चलिये आज मैं अपना किस्सा बता ही दूँ। किस्से का सारांश है
आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास।
लिखना हमें आता नहीं अरु बन गये ब्लोगरदास॥
अब उपरोक्त दोहे में मात्रा सही है या नहीं यह देखने का कष्ट मत करियेगा क्योंकि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि 'लिखना तो आता नहीं...'।
अक्टूबर 2004 में अपनी नौकरी से स्वैच्छिक सेवा निवृति ले लेने के बाद मेरे पास समय ही समय था, साथ ही कम्प्यूटर और इन्टरनेट कनेक्शन भी था। सुन रखा था कि नेट से कमाई करने के बहुत सारे तरीके हैं। तो सारा समय मैं इस चक्कर में इन्टरनेट को खंगालते रहता था। खंगालते खंगालते पता चला कि हिन्दी ब्लोगिंग नाम की भी एक चिड़िया होती है। बस क्या था ब्लोगर में एक खाता खोल लिया। अब समस्या यह थी कि 'लिखना तो...', पर जब अपना एक ब्लोग बना ही लिया है तो कुछ न कुछ पोस्ट करना भी जरूरी है। सोचा कि किस्सा हातिमताई या सिंहासन बत्तीसी या फिर बैताल पच्चीसी आदि को अपने ब्लोग में डाला जाये। पर लगा कि इन कहानियों की ओर भला आजकल कौन तवज्जो देने वाला है?
फिर ध्यान में आया कि मैं नहीं लिख सकता तो क्या हुआ, मेरे स्वर्गीय पिताश्री के तो बहुत सी रचनाएँ मेरे पास है। पिताजी को अपने जमाने के पत्र पत्रिकाओं में छपते तो अवश्य थे किन्तु उन्हे उसके बावजूद भी सन्तुष्टि नहीं थी। वे अपनी रचनाओं को स्वतंत्र रूप से प्रकाशित देखना चाहते थे। एक बार अपने उपन्यास धान के देश में को स्वयं प्रकाशक बन कर प्रकाशित भी किया। पुस्तक तो खैर क्या बिकी हाँ घड़ी चेन आदि सभी बिक गये। तो मैंने उसी उपन्यास को अपने ब्लोग में डालना शुरू कर दिया। फिर उनकी कविताओं को। फिर उनकी अन्य रचनाओं को। पर एक दिन वह भी आ गया कि मेरे पास अपने ब्लोग में डालने के लिये उनकी एक भी रचना नहीं बची।
ब्लोगिंग का नशा अब तक लत बन चुकी थी। क्या करें? जबरदस्ती जो मन में आये लिखना शुरू कर दिया और आज तक ब्लोगर बने हुये हैं।
Monday, June 22, 2009
Thursday, May 28, 2009
तरस जाओगे भीख देने के लिये यदि हम मांगने न आयें तो
"कुछ दे दो बाबा, भगवान आपका भला करेगा।" मेरे पास आकर वो बोला। अच्छा खासा जवान आदमी था, किसी प्रकार की शारीरिक अपंगता भी न थी।
"हट्टे-जवान आदमी होकर भी भीख मांगते शर्म नहीं आती। कुछ काम क्यों नहीं करते?" मैंने कहा।
"काम ही तो कर रहा हूँ। क्या भीख मांगना काम नहीं है? हम लोग यदि मांगने न आयें तो आप लोग भीख देने के लिये तरस जायेंगे। कुछ देना है तो दीजिये, फालतू उपदेश देकर मेरे धंधे का वक्त खोटा मत कीजिये।"
उसकी बातें सुनकर मेरे ज्ञान चक्षु खुल गये। मैंने सोचा ठीक ही तो कह रहा है। जेब से एक रुपये सिक्का निकाल कर कहा, ये लो।
उसने एक के सिक्के को तुच्छ नजरों से देखा और बोला, "एक रुपये से क्या होता है साहब आजकल? एक रुपये में एक सिगरेट तक तो नहीं मिलता। सिगरेट की बात छोड़िये, एक पानी पाउच तक तो नहीं आता, रायपुर की इस बढ़ी हुई गर्मी में दुकानदार लोग एक रुपये के पानी पाउच को दो रुपये से तीन रुपये तक में बेच रहे हैं, लोग यह तक नहीं जानते कि अधिक पैसे लेकर उन्हें महीनों पुराने स्टॉक का सड़ा पानी दिया जा रहा है। दस रुपये नहीं तो कम से कम पाँच रुपये तो दीजिये।"
मैं बोला, "देखो, एक रुपया लेना है तो लो नहीं तो चलते बनो।"
"वाह साहब, दोस्तों के साथ 'बार' में बैठ कर दारू पीने में तो हजार पाँच सौ रुपये खर्च कर दोगे। 'वेटर' को ही बीस पचीस रुपये टिप दे दोगे। पर हमें दस पाँच रुपये भी नहीं दे सकते।"
उसकी बातों में अब मुझे भी थोड़ा रस आने लगा था। मैंने कहा, "दारू चाहे अच्छा हो या बुरा पर वह कम से कम हमारे अंग में तो जाता है, वेटर भी अपनी सेवाएँ देता है। पर तुम्हें देने से भला क्या मिलेगा?"
"हमें देने से आपको पुण्य मिलेगा साहब जो परलोक में आपके काम आयेगा। और सबसे बड़ी बात तो हमारा आशीर्वाद मिलेगा जो अमूल्य है और इस लोक में आपकी बढ़ती करेगा। बस अब जल्दी से दस रुपये दे दीजिये।"
"देख भाई, एक रुपये ले कर चलता बन। और भी लोगों से मांगेगा तो दस पाँच रुपये बन ही जायेंगे।"
"एक रुपया तो मैं किसी से नहीं लेता साहब, मैं तो पुण्य और आशीर्वाद का व्होलसेल डीलर हूँ। देना है तो कम से कम पाँच रुपये दीजिये।"
"मैं चिल्हर पुण्य और आशीर्वाद लेना चाहता हूँ भाई थोक नहीं, जाओ तुम कोई और ग्राहक ढूंढो और मैं कोई चिल्हर दुकानदार देखूँगा।"
कुछ देर तो वो मुझे बड़ी हिकारत भरी नजर से देखता रहा फिर चला गया।
अब मेरे भी संस्कार कुछ ऐसे हैं कि वह एक रुपया मुझे काटने लगा, जब तक मैं उस रुपये को दान में न दे देता मुझे चैन नहीं मिलने वाला था। अब मैं इन्तिजार करने लगा कि कोई दूसरा भिखारी आये तो मैं उसे वो एक रुपया दे दूँ।
कुछ देर बाद मेरी मुराद पूरी हुई और एक दूसरा भिखारी मेरे पास आ कर बोला, "एक रुपया दे दीजिये साहब, गरीब भिखारी को।"
था तो वह भी पहले वाले जैसा ही याने कि हट्टा कट्टा जवान पर उसे काम करने के लिये कहने की हिम्मत अब मेरी न हुई क्योंकि मैं खुद ही अपने एक रुपये से पीछा छुड़ाना चाहता था। पर मेरे अचेतन में एकाएक पहले भिखारी के शब्द गूँज उठे और अनायास ही मेरे मुँह से निकल पड़ा, "एक रुपये से आजकल होता क्या है?"
वो बोला, "होता तो कुछ भी नहीं है साहब पर देने वाली की औकात देख कर मांगना पड़ता है।"
मुझे पहली बार अपनी औकात का पता चला। मैंने उसे एक रुपया थमाते हुये कहा, "तुम मांगने वालों की किस्मत खुल गई है कि रायपुर में एक जमाने से अठन्नी चवन्नी का चलन बन्द हो चुका है। नहीं तो एक आदमी से मुश्किल चवन्नी ही मिलती, मैं भी तुम्हें चवन्नी ही दिया होता।"
"तो क्या आप समझते हैं कि मैं आपकी चवन्नी ले लेता?" आश्चर्यमिश्रित स्वर में उसने मुझसे कहा, "नहीं साहब, मैं कभी भी आपकी चवन्नी नहीं लेता क्योंकि मैं अपने से कम औकात वालों से भीख नहीं लेता बल्कि उन्हें खुद ही कुछ दे दिया करता हूँ।"
एक रुपये से मेरा पीछा छूट चुका था इसलिये मैं खुश था और इसीलिये आगे बिना कुछ कहे सुने उसे चुपचाप चले जाने दिया।
"हट्टे-जवान आदमी होकर भी भीख मांगते शर्म नहीं आती। कुछ काम क्यों नहीं करते?" मैंने कहा।
"काम ही तो कर रहा हूँ। क्या भीख मांगना काम नहीं है? हम लोग यदि मांगने न आयें तो आप लोग भीख देने के लिये तरस जायेंगे। कुछ देना है तो दीजिये, फालतू उपदेश देकर मेरे धंधे का वक्त खोटा मत कीजिये।"
उसकी बातें सुनकर मेरे ज्ञान चक्षु खुल गये। मैंने सोचा ठीक ही तो कह रहा है। जेब से एक रुपये सिक्का निकाल कर कहा, ये लो।
उसने एक के सिक्के को तुच्छ नजरों से देखा और बोला, "एक रुपये से क्या होता है साहब आजकल? एक रुपये में एक सिगरेट तक तो नहीं मिलता। सिगरेट की बात छोड़िये, एक पानी पाउच तक तो नहीं आता, रायपुर की इस बढ़ी हुई गर्मी में दुकानदार लोग एक रुपये के पानी पाउच को दो रुपये से तीन रुपये तक में बेच रहे हैं, लोग यह तक नहीं जानते कि अधिक पैसे लेकर उन्हें महीनों पुराने स्टॉक का सड़ा पानी दिया जा रहा है। दस रुपये नहीं तो कम से कम पाँच रुपये तो दीजिये।"
मैं बोला, "देखो, एक रुपया लेना है तो लो नहीं तो चलते बनो।"
"वाह साहब, दोस्तों के साथ 'बार' में बैठ कर दारू पीने में तो हजार पाँच सौ रुपये खर्च कर दोगे। 'वेटर' को ही बीस पचीस रुपये टिप दे दोगे। पर हमें दस पाँच रुपये भी नहीं दे सकते।"
उसकी बातों में अब मुझे भी थोड़ा रस आने लगा था। मैंने कहा, "दारू चाहे अच्छा हो या बुरा पर वह कम से कम हमारे अंग में तो जाता है, वेटर भी अपनी सेवाएँ देता है। पर तुम्हें देने से भला क्या मिलेगा?"
"हमें देने से आपको पुण्य मिलेगा साहब जो परलोक में आपके काम आयेगा। और सबसे बड़ी बात तो हमारा आशीर्वाद मिलेगा जो अमूल्य है और इस लोक में आपकी बढ़ती करेगा। बस अब जल्दी से दस रुपये दे दीजिये।"
"देख भाई, एक रुपये ले कर चलता बन। और भी लोगों से मांगेगा तो दस पाँच रुपये बन ही जायेंगे।"
"एक रुपया तो मैं किसी से नहीं लेता साहब, मैं तो पुण्य और आशीर्वाद का व्होलसेल डीलर हूँ। देना है तो कम से कम पाँच रुपये दीजिये।"
"मैं चिल्हर पुण्य और आशीर्वाद लेना चाहता हूँ भाई थोक नहीं, जाओ तुम कोई और ग्राहक ढूंढो और मैं कोई चिल्हर दुकानदार देखूँगा।"
कुछ देर तो वो मुझे बड़ी हिकारत भरी नजर से देखता रहा फिर चला गया।
अब मेरे भी संस्कार कुछ ऐसे हैं कि वह एक रुपया मुझे काटने लगा, जब तक मैं उस रुपये को दान में न दे देता मुझे चैन नहीं मिलने वाला था। अब मैं इन्तिजार करने लगा कि कोई दूसरा भिखारी आये तो मैं उसे वो एक रुपया दे दूँ।
कुछ देर बाद मेरी मुराद पूरी हुई और एक दूसरा भिखारी मेरे पास आ कर बोला, "एक रुपया दे दीजिये साहब, गरीब भिखारी को।"
था तो वह भी पहले वाले जैसा ही याने कि हट्टा कट्टा जवान पर उसे काम करने के लिये कहने की हिम्मत अब मेरी न हुई क्योंकि मैं खुद ही अपने एक रुपये से पीछा छुड़ाना चाहता था। पर मेरे अचेतन में एकाएक पहले भिखारी के शब्द गूँज उठे और अनायास ही मेरे मुँह से निकल पड़ा, "एक रुपये से आजकल होता क्या है?"
वो बोला, "होता तो कुछ भी नहीं है साहब पर देने वाली की औकात देख कर मांगना पड़ता है।"
मुझे पहली बार अपनी औकात का पता चला। मैंने उसे एक रुपया थमाते हुये कहा, "तुम मांगने वालों की किस्मत खुल गई है कि रायपुर में एक जमाने से अठन्नी चवन्नी का चलन बन्द हो चुका है। नहीं तो एक आदमी से मुश्किल चवन्नी ही मिलती, मैं भी तुम्हें चवन्नी ही दिया होता।"
"तो क्या आप समझते हैं कि मैं आपकी चवन्नी ले लेता?" आश्चर्यमिश्रित स्वर में उसने मुझसे कहा, "नहीं साहब, मैं कभी भी आपकी चवन्नी नहीं लेता क्योंकि मैं अपने से कम औकात वालों से भीख नहीं लेता बल्कि उन्हें खुद ही कुछ दे दिया करता हूँ।"
एक रुपये से मेरा पीछा छूट चुका था इसलिये मैं खुश था और इसीलिये आगे बिना कुछ कहे सुने उसे चुपचाप चले जाने दिया।
Monday, May 11, 2009
देवनागरी लिपि - पूर्णतः वैज्ञानिक लिपि
शायद आपको पता होगा कि हमारी हिन्दी की वर्णमाला, वास्तव में देवनागरी वर्णमाला, पूर्णतः वैज्ञानिक है। वर्ण या अक्षर ध्वनि को प्रदर्शित करने वाले संकेत होते हैं और देवनागरी वर्णमाला को पूर्णतः ध्वनि की उत्पत्ति के आधार पर ही बनाया गया है। मनुष्य ध्वनि उत्पन्न करने के लिये अर्थात् बोलने के लिये कंठ से होठों तक के तंत्र का प्रयोग करता है और देवनागरी वर्णमाला में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि एक ही प्रकार से उत्पन्न होने वाली ध्वनियों का विशेष वर्ग हो।
कंठ से निकलने वाली ध्वनियों को स्वर कहा जाता है और उन ध्वनियों को जिनके उच्चारण के लिये उनके साथ स्वरों का मेल होना आवश्यक होता है व्यंजन कहा जाता है। देवनागरी के स्वर अ, आ इ, ई, उ, ऊ ए, ऐ, ओ, औ, अं तथा अः सीधे कंठ से उत्पन्न होते हैं तथा इनके बोलने में अन्य स्वर तंत्र जैसे कि जीभ, तालू, मूर्धा, होठ आदि का कहीं प्रयोग नहीं होता। इन 12 स्वरों के अतिरिक्त देवनागरी के चार और स्वर ऋ, ॠ, ऌ तथा ॡ हैं जो कि सीधे कंठ से उत्पन्न नहीं होते किन्तु माने स्वर ही जाते हैं। इनमें से अंतिम तीन स्वरों का प्रयोग केवल संस्कृत में ही होता है, इनका प्रयोग हिन्दी में बिल्कुल ही नहीं होता। अन्य लिपियों में भी सीधे कंठ से निकलने वाली ध्वनियों को स्वर (vowel) कहा जाता है जैसे कि अंग्रेजी में a e io u स्वर (vowel) हैं।
शेष 36 व्यंजन हैं जिन्हें कि उनकी उत्पत्ति के आधार पर आठ वर्गों में बाँटा गया है जो कि नीचे दर्शाये जा रहे हैं
क ख ग घ ङ (क वर्ग)
च छ ज झ ञ (ख वर्ग)
त थ द ध न (त वर्ग)
ट ठ ड ढ ण (ट वर्ग)
प फ ब भ म (प वर्ग)
य र ल व
स श ष ह
क्ष त्र ज्ञ
एक वर्ग के वर्णो के उच्चारण करने पर हर बार ध्वनि तंत्रों की एक ही जैसी क्रिया होती है जैसे कि प वर्ग के वर्णों को बोलने में दोनों होठ आपस में जुड़ कर अलग होंगे।
यहाँ पर यह भी बता देना उचित है कि ड़ तथा ढ़ की गणना देवनागरी के 52 अक्षरों में नहीं होती बल्कि ये संयुक्ताक्षर कहलाते हैं।
देवनागरी लिपि का पूर्णतः वैज्ञानिक आधार पर होने के ही कारण माना जाता है कि यह कम्प्यूटर के लिये सर्वथा उपयुक्त लिपि है किन्तु अक्षरों के अनेकों प्रकार से मेल होने की जटिलता के कारण इस लिपि में कैरेक्टर्स की संख्या का निर्धारण न हो पाने के कारण इसका कम्प्यूटर की भाषा में सही सही प्रयोग हो पाना अभी तक सम्भव नहीं हो सका है।
कंठ से निकलने वाली ध्वनियों को स्वर कहा जाता है और उन ध्वनियों को जिनके उच्चारण के लिये उनके साथ स्वरों का मेल होना आवश्यक होता है व्यंजन कहा जाता है। देवनागरी के स्वर अ, आ इ, ई, उ, ऊ ए, ऐ, ओ, औ, अं तथा अः सीधे कंठ से उत्पन्न होते हैं तथा इनके बोलने में अन्य स्वर तंत्र जैसे कि जीभ, तालू, मूर्धा, होठ आदि का कहीं प्रयोग नहीं होता। इन 12 स्वरों के अतिरिक्त देवनागरी के चार और स्वर ऋ, ॠ, ऌ तथा ॡ हैं जो कि सीधे कंठ से उत्पन्न नहीं होते किन्तु माने स्वर ही जाते हैं। इनमें से अंतिम तीन स्वरों का प्रयोग केवल संस्कृत में ही होता है, इनका प्रयोग हिन्दी में बिल्कुल ही नहीं होता। अन्य लिपियों में भी सीधे कंठ से निकलने वाली ध्वनियों को स्वर (vowel) कहा जाता है जैसे कि अंग्रेजी में a e io u स्वर (vowel) हैं।
शेष 36 व्यंजन हैं जिन्हें कि उनकी उत्पत्ति के आधार पर आठ वर्गों में बाँटा गया है जो कि नीचे दर्शाये जा रहे हैं
क ख ग घ ङ (क वर्ग)
च छ ज झ ञ (ख वर्ग)
त थ द ध न (त वर्ग)
ट ठ ड ढ ण (ट वर्ग)
प फ ब भ म (प वर्ग)
य र ल व
स श ष ह
क्ष त्र ज्ञ
एक वर्ग के वर्णो के उच्चारण करने पर हर बार ध्वनि तंत्रों की एक ही जैसी क्रिया होती है जैसे कि प वर्ग के वर्णों को बोलने में दोनों होठ आपस में जुड़ कर अलग होंगे।
यहाँ पर यह भी बता देना उचित है कि ड़ तथा ढ़ की गणना देवनागरी के 52 अक्षरों में नहीं होती बल्कि ये संयुक्ताक्षर कहलाते हैं।
देवनागरी लिपि का पूर्णतः वैज्ञानिक आधार पर होने के ही कारण माना जाता है कि यह कम्प्यूटर के लिये सर्वथा उपयुक्त लिपि है किन्तु अक्षरों के अनेकों प्रकार से मेल होने की जटिलता के कारण इस लिपि में कैरेक्टर्स की संख्या का निर्धारण न हो पाने के कारण इसका कम्प्यूटर की भाषा में सही सही प्रयोग हो पाना अभी तक सम्भव नहीं हो सका है।
Sunday, May 10, 2009
हम तो बेवकूफ हैं जो हर रोज माँ का चरणस्पर्श करते हैं
सोचा कि चलो थोड़ा ब्लोगवाणी को भी झाँक लें। अरे यहाँ तो आज माँ ही माँ हैं। मैं तो ठहरा पुराना आदमी जिसे कि किस दिन कौन सा डे है पता ही नहीं रहता। ब्लोगवाणी में झाँकने से पता चला कि आज मदर्स डे है।
सोचने लगा कि हम तो बेवकूफ हैं जो हर रोज माँ का चरणस्पर्श करके उसके प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हैं (आज वे इस संसार में नहीं है तो भी प्रतिदिन उन्हें याद करके मन ही मन में उन्हें प्रणाम कर लिया करते हैं)। आज के लोग अधिक बुद्धिमान हैं जिन्होंने माँ का सम्मान करने के लिये साल में एक दिन तय कर लिया है। मदर्स डे के दिन माँ का खूब सम्मान कर लो फिर बाकी दिन उन्हें देखने की भी क्या जरूरत है?
जमाना बदल गया है पर अफसोस है कि हम जमाने के साथ नहीं बदल सके।
सोचने लगा कि हम तो बेवकूफ हैं जो हर रोज माँ का चरणस्पर्श करके उसके प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हैं (आज वे इस संसार में नहीं है तो भी प्रतिदिन उन्हें याद करके मन ही मन में उन्हें प्रणाम कर लिया करते हैं)। आज के लोग अधिक बुद्धिमान हैं जिन्होंने माँ का सम्मान करने के लिये साल में एक दिन तय कर लिया है। मदर्स डे के दिन माँ का खूब सम्मान कर लो फिर बाकी दिन उन्हें देखने की भी क्या जरूरत है?
जमाना बदल गया है पर अफसोस है कि हम जमाने के साथ नहीं बदल सके।
Friday, May 8, 2009
एक ओर आलिंगन बिजनेस तो दूसरी तरफ आलिंगन अपराध
$2 प्रति आलिंगन - यह भी एक बिजनेस है
यू ट्यूब के इस व्हीडियो क्लिप में देखें कि आलिंगन भी बेचा जा सकता हैः
मित्रवत आलिंगन के कारण पाकिस्तानी महिला पर्यटन मंत्री का पदत्याग
(दो साल पुराना समाचार)
पैराशूटिंग क बाद अपने पैराशूट इंस्ट्रक्टर को पाकिस्तानी महिला पर्यटन मंत्री नीलोफर बख्तियार के द्वारा मित्रवत आलिंगन देने के कारण इस्लामिक मौलवियों ने फतवा जारी किया तथा परिणामस्वरूप उन्हें अपना पद छोड़ने के लिये मजबूर होना पड़ा।
पूरा समाचार पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।
यू ट्यूब के इस व्हीडियो क्लिप में देखें कि आलिंगन भी बेचा जा सकता हैः
मित्रवत आलिंगन के कारण पाकिस्तानी महिला पर्यटन मंत्री का पदत्याग
(दो साल पुराना समाचार)
पैराशूटिंग क बाद अपने पैराशूट इंस्ट्रक्टर को पाकिस्तानी महिला पर्यटन मंत्री नीलोफर बख्तियार के द्वारा मित्रवत आलिंगन देने के कारण इस्लामिक मौलवियों ने फतवा जारी किया तथा परिणामस्वरूप उन्हें अपना पद छोड़ने के लिये मजबूर होना पड़ा।
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