Wednesday, August 11, 2010

साग-सब्जी-तरकारी-भाजी

सोच रहा हूँ कि आज क्या लिखूँ अपने पोस्ट में? कुछ भी नहीं सूझ रहा है और खीझ रहा हूँ खुद पर। क्या हर रोज कुछ ना कुछ लिखना जरूरी है? न लिखूँ तो क्या फर्क पड़ जायेगा? और लिखता हूँ तो भी क्या फर्क पड़ जाता है? कुछ लोग पढ़ लेते हैं तो कुछ लोग 'वाह वाह' भी कर देते हैं। पर फर्क कुछ नहीं पड़ता। हिन्दी की गलतियाँ देख कर अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु के बारे में लिखा तो क्या लोगों ने सही हिन्दी लिखना शुरू कर दिया? सोचता हूँ कि क्या एक मैंने ही हिन्दी का ठेका ले रखा है? अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है क्या?

जब देखो तब किसी ना किसी बात से कुढ़ता रहता हूँ। लोगों को अंग्रेजी के बारह महीनों के नाम याद हैं पर हिन्दू वर्ष के बारह महीनों के नाम याद नहीं। कितनी ही बार कितने ही लोगों को बता चुका हूँ कि हिन्दू वर्ष के बारह महीनों के नाम हैं - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ (जेठ), आषाढ़ श्रावण (सावन), भाद्रपक्ष (भादों), आश्विन (क्वार), कार्तिक, मार्गशीष (अगहन), पूस, माघ, फाल्गुन (फागुन)। पर क्या फायदा? कोई याद रखने की कोशिश भी करता है क्या? आज के बच्चे हिन्दी की गिनती नहीं जानते, पूछते हैं कि अड़सठ याने कि सिक्सटी एट ही होता है ना? जब हिन्दी की गिनती ही नहीं आती तो पहाड़ा याद रखने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। हमारी संस्कृति दिनों-दिन रसातल में जाती जा रही है। अच्छे संस्कारों में कमी आती जा रही है। ऐसी ही बहुत सारी बातें सोच-सोच कर कुढ़ता हूँ। पूरी तरह से सठिया गया हूँ। अपनी ही हाँकते रहता हूँ। कई बार दूसरों को सीख दी है "जैसी चले बयार पीठ तैसी कर लीजे" पर जमाने के साथ खुद को कभी भी नहीं बदल पाया। जानता हूँ कि खुद को तो बदला जा सकता है, जमाने को नहीं। पर बार-बार जमाने को ही बदलने की नाकाम कोशिश करता हूँ। यह भी जानता हूँ कि ऐसा करना मूर्खता है पर जान-बूझ कर बार-बार मूर्खता करता हूँ और लोगों की नजर में बुरा भी बनता हूँ। अपने पोस्ट में ही नहीं बल्कि अपने मिलने वालों से बात-चीत करते समय भी कुछ न कुछ उपदेश-सा दे दिया करता हूँ। मेरे सामने तो वे मेरी उम्र का लिहाज कर के मेरी हाँ में हाँ मिला देते हैं पर पीठ पीछे जरूर यही कहते होंगे - 'स्साला खूँसट बुड्ढा, हमेशा होशियारी झाड़ते रहता है'।

"अब जरा कम्प्यूटर के सामने से हटिए और जाकर सब्जी ले आइए।"

मेरी सोच का सिलसिला टूटता है। पर क्षण भर बाद सोच का एक नया सिलसिला शुरू हो जाता है। सब्जी शब्द सुनकर याद आ जाता है कि एक फिल्म के किसी संवाद में "आलू की भाजी" का जिक्र था। मराठी में सब्जी को भाजी ही कहा जाता है जबकि हमारे यहाँ पालक, मेथी, बथुआ, चौलाई आदि को ही भाजी कहा जाता है। भाजी याने कि सिर्फ पत्ते वाली सब्जियाँ। अचानक सोचने लगता हूँ कि आखिर सब्जी शब्द कैसे बना होगा? क्या करना है मुझे यह जानकर कि सब्जी शब्द क्यों और कैसे बना? मैं कोई भाषाविद् हूँ क्या? अपनी सोच को झटकने की कोशिश करता हूँ पर सोच है कि चिपक कर रह गई है। उर्दू में 'हरा' को 'सब्ज' कहा जाता है, जरूर सब्जी शब्द सब्ज से ही बना होगा। सब्जी याने कि हरे रंग की सब्जियाँ - मटर, सेम आदि! तो फिर साग और तरकारी क्या होता है? शायद जो सब्जी नहीं होती याने कि हरे रंग की नहीं होती उसे तरकारी कहते हैं - आलू, टमाटर आदि। और साग? लगता है कि साग शब्द का प्रयोग शायद सब्जी-भाजी-तरकारी सभी के मेल के लिये किया जाता है, मांसाहार के लिए भी। अपने इस विश्लेषण से न तो पूर्णतः संतुष्ट हूँ और न असंतुष्ट।

"अजी, गए नहीं अभी तक?"

मेरी तन्द्रा टूटती है। उठ जाता हूँ सब्जी लाने जाने के लिए। सोच में अभी भी घूम रहा है साग-सब्जी-तरकारी-भाजी!

Tuesday, August 10, 2010

टोनही मंत्र सिद्ध करने का दिन - हरेली

अमावस की घोर अंधेरी रात! घोर अंधेरा! नदी के उस पार श्मशान में बार-बार बंग-बंग करके जलती-बुझती कोई चीज!

छत्तीसगढ़ में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने कभी ऐसे दृश्य के बारे में ना सुना हो। उस जलती-बुझती चीज को टोनही बरना कहा जाता है। बताया जाता है कि प्रतिवर्ष हरेली अर्थात् श्रावण कृष्ण अमावस्या की रात्रि को टोनही औरतें जादू-टोना करने वाली औरतें अपना मंत्र सिद्ध करती हैं। उनका मंत्र ढाई अक्षरों का होता है जिसे सिद्ध करने के लिए वे हरेली की रात्रि को निर्वस्त्र होकर श्मशान-साधना करती हैं। मंत्र सिद्ध करते समय उनके मुँह में एक प्रकार की जड़ी होती है जिसके कारण उनके मुँह से टपकने वाली लार अग्नि के समान प्रज्वलित होते जाती है। एक जमाने में जब कभी भी छत्तीसगढ़ के किसी गाँव में हैजे का प्रकोप हुआ करता था तो उस प्रकोप को गाँव में लाने का आरोप इन टोनही औरतों पर अवश्य रूप से लग जाया करता था।

आज छत्तीसगढ़ में टोनही की अवधारणा तो समाप्तप्राय हो चुकी है किन्तु इनका डर शायद अभी भी बाकी है। यही कारण है कि आज के दिन प्रत्येक घर के दरवाजों में नीम की पत्तियों वाली छोटी-छोटी डंगाले टंगी हुई दिखाई देती हैं। रायपुर में तो आटो रिक्शा तक में भी नीम की ये डालियाँ टंगी हुई दिखाई दे रही हैं। वास्तव में हम अंध-विश्वास को तो दूर कर लेते हैं किन्तु अंध-विश्वास के कारण भय को अपने भीतर से नहीं भगा पाते। अज्ञात का डर मनुष्य को आरम्भ से ही सताता रहा है और शायद अन्त तक सताता ही रहेगा।

हरेली को छत्तीसगढ़ में एक विशिष्ट त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यह हिन्दू वर्ष (चैत्र-फाल्गुन) का प्रथम त्यौहार है जबकि होली अन्तिम! हरेली के दिन छत्तीसगढ़ में गाँव का बैगा गाँव की रक्षा करने के लिए ग्राम-देवता की पूजा करता है जिसके आयोजन के प्रत्येक ग्रामवासी सहयोग-राशि प्रदान करता है। दिन में त्यौहार की खुशियाँ मनाई जाती है किन्तु रात्रि को अत्यन्त भयावह माना जाता है।

Monday, August 9, 2010

एक पोस्ट फिल्मी गीतों भरा

फिल्मी गीतों पर आधारित यह एक हल्का-फुल्का पोस्ट है यारों बकवास लगे तो मुझे ना दोष देना और बोर लगे तो आगे पढ़ना छोड़ देना!

यदि आप याद करने की कोशिश करेंगे तो आपको याद आयेगा कि आपके जीवन में एक समय ऐसा था जब न किसी प्रकार की फिक्र थी न चिंता। था तो सिर्फ आह्लाद! वसन्त हो या पतझड़, प्रसन्नता के आवेग में नीला अम्बर झूमता सा प्रतीत होता था - झूमे रे नीला अम्बर झूमे....! उम्र के उस पड़ाव में किसी ने ऐसा जादू डाल रखा था कि मन का मोर मतवाला होकर नृत्य करने लगता था - मन मोर हुआ मतवाला किसने जादू डाला रे....! जीवन के इस मौज में बाइक लेकर इस बस्ती से उस बस्ती गाते हुए घूमा करते थे - बस्ती बस्ती पर्वत पर्वत गाता जाये बंजारा लेकर दिल का इकतारा....। किसी की मुस्कुराहटों पर निसार हो जाने, किसी के दर्द को अपना लेने, किसी के लिये दिल में प्यार होने को ही आप जिन्दगी समझा करते थे - किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार किसी का दर्द हो सके ले उधार किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार जीना इसी का नाम है....। आपको अपना दिल आवारा लगा करता था और पता ही नहीं था कि वह कब किस पर आ जायेगा - है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पे आयेगा....

ऐसे में न जाने कब यौवन ने अपना जादू चलाया और मदन ने आपके हृदय में अधिकार जमा लिया। कहीं पर आपको आपकी सपनों की रानी दिखाई पड़ गई। किशोरावस्था और यौवनावस्था की उस वयःसन्धि उसकी यही हसरत हुआ करती थी कि वह पंछी बनकर आकाश में उड़ जाये - पंछी बनूँ उड़ती फिरूं मस्त गगन में....! आपका हृदय उसकी ओर खिंचते चला गया। आपको पूर्ण रूप से आभास था कि उसका हृदय भी आपके लिये आतुर रहा करता है पर न तो आप उस तक जा पाते थे और न ही वो आपको बुला पाती थी - हम से आया न गया उनसे बुलाया ना गया फासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया....। पर एक दिन जाने कैसे आपने क्या कह दिया और उसने क्या सुन लिया कि बात बन गई - जाने क्या तूने कही जाने क्या मैंने सुनी बात कुछ बन ही गई....!

अब तो आप प्रतिदिन उसके घर का चक्कर लगाने लगे। उसके घर की खिड़की के पास पहुँचने पर आपके होठों से अपने आप सीटी की आवाज निकल उठती थी। आपके सपनों की रानी यह देख कर कह उठती थी - शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो....। पर आप कहाँ मानने वाले थे? पहुँच ही जाया करते थे आँखें चार करने के लिये और नैनों के मिलते ही चैन उड़ जाया करता था - नैन मिले चैन कहाँ....

उसे भी यही लगने लग गया था कि किसी ने उसे अपना बना कर मुस्कुराना सिखा दिया है - किसी ने अपना बना के मुझको मुस्कुराना सिखा दिया....। उसके होठ मुस्कुरा उठते थे, कंगना खनक उठता था और उसकी सखियाँ कह उठती थीं - जानू जानू रे काहे खनके है तोरा कंगना....!

दोनों का मेल-मिलाप बढ़ता गया! दोनो का जीवन प्यार भरी घड़ियाँ बन गईं - जिंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है....। दोनों के दिलों के तार धड़कने लगे थे - धड़कने लगी दिल की तारों की दुनिया....। आप उससे उसके प्यार के विषय में पूछ बैठते थे और वह कह उठती थी - मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती....। आप उससे अपने प्यार को कभी ना भुलाने का वादा करने के लिए कहा करते थे - ये वादा करो चांद के सामने भुला तो ना दोगे मेरे प्यार को....

आप तनहा होते थे तो आपके हृदय के द्वार पर कोई अपनी पायल की झंकार लिये आ जाया करता था - कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये....

दिन-रात बेकरारी बनी रहती थी और मिलन होने पर ही बड़ी मुश्किल से करार आता था - बड़ी मुश्किल से दिल की बेकरारी को करार आया....। उसे एक अनजाना सा डर भी बना रहा करता था कि कहीं आप उसे छोड़ तो नहीं देंगे और वह आपसे कह उठती थी - चले जाना नहीं नैन मिलाके सैंया बेदर्दी....। जब कभी भी आप उसकी नजरों से छुप जाया करते थे वह प्यार के अनोखे दर्द से तड़प उठा करती थी - छुप गया कोई रे दूर से पुकार के दरद अनोखे हाय दे गया प्यार के....। अपने सामने आपको न पाकर उसे यही लगता था - जो दिल में खुशी बन कर आये वो दर्द बसा कर चले गये....। प्यार की शीतल जलन ने आप दोनों का चैन और आराम को छीन लिया था - हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ आराम कहाँ....

और फिर अचानक आपको उससे दूर जाना पड़ गया था। उसने समझा था कि आप बहाना बना कर उससे दूर चले गए हैं - जाना था हमसे दूर बहाने बना लिये अब तुमने कितनी दूर ठिकाने बना लिये....। दिन-रात उसका हृदय सिर्फ आप को ही पुकारा करता था कभी वह कहती थी - आन मिलो आन मिलो श्याम साँवरे.... तो कभी - आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं....। शाम की तनहाइयाँ उसके गम को और भी बढ़ा दिया करती थी - ये शाम की तनहाइयाँ ऐसे में तेरा गम....। आपके पास ना होने से उसे चांद का निकलना भी न भाता था - चांद फिर निकला मगर तुम ना आये जला फिर मेरा दिल करूँ क्या मैं हाये....। अपनी अटारी पर बदरी को देखकर उसका दिल कह उठता था - जा री जा री ओ कारी बदरिया मत बरसो री मोरी अटरिया परदेस गये हैं सँवरिया....। उसे तो लगने लग गया था कि आपने उसे भुला दिया है - मोहे भूल गये साँवरिया....। आपकी जुदाई के गम में वह बरबस गुनगुना उठती थी - तेरी याद में जल कर देख लिया अब आग में जल कर देखेंगे....

उससे दूर के कारण आपका दिल भी रो उठता था - आज तुमसे दूर होकर ऐसे रोया मेरा प्यार चाँद रोया साथ मेरे रात रोई बार बार....। आपका दिल बार बार बस उसे ही पुकारा करता था - आ जा रे अब मेरा दिल पुकारा रो रो के गम भी हारा....। उसके इंतजार में आपकी जिन्दगी दर्द बन चुकी थी - आ जा के इंतजार में जाने को है बहार भी तेरे बगैर जिन्दगी दर्द बन के रह गई....। आपको सिर्फ यही लगा करता था - हम तुझसे मुहब्बत करके सनम हँसते भी रहे रोते भी रहे....

और फिर आप फिर वापस आए थे। जब आप शहर की सीमा में स्थित नदी के उस पार पहुँचे थे तो प्रसन्नता से वह कह उठी थी - उस पार साजन इस पार सारे ले चल ओ माझी किनारे....। उसकी आँखों की प्यास बुझ गई थी - घर आया मेरा परदेसी प्यास बुझी मेरे अखियन की....। आपके घर वापस आ जाने पर उसका जिया मचलने लगा था - जबसे बलम घर आये जियरा मचल मचल जाये....

फिर अन्ततः आपका प्यार परवान चढ़ा था। वो छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा.... कहते हुए आपके घर आ गई थी और अपने जनम को सफल बनाने के लिये आपसे अनुरोध किया था - आज सजन मोहे अंग लगालो जनम सफल हो जाये....

चलते-चलते

पोस्ट में उल्लेखित गीतः

  1. झूमे से नीला अम्बर झूमे.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, तलत महमूद, संगीत - सलिल चौधरी, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - एक गाँव की कहानी, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  2. मन मोर हुआ मतवाला किसने जादू डाला रे.... (गायक/गायिका -  सुरैया, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - नरेन्द्र शर्मा, फिल्म - अफसर, प्रदर्शन वर्ष - 1950)
  3. बस्ती बस्ती पर्वत पर्वत गाता जाये बंजारा लेकर दिल का इकतारा.... (गायक/गायिका - बंजारा मोहम्मद रफी, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - रेल्वे प्लेटफार्म, प्रदर्शन वर्ष -1955)
  4. किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार किसी का दर्द हो सके ले उधार किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार जीना इसी का नाम है.... (गायक/गायिका - मुकेश, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - अनाड़ी, प्रदर्शन वर्ष -1959)
  5. है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पे आयेगा.... (गायक/गायिका - हेमन्त कुमार, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - मजरूह सुल्तानपुरी, फिल्म - सोलवाँ साल, प्रदर्शन वर्ष -1958)
  6. उड़ती फिरूं मस्त गगन में.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - चोरी चोरी, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  7. हम से आया न गया उनसे बुलाया ना गया फासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया.... (गायक/गायिका - तलत महमूद, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - देख कबीरा रोया, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  8. जाने क्या तूने कही जाने क्या मैंने सुनी बात कुछ बन ही गई.... (गायक/गायिका - गीता दत्त, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - प्यासा, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  9. शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो.... (गायक/गायिका - चीतलकर, लता मंगेशकर, संगीत - सी.रामचन्द्र, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - अलबेला, प्रदर्शन वर्ष -1951)
  10. नैन मिले चैन कहाँ.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, मन्ना डे, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - बसंत बहार, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  11. किसी ने अपना बना के मुझको मुस्कुराना सिखा दिया.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - पतिता, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  12. जानू जानू रे काहे खनके है तोरा कंगना.... (गायक/गायिका - आशा भोंसले, गीता दत्त, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - इंसान जाग उठा, प्रदर्शन वर्ष -1959)
  13. जिंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है.... (गायक/गायिका - हेमन्त कुमार, लता मंगेशकर, संगीत - सी. रामचन्द्र, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - अनाकली, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  14. धड़कने लगी दिल की तारों की दुनिया.... (गायक/गायिका - आशा भोंसले, महेन्द्र कपूर, संगीत - एन दत्ता, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - धूल का फूल, प्रदर्शन वर्ष -1959)
  15. मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - सी. रामचन्द्र, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - अनारकली, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  16. ये वादा करो चांद के सामने भुला तो ना दोगे मेरे प्यार को.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, मुकेश, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - राजहठ, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  17. कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये.... (गायक/गायिका - मन्ना डे, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - देख कबीरा रोया, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  18. बड़ी मुश्किल से दिल की बेकरारी को करार आया.... (गायक/गायिका - शमशाद बेगम, संगीत - नौशाद, गीतकार - जां निसार अख्तर, फिल्म - नग़मा, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  19. चले जाना नहीं नैन मिलाके सैंया बेदर्दी.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - हुस्नलाल भगतराम, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - बड़ी बहन, प्रदर्शन वर्ष - 1950)
  20. छुप गया कोई रे दूर से पुकार के दरद अनोखे हाय दे गया प्यार के.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - हेमन्त कुमार, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - चम्पाकली, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  21. जो दिल में खुशी बन कर आये वो दर्द बसा कर चले गये.... (गायक/गायिका - लता मंगेषकर, संगीत - हुस्नलाल भगतराम, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - बड़ी बहन, प्रदर्शन वर्ष - 1950)
  22. हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ आराम कहाँ.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - जेलर, प्रदर्शन वर्ष -1958)
  23. जाना था हमसे दूर बहाने बना लिये अब तुमने कितनी दूर ठिकाने बना लिये.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - मदन मोहन, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - अदालत, प्रदर्शन वर्ष -1958)
  24. आन मिलो आन मिलो श्याम साँवरे.... (गायक/गायिका - गीता दत्त, मन्ना डे, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - देवदास, प्रदर्शन वर्ष -1955)
  25. आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - एस एन त्रिपाठी, गीतकार - भरत व्यास, फिल्म - रानी रूपमती, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  26. ये शाम की तनहाइयाँ ऐसे में तेरा गम.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - आह, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  27. आ जाओ तड़पते हैं अरमां अब रात गुजरने वाली है.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जायपुरी, फिल्म - आवारा, प्रदर्शन वर्ष -    1951)
  28. चांद फिर निकला मगर तुम ना आये जला फिर मेरा दिल करूँ क्या मैं हाये.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - मजरूह सुल्तानपुरी, फिल्म - पेइंग गेस्ट, प्रदर्शन वर्ष -1957)
  29. जा री जा री ओ कारी बदरिया मत बरसो री मोरी अटरिया परदेस गये हैं सँवरिया.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - सी. रामचन्द्र, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - आजाद, प्रदर्शन वर्ष -1955)
  30. मोहे भूल गये साँवरिया.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - नौशाद, गीतकार - शकील बदाँयूनी बैजू, फिल्म - बावरा, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  31. तेरी याद में जल कर देख लिया अब आग में जल कर देखेंगे.... ( लता मंगेशकर, संगीत - हेमन्त कुमार, गीतकार - राजेन्द्र कृशन, फिल्म - नागिन, प्रदर्शन वर्ष -1954)
  32. आज तुमसे दूर होकर ऐसे रोया मेरा प्यार चाँद रोया साथ मेरे रात रोई बार बार.... (गायक/गायिका - मुकेश, संगीत - उषा खन्ना, गीतकार - अन्जान, फिल्म - दायरा, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  33. आ जा रे अब मेरा दिल पुकारा रो रो के गम भी हारा.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, मुकेश, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - आह, प्रदर्शन वर्ष -1953)
  34. आ जा के इंतजार में जाने को है बहार भी तेरे बगैर जिन्दगी दर्द बन के रह गई.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - हलाकू, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  35. हम तुझसे मुहब्बत करके सनम हँसते भी रहे रोते भी रहे.... (गायक/गायिका - मुकेश, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जायपुरी, फिल्म - आवारा, प्रदर्शन वर्ष -1951)
  36. उस पार साजन इस पार सारे ले चल ओ माझी किनारे.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जयपुरी, फिल्म - चोरी चोरी, प्रदर्शन वर्ष -1956)
  37. घर आया मेरा परदेसी प्यास बुझी मेरे अखियन की.... (गायक/गायिका - लता मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - शैलेन्द्र, फिल्म - आवारा, प्रदर्शन वर्ष -1951)
  38. जबसे बलम घर आये लता जियरा मचल मचल जाये.... (गायक/गायिका - मंगेशकर, संगीत - शंकर जयकिशन, गीतकार - हसरत जायपुरी, फिल्म - आवारा, प्रदर्शन वर्ष -1951)
  39. छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा.... (गायक/गायिका - शमशाद बेगम, संगीत - नौशाद, गीतकार - शकील बदाँयूनी, फिल्म - बाबुल, प्रदर्शन वर्ष -1950)
  40. आज सजन मोहे अंग लगालो जनम सफल हो जाये.... (गायक/गायिका - गीता दत्त, संगीत - सचिन देव बर्मन, गीतकार - साहिर लुधियानवी, फिल्म - प्यासा, प्रदर्शन वर्ष -1957)

Sunday, August 8, 2010

ब्लोग तो हर कोई बना सकता है ना! ब्लोग बनाना भला क्या मुश्किल काम है?

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"आज हम आपके पास अपनी कुछ शंकाओं के समाधान के लिए आए हैं लिख्खाड़ानन्द जी!"

"हम अवश्य ही आपकी शंकाओं का निवारण करेंगे टिप्पण्यानन्द जी! बताइये आपकी क्या शंकाएँ हैं?"

"तो यह बताइये लिख्खाड़ानन्द जी, जब किसी फिल्म को देखकर दर्शक कहें कि बहुत ही बेकार फिल्म है तो फिल्म बनाने वाला इसके जवाब में दर्शक से यह नहीं कहता कि तुम्ही कोई अच्छी सी फिल्म बना कर दिखाओ, जब किसी कवि सम्मेलन में श्रोता किसी कवि की कविता को हूट करते हैं तो कवि श्रोताओं से यह नहीं कहता कि तुम्ही कोई अच्छी सी कविता लिख कर दिखाओ तो फिर जब कोई पाठक किसी ब्लोग पोस्ट को पढ़ कर उसकी निरर्थकता के बारे में कुछ कहता है तो उससे कुछ सार्थक करके दिशा बदलने के लिए क्यों कहा जाता है? उन्हें पनठेलिये, मजमा लगाने वाले और खुद कुछ भी नहीं करने वाले क्यों कहा जाता है?"

"बहुत ही सीधी और सरल सी बात है टिप्पण्यानन्द जी! फिल्म हर कोई नहीं बना सकता, कविता भी हर कोई नहीं कर सकता पर ब्लोग तो हर कोई बना सकता है ना! ब्लोग बनाना भला क्या मुश्किल काम है? और आपको हम बता दें कि ब्लोग बना लेने को ही सार्थक कर के दिशा बदलना कहा जाता है! यदि हम पनठेलियों और मजमा लगाने वालों को प्रोत्साहित कर के ब्लोगर बना दें तो फिर वे भी सार्थक करने वालों की श्रेणी में आ जायेंगे। ब्लोगर बनाना तो देश और समाज के लिए बहुत ही कल्याणकारी काम है! और फिर किसी को ब्लोगर बनाने का सबसे बड़ा फायदा तो खुद को ही मिलता है ना! जिस किसी को भी आप ब्लोगर बनाते हैं वह आपका पक्का मुरीद हो जाता है और आपके प्रत्येक पोस्ट में टिप्पणी करना नहीं भूलता। यदि कभी कोई आपकी आलोचना करे तो वह आपके गुट का सदस्य बनकर आपके पक्ष में जी-जान लड़ा देने के लिए हमेशा तैयार रहता है!"

"लगता है कि खुदा-ए-शाह 'खुदगर्ज' को आपने आपने ही ब्लोगर बनाया है! तभी तो वे आपकी किसी भी आलोचना-समालोचना का सामना करने के लिए हमेशा सामने आ जाते हैं।"

"हें हें हें हें, आप तो बड़ी दूर की कौड़ी ले आया करते हैं!"

"लिख्खाड़ानन्द जी! हमने तो हिन्दी में सिर्फ 'लघु', 'लघुतर' और 'लघुतम' ही पढ़ा है किन्तु आजकल कथा-कहानियों के साथ 'लघुत्तम' विशेषण का प्रयोग देखने में आ रहा है।"

"टिप्पण्यानन्द जी! आपने कभी लघुत्तम समापवर्तक नहीं पढ़ा है क्या?"

"पढ़ा तो है लिख्खाड़ानन्द जी! किन्तु वह तो गणित से सम्बन्धित शब्द है, कथा-कहानियों के साथ लघुत्तम विशेषण का प्रयोग क्या व्याकरण की दृष्टि से अनुचित नहीं है?"

"आप भी अजीब सिड़ी आदमी हैं! आज हिन्दी के व्याकरण का ज्ञान कितने लोगों को है? आप ही बताइए कि सही हिन्दी का प्रयोग कितने लोग लोग करते हैं आज के जमाने में? कितने ही ट्रकों और बसों के पीछे 'हार्न दिजीये' लिखा होता है, पेट्रोल पंप में 'यहाँ पेट्रोल मीलता है' लिखा होता है। शासकीय कार्यालयों में जाकर देखें कि कैसी हिन्दी का चलन है वहाँ पर। आज तक किसी ने कभी कोई ऐतराज किया है क्या? फिर लघुत्तम कथा पर आपको ऐतराज करने का क्या अधिकार है? हम तो कहेंगे कि लघुतम के स्थान पर लघुत्तम का प्रयोग तो और भी अधिक प्रभावशाली है। हम तो यह भी कहेंगे कि लघुत्तम लघु और उत्तम शब्दों की संधि से बना हुआ शब्द है याने कि लघुत्तम कथा का अर्थ है लघुकथाओं में उत्तम लघुकथा!"

"संधि और समास तो हमने भी पढ़ा है पर जिस प्रकार से आप संधि-विच्छेद कर रहे हैं वैसा तो कभी नहीं पढ़ा भई!"

"आप हमारे पास शंका-समाधान के लिए आए हैं या हम से शास्त्रार्थ करने के लिए? भूल जाइये आप अपने जमाने में पढ़ी हुई हिन्दी को। वह पुराने जमाने की हिन्दी हो गई। हिन्दी तो जमाने के साथ-साथ बदलती ही रही है! एक जमाने में गाँधी जी ने 'साहब राम' और 'बेगम सीता' वाली हिन्दुस्तानी हिन्दी चलाई थी। और आज के जमाने में वही हिन्दी चलती है जिसे आज के महान साहित्यकार, पत्रकार, प्रकाशक और हम जैसे महान ब्लोगर लिखते और पढ़वाते हैं। आज हिन्दी की कोई भी नामी पत्र-पत्रिका या अखबार को पढ़ कर देख लीजिए आपको चन्द्रबिन्दु का प्रयोग कहीं नहीं मिलेगा, आज की हिन्दी में 'बच्चा हँस रहा है' कोई नहीं लिखता, 'बच्चा हंस रहा है' ही लिखा जाता है। आज के पाठक 'हंस' और 'हँस' के चक्कर में नहीं पड़ा करते। आज के जमाने में तो पढ़ने वालों को बस समझ में आना चाहिए कि आप क्या कहना चाहते हैं, हिन्दी में हिज्जे और व्याकरण की गलतियों को कोई नहीं देखता। जो लोग आज भी शुद्ध हिन्दी की बात करते हैं वे लोग लकीर के फकीर हैं। ऐसे बेवकूफों की बात कोई सुनने वाला भी नहीं है। इन मूर्खों को तो यह भी नहीं पता है कि यदि हम लोग नहीं लिखते तो हिन्दी कब की रसातल में चली गई होती!"

"धन्यवाद लिख्खाड़ानन्द जी! आपसे हमेशा ज्ञान की बातें ही सीखने को मिलती हैं। अब मैं चलता हूँ, नमस्कार!"

"नमस्कार!"

Saturday, August 7, 2010

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है

रात के सन्नाटे में बरसते पानी की टिपिर-टिपिर ध्वनि! आंगन में लगी रातरानी के फूलों की भीनी-भीनी सुवास! पड़ोस के घर में चलती हुई टीवी से सुनाई देता गीत - "मनमोर हुआ मतवाऽऽला ये किसने जादू डाला रे..."! दामिनी की दमक! सुरचाप की चमक! मेघों की कड़क! इस सुनसान रात्रि में मैं निपट अकेला इस दृश्य को देख रहा हूँ। नितांत अकेला होने पर भी मौन नहीं हूँ, स्वयं से बातें भी करते जा रहा हूँ। मैथिलीशरण गुप्त जी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।


पावस का प्रभाव बाल हृदय को उल्लासित कर रहा है, युवा प्रेमी-युगलों के हृदय में मधुर मिलन के लिये तड़प उत्पन्न कर रहा है, विरहातुरों को संतप्त कर रहा है और वृद्ध हृदय को अतीत का स्मरण करा रहा है। हम मनुष्य तो क्या, इस पावस ने तो देवाधिदेव श्री राम के हृदय को भी प्रभावित किया हैः

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥

पिछले तीन-चार दिनों से लगातार बारिश हो रही है। कभी मूसलाधार तो कभी हल्की फुहार। नदी-नाले अपनी उफान पर हैं। सरिता सम्पूर्ण धरा को अपने भीतर समेट लेना चाहती हैं। उनकी वेगवती प्रचण्ड धाराएँ चट्टानों से टकरा कर उन्हें चूर-चूर कर डालने के लिए आतुर हैं। धारा और चट्टान की टकराहट से उत्पन्न फेन की शुभ्रता नयनाभिराम प्रतीत हो रही हैं।

रात भर बरसने के बाद बारिश अभी थमी है। बरसात के रुक जाने से पक्षी अपने नीड़ से निकल आये हैं। उनकी चहचहाहट एक मधुर संगीत को जन्म दे रही है। पास के पीपल की डाल पर कोयल कूक रही है। वसुन्धरा ने हरीतिमा से अपना श्रृंगार कर लिया है। कहीं दूर कोई आल्हा गा रहा है - "बड़े लड़ैया महोबेवाला जिनके बल को वार न पार ..."!

रिमझिम की फुहार रुकी हुई है किन्तु किन्तु मेघमालाओं ने अभी भी भगवान भास्कर को ढँक रखा है। ऊदे-ऊदे बादल आसमान में अपना जादू दिखा रहे हैं। कभी वे हाथी का शक्ल ले लेते हैं तो कभी मोर का। देखते ही देखते बादल का वह टुकड़ा जो शेर जैसा दिखाई दे रहा था अब श्वान जैसा प्रतीत होने लगा है। अरे अब तो पूरे आसमान को काले-काले बादलों ने ढँक लिया। बस थोड़ी ही देर में अवश्य ही फिर से बरसने लगेंगे ये, इनके बरसने में कुछ भी सन्देह नहीं है क्योंकि आज शनिवार है और ये बादल कल शुक्रवार से छाये हुए हैं, कहा भी गया हैः

शुक्रवार की बादरी रही शनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी बिन बरसे नहि जाय॥