक्ष ड्रॉपडाउन बॉक्स खुलेगा और हिन्दी में किए गए सर्च की लिस्ट दिखाई देने लगेगी। स्क्रीनशॉट देखें


याने कि गूगल सर्च में अब हिन्दी सर्च बढ़ते जा रहा है!

वैसे यदि आप यह जानना चाहें कि आज भारत में गूगल सर्च में सबसे अधिक सर्च क्या किया गया तो गूगल ट्रेंड्स याने कि http://www.google.co.in/trends खोल लीजिए। खुलते ही वह आपको दस सबसे अधिक किए गए सर्च्स की सूची दिखा देगा। स्क्रीनशॉट देखें

हमने तो सोचा था कि आज सबसे ज्यादा किए गये सर्च को टॉपिक बना कर एक पोस्ट लिख देंगे पर यह क्या? पता नहीं क्या क्या खोजते रहते हैं लोग? धत्तेरे की! इन खोज पर तो एक अच्छा सा पोस्ट भी नहीं लिखा जा सकता।

चलते-चलते

बोर हो रहा था वो। सोचा चलो हिन्दी ब्लोग्स ही पढ़ लें। जी.के. अवधिया जैसे ब्लोगर्स के एक दो पोस्ट्स पढ़ कर और भी बोर हो गया बेचारा। तो अब क्या करे? चला गया फिल्म देखने। अंग्रेजी पिक्चर! किस-विस वाले बहुत से सीन थे उसमें। उत्तेजित हो कर निकला। दूर से देखा एक घर के दरवाजे पर एक खूबसूरत महिला खड़ी है। जब उस घर के पास पहुँचा तो महिला घर के भीतर जाने लगी। वह भी उसके पीछे घर में घुस गया। महिला के कमरे तक जा पहुँचा और उत्तेजना के वशीभूत उसे किस करने लगा।

महिला ऐतराज करते हुये कहे जा रही थी, "छोड़ो छोड़ो, जान न पहचान प्यार करते हो। शर्म नहीं आती बिना जान-पहचान के प्यार करते हए?"

आवाज सुन कर महिला का पति वहाँ आ पहुँचा। उसकी हरकत देख कर महिला के पति ने आव देखा न ताव, झपट कर उसे जमीन पर पटक दिया और उसकी छाती पर सवार हो कर उसकी धुनाई करने लगा।

महिला जोर जोर से कहने लगी, "और मारो, और मारो, जान न पहचान प्यार करता है। और मारो, और मारो, जान न पहचान प्यार करता है।"

वो भी कमजोर नहीं था। थोड़ी देर तक मार खाते रहा फिर जोर लगा कर महिला के पति को नीचे गिरा दिया और छाती पर सवार होकर खाये हुये मार का बदला निकालने लगा।

महिला फिर जोर जोर से चिल्लाने लगी, "और मारो, और मारो, खुद प्यार करता है दूसरे को प्यार करने देता है।"