बहुत दिनों से जानने की इच्छा थी कि क्या वाकइ आनलाइन स्टोर से कुछ कमाया जा सकता है? इसीलिये आज से हमने भी अपना एक आनलाइन ई-बुक स्टोर खोल लिया है।
फिलहाल तो इस स्टोर में वे अंग्रेजी ईबुक्स ही हैं जो कि स्क्रिप्ट खरीदने के साथ मिली हैं किन्तु बहुत जल्दी ही इसमें अब हिन्दी के ईबुक्स भी डाल देने की योजना है। फिलहाल तो उपलबद्ध अंग्रेजी ईबुक्स की कीमत को मैंने बहुत कम कर दिया है।
तो यह है मेरा व्यावसायिकता की ओर बढ़ने का पहला कदम।
Monday, November 17, 2008
Saturday, November 15, 2008
ये चंदा रूस का ना ये जापान का

ये चंदा रूस का ना ये जापान का
ना ये अमरीकन प्यारे
ये तो है हिन्दुस्तान का!
जी हाँ, भारत का पहला मानव रहित अंतरिक्ष यान, चंद्रयान, 1, अंततः चंद्रमा की सतह पर पहुँच ही नहीं गया वरन भारतीय तिरंगे से चित्रित "प्रोब" को भी चांद की सतह पर रख दिया।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार भारतीय ध्वज के साथ चित्रित प्रोब ने दिनांक 14-11-2008 को भारतीय समय के अनुसार रात्रि 8-34 बजे (1504 GMT) चंद्रमा की सतह को छुआ।
हमारे वैज्ञानिकों ने ऐसे चन्द्रयान, जो कि चंद्रमा के वायुमंडल की संरचना को मापने सहित विभिन्न प्रयोगों के लिये सक्षम है, को सफलतापूर्वक चांद पर भेज कर साबित कर दिया है कि हमारा भारत भी किसी से कम नहीं है, निश्चित रूप से अब वह एक विश्व शक्ति के रूप में उभर रहा है।
चंद्रयान 1, जिसे कि भारतीय अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया था, ने तीन हफ्ते पहले चंद्रमा की परिक्रमा करना आरम्भ किया था तथा दिनांक 14-11-2008 को भारतीय समय के अनुसार रात्रि 8-34 बजे 30kg वजन वाले तिरंगे से चित्रित प्रोब को चंद्रमा की सतह पर रख कर मिशन के पहले चरण का समापन किया।
Monday, November 10, 2008
आखिर हिन्दी ब्लोग्स सामान्य पाठकों को कब आकर्षित करेंगे?
हिन्दी ब्लोग्स की टिप्पणियों को पढ़ कर यही प्रतीत होता है कि को आज भी केवल हिन्दी ब्लोगर्स ही एक दूसरे के ब्लोग्स को पढ़ते हैं। सामान्य पाठकों का उनके प्रति कोई आकर्षण कहीं पर भी दृष्टिगत नहीं होता। यह बात तो है कि अभी भी भारत में इंटरनेट का प्रयोग अपेक्षाकृत बहुत कम है। किन्तु यह भी सत्य है कि "ब्लोग" से अब लोग अपरिचित नहीं रहे हैं। अमिताभ बच्चन साहब के ब्लोग(जो कि अंग्रेजी में है) की सैकड़ों टिप्पणियाँ, जो कि सामान्य वर्ग के लोगों के द्वारा की गई होती हैं, सिद्ध करती हैं कि पाठकों की संख्या इतनी भी नगण्य नहीं है कि हमें हिन्दी ब्लोग्स के लिये पाठक ही न मिल पायें। अतः लगता है कि यदि कोई खामी है तो कहीं न कहीं हमारे ब्लोग लेखन में ही है। अब समय आ गया है कि हम अपने लेखन की स्वयं ही समालोचना करें और खामियों को दूर कर के कुछ ऐसा लिखें जो कि आम लोगों को आकर्षित कर सके।
Saturday, November 8, 2008
लिख ले बेटा जो कुछ भी लिखना है! पर कोई पढ़ेगा तब ना?
बहुत दिन हो गये कुछ लिखे हुये। सोचा कुछ लिख लिया जाये। पर सूझ नहीं रहा था कि क्या लिखूँ। भीतर से आवाज आ रही थी कि लिख ले बेटा जो कुछ भी लिखना है! पर कोई पढ़ेगा तब ना?
मैने भी आवाज देने वाले से पूछा, "कोई क्यों नहीं पढ़ेगा?"
"तू अच्छी तरह से जानता है कि हर कोई सिर्फ अपनी पढ़वाना चाहता है, दूसरों की पढ़ना नहीं। तू ही दूसरों को कब कब पढ़ता है?"
"ऐसे में हिन्दी आगे कैसे बढ़ेगी?"
"तू क्यों फिकर कर रहा है? क्या तूने ठेका ले लिया है हिन्दी को आगे बढ़ाने का? तू तो बस ये सोच कि लोग तुझे कैसे पढ़ेंगे, छोड़ हिन्दी-विन्दी की फिकर।"
"अच्छा तो यही बता दो कि लोग मुझे पढ़ें इसके लिये मैं क्या करूँ?"
"ये तो तेरी समस्या है, इसे तू ही सुलझा। अपुन को नहीं पता कि लोग तुझे कैसे पढ़ेंगे।"
"अरे कुछ तो बता।"
कोई जवाब नहीं....
"बता भी ना यार।"
फिर वही चुप्पी ....
फिर हमने भी सोच लिया कि लिया कि लिखेंगे जरूर पर किसी को पढ़वाने के लिये नहीं, अपनी संतुष्टि के लिये। आखिर तुलसीदास जी ने भी तो "स्वांतः सुखाय" लिखा था, किसी को पढ़वाने के लिये नहीं। तो हमें भी क्या उनका अनुसरण नहीं करना चाहिये?
मैने भी आवाज देने वाले से पूछा, "कोई क्यों नहीं पढ़ेगा?"
"तू अच्छी तरह से जानता है कि हर कोई सिर्फ अपनी पढ़वाना चाहता है, दूसरों की पढ़ना नहीं। तू ही दूसरों को कब कब पढ़ता है?"
"ऐसे में हिन्दी आगे कैसे बढ़ेगी?"
"तू क्यों फिकर कर रहा है? क्या तूने ठेका ले लिया है हिन्दी को आगे बढ़ाने का? तू तो बस ये सोच कि लोग तुझे कैसे पढ़ेंगे, छोड़ हिन्दी-विन्दी की फिकर।"
"अच्छा तो यही बता दो कि लोग मुझे पढ़ें इसके लिये मैं क्या करूँ?"
"ये तो तेरी समस्या है, इसे तू ही सुलझा। अपुन को नहीं पता कि लोग तुझे कैसे पढ़ेंगे।"
"अरे कुछ तो बता।"
कोई जवाब नहीं....
"बता भी ना यार।"
फिर वही चुप्पी ....
फिर हमने भी सोच लिया कि लिया कि लिखेंगे जरूर पर किसी को पढ़वाने के लिये नहीं, अपनी संतुष्टि के लिये। आखिर तुलसीदास जी ने भी तो "स्वांतः सुखाय" लिखा था, किसी को पढ़वाने के लिये नहीं। तो हमें भी क्या उनका अनुसरण नहीं करना चाहिये?
Sunday, July 20, 2008
सारे ब्लोगर्स हमें बहुत याद आये
लगभग एक महीने बाद आप सब से बतियाने का मौका मिला है, और आगे कब मिलेगा अभी तय नहीं है। वो क्या है कि हमारे कम्प्यूटर जी "घुच्च" हो गये। जो बैठे कि उठने का नाम नहीं ले रहे हैं। हमने भी सोच लिया है कि "बच्चू, बैठे रहो, अब हम तुम्हारी मरम्मत न करवा कर नया ही लायेंगे"। और अपने इस जिद में आप सब से जुदाई मोल ले ली है। पर अब हमें पता चल रहा है कि अपने लोगों से दूर होने में क्या दर्द होता है। बार बार ये गीत याद आते है कि "न पूछो ये दिन हमने कैसे बिताये, सारे ब्लोगर्स हमें बहुत याद आये", "तुझे खो दिया हमने पाने के बाद, तेरी याद आई तेरे जाने के बाद", "तेरा जाना, दिल के अरमानों का खो जाना..."
आज हमें एक मित्र के सौजन्य से आप लोगों से मुलाकात करने का अवसर मिल गया है तो सोचा कि सूचना के तौर पर एक छोटा सा पोस्ट लिख मारें। अब कौन जाने कितने दिन और आप लोगों से दूर रहना पड़े।
ऐसा भी नहीं है कि हमें नेट पर आने का मौका न मिल रहा हो। नेट पर आने का मौका तो मिलता है पर इतने अधिक देर के लिये नहीं कि आप लोगों से रू-ब-रू हो पायें, सिर्फ अपना मेल-वेल देख लेते हैं और आप सभी लोगों के पोस्ट्स के कम से कम हेडिंग्स भी देख लिया करते हैं एग्रीगेटर्स में जा कर।
तो अगला अवसर मिलने तक के लिये फिलहाल अलविदा।
आज हमें एक मित्र के सौजन्य से आप लोगों से मुलाकात करने का अवसर मिल गया है तो सोचा कि सूचना के तौर पर एक छोटा सा पोस्ट लिख मारें। अब कौन जाने कितने दिन और आप लोगों से दूर रहना पड़े।
ऐसा भी नहीं है कि हमें नेट पर आने का मौका न मिल रहा हो। नेट पर आने का मौका तो मिलता है पर इतने अधिक देर के लिये नहीं कि आप लोगों से रू-ब-रू हो पायें, सिर्फ अपना मेल-वेल देख लेते हैं और आप सभी लोगों के पोस्ट्स के कम से कम हेडिंग्स भी देख लिया करते हैं एग्रीगेटर्स में जा कर।
तो अगला अवसर मिलने तक के लिये फिलहाल अलविदा।
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